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CBSE • कक्षा XII • Biology • अध्याय 10
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

जैव प्रौद्योगिकी एवं इसके अनुप्रयोग

जैव प्रौद्योगिकी के सिद्धांतों एवं प्रक्रमों का वास्तविक मानवीय एवं आर्थिक महत्व कृषि, चिकित्सा, उद्योग, पर्यावरण संरक्षण तथा दैनिक जीवन में इसके क्रांतिकारी अनुप्रयोगों से प्रकट होता है। पारंपरिक प्रजनन विधियों की सीमाओं को पार करते हुए आधुनिक आनुवंशिक इंजीनियरिंग ने ऐसे आनुवंशिकतः रूपांतरित जीवों (Genetically Modified Organisms - GMOs) का विकास किया है जिन्होंने कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि की है और घातक आनुवंशिक रोगों के उपचार के नए मार्ग खोले हैं। प्रस्तुत अध्याय जैव प्रौद्योगिकी के व्यावहारिक अनुप्रयोगों, नैतिक मुद्दों एवं जैव-दस्युता का समग्र वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है: 1. कृषि में जैव प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग: जीएम फसलों के लाभ (अजैविक प्रतिबल सहिष्णुता, पीड़करोधी, खनिज उपयोग क्षमता), विटामिन 'ए' समृद्ध स्वर्णिम धान (Golden Rice), Bacillus thuringiensis जीवाणु के cry जीन ($cryIAc, cryIIAb, cryIAb$) द्वारा बीटी-कपास (Bt-Cotton) का निर्माण तथा कीट की आंत के क्षारीय pH में प्रोविषक का सक्रियण; तम्बाकू के पौधों में सूत्रकृमि Meloidogyne incognita के संक्रमण की रोकथाम हेतु आरएनए अंतरक्षेप (RNA Interference - RNAi) तकनीक। 2. चिकित्सा में जैव प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग: एली लिली (Eli Lilly, 1983) कंपनी द्वारा E. coli में A व B शृंखलाओं का पृथक संश्लेषण कर डाईसल्फाइड बंधों द्वारा आनुवंशिकतः निर्मित इंसुलिन (ह्यूमूलिन / Humulin) का निर्माण एवं प्रो-इंसुलिन से C-पेप्टाइड का निष्कासन; 1990 में 4-वर्षीय बालिका में एडीनोसीन डीएमीनेज (ADA) न्यूनता हेतु प्रथम सफल जीन चिकित्सा (Gene Therapy); तथा आणविक निदान विधियां (PCR एवं ELISA)। 3. पारजीवी जंतु (Transgenic Animals): पारजीवी जंतुओं (95% चूहे) के उत्पादन के 5 प्रमुख कारण (सामान्य कार्यिकी का अध्ययन, मानव रोगों के मॉडल, वैक्सीन सुरक्षा, विषाक्तता परीक्षण), तथा प्रथम पारजीवी गाय 'रोजी' (Rosie, 1997) जिसके दूध में मानव प्रोटीन $\alpha$-लैक्टलब्यूमिन (2.4 ग्राम/लीटर) प्रचुर मात्रा में थी। 4. नैतिक विचार एवं जैव-दस्युता (Ethical Issues & Biopiracy): भारत सरकार द्वारा गठित GEAC (आनुवंशिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति), तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा विकासशील देशों के जैविक संसाधनों व पारंपरिक ज्ञान का अवैध पेटेंट यानी जैव-दस्युता (Biopiracy - बासमती चावल, नीम व हल्दी पेटेंट विवाद)।

विटामिन 'ए' से चमकता स्वर्णिम चावल, बिना सुई वाला इंसुलिन, और वो 4 साल की बच्ची जिसे जीन थेरेपी ने नया जीवन दिया!

क्या आप जानते हैं कि 1983 से पहले मधुमेह (डायबिटीज) के मरीजों के लिए इंसुलिन कैसे बनता था? कसाईखानों में मारे गए सूअरों और बैलों के अग्न्याशय को पीसकर इंसुलिन निकाला जाता था, जिससे मरीजों को भयानक एलर्जी और रिएक्शन होते थे! लेकिन जैव प्रौद्योगिकी ने मानव जीन को एक साधारण बैक्टीरिया में डालकर 100% शुद्ध 'ह्यूमूलिन' बनाकर करोड़ों मरीजों को जीवनदान दिया। इतना ही नहीं, विकासशील देशों में हर साल 5 लाख बच्चे केवल विटामिन 'ए' की कमी से अंधे हो जाते हैं। वैज्ञानिकों ने डैफोडिल फूल की जीन चावल में डालकर ऐसा 'गोल्डन राइस' बना दिया जिसकी एक कटोरी बच्चे की आंखों की रोशनी बचा सकती है! और 1990 में जब एक 4 साल की बच्ची अशांति डीसिल्वा की प्रतिरक्षा प्रणाली जन्मजात आनुवंशिक दोष (ADA न्यूनता) से पूरी तरह ठप हो गई थी, तो वैज्ञानिकों ने इतिहास में पहली बार उसकी कोशिकाओं में स्वस्थ जीन डालकर उसे एक सामान्य जीवन लौटा दिया!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

CBSE बोर्ड, CBSE तथा NEET-UG में यह अध्याय 5 से 6 अंकों का सर्वाधिक प्रश्न-प्रवण अध्याय है: 1. 5-अंकीय सचित्र दीर्घ उत्तरीय प्रश्न: आनुवंशिक रूप से निर्मित इंसुलिन (ह्यूमूलिन) का निर्माण एवं प्रो-इंसुलिन की संरचना, अथवा बीटी-कपास (Bt Cotton) की क्रियाविधि एवं क्राई प्रोटीन्स, अथवा जीन थेरेपी द्वारा ADA न्यूनता का उपचार। 2. 3-अंकीय प्रक्रियात्मक प्रश्न: आरएनए अंतरक्षेप (RNAi) की क्रियाविधि एवं पादप सुरक्षा में इसका उपयोग, अथवा पारजीवी गाय 'रोजी' (Rosie) एवं जैविक उत्पादों का महत्व। 3. NEET-UG के सीधे प्रश्न: CryIAc व CryIIAb (कपास के मुकुल कृमि), CryIAb (मक्का छेदक), C-पेप्टाइड की अनुपस्थिति, GEAC का पूरा नाम, तथा बासमती चावल पर अमेरिकी कंपनी राइसटेक का 1997 का पेटेंट विवाद।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • पुनर्योगज डीएनए (rDNA) प्रौद्योगिकी, क्लोनिंग संवाहक एवं पोषी रूपांतरण के मूलभूत चरण।
  • इंसुलिन हार्मोन की रासायनिक प्रकृति (पॉलीपेप्टाइड) एवं रक्त शर्करा नियमन।
  • पादप एवं जंतु रोगों की बुनियादी समझ।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • बीटी-विष (Cry protein) के निष्क्रिय प्रोविषक से कीट आंत के क्षारीय pH में सक्रिय होने की संपूर्ण आणविक क्रियाविधि को स्पष्ट करना।
  • RNA अंतरक्षेप (RNAi) द्वारा तम्बाकू पादप को सूत्रकृमि संक्रमण से बचाने के चरणों का सचित्र विश्लेषण करना।
  • प्रो-इंसुलिन एवं परिपक्व इंसुलिन के मध्य C-पेप्टाइड के अंतर को समझाते हुए एली लिली कंपनी की निर्माण पद्धति का वर्णन करना।
  • ADA न्यूनता से ग्रसित रोगी में रेट्रोवायरल संवाहक द्वारा जीन थेरेपी की प्रक्रिया का चरणबद्ध निरूपण करना।
  • पारजीवी जंतुओं (विशेषकर गाय 'रोजी') के महत्व तथा जैव-दस्युता (Biopiracy) के राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय प्रभावों का मूल्यांकन करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. कृषि में जैव प्रौद्योगिकी के अनु...
2 2. चिकित्सा में जैव प्रौद्योगिकी—आन...
3 3. पारजीवी जंतु (Transgenic Animals...
4 4. नैतिक विचार एवं जैव-दस्युता (Eth...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. कृषि में जैव प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग—Bt-कपास, RNAi एवं स्वर्णिम धान

कृषि में उत्पादन बढ़ाने हेतु हरित क्रांति ने रासायनिक खादों व कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग किया, जिसके गंभीर पर्यावरणीय दुष्परिणाम हुए। इसके विकल्प के रूप में आनुवंशिकतः रूपांतरित (GM) फसलें विकसित की गईं, जिनके पौधे, कवक या जीवाणु के जीनों को आनुवंशिक इंजीनियरिंग द्वारा बदल दिया गया है।

GM पादपों के प्रमुख लाभ:

  • अजैविक प्रतिबलों (ठंड, सूखा, लवणता, अत्यधिक ताप) के प्रति अधिक सहनशीलता।
  • रासायनिक पीड़कनाशकों पर निर्भरता में भारी कमी (कीट-प्रतिरोधी फसलें)।
  • फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान (Post-harvest losses) में कमी।
  • पौधों द्वारा मृदा से खनिज उपयोग की क्षमता में वृद्धि (मृदा की उर्वरा शक्ति का ह्रास रुकता है)।
  • पोषण स्तर में वृद्धि: उदाहरण—स्वर्णिम धान (Golden Rice), जो विटामिन 'ए' ($\beta$-कैरोटीन) से प्रचुर आनुवंशिकतः रूपांतरित चावल है।

बीटी-कपास (Bt-Cotton) एवं बीटी-विष की क्रियाविधि:

मृदा जीवाणु Bacillus thuringiensis (Bt) एक विशेष विषैला प्रोटीन बनाता है जो विशिष्ट कीटों—जैसे लेपिडॉप्टेरा (तम्बाकू की कली का कीड़ा, सैनिक कीड़ा), कोलियोप्टेरा (भृंग), तथा डिप्टेरा (मक्खी, मच्छर) को मार देता है।

  • निष्क्रिय प्रोविषक (Inactive Protoxin): बीटी जीवाणु स्वयं इस विष से नहीं मरता क्योंकि जीवाणु के भीतर यह विष प्रोटीन रवे (Crystals) के रूप में निष्क्रिय प्राकविष (Inactive Protoxin) अवस्था में रहता है।
  • सक्रियण की क्रियाविधि: जब कोई कीट इस पादप ऊतक को खाता है, तो कीट की मध्य आंत (Midgut) के क्षारीय pH (Alkaline pH) के कारण यह अघुलनशील रवा घुल जाता है और सक्रिय विष में बदल जाता है।
  • सक्रिय विष मध्य आंत की उपकला कोशिकाओं (Epithelial cells) की सतह से जुड़कर उनमें छिद्र (Pores) बना देता है। कोशिकाओं में जल भरने से वे फूलकर फट जाती हैं और कीट की आंत में लयन होने से कीट की मृत्यु हो जाती है।
  • क्राई जीन (Cry Genes): यह विष cry नामक जीन द्वारा कूटबद्ध होता है:
    • $cryIAc$ तथा $cryIIAb$: कपास के मुकुल कृमि (Cotton Bollworms) को नियंत्रित करते हैं।
    • $cryIAb$: मक्का छेदक (Corn Borer) को नियंत्रित करता है।

पीड़क-प्रतिरोधी पौधे एवं आरएनए अंतरक्षेप (RNA Interference - RNAi):

सूत्रकृमि (नेमाटोड) Meloidogyne incognita तम्बाकू के पौधों की जड़ों को संक्रमित करके पौधों में 'गांठें' (Root-knots) बना देता है, जिससे पैदावार में भारी कमी आती है। इसकी रोकथाम हेतु आरएनए अंतरक्षेप (RNAi) तकनीक का उपयोग किया गया:

  1. सिद्धांत: RNAi सभी यूकेरियोटिक जीवों में कोशिकीय सुरक्षा (Cellular Defense) की एक प्राकृतिक विधि है। इसमें एक विशिष्ट mRNA के साथ पूरक द्विरज्जुक आरएनए (dsRNA) के जुड़ जाने से उस mRNA का अनुवाद संदमित (साइलेंस / मौन) हो जाता है, जिससे प्रोटीन नहीं बन पाता।
  2. तकनीक: Agrobacterium संवाहकों का उपयोग करके सूत्रकृमि-विशिष्ट जीनों को तम्बाकू के पौधे में इस प्रकार प्रविष्ट कराया गया कि वे पोषी पौधे के भीतर अर्थ (Sense) तथा प्रति-अर्थ (Anti-sense) दोनों प्रकार के आरएनए बनाते हैं।
  3. ये दोनों आरएनए परस्पर पूरक होने के कारण जुड़कर द्विरज्जुक आरएनए (dsRNA) बना लेते हैं, जो RNAi प्रक्रिया प्रारंभ करता है।
  4. जब सूत्रकृमि पौधे की जड़ों को खाता है, तो यह dsRNA सूत्रकृमि के शरीर में पहुंचकर उसके महत्वपूर्ण mRNA को मौन (Silence) कर देता है। परिणामस्वरूप सूत्रकृमि अपनी आवश्यक प्रोटीन नहीं बना पाता और ट्रांसजेनिक पौधे में जीवित नहीं रह पाता। इस प्रकार पौधा सुरक्षित रहता है।

2. चिकित्सा में जैव प्रौद्योगिकी—आनुवंशिक इंसुलिन (ह्यूमूलिन) एवं जीन थेरेपी

पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी ने सुरक्षित एवं अत्यधिक प्रभावी चिकित्सीय औषधियों के उत्पादन को संभव बनाया है जो अवांछित प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाएं उत्पन्न नहीं करतीं।

1. आनुवंशिक रूप से निर्मित इंसुलिन (Genetically Engineered Insulin):

मानव इंसुलिन 51 अमीनो अम्लों का बना एक प्रोटीन हार्मोन है जो रक्त में शर्करा स्तर को नियंत्रित करता है।

  • प्रो-इंसुलिन (Pro-insulin): मानव में इंसुलिन एक प्राक-हार्मोन (Pro-hormone) के रूप में संश्लेषित होता है, जिसमें तीन पेप्टाइड शृंखलाएं होती हैं:
    • A-शृंखला: 21 अमीनो अम्ल
    • B-शृंखला: 30 अमीनो अम्ल
    • C-पेप्टाइड (C-peptide): 33 अमीनो अम्ल लंबा एक अतिरिक्त खंड।
    परिपक्व, कार्यात्मक इंसुलिन में C-पेप्टाइड अनुपस्थित होता है; परिपक्वन के दौरान C-पेप्टाइड को काटकर अलग कर दिया जाता है, तथा A और B शृंखलाएं आपस में डाइसल्फाइड बंधों ($-S-S-$) द्वारा जुड़ जाती हैं।
  • एली लिली का ऐतिहासिक नवाचार (1983): अमेरिकी दवा कंपनी एली लिली (Eli Lilly) ने 1983 में इंसुलिन की A और B शृंखलाओं के अनुरूप दो अलग-अलग डीएनए अनुक्रम तैयार किए। इन्हें E. coli जीवाणु के प्लाज्मिड में प्रविष्ट कराकर A और B शृंखलाओं का अलग-अलग उत्पादन किया गया। फिर दोनों शृंखलाओं को निकालकर प्रयोगशाला में डाइसल्फाइड बंधों द्वारा जोड़कर शुद्ध मानव इंसुलिन (ह्यूमूलिन / Humulin) बनाया गया।

2. जीन चिकित्सा (Gene Therapy):

जीन थेरेपी उन विधियों का संग्रह है जिनके द्वारा किसी बच्चे या भ्रूण में निदान किए गए आनुवंशिक दोषों का सुधार किया जाता है। इसमें रोग के उपचार हेतु किसी व्यक्ति की कोशिकाओं या ऊतकों में एक सामान्य, स्वस्थ कार्यात्मक जीन को प्रविष्ट कराया जाता है जो दोषपूर्ण या निष्क्रिय जीन के कार्य की भरपाई करता है।

एडीनोसीन डीएमीनेज (ADA) न्यूनता का ऐतिहासिक उपचार (1990):

  1. रोग का कारण: 1990 में 4-वर्षीय बालिका को ADA (Adenosine Deaminase) न्यूनता हेतु प्रथम नैदानिक जीन थेरेपी दी गई। यह एंजाइम प्रतिरक्षा तंत्र (T-लिम्फोसाइट्स) के सामान्य कार्य हेतु अनिवार्य होता है। इस जीन के विलोपन से गंभीर संयुक्त प्रतिरक्षा न्यूनता (SCID) हो जाती है।
  2. उपचार के चरण:
    • रोगी के रक्त से लसिकाणुओं (Lymphocytes) को निकालकर शरीर से बाहर प्रयोगशाला में संवर्धित किया गया।
    • एक पश्चविषाणु (Retroviral vector) का उपयोग करके कार्यात्मक ADA cDNA को इन लसिकाणुओं में प्रविष्ट कराया गया।
    • इन आनुवंशिक रूप से रूपांतरित लसिकाणुओं को पुनः रोगी के शरीर में वापस चढ़ा दिया गया।
  3. सीमा एवं स्थायी उपचार: चूंकि ये कोशिकाएं अमर नहीं होतीं (मरणशील हैं), अतः रोगी को समय-समय पर इन रूपांतरित लसिकाणुओं को शरीर में चढ़ाने की आवश्यकता होती है। स्थायी उपचार: यदि अस्थि मज्जा की कोशिकाओं से पृथक किए गए स्वस्थ ADA जीन को प्रारंभिक भ्रूणीय अवस्था (Early embryonic stages) में कोशिकाओं में प्रविष्ट करा दिया जाए, तो यह रोग हमेशा के लिए पूर्णतः ठीक हो सकता है।

3. आणविक निदान (Molecular Diagnosis):

पारंपरिक विधियों (सीरम/मूत्र विश्लेषण) द्वारा रोग का पता तब चलता है जब रोगाणुओं की संख्या शरीर में बहुत बढ़ चुकी होती है। जैव प्रौद्योगिकी की तीन विधियां प्रारंभिक निदान करती हैं:

  • पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी।
  • पॉलीमरेज शृंखला अभिक्रिया (PCR): संदिग्ध एड्स रोगियों में HIV की पहचान तथा कैंसर रोगियों में उत्परिवर्तित जीनों का पता लगाने हेतु अत्यंत कम सांद्रता में भी रोगाणु डीएनए का प्रवर्धन करता है।
  • एलिसा (ELISA): एंटीजन-एंटीबॉडी परस्पर क्रिया के सिद्धांत पर आधारित त्वरित परीक्षण।

3. पारजीवी जंतु (Transgenic Animals) एवं उनके प्रमुख अनुप्रयोग

वे जंतु जिनके डीएनए में परिचालन (हेरफेर) द्वारा एक अतिरिक्त विजातीय (विदेशी) जीन प्रविष्ट कराया गया हो और जो उस जीन को अभिव्यक्त करते हों, पारजीवी जंतु (Transgenic Animals) कहलाते हैं। पारजीवी चूहे, खरगोश, सूअर, भेड़, गाय तथा मछलियां बनाई जा चुकी हैं, किंतु विद्यमान सभी पारजीवी जंतुओं में 95% से अधिक चूहे (Mice) हैं।

पारजीवी जंतुओं के 5 प्रमुख अनुप्रयोग:

  1. सामान्य कार्यिकी एवं विकास का अध्ययन: विजातीय जीन प्रविष्ट कराकर यह अध्ययन करना कि जीनों का नियमन कैसे होता है तथा वे शरीर के सामान्य कार्यों व विकास (जैसे इंसुलिन सदृश वृद्धि कारक - IGF) को कैसे प्रभावित करते हैं।
  2. मानव रोगों का अध्ययन (Disease Models): अनेक पारजीवी जंतु मानव रोगों के प्रतिरूप (Models) के रूप में विशेष रूप से तैयार किए जाते हैं, ताकि रोगों के नए उपचारों की जांच की जा सके। उदा. कैंसर, सिस्टिक फाइब्रोसिस, रूमेटॉइड आर्थराइटिस तथा अल्जाइमर रोग हेतु विशेष पारजीवी मॉडल उपलब्ध हैं।
  3. जैविक उत्पाद प्राप्त करना (Biological Products):
    • मानव रोगों के उपचार हेतु आवश्यक दवाइयां अक्सर जटिल प्रोटीन्स होती हैं जिन्हें प्रयोगशाला में संश्लेषित करना अत्यधिक महंगा होता है। पारजीवी जंतुओं में विशिष्ट जीन डालकर उपयोगी जैविक उत्पाद प्राप्त किए जाते हैं।
    • उदाहरण 1: वातस्फीति (एम्फाइसीमा / Emphysema) के उपचार हेतु $\alpha$-1-एंटीट्रिप्सिन ($\alpha$-1-antitrypsin) प्रोटीन का उत्पादन।
    • उदाहरण 2: 1997 में प्रथम पारजीवी गाय 'रोजी' (Rosie) उत्पन्न की गई। इसके दूध में मानव प्रोटीन $\alpha$-लैक्टलब्यूमिन ($\alpha$-lactalbumin) 2.4 ग्राम प्रति लीटर पाई गई। यह दूध प्राकृतिक गाय के दूध की तुलना में मानव शिशुओं हेतु कहीं अधिक संतुलित और सुपाच्य पोषक आहार सिद्ध हुआ।
  4. टीका सुरक्षा परीक्षण (Vaccine Safety Testing): टीकों का मानव पर प्रयोग करने से पूर्व उनकी सुरक्षा जांच हेतु पारजीवी चूहों का उपयोग किया जाता है। उदा. पोलियो टीके की सुरक्षा जांच चूहों पर सफलतापूर्वक की गई है।
  5. रासायनिक सुरक्षा परीक्षण (विषाक्तता परीक्षण): पारजीवी जंतुओं में ऐसे जीन डाले जाते हैं जो उन्हें विषैले पदार्थों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं, जिससे रसायनों व दवाओं के विषाक्त प्रभावों का कम समय में सटीक पता चल जाता है।

4. नैतिक विचार एवं जैव-दस्युता (Ethical Issues & Biopiracy)

मनुष्य द्वारा अन्य जीवों के आनुवंशिक हेरफेर से अनेक नैतिक, पारिस्थितिक तथा सुरक्षात्मक प्रश्न उत्पन्न होते हैं:

1. जीईएसी (GEAC - Genetic Engineering Appraisal Committee):

आनुवंशिक रूप से रूपांतरित जीवों के अंधाधुंध उपयोग और पर्यावरण में उनके अनियंत्रित प्रवेश से पारिस्थितिक असंतुलन का खतरा रहता है। अतः भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने GEAC (आनुवंशिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति) का गठन किया है। इसके दो मुख्य कार्य हैं:

  • जीएम (आनुवंशिकतः रूपांतरित) अनुसंधानों की वैधानिकता एवं सुरक्षा की स्वीकृति देना।
  • जनसेवाओं हेतु जीएम जीवों एवं उनके उत्पादों को पर्यावरण में प्रविष्ट कराने की अनुमति व सुरक्षा का मूल्यांकन करना।

2. जैव-दस्युता (Biopiracy):

बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा विकसित देशों के अन्य संगठनों द्वारा किसी राष्ट्र अथवा संबंधित जन-समुदायों की पूर्व-स्वीकृति (Prior consent) के बिना तथा उचित क्षतिपूर्ति भुगतान (Compensatory payment) किए बिना उनके जैविक संसाधनों एवं पारंपरिक ज्ञान (Traditional Knowledge) का अनधिकृत व्यावसायिक दोहन या पेटेंट कराना 'जैव-दस्युता' कहलाता है।

प्रमुख जैव-दस्युता विवाद:

  • बासमती चावल पेटेंट विवाद (1997): भारत में बासमती चावल की 27 पहचानी गई किस्में सदियों से उगाई जा रही हैं। 1997 में एक अमेरिकी कंपनी (RiceTec) ने अमेरिकी पेटेंट एवं ट्रेडमार्क कार्यालय से 'बासमती चावल की नई किस्म' का पेटेंट अधिकार प्राप्त कर लिया। वास्तव में कंपनी ने भारतीय बासमती को अर्ध-बौनी किस्मों से संकरित करके अपनी 'नई खोज' का दावा किया था! भारत सरकार के कड़े विरोध और प्रमाणों के बाद कंपनी के अधिकांश पेटेंट दावों को रद्द कराया गया।
  • नीम एवं हल्दी पेटेंट विवाद: भारत में सदियों से हल्दी का उपयोग घाव भरने (Antiseptic) तथा नीम का उपयोग कीटनाशक व औषधीय रूप में किया जाता रहा है। विदेशी संस्थाओं ने इनके औषधीय गुणों का पेटेंट कराने का प्रयास किया, जिसे भारतीय वैज्ञानिकों ने ऐतिहासिक ग्रंथों के साक्ष्य प्रस्तुत कर निरस्त कराया।
  • भारतीय संसद का कदम: भारत की संसद ने ऐसे अनैतिक पेटेंटों से देश की जैव-संपदा की सुरक्षा हेतु 'भारतीय पेटेंट बिल' (Indian Patents Bill) का द्वितीय संशोधन पारित किया है, जिसमें पेटेंट नियमों, आपातकालीन प्रावधानों तथा अनुसंधान व विकास के अधिकारों को कड़ा बनाया गया है।

महत्वपूर्ण जैविक संकल्पनाएँ, प्रक्रियाएँ एवं आरेख

इंसुलिन पॉलीपेप्टाइड संघटन
प्राक-इंसुलिन = A (21 aa) + B (30 aa) + C-पेप्टाइड (33 aa) | परिपक्व इंसुलिन = A + B (डाइसल्फाइड बंध)
C-पेप्टाइड परिपक्व इंसुलिन में अनुपस्थित होता है (Eli Lilly 1983)
बीटी क्राई जीन विनिर्देश (Cry Gene Specificity)
cryIAc + cryIIAb = कपास मुकुल कृमि (Bollworm) | cryIAb = मक्का छेदक (Corn Borer)
स्रोत: Bacillus thuringiensis; आंत के क्षारीय pH में सक्रिय
रोजी (Rosie) पारजीवी गाय दूध संघटन
मानव प्रोटीन: α-लैक्टलब्यूमिन (2.4 ग्राम / लीटर)
1997 में विकसित; मानव शिशुओं हेतु अत्यधिक पोषक एवं सुपाच्य
प्रथम जीन थेरेपी नैदानिक विवरण
वर्ष: 1990 | रोगी: 4-वर्षीय बालिका | रोग: ADA (Adenosine Deaminase) न्यूनता | संवाहक: Retrovirus
स्थायी उपचार: प्रारंभिक भ्रूणीय अवस्था में जीन प्रविष्ट कराना

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
आनुवंशिक रूप से निर्मित इंसुलिन (ह्यूमूलिन) का निर्माण अमेरिकी कंपनी 'एली लिली' द्वारा किस प्रकार किया गया? प्रो-इंसुलिन एवं परिपक्व इंसुलिन की संरचना में मूलभूत अंतर क्या है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. प्रो-इंसुलिन बनाम परिपक्व इंसुलिन में अंतर:
    मानव अग्न्याशय द्वारा स्रावित प्रो-इंसुलिन (प्राक-हार्मोन) में तीन पॉलीपेप्टाइड शृंखलाएं होती हैं: A-शृंखला (21 अमीनो अम्ल), B-शृंखला (30 अमीनो अम्ल), तथा एक अतिरिक्त C-पेप्टाइड (33 अमीनो अम्ल)।
    परिपक्वन की प्रक्रिया में C-पेप्टाइड को काटकर पूर्णतः अलग कर दिया जाता है। अतः परिपक्व, सक्रिय इंसुलिन में केवल A और B शृंखलाएं होती हैं जो आपस में दो डाइसल्फाइड बंधों ($-S-S-$) द्वारा जुड़ी होती हैं (C-पेप्टाइड अनुपस्थित होता है)।
  2. एली लिली (1983) की निर्माण विधि:
    • जीवाणु में सीधे प्रो-इंसुलिन का जीन डालने पर C-पेप्टाइड को काटने वाला मानव एंजाइम तंत्र जीवाणु में नहीं होता था।
    • अतः 1983 में एली लिली ने रासायनिक रूप से इंसुलिन की A-शृंखला तथा B-शृंखला के लिए दो अलग-अलग डीएनए अनुक्रम तैयार किए।
    • इन दोनों डीएनए अनुक्रमों को E. coli जीवाणु के प्लाज्मिड में प्रविष्ट कराकर A और B शृंखलाओं का संवर्धन द्वारा अलग-अलग उत्पादन किया।
    • इसके पश्चात् दोनों शृंखलाओं को जीवाणु कोशिकाओं से निष्कर्षित कर प्रयोगशाला में रासायनिक विधि द्वारा डाइसल्फाइड बंध बनाकर जोड़ दिया गया। इस प्रकार पूर्णतः क्रियाशील मानव इंसुलिन (ह्यूमूलिन / Humulin) का निर्माण हुआ।
उदाहरण 2
बीटी-कपास (Bt-Cotton) में कीट-प्रतिरोधकता किस प्रकार कार्य करती है? बीटी-विष जीवाणु को स्वयं क्यों नहीं मारता किंतु कीट की आंत में जाते ही वह क्यों मर जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. जीवाणु में अहानिकर रहने का कारण: मृदा जीवाणु Bacillus thuringiensis के भीतर बीटी-विष प्रोटीन रवों (Crystals) के रूप में एक निष्क्रिय प्राकविष (Inactive Protoxin) अवस्था में रहता है, इसलिए यह जीवाणु को स्वयं कोई हानि नहीं पहुंचाता।
  2. कीट की आंत में सक्रियण की क्रियाविधि:
    • जब कीट कपास के पौधे के किसी भाग को खाता है, तो यह निष्क्रिय प्रोविषक कीट की आहारनाल में पहुंचता है।
    • कीट की मध्य आंत (Midgut) का माध्यम क्षारीय (Alkaline pH) होता है। यह क्षारीय pH विषैले रवों को घोल देता है और प्रोविषक को सक्रिय बीटी-विष (Active Toxin) में बदल देता है।
    • सक्रिय विष मध्य आंत की उपकला कोशिकाओं (Epithelial cells) की सतह से जुड़ जाता है।
    • यह विष उपकला कोशिकाओं में छिद्र (Pores) उत्पन्न कर देता है, जिससे बाह्य द्रव अंदर भरने से कोशिकाएं फूलकर फट जाती हैं।
    • आंत की भित्ति के लयन (Lysis) होने से कीट भोजन ग्रहण नहीं कर पाता और कुछ ही समय में कीट की मृत्यु हो जाती है।
  3. क्राई जीन: $cryIAc$ और $cryIIAb$ कपास के मुकुल कृमि को तथा $cryIAb$ मक्का छेदक को नष्ट करते हैं।
उदाहरण 3
आरएनए अंतरक्षेप (RNA Interference - RNAi) क्या है? तम्बाकू के पौधों को सूत्रकृमि 'मेलाइडेगायनी इन्कोग्निशिया' (Meloidogyne incognita) से बचाने में इसका उपयोग कैसे किया जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. RNA अंतरक्षेप (RNAi) की परिभाषा: यह सभी यूकेरियोटिक जीवों में कोशिकीय प्रतिरक्षा की एक प्राकृतिक प्रणाली है जिसमें एक विशिष्ट mRNA के पूरक द्विरज्जुक आरएनए (dsRNA) के जुड़ने से उस mRNA का अनुवाद रुक (Silence/मौन हो) जाता है, जिससे लक्षित प्रोटीन का निर्माण नहीं हो पाता।
  2. तम्बाकू पादप में अनुप्रयोग के चरण:
    • सूत्रकृमि Meloidogyne incognita तम्बाकू की जड़ों में संक्रमण कर गांठें बनाता है।
    • Agrobacterium संवाहकों का उपयोग करके सूत्रकृमि-विशिष्ट जीनों को तम्बाकू के पादप में इस प्रकार डाला गया कि वे पोषी कोशिका में अर्थ (Sense) तथा प्रति-अर्थ (Anti-sense) दोनों आरएनए बनाते हैं।
    • ये दोनों आरएनए परस्पर पूरक होने के कारण जुड़कर dsRNA बना लेते हैं।
    • जब सूत्रकृमि पौधे की जड़ों से रस चूसता है, तो यह dsRNA सूत्रकृमि की कोशिकाओं में प्रवेश कर जाता है और सूत्रकृमि के जीवन हेतु आवश्यक विशिष्ट mRNA को साइलेंस (नष्ट) कर देता है।
    • आवश्यक प्रोटीन के अभाव में परजीवी सूत्रकृमि पोषी पादप में जीवित नहीं रह पाता और पौधा संक्रमण से मुक्त रहता है।
उदाहरण 4
जीन चिकित्सा (Gene Therapy) क्या है? 1990 में 4-वर्षीय बालिका में 'एडीनोसीन डीएमीनेज' (ADA) न्यूनता के उपचार हेतु अपनाई गई विधि का सचित्र अथवा चरणबद्ध विवरण दीजिए। इसका स्थायी उपचार क्या हो सकता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. जीन थेरेपी की परिभाषा: किसी आनुवंशिक रोग के उपचार हेतु रोगी की कोशिकाओं में एक सामान्य, स्वस्थ एवं क्रियाशील जीन को प्रविष्ट कराकर दोषपूर्ण जीन के कार्य की भरपाई करने की तकनीक जीन चिकित्सा कहलाती है।
  2. ADA न्यूनता का उपचार (1990):
    • ADA एंजाइम प्रतिरक्षा तंत्र (T-कोशिकाओं) के लिए अनिवार्य है; इसकी कमी से SCID रोग होता है।
    • चरण 1: रोगी बालिका के रक्त से लसिकाणुओं (Lymphocytes) को निकालकर संवर्धन में उगाया गया।
    • चरण 2: एक पश्चविषाणु संवाहक (Retroviral vector) द्वारा सामान्य मानव ADA cDNA को इन लसिकाणुओं में प्रविष्ट कराया गया।
    • चरण 3: इन आनुवंशिकतः रूपांतरित लसिकाणुओं को पुनः रोगी के शरीर में वापस प्रविष्ट करा दिया गया।
  3. स्थायी उपचार: चूंकि शरीर में लसिकाणु कोशिकाएं मरणशील (नश्वर) होती हैं, इसलिए रोगी को समय-समय पर रूपांतरित कोशिकाओं के अंतःक्षेपण की आवश्यकता होती है। यदि अस्थि मज्जा की कोशिकाओं से सामान्य ADA जीन को पृथक करके प्रारंभिक भ्रूणीय अवस्था (Early embryonic stages) की कोशिकाओं में प्रविष्ट करा दिया जाए, तो यह इस रोग का पूर्ण एवं स्थायी उपचार होगा।
उदाहरण 5
जैव-दस्युता (Biopiracy) से आप क्या समझते हैं? 1997 में अमेरिकी कंपनी द्वारा 'बासमती चावल' के पेटेंट विवाद के संदर्भ में इसकी विवेचना कीजिए। भारत सरकार ने इसके निवारण हेतु क्या कदम उठाए हैं?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. जैव-दस्युता (Biopiracy): बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा अन्य संस्थाओं द्वारा किसी देश अथवा उसके निवासियों की पूर्व अनुमति तथा बिना किसी उचित क्षतिपूर्ति भुगतान के उनके जैविक संसाधनों एवं पारंपरिक ज्ञान का अनधिकृत व्यावसायिक दोहन अथवा उन पर पेटेंट अधिकार प्राप्त करना जैव-दस्युता कहलाता है।
  2. बासमती चावल पेटेंट विवाद (1997):
    • भारत में सदियों से बासमती चावल अपनी अनूठी सुगंध और लंबे दानों हेतु प्रसिद्ध है और इसकी 27 पहचानी गई किस्में भारत में उगाई जाती हैं।
    • 1997 में एक अमेरिकी कंपनी (RiceTec) ने अमेरिकी पेटेंट कार्यालय से 'बासमती राइस लाइन्स एंड ग्रेन्स' पर पेटेंट अधिकार प्राप्त कर लिया और बासमती के नाम से घरेलू व विदेशी बाजारों में चावल बेचने का अधिकार प्राप्त कर लिया।
    • वास्तव में कंपनी ने भारतीय किसानों द्वारा पीढ़ियों से विकसित पारंपरिक बासमती चावल को अमेरिकी अर्ध-बौनी किस्मों से संकरित करके इसे अपनी 'नई खोज' बताया था।
    • भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ा कानूनी विरोध दर्ज किया और प्राचीन भारतीय ग्रंथों तथा ऐतिहासिक साक्ष्यों को प्रस्तुत किया, जिसके फलस्वरूप अमेरिकी पेटेंट कार्यालय को कंपनी के अधिकांश पेटेंट दावों को निरस्त करना पड़ा।
  3. भारत सरकार द्वारा निवारण उपाय: भारत की संसद ने अपने जैविक संसाधनों की रक्षा हेतु 'भारतीय पेटेंट बिल' (Indian Patents Bill) का द्वितीय संशोधन पारित किया है, जिसमें पारंपरिक ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी (TKDL) की स्थापना की गई है ताकि कोई विदेशी कंपनी भारत के पारंपरिक ज्ञान पर अनधिकृत पेटेंट न करा सके।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

परिपक्व इंसुलिन में C-पेप्टाइड को उपस्थित मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

परिपक्व, सक्रिय इंसुलिन में केवल A और B शृंखलाएं होती हैं (डाइसल्फाइड बंधों से जुड़ी); C-पेप्टाइड केवल प्रो-इंसुलिन में होता है और परिपक्वन के दौरान कटकर अलग हो जाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

बीटी-विष को जीवाणु के भीतर ही सक्रिय और विषैला समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

जीवाणु में बीटी-विष अघुलनशील निष्क्रिय प्रोविषक (Protoxin) के रूप में रहता है; यह केवल कीट की आंत के क्षारीय pH में घुलकर सक्रिय विष बनता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

ADA न्यूनता के लसिकाणु उपचार को स्थायी उपचार मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

रोगी में लसिकाणुओं का आवर्ती अंतःक्षेपण अस्थायी उपचार है; स्थायी उपचार केवल तभी संभव है जब जीन को 'प्रारंभिक भ्रूणीय अवस्था' में प्रविष्ट कराया जाए।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

CryIAc और CryIAb के लक्षित कीटों में भ्रम होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

CryIAc और CryIIAb कपास के मुकुल कृमि (Bollworms) को नियंत्रित करते हैं; जबकि CryIAb मक्का छेदक (Corn borer) को नियंत्रित करता है।

कृषि एवं चिकित्सा में जैव प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग (Biotechnology Applications Architecture)

जैव प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग (Biotechnology and its Applications)Bt-कपास • RNA अंतरक्षेप • आनुवंशिक इंसुलिन • ADA जीन थेरेपी • पारजीवी जंतु व जैव-दस्युता1. कृषि अनुप्रयोगबीटी-कपास (Bt Cotton):• B. thuringiensis (Cry प्रोटीन)• कीट आंत का क्षारीय pH• उपकला में छिद्र व लयन• cryIAc/cryIIAb: मुकुल कृमिRNA अंतरक्षेप (RNAi):• M. incognita (तम्बाकू जड़)• dsRNA द्वारा mRNA साइलेंसिंग• परजीवी की मृत्युस्वर्णिम धान (Golden Rice):• विटामिन 'ए' (β-कैरोटीन)2. चिकित्सा अनुप्रयोगह्यूमूलिन (Eli Lilly, 1983):• प्रो-इंसुलिन = A + B + C पेप्टाइड• परिपक्व इंसुलिन = A + B (21+30)• C-पेप्टाइड परिपक्व में अनुपस्थित• डाइसल्फाइड बंध (-S-S-)जीन थेरेपी (1990):• 4-वर्षीय बालिका (SCID)• ADA जीन विलोपन सुधार• रेट्रोवायरस संवाहक उपयोगस्थायी उपचार: प्रारंभिक भ्रूणीयअवस्था में स्वस्थ जीन डालना3. पारजीवी जंतुपारजीवी जीव (95% चूहे):• सामान्य कार्यिकी व विकास• मानव रोग मॉडल (Cancer, CF)• टीका सुरक्षा परीक्षण (Polio)• रासायनिक विषाक्तता जांचजैविक उत्पाद (Biologicals):• रोजी गाय (Rosie, 1997): α-लैक्टलब्यूमिन (2.4 g/L) शिशुओं हेतु सर्वोत्तम दूध• α-1-एंटीट्रिप्सिन: वातस्फीति (Emphysema) इलाज4. नैतिकता व दस्युताGEAC (भारत सरकार):• Genetic Engineering Appraisal Committee• GM जीवों की सुरक्षा स्वीकृतिजैव-दस्युता (Biopiracy):• अनधिकृत पेटेंट व दोहन• बासमती चावल पेटेंट (1997) (RiceTec अमेरिकी कंपनी)• नीम व हल्दी पेटेंट विवादभारतीय पेटेंट बिल संशोधनपारंपरिक ज्ञान (TKDL) सुरक्षा

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
जीएम फसलों में बीटी-कपास प्रमुख है; B. thuringiensis का Cry प्रोटीन कीट आंत के क्षारीय pH में घुलकर उपकला में छिद्र करता है।
मुख्य बिंदु 2
cryIAc तथा cryIIAb कपास मुकुल कृमि को तथा cryIAb मक्का छेदक को नियंत्रित करता है।
मुख्य बिंदु 3
RNA अंतरक्षेप (RNAi) यूकैरियोट्स की प्राकृतिक सुरक्षा विधि है; dsRNA द्वारा विशिष्ट mRNA को साइलेंस कर M. incognita से तम्बाकू जड़ बचाते हैं।
मुख्य बिंदु 4
स्वर्णिम धान (Golden Rice) विटामिन 'ए' (β-कैरोटीन) से समृद्ध आनुवंशिक रूपांतरित चावल है।
मुख्य बिंदु 5
प्राक-इंसुलिन में A, B और C-पेप्टाइड होते हैं; परिपक्व इंसुलिन में C-पेप्टाइड नहीं होता, केवल A और B शृंखलाएं डाइसल्फाइड बंधों से जुड़ी होती हैं।
मुख्य बिंदु 6
1983 में एली लिली ने E. coli में A व B शृंखलाओं का अलग-अलग निर्माण कर प्रथम आनुवंशिक इंसुलिन (ह्यूमूलिन) बनाया।
मुख्य बिंदु 7
1990 में 4-वर्षीय बालिका को ADA न्यूनता (SCID) हेतु प्रथम जीन थेरेपी दी गई; स्थायी उपचार प्रारंभिक भ्रूणीय अवस्था में जीन डालना है।
मुख्य बिंदु 8
विद्यमान पारजीवी जंतुओं में 95% से अधिक चूहे हैं; प्रथम पारजीवी गाय 'रोजी' (1997) के दूध में मानव प्रोटीन α-लैक्टलब्यूमिन (2.4 g/L) थी।
मुख्य बिंदु 9
GEAC (आनुवंशिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति) भारत में जीएम शोध व उत्पादों की सुरक्षा का नियमन करती है।
मुख्य बिंदु 10
पारंपरिक ज्ञान व जैविक संसाधनों का अनधिकृत व्यावसायिक पेटेंट जैव-दस्युता (Biopiracy) कहलाता है (उदा. 1997 बासमती पेटेंट विवाद)।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
बीटी-कपास में प्रयुक्त 'Cry' प्रोविषक कीट की आहारनाल में पहुंचकर किस कारण से सक्रिय विष में परिवर्तित होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
2
मानव के परिपक्व एवं सक्रिय इंसुलिन अणु में कौन सा खंड पूर्णतः अनुपस्थित होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C
3
1997 में विकसित प्रथम पारजीवी गाय 'रोजी' (Rosie) के दूध में कौन सी मानव प्रोटीन प्रचुर मात्रा (2.4 ग्राम/लीटर) में उपस्थित थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
4
भारत में आनुवंशिक रूप से रूपांतरित (GM) फसलों एवं जीवों के शोध व सार्वजनिक उपयोग की सुरक्षा का नियमन कौन सा संगठन करता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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