क. कथानक एवं मुख्य पात्र:
- रसीला: इंजीनियर बाबू जगत सिंह का सीधा-साधा, ईमानदार नौकर। दस रुपये मासिक वेतन पाता है। गाँव में परिवार के भरण-पोषण के लिए कर्जदार है।
- रमजान: पड़ोस में रहने वाले जिला मजिस्ट्रेट शेख सलीमुद्दीन का चौकीदार। संवेदनशील, सच्चा मित्र, जो रसीला की जरूरत पर उसे बिना संकोच रुपये उधार देता है।
- बाबू जगत सिंह: रिश्वतखोर इंजीनियर। बाहर से सम्मानित, भीतर से भ्रष्ट। 500 रुपये की रिश्वत आसानी से डकार जाते हैं, किंतु नौकर की अठन्नी पर क्रूरता की हद पार कर देते हैं।
- शेख सलीमुद्दीन: जिला मजिस्ट्रेट, जो स्वयं 1000 रुपये की रिश्वत लेते हैं, किंतु अदालत में बैठकर रसीला को 6 महीने की जेल की सजा सुनाते हैं।
ख. चरमोत्कर्ष एवं सामाजिक विडंबना:
रसीला रमजान का कर्ज चुकाने के लिए मिठाई लाने के पैसों में से केवल आठ आने बचा लेता है। बाबू जगत सिंह को संदेह होने पर वे रसीला को पीटते हैं और पुलिस के हवाले कर देते हैं। अदालत में मजिस्ट्रेट साहब उसे छह माह की सख्त सजा देते हैं। रमजान का यह कथन समूची व्यवस्था पर तमाचा मारता है: "फैसले के समय शेख साहब ने कहा—'रसीला बहुत अनुभवी और चालाक नौकर है... इसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए।' दासों पर इतना अत्याचार! यह इंसाफ नहीं, अंधेर है!"