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CBSE • कक्षा XII • Biology • अध्याय 13
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

जैव विविधता एवं संरक्षण

जैव विविधता (Biodiversity) पृथ्वी पर जीवन के सभी रूपों, आनुवंशिक भिन्नताओं, प्रजातीय समृद्धि तथा पारिस्थितिक तंत्रों की समग्र जटिलता व बहुरूपता का परिचायक है। प्रसिद्ध सामाजिक-जीववैज्ञानिक एडवर्ड विल्सन (Edward Wilson) ने इस शब्द को लोकप्रिय बनाया। प्रस्तुत अध्याय जैव विविधता के स्तरों, वैश्विक एवं भारतीय वितरण प्रतिरूपों, जाति-क्षेत्र संबंधों, जैव विविधता की तीव्र क्षति के कारणों तथा संरक्षण की आधुनिक व पारंपरिक रणनीतियों का संपूर्ण वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है: 1. जैव विविधता के तीन स्तर: आनुवंशिक विविधता (उदा. हिमालय की Rauwolfia vomitoria से प्राप्त सर्पगंधा/रेसरपिन, भारत में धान की 50,000 व आम की 1,000 किस्में), प्रजातीय विविधता (पश्चिमी घाट में उभयचरों की विविधता पूर्वी घाट से अधिक), तथा पारिस्थितिकीय विविधता (भारत के मरुस्थल, वर्षावन, मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियां बनाम नॉर्वे)। 2. जैव विविधता का विस्तार: रॉबर्ट मे (Robert May) का वैश्विक अनुमान (लगभग 70 लाख जातियां), अध्ययनित जंतुओं में 70% से अधिक कीट, कवकों की संख्या मछलियों, उभयचरों, सरीसृपों व स्तनधारियों के योग से भी अधिक; भारत विश्व के भूभाग का केवल 2.4% होते हुए भी वैश्विक जैव विविधता में 8.1% की समृद्ध हिस्सेदारी रखता है (12 महा-विविधता देशों में शामिल)। 3. जैव विविधता के प्रतिरूप: अक्षांशीय प्रवणता (भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर विविधता में कमी, उष्णकटिबंधों में लाखों वर्षों से स्थिर अनुकूल परिस्थितियां एवं अमेजन वर्षावन—पृथ्वी के फेफड़े), तथा अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट का जाति-क्षेत्र संबंध (Species-Area Relationship: $\log S = \log C + Z \log A$)। 4. पारितंत्र स्थिरता एवं पॉल एहरलिच की 'रिवेट पोपर परिकल्पना' (Rivet Popper Hypothesis): डेविड टिलमैन के प्रयोग तथा हवाई जहाज के रिवेट (कीलों) से पारितंत्र जातियों की तुलना। 5. जैव विविधता की क्षति—'द एविल क्वार्टेट' (The Evil Quartet - दुष्ट चतुष्क): 1. आवासीय क्षति तथा विखंडन (अमेजन वन की कटाई), 2. अति-दोहन (स्टेलर समुद्री गाय, डोडो, यात्री कबूतर), 3. विदेशी जातियों का आक्रमण (नाइल पर्च, गाजर घास/पार्थेनियम, लैंटाना, जलकुंभी/वॉटर हायसिंथ एवं अफ्रीकी कैटफिश), तथा 4. सह-विलुप्तता (Co-extinctions)। 6. जैव विविधता का संरक्षण (Conservation Strategies): स्व-स्थाने संरक्षण (In-situ): 34 वैश्विक हॉटस्पॉट (भारत में पश्चिमी घाट, हिमालय, इंडो-बर्मा), राष्ट्रीय उद्यान (90), वन्यजीव अभयारण्य (448), जैवमंडल निचय (14), तथा पवित्र उपवन (Sacred Groves—मेघालय की खासी व जयंतिया पहाड़ियां)। बाह्य-स्थाने संरक्षण (Ex-situ): वानस्पतिक उद्यान, चिड़ियाघर, क्रायोप्रिजर्वेशन (तरल $N_2$ में $-196^\circ\text{C}$ पर), जीन बैंक, बीज बैंक तथा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (पृथ्वी शिखर सम्मेलन, रियो डी जेनेरियो, 1992)।

पृथ्वी के फेफड़े कहे जाने वाले अमेजन के वर्षावन, 70 लाख जातियों का रहस्य और एक हवाई जहाज जिसकी कीलें कोई चुरा रहा है!

कल्पना कीजिए कि आप 30,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहे एक हवाई जहाज में बैठे हैं, और यात्री अपनी सीटों, पंखों और खिड़कियों की कीलें (Rivets) निकालकर अपनी जेब में रखने लगें! स्टैनफोर्ड के महान पारिस्थितिकीविद् पॉल एहरलिच ने समझाया कि हमारी पृथ्वी भी ठीक उसी हवाई जहाज जैसी है, और उस पर रहने वाली हर एक प्रजाति उस जहाज की सुरक्षा को थामे रखने वाली एक कील है! जब कोई की-स्टोन प्रजाति (जैसे मधुमक्खी या बाघ) विलुप्त होती है, तो यह हवाई जहाज के पंख की मुख्य कील निकालने जैसा है—जिसके बाद पूरे पारितंत्र का भयानक पतन तय है! और दक्षिण अमेरिका का विशाल अमेजन वर्षावन, जो इतनी ऑक्सीजन छोड़ता है कि उसे 'पृथ्वी का फेफड़ा' कहा जाता है, आज सोयाबीन की खेती और मवेशियों के चरागाहों के लिए बुलडोजरों से बेरहमी से काटा जा रहा है!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

CBSE बोर्ड, CBSE तथा NEET-UG में यह अध्याय 5 से 6 अंकों का निश्चित स्कोरिंग अध्याय है: 1. 5-अंकीय सचित्र दीर्घ उत्तरीय प्रश्न: जैव विविधता की क्षति के 4 प्रमुख कारण ('द एविल क्वार्टेट') का विस्तृत विवरण, अथवा स्व-स्थाने (In-situ) बनाम बाह्य-स्थाने (Ex-situ) संरक्षण की रणनीतियों का तुलनात्मक विश्लेषण। 2. 3-अंकीय गणितीय/सैद्धांतिक प्रश्न: अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट का जाति-क्षेत्र संबंध समीकरण ($\\log S = \\log C + Z \\log A$) व आरेख, अथवा पॉल एहरलिच की रिवेट पोपर परिकल्पना। 3. NEET-UG के अनिवार्य प्रश्न: रॉबर्ट मे का 7 मिलियन का अनुमान, भारत का 8.1% विविधता योगदान, पवित्र उपवन (खासी व जयंतिया पहाड़ियां), क्रायोप्रिजर्वेशन ($-196^\circ\text{C}$), तथा 3 भारतीय हॉटस्पॉट्स के नाम।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • पारिस्थितिक तंत्र की संरचना, खाद्य जाल एवं की-स्टोन प्रजातियों की अवधारणा।
  • अक्षांश (Latitude: भूमध्य रेखा, कर्क व मकर रेखा, ध्रुव) का बुनियादी भूगोल।
  • द्विपद नामकरण एवं टैक्सोनॉमिक वर्गीकरण की समझ।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • आनुवंशिक, प्रजातीय एवं पारिस्थितिकीय जैव विविधता के मध्य स्पष्ट विभेद करना।
  • उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अत्यधिक जैव विविधता होने के तीनों पारिस्थितिक व विकासीय कारणों का विश्लेषण करना।
  • अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट के जाति-क्षेत्र संबंध ($S = C A^Z$) का आरेख बनाकर ढाल $Z$ के मानों की व्याख्या करना।
  • जैव विविधता की क्षति के 'दुष्ट चतुष्क' (Evil Quartet) के चारों घटकों का उदाहरण सहित निरूपण करना।
  • स्व-स्थाने (हॉटस्पॉट्स, राष्ट्रीय उद्यान, पवित्र उपवन) एवं बाह्य-स्थाने (क्रायोप्रिजर्वेशन, बीज बैंक) संरक्षण विधियों का तुलनात्मक मूल्यांकन करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. जैव विविधता के स्तर एवं वैश्विक...
2 2. जैव विविधता के प्रतिरूप—अक्षांशी...
3 3. पारितंत्र में जैव विविधता का महत...
4 4. जैव विविधता का संरक्षण—स्व-स्थान...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. जैव विविधता के स्तर एवं वैश्विक व भारतीय प्रतिरूप

जैव विविधता (Biodiversity): एडवर्ड विल्सन के अनुसार जैविक संगठन के सभी स्तरों पर उपस्थित विभिन्नता को जैव विविधता कहते हैं। इसके तीन प्रमुख स्तर हैं:

  • 1. आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity): एक ही प्रजाति के भीतर जीनों एवं एलीलों की विविधता।
    • उदाहरण 1: हिमालय की विभिन्न श्रेणियों में उगने वाले औषधीय पादप Rauwolfia vomitoria (सर्पगंधा) में इसके सक्रिय रसायन रेसरपिन (Reserpine) की क्षमता एवं सांद्रता में आनुवंशिक भिन्नता पाई जाती है।
    • उदाहरण 2: भारत में धान (चावल) की 50,000 से अधिक आनुवंशिक किस्में तथा आम की 1,000 से अधिक किस्में पाई जाती हैं।
  • 2. प्रजातीय विविधता (Species Diversity): किसी विशेष क्षेत्र में प्रजातियों की संख्या एवं समृद्धि।
    • उदाहरण: पश्चिमी घाट (Western Ghats) में उभयचर जातियों (Amphibians) की विविधता पूर्वी घाट से कहीं अधिक है।
  • 3. पारिस्थितिकीय विविधता (Ecological Diversity): पारितंत्र के स्तर पर विविधता।
    • उदाहरण: भारत में मरुस्थल, वर्षावन, मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियां (Coral reefs), आर्द्रभूमियां तथा अल्पाइन चरागाह पाए जाते हैं, अतः भारत की पारिस्थितिकीय विविधता स्कैंडिनेवियाई देश नॉर्वे (Norway) की तुलना में कहीं अधिक समृद्ध है।

पृथ्वी पर कुल कितनी जातियां हैं? (वैश्विक एवं भारतीय स्थिति):

  • IUCN (2004) के अनुसार अब तक लगभग 1.5 मिलियन (15 लाख) जातियों का वैज्ञानिक वर्णन किया जा चुका है।
  • वैज्ञानिक रॉबर्ट मे (Robert May) के वैश्विक आकलनों के अनुसार पृथ्वी पर कुल जातियों की संख्या लगभग 70 लाख (7 Million) है, जिसका अर्थ है कि अभी भी 78% से अधिक जातियों की खोज व नामकरण शेष है!
  • जीवों का अनुपात: अब तक खोजी गई जातियों में 70% से अधिक जंतु हैं, जबकि पादपों (शैवाल, कवक, ब्रायोफाइट्स, जिम्नोस्पर्म, एंजियोस्पर्म) का हिस्सा केवल 22% है। जंतुओं में 70% से अधिक केवल कीट (Insects) हैं (अर्थात् पृथ्वी पर प्रत्येक 10 जंतुओं में से 7 कीट हैं!)। पृथ्वी पर कवकों (Fungi) की कुल जातियों की संख्या मछलियों, उभयचरों, सरीसृपों तथा स्तनधारियों के संयुक्त योग से भी अधिक है।
  • भारत की स्थिति: भारत का भूभाग विश्व के कुल क्षेत्रफल का केवल 2.4% है, किंतु इसकी वैश्विक प्रजातीय विविधता में 8.1% की प्रभावशाली हिस्सेदारी है। इसी कारण भारत को विश्व के 12 महा-विविधता (Mega-diversity) वाले देशों में गिना जाता है। भारत में लगभग 45,000 पादप जातियां तथा इससे दोगुनी (लगभग 90,000) जंतु जातियां अभिलिखित की जा चुकी हैं।

2. जैव विविधता के प्रतिरूप—अक्षांशीय प्रवणता एवं जाति-क्षेत्र संबंध

जैव विविधता पृथ्वी पर एक समान वितरित नहीं है, बल्कि विशिष्ट प्रतिरूप दर्शाती है:

1. अक्षांशीय प्रवणता (Latitudinal Gradients):

जब हम भूमध्य रेखा (Equator) से ध्रुवों (Poles) की ओर जाते हैं, तो प्रजाति विविधता निरंतर घटती जाती है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्र ($23.5^\circ\text{N}$ कर्क रेखा से $23.5^\circ\text{S}$ मकर रेखा तक) शीतोष्ण (Temperate) एवं ध्रुवीय क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक समृद्ध जैव विविधता रखते हैं।

उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अत्यधिक जैव विविधता होने के 3 वैज्ञानिक कारण:

  1. दीर्घ विकासीय समय (Evolutionary Time): शीतोष्ण क्षेत्र अतीत में बार-बार हिमानीकरण (Glaciation / हिमयुग) से पीड़ित होते रहे हैं, जबकि उष्णकटिबंधीय क्षेत्र लाखों वर्षों से अपेक्षाकृत अबाधित और स्थिर रहे हैं, जिससे वहां जातियों के विविधीकरण (Speciation) हेतु लंबा समय मिला।
  2. अत्यधिक स्थिर एवं पूर्वानुमेय पर्यावरण: उष्णकटिबंधीय वातावरण शीतोष्ण क्षेत्रों की तरह अत्यधिक मौसमी नहीं होते, बल्कि वर्ष भर अधिक स्थिर और पूर्वानुमेय (Constant) रहते हैं, जो विशिष्ट निकेत (Niche specialization) और उच्च विविधता को बढ़ावा देते हैं।
  3. प्रचुर सौर ऊर्जा एवं उच्च उत्पादकता: उष्णकटिबंधों में वर्ष भर प्रचुर सौर ऊर्जा उपलब्ध रहती है, जो उच्च प्राथमिक उत्पादकता में योगदान करती है और अधिक जीवों का भरण-पोषण करती है।

अमेजन वर्षावन (Amazon Rainforest - दक्षिण अमेरिका): पृथ्वी पर सबसे विशाल जैव विविधता रखते हैं। इन्हें 'पृथ्वी के फेफड़े' (Lungs of the Planet) कहा जाता है क्योंकि ये पृथ्वी के वायुमंडल की लगभग 20% ऑक्सीजन प्रकाश-संश्लेषण द्वारा उत्पादित करते हैं। यहाँ 40,000 पादप प्रजातियां, 3,000 मत्स्य प्रजातियां, 1,300 पक्षी, 427 स्तनधारी, 427 उभयचर, 378 सरीसृप तथा 1,25,000 से अधिक अकशेरुकी जातियां पाई जाती हैं।

2. जाति-क्षेत्र संबंध (Species-Area Relationship):

महान जर्मन प्रकृतिविज्ञानी एवं भूगोलवेत्ता अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट (Alexander von Humboldt) ने दक्षिण अमेरिकी जंगलों में अपने व्यापक अन्वेषण के दौरान देखा कि: 'किसी क्षेत्र में अन्वेषण का क्षेत्रफल बढ़ाने पर प्रजाति समृद्धि (Species richness) बढ़ती है, किंतु केवल एक सीमा तक।'

प्रजाति समृद्धि और क्षेत्रफल के बीच का संबंध एक आयताकार अतिपरवलय (Rectangular Hyperbola) होता है। लघुगणकीय (Logarithmic) पैमाने पर यह संबंध एक सीधी रेखा बन जाता है:

$$\log S = \log C + Z \log A$$
  • $S$ = प्रजाति समृद्धि (Species richness)
  • $A$ = क्षेत्रफल (Area)
  • $Z$ = रेखा का ढाल अथवा समाश्रयण गुणांक (Regression coefficient / Slope)
  • $C$ = Y-अन्तःखंड (Y-intercept)

$Z$ मान का पारिस्थितिकीय महत्व:
• सामान्य क्षेत्रों में (चाहे ब्रिटेन के पादप हों या कैलिफोर्निया के पक्षी): $Z$ का मान अत्यंत संकीर्ण सीमा 0.1 से 0.2 के बीच ही रहता है।
• किंतु जब संपूर्ण महाद्वीपों जैसे बहुत बड़े क्षेत्रों का विश्लेषण किया जाता है, तो रेखा का ढाल अत्यधिक तीव्र (Steeper) हो जाता है और $Z$ का मान 0.6 से 1.2 तक पहुंच जाता है (उदा. विभिन्न उष्णकटिबंधीय वनों में फलभक्षी पक्षियों एवं स्तनधारियों के लिए $Z = 1.15$ होता है)।

3. पारितंत्र में जैव विविधता का महत्व एवं क्षति के कारण (The Evil Quartet)

पारितंत्र स्थिरता एवं जैव विविधता:

डेविड टिलमैन (David Tilman) ने अपने दीर्घकालिक बाहरी भूखंड प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया कि: जिन भूखंडों पर अधिक प्रजातियां थीं, उनके कुल जैवभार में साल-दर-साल कम विचलन देखा गया। अधिक विविधता ने उच्च उत्पादकता में सीधा योगदान दिया।

पॉल एहरलिच की 'रिवेट पोपर परिकल्पना' (Rivet Popper Hypothesis):

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के पारिस्थितिकीविद् पॉल एहरलिच ने पारितंत्र की तुलना एक हवाई जहाज से की:

  • हवाई जहाज = पारितंत्र; हवाई जहाज के विभिन्न भागों को जोड़ने वाली कीलें (Rivets) = प्रजातियां।
  • यदि हवाई जहाज में यात्रा करने वाला प्रत्येक यात्री एक-एक कील (Rivet) उखाड़कर घर ले जाने लगे (प्रजातियों का विलुप्तीकरण), तो शुरू में उड़ान की सुरक्षा पर कोई असर नहीं दिखता।
  • किंतु जब बहुत सारी कीलें उखाड़ ली जाती हैं, तो जहाज खतरनाक रूप से कमजोर हो जाता है।
  • महत्वपूर्ण बात यह है कि कौन सी कील निकाली जा रही है: यदि हवाई जहाज की पंखों की मुख्य कील (Key-stone species) को निकाल दिया जाए, तो हवाई जहाज की उड़ान और संरचना पर तत्काल गंभीर संकट उत्पन्न हो जाता है (जैसे परागणकारी कीटों या शीर्ष शिकारियों की विलुप्ति से संपूर्ण खाद्य जाल नष्ट हो जाता है)।

जैव विविधता की क्षति के कारण—'द एविल क्वार्टेट' (The Evil Quartet - दुष्ट चतुष्क):

वर्तमान में जातियों के विलुप्त होने की दर मानव पूर्व काल की तुलना में 100 से 1000 गुना तीव्र है। इसके 4 प्रमुख कारण हैं:

  1. 1. आवासीय क्षति तथा विखंडन (Habitat Loss and Fragmentation):
    यह जैव विविधता के विनाश का सबसे प्रमुख और विनाशकारी कारण है।
    • उष्णकटिबंधीय वर्षावन जो कभी पृथ्वी के 14% भूभाग को ढकते थे, आज कटकर 6% से भी कम रह गए हैं। अमेजन वर्षावन को सोयाबीन की खेती तथा गोमांस हेतु मवेशियों के चरागाह बनाने के लिए तेजी से साफ किया जा रहा है।
    • जब विशाल प्राकृतिक आवासों को मानव बस्तियों, सड़कों व रेल लाइनों द्वारा छोटे-छोटे टुकड़ों (खंडों) में बांट दिया जाता है, तो बड़े भूभाग की आवश्यकता वाले स्तनधारियों एवं पक्षियों की आबादी तेजी से घट जाती है।
  2. 2. अति-दोहन (Over-exploitation):
    मनुष्य की आवश्यकता जब लालच में बदल जाती है, तो प्रजातियों का अति-दोहन शुरू होता है। विगत 500 वर्षों में मनुष्य के अत्यधिक शिकार और दोहन के कारण स्टेलर की समुद्री गाय (Steller's sea cow), यात्री कबूतर (Passenger pigeon), डोडो (Dodo, मॉरीशस), तथा थाइलेसीन (तस्मानिया) जैसी प्रजातियां हमेशा के लिए विलुप्त हो गईं।
  3. 3. विदेशी जातियों का आक्रमण (Alien Species Invasions):
    जब बाहरी प्रजातियों को अनजाने में या जानबूझकर किसी नए पारितंत्र में लाया जाता है, तो प्राकृतिक परभक्षी न होने के कारण वे आक्रामक होकर स्थानीय जातियों को नष्ट कर देती हैं:
    • पूर्वी अफ्रीका की विक्टोरिया झील में जब नाइल पर्च (Nile Perch) मछली को डाला गया, तो उसने वहां की मूल निवासी 200 से अधिक सिचलिड (Cichlid) मछलियों की प्रजातियों को खाकर विलुप्त कर दिया।
    • आक्रामक खरपतवार: गाजर घास (Parthenium), लैंटाना (Lantana), तथा जलकुंभी (Eichhornia / बंगाल का आतंक) ने स्थानीय वनस्पतियों को भारी नुकसान पहुंचाया।
    • जलीय कृषि हेतु अवैध रूप से लाई गई अफ्रीकी कैटफिश (Clarias gariepinus) नदियों की स्थानीय कैटफिश प्रजातियों के अस्तित्व हेतु गंभीर संकट बन गई है।
  4. 4. सह-विलुप्तता (Co-extinctions):
    जब कोई एक प्रजाति विलुप्त होती है, तो उस पर अनिवार्य रूप से आश्रित अन्य पादप व जंतु प्रजातियां भी स्वतः विलुप्त हो जाती हैं। उदाहरण: जब कोई पोषी मछली विलुप्त होती है, तो उसके विशिष्ट परजीवी भी विलुप्त हो जाते हैं। सहोपकारी पादप-परागणकर्ता संबंध में किसी एक के नष्ट होने पर दूसरा भी नष्ट हो जाता है।

4. जैव विविधता का संरक्षण—स्व-स्थाने एवं बाह्य-स्थाने रणनीतियां

जैव विविधता के संरक्षण के तीन प्रमुख कारण हैं:

  • संकीर्ण उपयोगितावादी (Narrowly Utilitarian): प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ—भोजन, जलावन लकड़ी, रेशा, निर्माण सामग्री, औद्योगिक उत्पाद तथा औषधियां। विश्व में बिकने वाली 25% से अधिक औषधियां सीधे पौधों से प्राप्त होती हैं। (जैव-पूर्वेक्षण / Bioprospecting: आर्थिक महत्व के उत्पादों हेतु जातियों की आणविक व आनुवंशिक स्तर पर खोज)।
  • व्यापक उपयोगितावादी (Broadly Utilitarian): अप्रत्यक्ष अमूल्य पारितंत्र सेवाएं—अमेजन वन द्वारा 20% ऑक्सीजन उत्पादन, परागण (मधुमक्खी, पक्षी), बाढ़ व भूक्षरण नियंत्रण, तथा प्रकृति का सौंदर्यपरक व मानसिक आनंद।
  • नैतिक (Ethical): पृथ्वी पर प्रत्येक जीव का अपना आंतरिक मूल्य (Intrinsic value) है; भावी पीढ़ियों हेतु इस जैव-धरोहर को सुरक्षित रखना हमारा नैतिक दायित्व है।

संरक्षण की दो प्रमुख रणनीतियां:

A. स्व-स्थाने संरक्षण (In-situ / On-site Conservation):

जब संपूर्ण पारितंत्र और संकटग्रस्त प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास के भीतर ही संरक्षित किया जाता है (उदा. बाघ को बचाने हेतु संपूर्ण जंगल को सुरक्षित करना):

  1. जैव विविधता हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspots):
    नॉर्मन मायर्स द्वारा प्रतिपादित अवधारणा। ये वे क्षेत्र हैं जहाँ असाधारण रूप से उच्च प्रजाति समृद्धि तथा उच्च स्तर की स्थानिकता (Endemism - वे प्रजातियां जो केवल उसी क्षेत्र में पाई जाती हैं और दुनिया में कहीं और नहीं) होती है, किंतु वहां आवास विनाश का गंभीर खतरा मंडरा रहा होता है।
    • विश्व में पहले 25 हॉटस्पॉट थे, अब कुल 34 हॉटस्पॉट हैं।
    • हॉटस्पॉट पृथ्वी के 2% से भी कम क्षेत्रफल को घेरते हैं, किंतु इनमें यदि कठोर संरक्षण लागू कर दिया जाए, तो जारी सामूहिक विलुप्तिकरण की दर को लगभग 30% तक कम किया जा सकता है।
    • भारत के 3 प्रमुख हॉटस्पॉट:
    1. पश्चिमी घाट एवं श्रीलंका (Western Ghats & Sri Lanka)
    2. इंडो-बर्मा (Indo-Burma)
    3. हिमालय (Himalaya)।
  2. संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क (Protected Area Network): भारत में कानूनी रूप से संरक्षित क्षेत्र:
    • 14 जैवमंडल निचय (Biosphere Reserves)
    • 90 राष्ट्रीय उद्यान (National Parks)
    • 448 वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuaries)।
  3. पवित्र उपवन (Sacred Groves): भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा जहाँ वनों के कुछ हिस्सों को देवी-देवताओं को समर्पित कर दिया जाता था और वहां पेड़ों को काटना या शिकार करना पूर्णतः वर्जित होता था। अनेक दुर्लभ व संकटग्रस्त पादपों की अंतिम शरणस्थली के रूप में पवित्र उपवन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
    • मेघालय की खासी तथा जयंतिया पहाड़ियां (Khasi and Jaintia Hills)
    • राजस्थान की अरावली पहाड़ियां
    • कर्नाटक तथा महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट क्षेत्र
    • मध्य प्रदेश के सरगुजा, चंदा एवं बस्तर क्षेत्र।

B. बाह्य-स्थाने संरक्षण (Ex-situ / Off-site Conservation):

जब संकटग्रस्त पादपों और जंतुओं को उनके प्राकृतिक आवास से निकालकर मानव-निर्मित विशेष सुरक्षित स्थान पर ले जाया जाता है जहाँ उनकी विशेष देखभाल और प्रजनन कराया जाता है:

  • पारंपरिक विधियां: प्राणी उद्यान (चिड़ियाघर / Zoological Parks), वानस्पतिक उद्यान (Botanical Gardens), तथा वन्यजीव सफारी पार्क।
  • उन्नत आधुनिक तकनीकें:
    • क्रायोप्रिजर्वेशन (Cryopreservation - हिम परिरक्षण): संकटग्रस्त प्रजातियों के युग्मकों (Gametes) को तरल नाइट्रोजन में $-196^\circ\text{C}$ तापमान पर जीवित और जननक्षम अवस्था में दशकों तक सुरक्षित रखना।
    • इन विट्रो निषेचन (IVF) तथा ऊतक संवर्धन (Tissue culture) द्वारा पादपों का प्रवर्धन।
    • बीज बैंक (Seed Banks): वाणिज्यिक एवं दुर्लभ फसलों के विभिन्न आनुवंशिक प्रभेदों के बीजों को कम ताप पर दीर्घकाल हेतु संचित रखना।

अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन:

  • पृथ्वी शिखर सम्मेलन (The Earth Summit, 1992): रियो डी जेनेरियो (ब्राजील) में ऐतिहासिक सम्मेलन जहाँ सभी राष्ट्रों ने जैव विविधता के संरक्षण एवं इसके घटकों के सतत उपयोग हेतु संकल्प लिया।
  • सतत विकास पर विश्व शिखर सम्मेलन (World Summit on Sustainable Development, 2002): जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में संपन्न; 190 देशों ने 2010 तक वैश्विक, क्षेत्रीय व स्थानीय स्तर पर जैव विविधता की क्षति दर में उल्लेखनीय कमी लाने की शपथ ली।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

जाति-क्षेत्र संबंध लघुगणक समीकरण (Humboldt)
log S = log C + Z · log A
S = प्रजाति समृद्धि, A = क्षेत्रफल, Z = ढाल/समाश्रयण गुणांक (सामान्यतः 0.1-0.2, महाद्वीप 0.6-1.2)
भारत का वैश्विक जैव विविधता योगदान
विश्व भूभाग = 2.4% | वैश्विक प्रजाति विविधता = 8.1% (12 मेगा-विविधता देशों में)
पादप जातियां = ~45,000 | जंतु जातियां = ~90,000+
क्रायोप्रिजर्वेशन (Cryopreservation) मापदंड
तापमान = -196°C (तरल नाइट्रोजन / Liquid Nitrogen)
बाह्य-स्थाने (Ex-situ) संरक्षण; युग्मकों व ऊतकों का दीर्घकालिक परिरक्षण
भारत के 3 प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉट
  1. पश्चिमी घाट व श्रीलंका | 2. इंडो-बर्मा | 3. हिमालय
वैश्विक कुल हॉटस्पॉट्स = 34 (उच्च स्थानिकता / Endemism)

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
जैव विविधता की क्षति के 'दुष्ट चतुष्क' (The Evil Quartet) के चारों प्रमुख कारणों की उदाहरण सहित विस्तृत व्याख्या कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: वर्तमान में प्रजातियों के तीव्र विलुप्तीकरण के लिए उत्तरदायी चार प्रमुख कारण 'द एविल क्वार्टेट' कहलाते हैं:

  1. 1. आवासीय क्षति तथा विखंडन (Habitat loss and fragmentation): यह सबसे गंभीर कारण है। मानव बस्तियों, कृषि व उद्योगों हेतु वनों को काटा जा रहा है। अमेजन वर्षावन जो पहले 14% भूभाग घेरते थे, अब 6% से भी कम रह गए हैं। सड़कों व रेलमार्गों द्वारा वनों के विखंडन से बड़े भूभाग में घूमने वाले जीवों (जैसे हाथी, बाघ) की संख्या तेजी से घटी है।
  2. 2. अति-दोहन (Over-exploitation): मानव द्वारा अत्यधिक व्यावसायिक शिकार और दोहन के कारण विगत 500 वर्षों में मॉरीशस का डोडो पक्षी, तस्मानिया का थाइलेसीन, रूस की स्टेलर समुद्री गाय तथा यात्री कबूतर हमेशा के लिए विलुप्त हो गए।
  3. 3. विदेशी जातियों का आक्रमण (Alien species invasions): बाहरी प्रजातियां जब नए पारितंत्र में प्रवेश करती हैं तो स्थानीय जातियों को समाप्त कर देती हैं:
    • विक्टोरिया झील में नाइल पर्च मछली ने 200 से अधिक सिचलिड मछलियों की जातियों को खाकर समाप्त कर दिया।
    • आक्रामक खरपतवार जैसे गाजर घास (Parthenium), Lantana तथा जलकुंभी (Eichhornia) ने स्थानीय पेड़-पौधों को नष्ट कर दिया।
  4. 4. सह-विलुप्तता (Co-extinctions): प्रकृति में अनेक जातियां एक-दूसरे पर अनिवार्य रूप से निर्भर होती हैं। जब एक पोषी जाति विलुप्त होती है, तो उस पर आश्रित विशिष्ट परजीवी भी स्वतः विलुप्त हो जाते हैं। पादप-परागणकर्ता सहोपकारिता में एक के नष्ट होने पर दूसरा भी समाप्त हो जाता है।
उदाहरण 2
अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट के 'जाति-क्षेत्र संबंध' (Species-Area Relationship) का आरेख बनाइए तथा इसके गणितीय समीकरण की व्याख्या कीजिए। $Z$ (ढाल) के मान का पारिस्थितिकीय महत्व क्या है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. अवधारणा: अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट ने दक्षिण अमेरिकी वनों में पाया कि किसी क्षेत्र में जैसे-जैसे अन्वेषण का क्षेत्रफल ($A$) बढ़ाया जाता है, वैसे-वैसे प्रजाति समृद्धि ($S$) बढ़ती है, किंतु केवल एक निश्चित सीमा तक।
  2. गणितीय समीकरण:
    सामान्य पैमाने पर वक्र एक आयताकार अतिपरवलय (Rectangular hyperbola) होता है:
    $$S = C A^Z$$
    लघुगणक (Log-log) पैमाने पर यह संबंध एक सीधी रेखा बन जाता है:
    $$\log S = \log C + Z \log A$$
    जहाँ: $S$ = प्रजाति समृद्धि, $A$ = क्षेत्रफल, $Z$ = रेखा की ढाल (समाश्रयण गुणांक), $C$ = Y-अन्तःखंड।
  3. $Z$ मान का पारिस्थितिकीय महत्व:
    • सामान्य छोटे व मध्यम क्षेत्रों में (चाहे टैक्सोनोमिक समूह कोई भी हो), $Z$ का मान बहुत स्थिर रहता है: 0.1 से 0.2।
    • किंतु जब पूरे महाद्वीप जैसे विशालकाय क्षेत्रों का विश्लेषण किया जाता है, तो ढाल बहुत तीव्र हो जाता है और $Z$ का मान 0.6 से 1.2 तक पहुंच जाता है (उदा. उष्णकटिबंधीय वनों के फलभक्षी पक्षियों व स्तनधारियों हेतु $Z = 1.15$)। यह दर्शाता है कि विशाल क्षेत्रों में आवास विविधता अधिक होने से प्रजाति वृद्धि दर अधिक तेज होती है।
उदाहरण 3
पॉल एहरलिच की 'रिवेट पोपर परिकल्पना' (Rivet Popper Hypothesis) क्या है? पारितंत्र की स्थिरता में यह की-स्टोन जातियों (Key-stone species) के महत्व को कैसे रेखांकित करती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. परिकल्पना का स्वरूप: स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के पारिस्थितिकीविद् पॉल एहरलिच ने पारितंत्र की तुलना एक हवाई जहाज (Airplane) से की और पारितंत्र की जातियों की तुलना हवाई जहाज के पुर्जों को जोड़ने वाली कील या रिवेट (Rivets) से की।
  2. प्रक्रिया:
    • यदि हवाई जहाज का प्रत्येक यात्री अपनी सीट या खिड़की की एक-एक कील निकाल ले (प्रजातियों का विलोपन), तो प्रारंभ में जहाज की उड़ान सुरक्षित दिखती है।
    • किंतु जैसे-जैसे अधिक से अधिक कीलें निकाली जाती हैं, कुछ समय बाद हवाई जहाज अत्यंत दुर्बल और असुरक्षित हो जाता है।
  3. की-स्टोन जातियों का महत्व: एहरलिच ने स्पष्ट किया कि नुकसान की गंभीरता इस बात पर निर्भर करती है कि कौन सी कील निकाली जा रही है: यदि हवाई जहाज के भीतर की किसी सीट की कील निकाली जाए तो कम खतरा है, किंतु यदि हवाई जहाज के पंख (Wings) को थामने वाली मुख्य कील निकाल ली जाए, तो जहाज तुरंत दुर्घटनाग्रस्त हो जाएगा। इसी प्रकार पारितंत्र में की-स्टोन जातियां (जैसे प्रमुख परागणकर्ता, शीर्ष परभक्षी या प्राथमिक उत्पादक) पंखों की कील के समान हैं; यदि ये विलुप्त होती हैं, तो संपूर्ण पारितंत्र का ताना-बाना तत्काल ध्वस्त हो जाता है।
उदाहरण 4
स्व-स्थाने (In-situ) संरक्षण तथा बाह्य-स्थाने (Ex-situ) संरक्षण में अंतर स्पष्ट कीजिए। 'जैव विविधता हॉटस्पॉट्स' की प्रमुख विशेषताएं तथा भारत के तीन हॉटस्पॉट्स के नाम लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. स्व-स्थाने बनाम बाह्य-स्थाने संरक्षण:
    लक्षणस्व-स्थाने संरक्षण (In-situ)बाह्य-स्थाने संरक्षण (Ex-situ)
    परिभाषासंकटग्रस्त प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास के भीतर ही संरक्षित करना।संकटग्रस्त जीवों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर मानव-निर्मित सुरक्षित स्थल पर ले जाकर संरक्षित करना।
    दृष्टिकोणसंपूर्ण पारितंत्र का संरक्षण किया जाता है।विशिष्ट संकटापन्न जाति या उसके युग्मकों का संरक्षण।
    उदाहरणराष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, जैवमंडल निचय, पवित्र उपवन।प्राणी उद्यान (चिड़ियाघर), वानस्पतिक उद्यान, क्रायोप्रिजर्वेशन, बीज बैंक।
  2. जैव विविधता हॉटस्पॉट्स की विशेषताएं:
    • अत्यधिक उच्च प्रजाति समृद्धि (Extreme species richness)।
    • उच्च स्तर की स्थानिकता (Endemism) — अर्थात् ऐसी जातियां जो केवल उसी क्षेत्र में पाई जाती हैं और विश्व में कहीं और नहीं पाई जातीं।
    • आवास विनाश का अत्यधिक गंभीर संकट।
  3. भारत के 3 प्रमुख हॉटस्पॉट:
    1. पश्चिमी घाट एवं श्रीलंका (Western Ghats)
    2. हिमालय (Himalaya)
    3. इंडो-बर्मा (Indo-Burma)।
उदाहरण 5
'पवित्र उपवन' (Sacred Groves) क्या हैं? भारत में जैव विविधता संरक्षण में इनकी भूमिका तथा किन्हीं दो प्रमुख क्षेत्रों के नाम लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. परिभाषा: भारत की समृद्ध सांस्कृतिक एवं धार्मिक परंपरा के अंतर्गत वनों के वे भूभाग जिन्हें स्थानीय आदिवासियों एवं ग्रामीण समुदायों द्वारा देवी-देवताओं या पवित्र आत्माओं को समर्पित कर दिया जाता है और जहाँ पेड़ों को काटना, शिकार करना अथवा किसी भी प्रकार का मानवीय हस्तक्षेप पूर्णतः निषिद्ध होता है, पवित्र उपवन (Sacred Groves) कहलाते हैं।
  2. जैव विविधता संरक्षण में भूमिका: पवित्र उपवन सदियों से वनों के विनाश से अछूते रहे हैं। परिणामस्वरूप ये आज अनेक दुर्लभ, संकटापन्न एवं संकटग्रस्त पादप व जंतु जातियों की अंतिम शरणस्थली (Last refuges) बन चुके हैं जो आसपास के अन्य सभी वनों से विलुप्त हो चुकी हैं।
  3. भारत के प्रमुख पवित्र उपवन क्षेत्र:
    • मेघालय की खासी तथा जयंतिया पहाड़ियां (Khasi and Jaintia Hills in Meghalaya) — भारत के सर्वाधिक प्रसिद्ध पवित्र उपवन।
    • राजस्थान की अरावली पहाड़ियां।
    • कर्नाटक तथा महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट क्षेत्र।
    • मध्य प्रदेश के सरगुजा, चंदा एवं बस्तर क्षेत्र।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भारत के भूभाग और जैव विविधता प्रतिशत में भ्रम होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

भारत का भूभाग विश्व का केवल 2.4% है, जबकि इसकी वैश्विक प्रजाति विविधता में हिस्सेदारी 8.1% है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

क्रायोप्रिजर्वेशन को स्व-स्थाने (In-situ) संरक्षण मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

क्रायोप्रिजर्वेशन (-196°C पर प्रयोगशाला में युग्मकों को रखना) बाह्य-स्थाने (Ex-situ) संरक्षण का आधुनिक रूप है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

हॉटस्पॉट्स में स्थानिकता (Endemism) का अर्थ न समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

स्थानिकता का अर्थ है कि वे प्रजातियां केवल उसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में पाई जाती हैं और विश्व में कहीं और नहीं पाई जातीं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

जाति-क्षेत्र संबंध में Z के मान को सभी क्षेत्रों हेतु 1.15 लिख देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

छोटे/सामान्य क्षेत्रों में Z का मान 0.1 से 0.2 होता है; केवल संपूर्ण महाद्वीप जैसे विशाल क्षेत्रों में ही Z = 0.6 से 1.2 होता है।

जैव विविधता, अक्षांशीय प्रवणता एवं संरक्षण रणनीतियों का वैज्ञानिक मानचित्र (Biodiversity Conservation Architecture)

जैव विविधता एवं संरक्षण (Biodiversity & Conservation)विविधता के 3 स्तर • जाति-क्षेत्र संबंध • द एविल क्वार्टेट • स्व-स्थाने व बाह्य-स्थाने संरक्षण1. विविधता स्तर3 प्रमुख स्तर:• आनुवंशिक: Rauwolfia (50,000 धान, 1000 आम)• प्रजातीय: पश्चिमी घाट उभयचर• पारिस्थितिक: भारत vs नॉर्वेवैश्विक व भारत आंकड़े:• रॉबर्ट मे: ~70 लाख जातियां• 70% जंतु (70% कीट)• कवक > कशेरुकी कुल योगभारत: 2.4% भूमि पर 8.1%12 महा-विविधता देशों में2. विविधता प्रतिरूपअक्षांशीय प्रवणता:• भूमध्य रेखा → ध्रुव: कमी• उष्णकटिबंध में अधिकता: 1. लंबा अबाधित समय 2. स्थिर पर्यावरण 3. प्रचुर सौर ऊर्जा/उत्पादकता• अमेजन वर्षावन: पृथ्वी फेफड़ेजाति-क्षेत्र संबंध (Humboldt):• log S = log C + Z·log A• Z = 0.1-0.2 (सामान्य)• Z = 0.6-1.2 (महाद्वीपीय)रिवेट पोपर: Paul Ehrlich3. द एविल क्वार्टेटजैव विविधता क्षति कारक:1. आवासीय क्षति व विखंडन: अमेजन वन 14% से घटकर 6%2. अति-दोहन (Greed): डोडो, स्टेलर गाय, यात्री कबूतर3. विदेशी जातियों का आक्रमण: नाइल पर्च (200 सिचलिड नष्ट) गाजर घास, जलकुंभी, कैटफिश4. सह-विलुप्तता: पोषी नष्ट → परजीवी नष्टवर्तमान विलुप्ति दर 100-1000 गुनातीव्र है (छठा महा-विलोपन)4. संरक्षण रणनीतियांस्व-स्थाने (In-situ):• 34 वैश्विक हॉटस्पॉट्स (पश्चिमी घाट, हिमालय, इंडो-बर्मा)• 14 बायोस्फीयर, 90 राष्ट्रीय उद्यान• 448 अभयारण्य• पवित्र उपवन: खासी पहाड़ियांबाह्य-स्थाने (Ex-situ):• चिड़ियाघर, बॉटनिकल गार्डन• क्रायोप्रिजर्वेशन (-196°C N₂)• बीज बैंक, टेस्ट ट्यूब क्लोनिंगपृथ्वी सम्मेलन (1992, रियो)विश्व शिखर सम्मेलन (2002)

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
जैव विविधता के तीन स्तर हैं: आनुवंशिक (Rauwolfia, धान 50,000 किस्में), प्रजातीय (पश्चिमी घाट उभयचर), तथा पारिस्थितिकीय (भारत vs नॉर्वे)।
मुख्य बिंदु 2
रॉबर्ट मे के अनुसार कुल वैश्विक जातियां लगभग 70 लाख हैं; ज्ञात जंतुओं में 70% कीट हैं; कवक जातियां सभी कशेरुकियों के योग से अधिक हैं।
मुख्य बिंदु 3
भारत विश्व के 2.4% भूभाग पर 8.1% वैश्विक प्रजाति विविधता रखता है (12 महा-विविधता देशों में एक)।
मुख्य बिंदु 4
अक्षांशीय प्रवणता के अनुसार भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर विविधता घटती है; उष्णकटिबंध में लंबा समय, स्थिर मौसम व अधिक सौर ऊर्जा है।
मुख्य बिंदु 5
अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट का जाति-क्षेत्र संबंध log S = log C + Z log A है; Z का मान सामान्यतः 0.1-0.2 तथा महाद्वीपों में 0.6-1.2 होता है।
मुख्य बिंदु 6
पॉल एहरलिच की रिवेट पोपर परिकल्पना हवाई जहाज की कीलों द्वारा की-स्टोन प्रजातियों के महत्वपूर्ण पारिस्थितिक योगदान को समझाती है।
मुख्य बिंदु 7
जैव विविधता क्षति का दुष्ट चतुष्क (Evil Quartet): 1. आवासीय क्षति व विखंडन, 2. अति-दोहन, 3. विदेशी जातियों का आक्रमण, 4. सह-विलुप्तता।
मुख्य बिंदु 8
स्व-स्थाने (In-situ) संरक्षण में 34 हॉटस्पॉट्स (भारत में पश्चिमी घाट, हिमालय, इंडो-बर्मा), 14 बायोस्फीयर रिजर्व, तथा पवित्र उपवन (खासी पहाड़ियां) आते हैं।
मुख्य बिंदु 9
बाह्य-स्थाने (Ex-situ) संरक्षण में क्रायोप्रिजर्वेशन (-196°C पर तरल नाइट्रोजन), बीज बैंक, वानस्पतिक उद्यान व चिड़ियाघर शामिल हैं।
मुख्य बिंदु 10
1992 में रियो डी जेनेरियो में ऐतिहासिक पृथ्वी शिखर सम्मेलन (Earth Summit) जैव विविधता के संरक्षण हेतु आयोजित किया गया।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
रॉबर्ट मे (Robert May) के वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार पृथ्वी पर पाई जाने वाली प्रजातियों की कुल संख्या लगभग कितनी है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
2
अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट के जाति-क्षेत्र संबंध समीकरण (log S = log C + Z log A) में संपूर्ण महाद्वीपों जैसे विशाल क्षेत्रों हेतु समाश्रयण ढाल 'Z' का मान क्या होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
3
बाह्य-स्थाने (Ex-situ) संरक्षण की आधुनिक तकनीक 'क्रायोप्रिजर्वेशन' (Cryopreservation) में युग्मकों को किस तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C
4
भारत में दुर्लभ एवं संकटग्रस्त पादपों की अंतिम शरणस्थली के रूप में प्रसिद्ध 'पवित्र उपवन' (Sacred Groves) मुख्य रूप से कहाँ स्थित हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: A
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