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CBSE • कक्षा XII • Biology • अध्याय 12
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

पारितंत्र (Ecosystem)

पारितंत्र (Ecosystem) प्रकृति की वह आधारभूत क्रियात्मक इकाई (Functional unit of nature) है, जहाँ जैविक समुदाय (पादप, जंतु एवं सूक्ष्मजीव) अपने भौतिक पर्यावरण (मृदा, जल, वायु, प्रकाश) के साथ ऊर्जा प्रवाह एवं पोषक तत्वों के चक्रण द्वारा एक समन्वित एवं आत्मनिर्भर तंत्र का निर्माण करते हैं। पारितंत्र शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1935 में ए. जी. टांसले (A.G. Tansley) द्वारा किया गया था। प्रस्तुत अध्याय पारितंत्र की संरचना, ऊर्जा गतिकी एवं पारिस्थितिक प्रक्रियाओं का समग्र वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है: 1. पारितंत्र की संरचना एवं कार्य: उत्पादकता (Productivity)—सकल प्राथमिक उत्पादकता (GPP), शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता ($NPP = GPP - R$), तथा संपूर्ण जीवमंडल की वार्षिक उत्पादकता (लगभग 170 अरब टन शुष्क भार, जिसमें समुद्रों का योगदान केवल 55 अरब टन है)। 2. अपघटन (Decomposition - प्रकृति का पुनर्चक्रण): अपरद (Detritus) के अपघटन के 5 क्रमिक चरण—खंडन (Fragmentation), निक्षालन (Leaching), अपचयन (Catabolism), ह्युमीफिकेशन (Humification—ह्यूमस निर्माण) एवं खनिजीभवन (Mineralization)। 3. ऊर्जा प्रवाह (Energy Flow): आपतित सौर विकिरण एवं प्रकाश-संश्लेषणात्मक सक्रिय विकिरण (PAR - 50%), पादपों द्वारा 2-10% PAR का प्रग्रहण, लिंडेमान का 10% ऊर्जा स्थानांतरण नियम, तथा चराई खाद्य शृंखला (GFC) बनाम अपरद खाद्य शृंखला (DFC)। 4. पारिस्थितिक पिरामिड (Ecological Pyramids): संख्या के पिरामिड (घास के मैदान में सीधे, वृक्ष पारितंत्र में उल्टे), जैव-भार के पिरामिड (स्थलीय में सीधे, जलीय/समुद्री पारितंत्र में उल्टे—प्लवकों पर मछलियों का भारी जैवभार), तथा ऊर्जा का पिरामिड—जो सदैव सीधा (Always Upright) होता है। 5. पारिस्थितिक अनुक्रमण (Ecological Succession): प्राथमिक बनाम द्वितीयक अनुक्रमण, जलारंभी अनुक्रमण (Hydrarch Succession—पादपप्लवक से चरम वन), तथा मरुआरंभी अनुक्रमण (Xerarch Succession—क्रस्टोज लाइकेन से चरम वन)। 6. पोषक चक्रण एवं पारितंत्र सेवाएं: गैसीय (कार्बन) बनाम अवसादी चक्र (फास्फोरस चक्र), तथा रॉबर्ट कोस्टान्जा द्वारा आकलित पारितंत्र सेवाएं (वार्षिक मूल्य लगभग 33 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर)।

समुद्र जो पृथ्वी का 70% हिस्सा घेरता है लेकिन केवल 32% भोजन बनाता है, और वो पिरामिड जो कभी उल्टा नहीं हो सकता!

क्या आप जानते हैं कि हमारी पृथ्वी का 70% से अधिक भाग नीले महासागरों से ढका है, लेकिन पूरी दुनिया के कुल जैविक उत्पादन (170 अरब टन) में समुद्रों की हिस्सेदारी केवल 55 अरब टन (लगभग 32%) है? क्योंकि गहरे समुद्रों में सूरज की किरणें और नाइट्रोजन-फास्फोरस जैसे पोषक तत्व बहुत सीमित होते हैं! और भौतिकी के ऊष्मागतिकी नियमों के कारण पूरी प्रकृति में एक ऐसा नियम चलता है जिसे कोई नहीं बदल सकता: चाहे जंगल हो, रेगिस्तान हो या समुद्र—ऊर्जा का पिरामिड हमेशा सीधा खड़ा रहता है! निचले स्तर से ऊपर जाने पर 90% ऊर्जा ताप बनकर अंतरिक्ष में उड़ जाती है और केवल 10% ही अगले पोषण स्तर तक पहुंच पाती है!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

CBSE बोर्ड, CBSE तथा NEET-UG में पारितंत्र अध्याय से प्रतिवर्ष 5 से 6 अंक के प्रश्न पूछे जाते हैं: 1. 5-अंकीय सचित्र दीर्घ उत्तरीय प्रश्न: अपघटन के विभिन्न चरणों (खंडन, निक्षालन, अपचयन, ह्युमीफिकेशन, खनिजीभवन) का विस्तृत वर्णन, अथवा जलीय एवं स्थलीय पारितंत्रों में संख्या, जैव-भार व ऊर्जा के पिरामिडों का तुलनात्मक विवेचन। 2. 3-अंकीय प्रक्रियात्मक प्रश्न: जलारंभी (Hydrarch) एवं मरुआरंभी (Xerarch) अनुक्रमण के क्रमिक चरण, अथवा फास्फोरस चक्र का प्रवाह आरेख। 3. NEET-UG के अनिवार्य प्रश्न: $NPP = GPP - R$ समीकरण, समुद्री जैवभार पिरामिड का उल्टा होना, ऊर्जा पिरामिड का सदैव सीधा होना, तथा संपूर्ण जीवमंडल की वार्षिक प्राथमिक उत्पादकता (170 अरब टन)।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • ऊष्मागतिकी के प्रथम एवं द्वितीय नियम (ऊर्जा संरक्षण व एन्ट्रॉपी वृद्धि)।
  • प्रकाश-संश्लेषण ($CO_2 + H_2O \rightarrow \text{ग्लूकोज} + O_2$) एवं श्वसन की मूल क्रियाएं।
  • खाद्य शृंखला (उत्पादक, शाकाहारी, मांसाहारी, अपघटक) की संकल्पना।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • सकल प्राथमिक उत्पादकता (GPP) तथा शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता (NPP) के संबंध को गणितीय रूप से स्पष्ट करना।
  • अपरद अपघटन के पांचों चरणों—खंडन, निक्षालन, अपचयन, ह्युमीफिकेशन तथा खनिजीभवन—का आणविक विश्लेषण करना।
  • संख्या, जैवभार एवं ऊर्जा के पारिस्थितिक पिरामिडों की आरेखीय रचना करना तथा उनके सीधे या उल्टे होने का वैज्ञानिक कारण बताना।
  • जलारंभी एवं मरुआरंभी पारिस्थितिक अनुक्रमण के प्राथमिक अन्वेषकों से चरम समुदाय (Climax community) तक के परिवर्तनों को समझाना।
  • फास्फोरस के अवसादी चक्र तथा पारितंत्र सेवाओं के आर्थिक मूल्यांकन (रॉबर्ट कोस्टान्जा) का निरूपण करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. पारितंत्र की उत्पादकता एवं अपघटन...
2 2. ऊर्जा प्रवाह एवं 10% का नियम (En...
3 3. पारिस्थितिक पिरामिड (Ecological...
4 4. पारिस्थितिक अनुक्रमण एवं पोषक चक...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. पारितंत्र की उत्पादकता एवं अपघटन के चरण

पारितंत्र के चार प्रमुख प्रकार्यात्मक घटक होते हैं: उत्पादकता, अपघटन, ऊर्जा प्रवाह तथा पोषक चक्रण।

A. पारितंत्र की उत्पादकता (Productivity):

जैवभार (Biomass) या कार्बनिक पदार्थ के उत्पादन की दर को उत्पादकता कहते हैं। इसे $\text{g/m}^2/\text{year}$ अथवा $\text{kcal/m}^2/\text{year}$ में मापा जाता है।

  • 1. प्राथमिक उत्पादकता (Primary Productivity): प्रकाश-संश्लेषण द्वारा पादपों द्वारा प्रति इकाई क्षेत्रफल में एक निश्चित समयावधि में उत्पादित जैवभार की मात्रा।
    • सकल प्राथमिक उत्पादकता (Gross Primary Productivity - GPP): प्रकाश-संश्लेषण के दौरान कार्बनिक पदार्थ के निर्माण की कुल दर।
    • शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता (Net Primary Productivity - NPP): उत्पादकों द्वारा अपनी श्वसन क्रिया (Respiration - $R$) में उपभोग करने के बाद बची हुई कुल उपलब्ध जैवभार ऊर्जा: $$NPP = GPP - R$$ यह शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता (NPP) ही शाकाहारियों (उपभोक्ताओं) एवं अपघटकों के भोजन हेतु उपलब्ध होती है।
  • 2. द्वितीयक उत्पादकता (Secondary Productivity): उपभोक्ताओं (शाकाहारी व मांसाहारी जीवों) द्वारा नए कार्बनिक पदार्थ के निर्माण की दर।
  • जीवमंडल की वार्षिक उत्पादकता: संपूर्ण जीवमंडल की कुल वार्षिक शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता लगभग 170 अरब टन (170 Billion Tons) शुष्क भार है। पृथ्वी का लगभग 70% भाग समुद्र होने के बावजूद महासागरों की वार्षिक उत्पादकता केवल 55 अरब टन (लगभग 32%) है, जबकि शेष 115 अरब टन उत्पादकता स्थल (जमीन) से प्राप्त होती है।

B. अपघटन प्रक्रम (Decomposition):

अपघटक (जीवाणु एवं कवक) मृत कार्बनिक पदार्थों (अपरद / Detritus - मृत पत्तियां, छाल, पुष्प, जंतुओं के मृत अवशेष व मल-मूत्र) को अकार्बनिक तत्वों ($CO_2, H_2O$ तथा पोषक तत्वों) में विखंडित करते हैं। अपघटन के 5 मुख्य चरण हैं:

  1. खंडन (Fragmentation): अपरदाहारी (Detritivores) जैसे केंचुआ (Earthworm) अपरद को खाकर छोटे-छोटे कणों में तोड़ देते हैं, जिससे पृष्ठीय क्षेत्रफल बढ़ जाता है।
  2. निक्षालन (Leaching): जल-विलेय अकार्बनिक पोषक तत्व मृदा के संस्तर (Horizon) में नीचे चले जाते हैं और लवणों के रूप में अनुपलब्ध होकर अवक्षेपित हो जाते हैं।
  3. अपचयन (Catabolism): जीवाणु तथा कवक के एंजाइम अपरद को सरल अकार्बनिक पदार्थों में विखंडित करते हैं।
  4. ह्युमीफिकेशन (Humification): इसके फलस्वरूप एक गहरे रंग के क्रिस्टल-विहीन (अमोर्फस / Amorphous) पदार्थ का निर्माण होता है जिसे ह्यूमस (Humus) कहते हैं। ह्यूमस के गुण: यह सूक्ष्मजीवों की क्रिया के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी होता है, इसका अपघटन अत्यंत धीमी दर से होता है, यह कोलाइडल प्रकृति का होता है और पोषक तत्वों के विशाल भंडार (Reservoir of nutrients) का कार्य करता है।
  5. खनिजीभवन (Mineralization): कुछ सूक्ष्मजीवों द्वारा ह्यूमस का और आगे अपघटन किया जाता है जिससे अकार्बनिक पोषक तत्व ($N, P, K, Ca$) मृदा में मुक्त हो जाते हैं।

अपघटन को प्रभावित करने वाले कारक:
• यदि अपरद में काइटिन तथा लिग्निन प्रचुर हो तो अपघटन बहुत धीमा होता है; यदि अपरद में नाइट्रोजन तथा शर्करा प्रचुर हो तो अपघटन तीव्र होता है।
• गर्म तथा नम वातावरण अपघटन को तीव्र करता है, जबकि निम्न तापमान तथा अवायवीयता अपघटन को धीमा करती है।

2. ऊर्जा प्रवाह एवं 10% का नियम (Energy Flow & 10% Law)

सूर्य सभी पारितंत्रों (गहरे समुद्र के जलतापीय तंत्रों को छोड़कर) हेतु ऊर्जा का एकमात्र स्रोत है।

  • आपतित कुल सौर विकिरण का 50% से कम भाग प्रकाश-संश्लेषणात्मक सक्रिय विकिरण (PAR - Photosynthetically Active Radiation) होता है।
  • पादप इस PAR का केवल 2 से 10 प्रतिशत भाग ही प्रकाश-संश्लेषण में प्रग्रहण (Capture) करते हैं। इसी सूक्ष्म ऊर्जा से संपूर्ण जीव जगत संचालित होता है।
  • पारितंत्र ऊष्मागतिकी के दोनों नियमों का पालन करता है:
    • प्रथम नियम: ऊर्जा का केवल रूपांतरण होता है।
    • द्वितीय नियम: पारितंत्र में सुव्यवस्था बनाए रखने हेतु ऊर्जा का निरंतर निवेश आवश्यक है, क्योंकि प्रत्येक स्तर पर श्वसन द्वारा ऊष्मा का ह्रास (एन्ट्रॉपी वृद्धि) होता है।

लिंडेमान का 10% ऊर्जा स्थानांतरण नियम (Lindeman's 10% Law, 1942):

रेमंड लिंडेमान के अनुसार: 'जब ऊर्जा एक पोषण स्तर (Trophic level) से अगले उच्च पोषण स्तर में स्थानांतरित होती है, तो केवल लगभग 10% ऊर्जा ही संचित होती है; शेष 90% ऊर्जा उपापचय (श्वसन) एवं ऊष्मा के रूप में पर्यावरण में नष्ट हो जाती है।' इसीलिए किसी भी खाद्य शृंखला में प्रायः 4 या 5 से अधिक पोषण स्तर नहीं होते, क्योंकि शीर्ष मांसाहारी तक पहुंचते-पहुंचते ऊर्जा की मात्रा नगण्य रह जाती है।

खाद्य शृंखला के प्रकार:

  1. चराई खाद्य शृंखला (Grazing Food Chain - GFC): सजीव पादपों (उत्पादक) से प्रारंभ होती है।
    घास (उत्पादक) $\rightarrow$ बकरी (प्राथमिक उपभोक्ता / शाकाहारी) $\rightarrow$ मनुष्य (द्वितीयक उपभोक्ता / मांसाहारी)।
    जलीय पारितंत्रों में ऊर्जा प्रवाह का मुख्य माध्यम GFC ही है।
  2. अपरद खाद्य शृंखला (Detritus Food Chain - DFC): मृत कार्बनिक पदार्थों (अपरद) से प्रारंभ होती है और अपघटकों (जीवाणु व कवक) तक जाती है।
    मृत पत्तियां $\rightarrow$ केंचुआ (अपरदाहारी) $\rightarrow$ चिड़िया $\rightarrow$ बाज।
    स्थलीय पारितंत्रों में ऊर्जा का एक बहुत बड़ा भाग GFC की अपेक्षा DFC के माध्यम से प्रवाहित होता है।

3. पारिस्थितिक पिरामिड (Ecological Pyramids)

पारिस्थितिक पिरामिड किसी खाद्य शृंखला में विभिन्न पोषण स्तरों के जीवों के मध्य संख्या, जैवभार अथवा संचित ऊर्जा का आरेखीय निरूपण है (चार्ल्स एल्टन, 1927)। पिरामिड का आधार उत्पादक स्तर ($T_1$) को तथा शीर्ष सर्वोच्च मांसाहारी ($T_4$) को दर्शाता है।

1. संख्या का पिरामिड (Pyramid of Numbers):

  • सीधा (Upright): घास के मैदान तथा तालाब में उत्पादकों (घास/शैवाल) की संख्या सर्वाधिक होती है और उच्च पोषण स्तरों में जीवों की संख्या घटती जाती है (लाखों घास $\rightarrow$ हजारों टिड्डे $\rightarrow$ सैकड़ों मेंढक $\rightarrow$ कुछ सांप)।
  • उल्टा (Inverted): एकल वृक्ष पारितंत्र में — एक बड़ा ओक या बरगद का पेड़ (उत्पादक = 1) $\rightarrow$ उस पर आश्रित फलभक्षी पक्षी (सैकड़ों) $\rightarrow$ पक्षियों के शरीर पर रहने वाले परजीवी जूं व पिस्सू (हजारों)।

2. जैवभार का पिरामिड (Pyramid of Biomass):

  • सीधा (Upright): अधिकांश स्थलीय पारितंत्रों (घास के मैदान व वनों) में उत्पादकों का कुल शुष्क भार शाकाहारियों व मांसाहारियों से कहीं अधिक होता है।
  • उल्टा (Inverted): समुद्री एवं जलीय पारितंत्रों में जैवभार का पिरामिड सदैव उल्टा होता है!
    कारण: उत्पादक पादपप्लवक (Phytoplankton) सूक्ष्मदर्शीय होते हैं और उनका तात्कालिक शुष्क भार बहुत कम होता है, जबकि उन पर आश्रित बड़ी मछलियों और व्हेल का जैवभार बहुत अधिक होता है (यद्यपि पादपप्लवकों की जनन दर व टर्नओवर अत्यंत तीव्र होता है)।

3. ऊर्जा का पिरामिड (Pyramid of Energy):

ऊर्जा का पिरामिड सदैव सीधा (Always Upright) होता है, यह कभी भी उल्टा नहीं हो सकता!

कारण: ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम तथा 10% ऊर्जा नियम के अनुसार, जब ऊर्जा एक पोषण स्तर से अगले पोषण स्तर में जाती है, तो प्रत्येक स्तर पर श्वसन द्वारा ऊर्जा का एक बड़ा भाग ($90\%$) ऊष्मा के रूप में खो जाता है। अतः किसी भी उच्च पोषण स्तर में अपने से निचले पोषण स्तर की तुलना में ऊर्जा सदैव कम ही होती है (उदा. पादप $10,000\text{ J} \rightarrow$ शाकाहारी $1,000\text{ J} \rightarrow$ प्राथमिक मांसाहारी $100\text{ J} \rightarrow$ शीर्ष मांसाहारी $10\text{ J}$)।

4. पारिस्थितिक अनुक्रमण एवं पोषक चक्रण (Succession & Nutrient Cycling)

पारिस्थितिक अनुक्रमण (Ecological Succession): किसी निश्चित क्षेत्र में समय के साथ जैविक समुदाय की प्रजाति संरचना में होने वाले क्रमिक, पूर्वानुमेय (Predictable) तथा दिशात्मक परिवर्तन को पारिस्थितिक अनुक्रमण कहते हैं।

  • मूल अन्वेषक जाति (Pioneer Species): किसी नग्न (बंजर) क्षेत्र पर सर्वप्रथम आक्रमण कर बसने वाली प्रथम प्रजाति।
  • क्रमक समुदाय (Seral Stages): अनुक्रमण के दौरान क्रमिक रूप से परिवर्तित होने वाले मध्यवर्ती समुदाय।
  • चरम समुदाय (Climax Community): अंतिम स्थायी एवं संतुलित समुदाय जो पर्यावरण के साथ पूर्ण साम्यावस्था में होता है (प्रायः समोद्भिद वन / Mesic forest)।
  • प्राथमिक बनाम द्वितीयक अनुक्रमण: प्राथमिक अनुक्रमण उस स्थान पर प्रारंभ होता है जहाँ पहले कभी कोई सजीव नहीं रहा (नग्न चट्टान, नया लावा, नव-निर्मित तालाब) — यह प्रक्रिया अत्यंत धीमी होती है (सैकड़ों से हजारों वर्ष)। द्वितीयक अनुक्रमण उस क्षेत्र में होता है जहाँ पहले जीवन था किंतु किसी कारण (आग, बाढ़, वनों की कटाई) से नष्ट हो गया — चूंकि यहाँ मृदा व बीज पहले से उपस्थित होते हैं, अतः यह तीव्र होता है।

अनुक्रमण के दो प्रमुख प्रकार:

  1. जलारंभी अनुक्रमण (Hydrarch Succession): जल-मग्न क्षेत्रों (जैसे तालाब) में प्रारंभ होता है।
    क्रम: पादपप्लवक अवस्था $\rightarrow$ जलमग्न पादप अवस्था (वेलिसनेरिया, हाइड्रिला) $\rightarrow$ जलमग्न मुक्त प्लावी अवस्था (कमल, जलकुंभी) $\rightarrow$ नरकुल-अनूप अवस्था (Reed-swamp / टाइफा) $\rightarrow$ कच्छ-शाद्वल अवस्था (Marsh-meadow) $\rightarrow$ झाड़ी अवस्था $\rightarrow$ चरम वन समुदाय (समोद्भिद अवस्था / Mesic)। अतः यह अत्यधिक जलीय अवस्था से समोद्भिद (मध्यम नमी) अवस्था में बदल जाता है।
  2. मरुआरंभी अनुक्रमण (Xerarch Succession): अत्यधिक शुष्क क्षेत्रों (जैसे नग्न चट्टान) पर प्रारंभ होता है।
    क्रम: क्रस्टोज लाइकेन (मूल अन्वेषक — अम्ल स्रावित कर चट्टान का अपक्षय करते हैं) $\rightarrow$ फोलिओज लाइकेन $\rightarrow$ मॉस $\rightarrow$ शाकीय पादप $\rightarrow$ झाड़ियां $\rightarrow$ चरम समोद्भिद वन (Mesic forest)। अतः जलारंभी एवं मरुआरंभी दोनों ही अनुक्रमण अंततः मध्यम जल दशाओं (समोद्भिद / Mesic conditions) की ओर ही अग्रसर होते हैं।

पोषक चक्रण—फास्फोरस चक्र (Phosphorus Cycle):

पोषक तत्वों की वह मात्रा जो किसी समय मृदा में उपस्थित होती है, 'खड़ी अवस्था' (Standing state) कहलाती है। फास्फोरस जीवों में न्यूक्लिक अम्लों, एटीपी (ऊर्जा अणु), कोशिका झिल्ली (फॉस्फोलिपिड), अस्थियों तथा दांतों का प्रमुख घटक है।

  • भंडार (Reservoir): फास्फोरस का मुख्य प्राकृतिक भंडार चट्टानें (Rocks) हैं, जिनमें यह फॉस्फेट खनिजों के रूप में पाया जाता है। यह एक अवसादी चक्र (Sedimentary Cycle) है।
  • चक्रण का मार्ग: चट्टानों के अपक्षय (Weathering) से फॉस्फेट मृदा घोल में घुल जाता है $\rightarrow$ पादप जड़ें इसे अवशोषित करती हैं $\rightarrow$ शाकाहारी व मांसाहारी जंतु इसे ग्रहण करते हैं $\rightarrow$ जीवों की मृत्यु तथा अपशिष्ट पदार्थों पर अपरद जीवाणु कार्य कर फॉस्फेट को पुनः मृदा में मुक्त कर देते हैं।
  • कार्बन चक्र और फास्फोरस चक्र में अंतर:
    1. कार्बन का गैसीय आदान-प्रदान वायुमंडल में बहुत अधिक होता है, जबकि फास्फोरस का श्वसन द्वारा कोई गैसीय निकास वायुमंडल में नहीं होता।
    2. वर्षा द्वारा वायुमंडल से फास्फोरस का निवेश नगण्य होता है, जबकि कार्बन का वायुमंडलीय निवेश बहुत अधिक होता है।

पारितंत्र सेवाएं (Ecosystem Services - Robert Costanza):

रॉबर्ट कोस्टान्जा एवं सहयोगियों (1997) ने प्रकृति की जीवन-समर्थक सेवाओं (शुद्ध वायु, परागण, बाढ़ नियंत्रण, पोषक चक्रण आदि) का औसत मूल्य प्रति वर्ष 33 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (US $33 Trillion/year) आकलित किया, जो संपूर्ण विश्व के कुल सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP - ~US $18 Trillion) का लगभग दोगुना है! कुल लागत में: मृदा निर्माण (Soil formation) का योगदान लगभग 50%, मनोरंजन व पोषक चक्रण का लगभग 10-10%, तथा जलवायु नियमन व वन्यजीव आवास का योगदान लगभग 6-6% है।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता (NPP) समीकरण
NPP = GPP - R
GPP = सकल प्राथमिक उत्पादकता, R = उत्पादक की श्वसन हानि
जीवमंडल कुल वार्षिक उत्पादकता सांख्यिकी
संपूर्ण जीवमंडल = ~170 अरब टन शुष्क भार | महासागर (70% क्षेत्र) = 55 अरब टन (32%)
स्थल उत्पादकता = 115 अरब टन (68%)
लिंडेमान का 10% ऊर्जा स्थानांतरण नियम
अगले पोषण स्तर में ऊर्जा = पूर्व पोषण स्तर की ऊर्जा × 0.10 (10%)
90% ऊर्जा श्वसन व ऊष्मा में नष्ट; ऊर्जा पिरामिड सदैव सीधा
पारितंत्र सेवाओं का आर्थिक मूल्यांकन (Costanza)
कुल वार्षिक मूल्य = ~US $33 Trillion | मृदा निर्माण = ~50% | पोषण/मनोरंजन = ~10% प्रत्येक
वैश्विक सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP ~US $18 Trillion) का लगभग दोगुना

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
सकल प्राथमिक उत्पादकता (GPP) तथा शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता (NPP) में अंतर स्पष्ट कीजिए। पृथ्वी का 70% भाग घेरने के बावजूद महासागरों की वार्षिक प्राथमिक उत्पादकता केवल 55 अरब टन क्यों है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. GPP बनाम NPP:
    • सकल प्राथमिक उत्पादकता (GPP): प्रकाश-संश्लेषण के दौरान हरे पौधों द्वारा एक निश्चित समयावधि में कार्बनिक पदार्थ (जैवभार) के निर्माण की कुल दर।
    • शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता (NPP): पौधों द्वारा अपनी श्वसन क्रिया (Respiration loss - $R$) में ऊर्जा उपभोग के पश्चात् बची हुई कुल संचित जैवभार ऊर्जा:
      $$NPP = GPP - R$$ यह शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता ही शाकाहारी जीवों एवं अपघटकों हेतु वास्तव में उपलब्ध होती है।
  2. महासागरों की कम उत्पादकता के कारण: संपूर्ण जीवमंडल की 170 अरब टन उत्पादकता में 70% क्षेत्रफल वाले महासागरों का योगदान केवल 55 अरब टन (लगभग 32%) होने के प्रमुख वैज्ञानिक कारण निम्नलिखित हैं:
    • प्रकाश की अनुपलब्धता: गहरे समुद्र में सूर्य का प्रकाश केवल सतह से कुछ मीटर (प्रकाशिक क्षेत्र / Photic zone) तक ही प्रवेश कर पाता है; गहरे समुद्र में पूर्ण अंधकार होता है जहाँ प्रकाश-संश्लेषण असंभव है।
    • पोषक तत्वों की भारी कमी (Nutrient limitation): खुले महासागरों में नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा लोहा जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व बहुत कम सांद्रता में होते हैं।
    • पादपप्लवकों का सूक्ष्म आकार: समुद्र के मुख्य उत्पादक सूक्ष्मदर्शीय पादपप्लवक (Phytoplankton) हैं जिनका तात्कालिक जैवभार अत्यधिक कम होता है।
उदाहरण 2
अपघटन (Decomposition) के पांचों क्रमिक चरणों—खंडन, निक्षालन, अपचयन, ह्युमीफिकेशन एवं खनिजीभवन—का विस्तृत वैज्ञानिक विवरण दीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: अपघटन के 5 मुख्य चरण:

  1. 1. खंडन (Fragmentation): अपरदाहारी (जैसे केंचुआ) मृत पादप व जंतु अवशेषों (अपरद) को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देते हैं, जिससे सूक्ष्मजीवों के आक्रमण हेतु सतही क्षेत्रफल बहुत बढ़ जाता है।
  2. 2. निक्षालन (Leaching): वर्षा जल के साथ जल-विलेय अकार्बनिक पोषक तत्व मृदा के निचले संस्तरों में रिस जाते हैं और अनुपलब्ध लवणों के रूप में अवक्षेपित हो जाते हैं।
  3. 3. अपचयन (Catabolism): मृदा में उपस्थित जीवाणु तथा कवक अपने बाह्यकोशिकीय एंजाइमों द्वारा जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल अकार्बनिक यौगिकों में तोड़ते हैं।
  4. 4. ह्युमीफिकेशन (Humification): अपघटन के फलस्वरूप गहरे भूरे/काले रंग के अक्रिस्टलीय (Amorphous) कोलाइडल पदार्थ का निर्माण होता है जिसे ह्यूमस (Humus) कहते हैं। यह पोषक तत्वों का विशाल भंडार होता है और बहुत धीमी गति से अपघटित होता है।
  5. 5. खनिजीभवन (Mineralization): विशिष्ट सूक्ष्मजीवों द्वारा ह्यूमस का अंतिम अपघटन होता है जिससे उसमें संचित अकार्बनिक खनिज ($N, P, K, Ca$) मृदा में मुक्त होकर पौधों की जड़ों को पुनः प्राप्त हो जाते हैं।
उदाहरण 3
संख्या, जैवभार तथा ऊर्जा के पारिस्थितिक पिरामिडों की तुलना कीजिए। 'ऊर्जा का पिरामिड सदैव सीधा क्यों होता है' तथा 'समुद्री पारितंत्र में जैवभार का पिरामिड उल्टा क्यों होता है'?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. ऊर्जा का पिरामिड सदैव सीधा होने का कारण: लिंडेमान के 10% नियम तथा ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम के अनुसार, जब ऊर्जा उत्पादक ($T_1$) से शाकाहारी ($T_2$) और मांसाहारी ($T_3, T_4$) में स्थानांतरित होती है, तो प्रत्येक स्तर पर श्वसन एवं उपापचयी क्रियाओं द्वारा 90% ऊर्जा ऊष्मा के रूप में पर्यावरण में खो जाती है। अतः किसी भी उच्च पोषण स्तर में अपने पूर्ववर्ती निचले स्तर से अधिक ऊर्जा कभी नहीं हो सकती। इसलिए ऊर्जा का पिरामिड सदैव और बिना किसी अपवाद के सीधा (Always Upright) ही होता है।
  2. समुद्री पारितंत्र में जैवभार का पिरामिड उल्टा होने का कारण: समुद्र में प्राथमिक उत्पादक सूक्ष्मदर्शीय पादपप्लवक (Phytoplankton) होते हैं जिनका आकार नगण्य और जीवनकाल बहुत छोटा होता है, अतः किसी भी समय उनका कुल शुष्क भार (जैवभार) बहुत कम होता है। किंतु उन पर आश्रित मांसाहारी मछलियों, शार्क तथा व्हेल का जीवनकाल लंबा होता है और उनका शारीरिक भार अत्यंत विशाल होता है। अतः उत्पादकों का जैवभार ($T_1$) कम और उपभोक्ताओं का जैवभार ($T_2, T_3$) अत्यधिक होने के कारण समुद्री जैवभार का पिरामिड उल्टा (Inverted) बनता है।
उदाहरण 4
जलारंभी अनुक्रमण (Hydrarch Succession) के क्रमिक चरणों का पादपप्लवक अवस्था से लेकर चरम समोद्भिद वन अवस्था तक रेखाचित्र अथवा प्रवाह चित्र सहित वर्णन कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: जलारंभी अनुक्रमण जल-मग्न आवास (जैसे नव-निर्मित तालाब या झील) में प्रारंभ होता है:

  1. 1. पादपप्लवक अवस्था (Phytoplankton stage - मूल अन्वेषक): डायटम्स, हरित शैवाल (जैसे क्लैमाइडोमोनास) तथा सायनोबैक्टीरिया तालाब के जल में सर्वप्रथम उत्पन्न होते हैं। इनके मृत अवशेष पेंदे में कार्बनिक कीचड़ बनाते हैं।
  2. 2. जलमग्न पादप अवस्था (Submerged plant stage): जब पेंदे में मिट्टी की परत बन जाती है, तो जड़युक्त जलमग्न पौधे जैसे Hydrilla, Vallisneria, Potamogeton उगते हैं।
  3. 3. जलमग्न मुक्त-प्लावी अवस्था (Submerged free-floating stage): जल छिछला होने पर तैरने वाले पौधे जैसे Nymphaea (कमल), Nelumbo, Eichhornia, Pistia छा जाते हैं।
  4. 4. नरकुल-अनूप अवस्था (Reed-swamp stage): जल बहुत छिछला (1-3 फीट) हो जाता है; उभयचर पौधे जैसे Typha (नरकुल), Phragmites उगते हैं जो जल का तीव्र वाष्पोत्सर्जन कर भूमि को दलदली बनाते हैं।
  5. 5. कच्छ-शाद्वल अवस्था (Marsh-meadow stage): दलदली मिट्टी में Carex, Cyperus तथा घासें उगती हैं जो दलदल को शुष्क मृदा में बदलती हैं।
  6. 6. झाड़ी अवस्था (Scrub stage): झाड़ियां तथा छोटे पेड़ (जैसे Salix, Cornus) उगते हैं जो छाया उत्पन्न करते हैं।
  7. 7. चरम वन अवस्था (Climax Forest / Mesic forest): अंततः विशाल समोद्भिद वृक्षों का वन विकसित हो जाता है जो स्थायी चरम समुदाय होता है।
उदाहरण 5
पारितंत्र में फास्फोरस चक्र (Phosphorus Cycle) के प्रवाह का विवरण दीजिए। यह कार्बन चक्र से किन दो प्रमुख बातों में भिन्न है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. फास्फोरस चक्र की कार्यप्रणाली:
    • फास्फोरस का मुख्य प्राकृतिक भंडार चट्टानें (Rocks) हैं जहाँ यह फॉस्फेट के रूप में संचित होता है।
    • चट्टानों के अपक्षय (Weathering) से फॉस्फेट मृदा के जल में घुलकर पादप जड़ों द्वारा अवशोषित किया जाता है।
    • पादपों से यह खाद्य शृंखला द्वारा शाकाहारी और मांसाहारी जंतुओं में स्थानांतरित होता है।
    • जीवों के मलमूत्र तथा मृत अवशेषों (अपरद) का अपघटनकारी जीवाणुओं द्वारा खनिजीभवन होने पर फॉस्फेट पुनः मृदा घोल में मुक्त हो जाता है।
  2. कार्बन चक्र से दो प्रमुख अंतर:
    लक्षणकार्बन चक्र (गैसीय)फास्फोरस चक्र (अवसादी)
    श्वसन द्वारा निकासजीवों के श्वसन द्वारा भारी मात्रा में $CO_2$ गैस वायुमंडल में मुक्त होती है।श्वसन द्वारा फास्फोरस का वायुमंडल में कोई गैसीय निकास नहीं होता।
    वायुमंडलीय निवेशवर्षा व गैसीय विसरण द्वारा वायुमंडल से भारी मात्रा में कार्बन प्राप्त होता है।वर्षा द्वारा वायुमंडल से फास्फोरस का निवेश नगण्य (लगभग शून्य) होता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

ऊर्जा के पिरामिड को किसी विशेष परिस्थिति में उल्टा मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ऊर्जा का पिरामिड सदैव सीधा (Always Upright) होता है, क्योंकि 10% नियम के अनुसार प्रत्येक पोषण स्तर पर 90% ऊर्जा ऊष्मा के रूप में नष्ट होती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

समुद्र के जैवभार पिरामिड को सीधा लिख देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

समुद्र में जैवभार का पिरामिड सदैव उल्टा (Inverted) होता है क्योंकि सूक्ष्म पादपप्लवकों का कुल जैवभार उन पर आश्रित विशाल मछलियों से बहुत कम होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

जलारंभी अनुक्रमण के चरम समुदाय को जलीय मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

जलारंभी (Hydrarch) और मरुआरंभी (Xerarch) दोनों का चरम समुदाय मध्यम नमी वाला समोद्भिद वन (Mesic forest) ही होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

NPP और GPP के संबंध को उल्टा लिख देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

GPP कुल निर्मित जैवभार है और NPP श्वसन के बाद बचा हुआ जैवभार है (NPP = GPP - R, न कि GPP = NPP - R)।

पारितंत्र की संरचना, ऊर्जा प्रवाह एवं पोषक चक्रण का वैज्ञानिक मानचित्र (Ecosystem Architecture)

पारितंत्र की संरचना एवं ऊर्जा गतिकी (Ecosystem Dynamics)उत्पादकता (NPP=GPP-R) • अपघटन • 10% ऊर्जा नियम • पारिस्थितिक पिरामिड • अनुक्रमण1. उत्पादकता व ऊर्जाप्राथमिक उत्पादकता:• GPP: कुल निर्मित जैवभार• NPP = GPP - R• जीवमंडल = 170 अरब टन (समुद्र केवल 55 अरब टन)ऊर्जा प्रवाह (10% नियम):• PAR = 50% सौर विकिरण• पादप प्रग्रहण = 2-10% PAR• 10% लिंडेमान नियम (90% ऊष्मा श्वसन ह्रास)GFC (चराई) व DFC (अपरद)ऊर्जा प्रवाह एकदिशीय2. अपघटन के 5 चरणअपरद विखंडन प्रक्रम:1. खंडन (Fragmentation): केंचुए द्वारा छोटे टुकड़े2. निक्षालन (Leaching): जल-विलेय लवण नीचे जाना3. अपचयन (Catabolism): जीवाणु/कवक एंजाइम पाचन4. ह्युमीफिकेशन: ह्यूमस निर्माण (पोषक भंडार)5. खनिजीभवन: अकार्बनिक खनिज मुक्तिलिग्निन/काइटिन = धीमा अपघटन3. पारिस्थितिक पिरामिडऊर्जा पिरामिड (Energy):• सदैव सीधा (Always Upright)• कभी उल्टा नहीं हो सकता (10% नियम, ताप ह्रास)जैवभार पिरामिड (Biomass):• स्थलीय: सीधा (घास/वन)• समुद्री/जलीय: उल्टा (Inverted) पादपप्लवक कम, मछलियां भारीसंख्या पिरामिड (Numbers):• घास का मैदान: सीधा• एकल वृक्ष पारितंत्र: उल्टा4. अनुक्रमण व चक्रणपारिस्थितिक अनुक्रमण:• प्राथमिक (नग्न) व द्वितीयक• जलारंभी: पादपप्लवक → वन• मरुआरंभी: क्रस्टोज लाइकेन → वन• चरम समुदाय = समोद्भिद (Mesic)फास्फोरस चक्र (अवसादी):• प्राकृतिक भंडार: चट्टानें (Rocks)• श्वसन द्वारा कोई गैसीय निकास नहींपारितंत्र सेवाएं (Costanza):• ~33 ट्रिलियन डॉलर प्रति वर्ष• मृदा निर्माण = ~50% लागत• GNP से लगभग दोगुना मूल्य

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
पारितंत्र (A.G. Tansley, 1935) प्रकृति की क्रियात्मक इकाई है जहाँ जैविक समुदाय और अजैविक पर्यावरण परस्पर क्रिया करते हैं।
मुख्य बिंदु 2
सकल प्राथमिक उत्पादकता (GPP) कुल निर्मित जैवभार है; शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता NPP = GPP - R उपभोक्ताओं हेतु उपलब्ध होती है।
मुख्य बिंदु 3
संपूर्ण जीवमंडल की कुल वार्षिक उत्पादकता 170 अरब टन है; महासागर 70% क्षेत्र घेरकर भी केवल 55 अरब टन उत्पादकता देते हैं।
मुख्य बिंदु 4
अपघटन के 5 चरण हैं: खंडन (केंचुआ), निक्षालन, अपचयन (जीवाणु/कवक), ह्युमीफिकेशन (ह्यूमस निर्माण) तथा खनिजीभवन।
मुख्य बिंदु 5
सौर विकिरण का 50% से कम PAR होता है; पौधे 2-10% PAR प्रग्रहण करते हैं; लिंडेमान के अनुसार 10% ऊर्जा ही अगले स्तर में जाती है।
मुख्य बिंदु 6
जलीय पारितंत्र में ऊर्जा का मुख्य माध्यम चराई खाद्य शृंखला (GFC) है; स्थलीय में अधिकांश ऊर्जा अपरद शृंखला (DFC) से प्रवाहित होती है।
मुख्य बिंदु 7
ऊर्जा का पिरामिड सदैव सीधा (Always Upright) होता है; समुद्री जैवभार का पिरामिड उल्टा (Inverted) होता है।
मुख्य बिंदु 8
पारिस्थितिक अनुक्रमण प्राथमिक (धीमा) या द्वितीयक (तीव्र) होता है; जलारंभी व मरुआरंभी दोनों चरम समोद्भिद वन (Mesic) में बदलते हैं।
मुख्य बिंदु 9
फास्फोरस चक्र एक अवसादी चक्र है जिसका मुख्य भंडार चट्टानें हैं; इसमें कोई श्वसन गैसीय निकास नहीं होता।
मुख्य बिंदु 10
रॉबर्ट कोस्टान्जा ने पारितंत्र सेवाओं का वैश्विक मूल्य 33 ट्रिलियन डॉलर आकलित किया, जिसमें मृदा निर्माण का योगदान लगभग 50% है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
समुद्री पारितंत्र में 'जैवभार का पिरामिड' (Pyramid of Biomass) किस प्रकार का होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
2
ऊर्जा का पिरामिड (Pyramid of Energy) सदैव सीधा (Upright) क्यों होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
3
चट्टानों पर प्रारंभ होने वाले 'मरुआरंभी अनुक्रमण' (Xerarch succession) में मूल अन्वेषक जाति (Pioneer species) कौन सी होती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
4
रॉबर्ट कोस्टान्जा द्वारा आकलित पारितंत्र सेवाओं (US $33 Trillion/year) में सर्वाधिक 50% हिस्सेदारी किस सेवा की है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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