क. विवाह-प्रस्ताव एवं अस्वीकृति का आघात:
उपन्यास का आरंभ मेरठ के एक प्रतिष्ठित परिवार में होता है। बाबू धनीराम की ज्येष्ठ पुत्री सुषमा अत्यंत विदुषी, सुशीला और गृहकार्य-दक्ष युवती है। उसके विवाह हेतु दयाराम जी अपने पुत्र अमित के साथ आते हैं। अमित सुषमा के गुणों से प्रभावित होता है, किंतु अमित के पिता दयाराम जी को सुषमा का सांवला रंग पसंद नहीं आता। वे संबंध से स्पष्ट मना कर देते हैं। इस अस्वीकृति से धनीराम का परिवार गहरा आघात सहता है।
ख. स्वावलंबन का संकल्प एवं वकालत की पढ़ाई:
- पारिवारिक दबाव और समाज के तानों के बावजूद सुषमा विवाह को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मानने से इनकार कर देती है।
- वह अपने पिता से अनुमति लेकर कानून (वकालत) की पढ़ाई करने का दृढ़ निश्चय करती है। वह दिन-रात कठोर परिश्रम करके एलएल.बी. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करती है।
- सुषमा मेरठ कचहरी में वकालत प्रारंभ करती है और अपनी योग्यता, सत्यनिष्ठा तथा प्रखर वक्ता के रूप में शहर की अत्यंत सफल एवं सम्मानित वकील बन जाती है। वह गरीब और असहाय महिलाओं के मुकद्दमे निःशुल्क लड़कर समाज में ख्याति अर्जित करती है।
ग. अमित का विवाह, पश्चाताप एवं चरमोत्कर्ष:
उधर, दयाराम जी अपने पुत्र अमित का विवाह एक रूपवती और धनी कन्या सरिता से कर देते हैं। सरिता रूपवती तो है, किंतु वह अहंकारी, फूहड़ और सास-ससुर की सेवा न करने वाली आधुनिक विलासिता-पसंद महिला निकलती है। घर में प्रतिदिन कलह होने लगती है। अमित को अब सुषमा के आंतरिक गुणों और सादगी का मूल्य समझ में आता है। कुछ समय बाद सरिता अमित को छोड़कर अपने मायके चली जाती है और तलाक का मुकद्दमा दायर कर देती है।
अमित कानूनी सलाह के लिए वकील की खोज करता हुआ संयोगवश सुषमा के चैंबर में पहुँचता है। सुषमा को देखकर अमित पश्चाताप और हीन-भावना से भर जाता है। अंततः दयाराम जी भी अपनी भूल स्वीकार करते हैं। सुषमा अपने आत्मसम्मान और योग्यता के बल पर समाज में एक "नया रास्ता" बनाती है।