"अनुशासन ही देश को महान बनाता है।" यह उक्ति मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सत्य सिद्ध होती है, किंतु विद्यार्थी जीवन में इसकी उपयोगिता सर्वाधिक है। 'अनुशासन' शब्द 'अनु' उपसर्ग और 'शासन' के योग से बना है, जिसका अर्थ है—नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना अथवा आत्म-नियंत्रण। प्रकृति का प्रत्येक अंग अनुशासन का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। सूर्य का समय पर उदय और अस्त होना, ऋतुओं का नियमित चक्र तथा ग्रहों की निश्चित कक्षाएं हमें अनुशासन की ही शिक्षा देती हैं।
विद्यार्थी जीवन मानव जीवन की वह उर्वरा भूमि है जहाँ चरित्र, ज्ञान और आदतों के बीज बोए जाते हैं। यदि इस अवस्था में अनुशासनहीनता का कीड़ा लग जाए, तो भविष्य अंधकारमय हो जाता है। एक अनुशासित विद्यार्थी केवल कक्षा में शांत बैठने तक सीमित नहीं रहता; वह अपनी दैनिक दिनचर्या, अध्ययन, खेलकूद, भोजन और विश्राम में एक सुंदर संतुलन स्थापित करता है। वह अपने गुरुजनों का आदर करता है, सहपाठियों से सौहार्दपूर्ण व्यवहार करता है और समय की एक-एक बूंद का सदुपयोग करता है।
वर्तमान समय में पाश्चात्य अंधानुकरण, अनियंत्रित मोबाइल और सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण छात्रों में अनुशासनहीनता और असंतोष की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इसका दुष्परिणाम परीक्षा में असफलता, मानसिक तनाव और चरित्र-पतन के रूप में सामने आता है। जिस प्रकार बिना पतवार की नाव लहरों के थपेड़ों से नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार अनुशासनहीन छात्र जीवन-संग्राम में पराजित हो जाता है।
अतः प्रत्येक विद्यार्थी को यह समझना चाहिए कि अनुशासन कोई बाह्य बंधन नहीं, बल्कि आत्म-विकास का स्वर्णिम सोपान है। अनुशासित रहकर ही हम एक समर्थ, सशक्त और गौरवशाली भारत का निर्माण कर सकते हैं।