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ICSE • कक्षा 9 • Hindi • अध्याय 8
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

Hindi Literature - Ekanki Sanchay: One-act Plays

आईसीएसई कक्षा 9 हिन्दी साहित्य (प्रश्न-पत्र 2, एकांकी संचयन: एकांकी संग्रह) के अंतर्गत चार अत्यंत सशक्त, प्रभावशाली एवं कालजयी एकांकियाँ निर्धारित हैं: विष्णु प्रभाकर रचित "संस्कार और भावना", विनोद रस्तोगी रचित "बहू की विदा", पं. हरिकृष्ण 'प्रेमी' रचित "मातृभूमि का मान", तथा उपेंद्रनाथ 'अश्क' रचित "सूखी डाली"। ये एकांकियाँ भारतीय संयुक्त परिवार की जटिल संरचना, पीढ़ी-संघर्ष एवं मानवीय संवेदनाओं की विजय, दहेज-प्रथा की विकृत मानसिकता और सास-ससुर के दोहरे चरित्र का पर्दाफाश, मातृभूमि की अस्मिता व स्वाभिमान हेतु हाड़ा राजपूतों का सर्वोच्च आत्मबलिदान, तथा वटवृक्ष रूपी संयुक्त परिवार को टूटने से बचाने की मनोवैज्ञानिक दूरदर्शिता का सजीव एवं मर्मस्पर्शी नाटकीय चित्रण प्रस्तुत करती हैं। इस विस्तृत अध्ययन मार्गदर्शिका में प्रत्येक एकांकी का सारांश, चरित्र-चित्रण (मां, उमा, अतुल; जीवनलाल, राजेश्वरी, प्रमोद, कमला; महाराणा लाखा, वीर सिंह; दादा मूलराज, बेला), नाट्य-शिल्प, संवाद-योजना, उद्देश्य तथा सीआईएससीई आधारित अवतरण प्रश्नोत्तर का सांगोपांग विश्लेषण किया गया है।

जब एक राजपूत सैनिक ने अपनी ही सेना के विरुद्ध एक मिट्टी के नकली दुर्ग की रक्षा में अपने प्राण क्यों न्योछावर कर दिए?

पं. हरिकृष्ण 'प्रेमी' की एकांकी "मातृभूमि का मान" का वह दृश्य भारतीय इतिहास के शौर्य का शिखर है, जब मेवाड़ के महाराणा लाखा बूंदी के युद्ध में पराजित होकर प्रतिज्ञा कर लेते हैं कि जब तक वे बूंदी का दुर्ग जीतकर उसमें प्रवेश नहीं करेंगे, तब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे! प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए चित्तौड़ के बाहर मिट्टी का एक "नकली दुर्ग" बनाया जाता है। किंतु मेवाड़ की सेना में ही कार्यरत हाड़ा राजपूत युवक वीर सिंह अपनी छाती तानकर कहता है: "हाड़ा राजपूतों के जीते-जी कोई बूंदी के नकली दुर्ग को भी नहीं जीत सकता! मातृभूमि चाहे असली हो या नकली, उसका मान हमारे रक्त से सिंचित है!" और वह नकली दुर्ग की रक्षा करते हुए महाराणा की तोपों के आगे हंसते-हंसते वीरगति को प्राप्त होता है! क्या आज का समाज पारिवारिक एकता के उस वटवृक्ष को समझता है जिसकी बात दादा मूलराज करते हैं? आइए, इन अमर एकांकियों के नाट्य-रस में प्रवेश करें।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

एकांकी संचयन आईसीएसई साहित्य प्रश्न-पत्र में 16 अंकों का अवतरण-आधारित प्रश्न विकल्प प्रस्तुत करता है। यह छात्रों में रंगमंचीय संवेदनशीलता, संवाद-कला, पारिवारिक दायित्वों तथा राष्ट्रप्रेम की भावना को जागृत करता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • एकांकी (एक अंक का नाटक) के नाट्य-तत्वों (पात्र, संवाद, संघर्ष, चरमोत्कर्ष) की समझ।
  • भारतीय पारिवारिक व ऐतिहासिक मूल्यों की सामान्य पृष्ठभूमि।
  • नाटकीय संवादों के आधार पर संदर्भ और वक्ता-श्रोता की पहचान करने की क्षमता।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • "संस्कार और भावना" में रूढ़िवादी संस्कारों पर मानवीय संवेदनाओं की विजय का विश्लेषण करना।
  • "बहू की विदा" में जीवनलाल के दहेज-लोभ, राजेश्वरी की ममता तथा "बेटी और बहू" के दोहरे मापदंड को समझना।
  • "मातृभूमि का मान" में वीर सिंह के अद्वितीय राष्ट्रप्रेम, स्वाभिमान और आत्मबलिदान की व्याख्या करना।
  • "सूखी डाली" में दादा मूलराज के दूरदर्शी नेतृत्व तथा संयुक्त परिवार की वटवृक्ष रूपी एकता को रेखांकित करना।
  • बोर्ड परीक्षा में 16 अंकों के एकांकी अवतरण प्रश्नों के विश्लेषणात्मक व सटीक उत्तर लिखना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. "संस्कार और भावना" (विष्णु प्रभा...
2 2. "बहू की विदा" (विनोद रस्तोगी): द...
3 3. "मातृभूमि का मान" (पं. हरिकृष्ण...
4 4. "सूखी डाली" (उपेंद्रनाथ 'अश्क'):...
5 5. "सूखी डाली" एवं "मातृभूमि का मान...
6 6. "संस्कार और भावना" एवं "बहू की व...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. "संस्कार और भावना" (विष्णु प्रभाकर): संस्कारों पर मानवीय संवेदना की विजय

एकांकी 1: संस्कार और भावना
क. पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं संघर्ष:

एक संभ्रांत परिवार की मां प्राचीन कुलीन संस्कारों और परंपराओं की प्रबल समर्थक है। उसका बड़ा पुत्र अविनाश अपनी पसंद से एक विजातीय (बंगाली) कन्या उमा से प्रेम-विवाह कर लेता है। रूढ़िवादी मां इसे अपने संस्कारों का अपमान मानती है और अविनाश को घर से निष्कासित कर देती है। छोटा बेटा अतुल अपनी मां और बड़े भाई के बीच पिसता रहता है।

ख. चरमोत्कर्ष एवं हृदय-परिवर्तन:
  • अविनाश गंभीर रूप से हैजे (कॉलरा) का शिकार हो जाता है और जीवन-मृत्यु के बीच झूलता है।
  • उमा बिना सोए, बिना खाए-पिए दिन-रात एक करके अपने पति की सेवा करती है और अपने प्राणों की बाजी लगाकर अविनाश को मौत के मुंह से खींच लाती है। सेवा करते-करते उमा स्वयं बीमार पड़ जाती है।
  • जब मां को पता चलता है कि जिस विजातीय बहू को उसने ठुकरा दिया था, उसने अपने पति के प्राण बचाने में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, तो मां की ममता की अंतःसलिला फूट पड़ती है।
  • मां के मन में प्राचीन "संस्कारों" और मातृत्व की "भावना" के बीच भीषण द्वंद्व होता है। अंततः भावना की विजय होती है। मां कहती है: "संस्कार भावना के आगे हार गए... मैं अपनी बहू को घर लाऊंगी।"

2. "बहू की विदा" (विनोद रस्तोगी): दहेज के दानव पर करारी चोट

एकांकी 2: बहू की विदा
क. दहेजलोभी ससुर और विवश भाई:

श्रावण मास में नवविवाहिता कमला की पहली विदाई कराने उसका छोटा भाई प्रमोद अपनी बहन की ससुराल आता है। कमला का ससुर जीवनलाल एक अत्यंत धनी, अहंकारी और दहेजलोभी व्यक्ति है। वह प्रमोद को अपमानित करते हुए कहता है कि विवाह में पांच हजार रुपये का दहेज कम मिला था; जब तक पांच हजार रुपये नगद नहीं मिलेंगे, तब तक वह कमला को विदा नहीं करेगा: "मेरी जेब में पांच हजार रुपये रख दो, बहू को विदा करा लो।"

ख. राजेश्वरी की उदारता एवं नाटकीय मोड़:
  • कमला की सास राजेश्वरी एक ममतामयी, न्यायप्रिय महिला है। वह अपने पति के लालच और अमानवीय व्यवहार की निंदा करती है और प्रमोद को अपनी तिजोरी से जेवर व रुपये देने की पेशकश करती है।
  • तभी जीवनलाल का पुत्र रमेश अपनी बहन गौरी को उसकी ससुराल से विदा कराने जाता है। जीवनलाल अपनी लाडली बेटी गौरी के स्वागत की भव्य तैयारियां करता है।
  • किंतु रमेश अकेला लौटता है और बताता है कि गौरी के ससुराल वालों ने भी दहेज कम मिलने के कारण गौरी की विदाई करने से मना कर दिया!
ग. जीवनलाल का पश्चाताप:

अपनी बेटी की विदाई रुकने पर जीवनलाल तिलमिला उठता है। तब राजेश्वरी उसे आइना दिखाती है: "दूसरों की बेटी क्या बेटी नहीं होती? जो घाव तुमने प्रमोद के हृदय पर किया था, आज वही घाव ईश्वर ने तुम्हारे सीने पर किया है!" जीवनलाल का अहंकार चूर-चूर हो जाता है। वह पश्चाताप के आंसुओं में डूबकर कमला को सहर्ष विदा करता है और कहता है: "बेटी और बहू में कोई अंतर नहीं होता।"

3. "मातृभूमि का मान" (पं. हरिकृष्ण 'प्रेमी'): हाड़ा राजपूतों का अमर बलिदान

एकांकी 3: मातृभूमि का मान
क. महाराणा लाखा की अविवेकपूर्ण प्रतिज्ञा:

चित्तौड़ के महाराणा लाखा बूंदी के राव हेमू के विरुद्ध युद्ध में बुरी तरह पराजित होते हैं। पराजय के क्रोध और अपमान में वे अविवेकपूर्ण भीषण प्रतिज्ञा कर लेते हैं: "जब तक मैं बूंदी के दुर्ग पर अधिकार न कर लूं, तब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा!"

ख. नकली दुर्ग और वीर सिंह का स्वाभिमान:
  • बूंदी को इतनी शीघ्रता से जीतना असंभव था। महाराणा के प्राणों की रक्षा हेतु मंत्रियों ने चित्तौड़ के बाहर मिट्टी का "नकली बूंदी दुर्ग" बनवाकर उसे जीतकर प्रतिज्ञा पूरी करने की योजना बनाई।
  • मेवाड़ की सेना में कार्यरत हाड़ा राजपूत युवक वीर सिंह जब यह सुनता है, तो उसका स्वाभिमान जाग उठता है। वह कहता है कि हम हाड़ा राजपूत अपनी मातृभूमि के नकली दुर्ग का भी अपमान नहीं होने देंगे!
  • वीर सिंह अपने मुट्ठी भर हाड़ा साथियों के साथ नकली दुर्ग के भीतर मोर्चा संभाल लेता है। जब महाराणा लाखा की सेना आक्रमण करती है, तो वीर सिंह तोपों और तीरों से असली युद्ध लड़ने लगता है।
  • वीर सिंह मातृभूमि के मान की रक्षा करते हुए युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त होता है। महाराणा लाखा उसकी वीरता और देशभक्ति के आगे नतमस्तक होकर पश्चाताप करते हैं।

4. "सूखी डाली" (उपेंद्रनाथ 'अश्क'): संयुक्त परिवार की वटवृक्ष रूपी एकता

एकांकी 4: सूखी डाली
क. वटवृक्ष रूपी परिवार और दादा मूलराज:

यह एकांकी एक बड़े भारतीय संयुक्त परिवार पर आधारित है, जिसके मुखिया 72 वर्षीय दादा मूलराज हैं। वे पूरे परिवार को एक विशाल वटवृक्ष मानते हैं और परिवार के सभी सदस्यों को उसकी डालियाँ। उनका मानना है कि जब तक डालियाँ पेड़ से जुड़ी हैं, तब तक वे हरी-भरी और सुरक्षित हैं; पेड़ से टूटकर अलग होने पर डाली "सूखी डाली" बनकर सूख जाती है और चूल्हे में जलने के काम आती है।

ख. बेला का आगमन और टकराव:
  • दादा जी के सबसे छोटे पोते परेश का विवाह लाहौर की उच्च-शिक्षित, संभ्रांत कन्या बेला से होता है।
  • बेला परंपरागत परिवार के रहन-सहन, भाषा और आदतों से तालमेल नहीं बिठा पाती। वह घर की अन्य स्त्रियों (इंदु, मंझली बहू) से स्वयं को श्रेष्ठ समझती है और अलग कमरा, नया फर्नीचर तथा अपनी अलग गृहस्थी की मांग करती है। घर में अलगाव और कलह का वातावरण बन जाता है।
  • दादा मूलराज अत्यधिक मनोवैज्ञानिक कुशलता और धैर्य का परिचय देते हैं। वे पूरे परिवार को आदेश देते हैं कि कोई भी बेला के किसी काम में दखल न दे, सब उसका पूरा सम्मान करें और उसे घर की 'महारानी' समझें।
  • जब परिवार के सभी लोग बेला से दूरी बना लेते हैं और उसका अत्यधिक औपचारिक आदर करने लगते हैं, तो बेला को अपनी गलती, अहंकार और एकाकीपन की भयंकर पीड़ा का अहसास होता है। वह रोते हुए दादा जी के चरणों में गिर पड़ती है और संयुक्त परिवार का अभिन्न अंग बन जाती है।

5. "सूखी डाली" एवं "मातृभूमि का मान" के मुख्य अवतरण

अवतरण: सूखी डाली
अवतरण: "हमारा परिवार एक विशाल वटवृक्ष है। जो डाली पेड़ से अलग होगी, वह सूख जाएगी और चूल्हे में जलने के सिवा किसी काम नहीं आएगी।"
प्रश्न 1: वक्ता कौन है और वह यह उपदेश किसे और क्यों दे रहा है? (4 अंक)

उत्तर: वक्ता परिवार के 72 वर्षीय मुखिया दादा मूलराज हैं। वे यह उपदेश अपने परिवार के सदस्यों को तब दे रहे हैं जब छोटी बहू बेला के आधुनिक विचारों और अलग रहने की जिद के कारण परिवार के विखंडन का संकट उत्पन्न हो जाता है।

प्रश्न 2: "वटवृक्ष" और "सूखी डाली" का प्रतीकात्मक अर्थ स्पष्ट कीजिए। (4 अंक)

उत्तर: "वटवृक्ष" संयुक्त परिवार की अखंडता, सुरक्षा और छाया का प्रतीक है; जबकि "सूखी डाली" परिवार से अलग होकर एकाकी, असुरक्षित और नष्ट हो जाने वाले व्यक्ति का प्रतीक है। दादा जी का मानना है कि संगठन में ही शक्ति और जीवन है।

अवतरण: मातृभूमि का मान
अवतरण: "मातृभूमि चाहे असली हो या नकली, हम हाड़ा राजपूत जीते-जी उसका अपमान नहीं सह सकते!"
प्रश्न 1: यह कथन किसका है और उसने ऐसा क्यों कहा? (4 अंक)

उत्तर: यह कथन वीर सिंह का है। जब महाराणा लाखा की प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए चित्तौड़ के बाहर मिट्टी का नकली बूंदी दुर्ग बनाया जाता है, तो वीर सिंह कहता है कि अपनी जन्मभूमि के प्रतीक का भी उपहास उड़ाना हाड़ा राजपूतों की आन के विरुद्ध है।

6. "संस्कार और भावना" एवं "बहू की विदा" के गहन अवतरण अभ्यास

अवतरण: बहू की विदा
अवतरण: "मुझ पर चोट हुई तो बौखला उठे, लेकिन जब दूसरों पर चोट करते हो तो सीना फुलाकर इतराते हो!"
प्रश्न 1: यह कथन किसका है और उसने किससे और किस अवसर पर कहा? (4 अंक)

उत्तर: यह कथन राजेश्वरी का है और उसने अपने पति जीवनलाल से उस समय कहा जब उनकी अपनी लाडली बेटी गौरी की ससुराल वालों ने दहेज के कारण उसकी विदाई रोक दी और जीवनलाल क्रोध व अपमान से तिलमिला उठे थे।

प्रश्न 2: वक्ता किस दोहरे मापदंड और पाखंड को उजागर कर रही है? (4 अंक)

उत्तर: राजेश्वरी जीवनलाल के उस पुरुष-प्रधान पाखंड को उजागर कर रही है जहाँ वे स्वयं पांच हजार रुपये दहेज न मिलने पर बहू कमला की विदाई रोककर गर्व महसूस करते हैं, किंतु जब वही विपत्ति उनकी अपनी बेटी गौरी पर आती है, तो वे बिलख उठते हैं। राजेश्वरी सिद्ध करती है कि बेटी और बहू दोनों का सम्मान समान है।

अवतरण: संस्कार और भावना
अवतरण: "अविनाश की जान बचाने के लिए उमा ने रात-दिन एक कर दिया। वह स्वयं भूखी रही, उसने अपनी नींद बेच दी।"
प्रश्न 1: उमा ने अपने निष्कासित पति अविनाश की सेवा किस विषम परिस्थिति में की? (4 अंक)

उत्तर: जब अविनाश गंभीर रूप से संक्रामक हैजे की बीमारी से ग्रस्त हो गया और उसके सभी परिजनों ने उसका साथ छोड़ दिया था, तब विजातीय बहू उमा ने अकेले ही एक निष्ठावान नर्स और समर्पित पत्नी की भांति दिन-रात एक करके सेवा की और उसे नया जीवनदान दिया।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

वर्तनी, मात्राओं अथवा विराम-चिह्नों की उपेक्षा करना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मानक देवनागरी वर्तनी का प्रयोग करें और पूर्णविराम व अल्पविराम का उचित स्थान पर प्रयोग करें।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गद्यांश से हूबहू वाक्यों की नकल करना अथवा निर्धारित शब्द-सीमा का उल्लंघन करना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

उत्तर सदैव अपनी भाषा में लिखें और निर्धारित शब्द-सीमा का कड़ाई से पालन करें।

आईसीएसई कक्षा 9 एकांकी संचयन: 4 कालजयी एकांकियों का नाट्य-शिल्प

आईसीएसई कक्षा 9 एकांकी संचयन: 4 कालजयी एकांकियों का नाट्य-शिल्प 1. संस्कार और भावना (विष्णु प्रभाकर) • विषय: रूढ़िवादी संस्कारों पर मातृत्व की विजय • पात्र: मां (संस्कारवादी), अविनाश, उमा (विजातीय बहू), अतुल • संघर्ष: अविनाश को हैजा; उमा द्वारा प्राणों की बाजी लगाकर सेवा • चरमोत्कर्ष: मां की ममता का जागरण; बहू को स्वीकार करना "संस्कार भावना के आगे हार गए।" 2. बहू की विदा (विनोद रस्तोगी) • विषय: दहेज-प्रथा का दानव एवं दोहरे मापदंड का पर्दाफाश • पात्र: जीवनलाल (लोभी ससुर), राजेश्वरी, कमला, प्रमोद • संघर्ष: 5000 दहेज के लिए बहू की पहली विदाई रोकना • चरमोत्कर्ष: अपनी बेटी गौरी की विदाई रुकने पर हृदय-परिवर्तन "बेटी और बहू में कोई अंतर नहीं होता।" 3. मातृभूमि का मान (हरिकृष्ण 'प्रेमी') • विषय: राजपूती स्वाभिमान व राष्ट्रभक्ति का सर्वोच्च बलिदान • पात्र: महाराणा लाखा (मेवाड़), वीर सिंह (हाड़ा राजपूत सैनिक) • संघर्ष: बूंदी के मिट्टी के नकली दुर्ग की रक्षा में प्राणार्पण • चरमोत्कर्ष: नकली दुर्ग की रक्षा करते हुए वीर सिंह की वीरगति "मातृभूमि चाहे असली हो या नकली, मान समान है!" 4. सूखी डाली (उपेंद्रनाथ 'अश्क') • विषय: संयुक्त परिवार की अखंडता व मनोवैज्ञानिक सामंजस्य • पात्र: दादा मूलराज (वटवृक्ष रूपी मुखिया), बेला, इंदु, परेश • संघर्ष: आधुनिक शिक्षित बेला का अहंकार व परिवार से अलगाव • चरमोत्कर्ष: अत्यधिक आदर से बेला का आत्म-मंथन; परिवार में विलय "पेड़ से अलग होकर डाली सूख जाती है।" आईसीएसई साहित्य पेपर 2: एकांकी संचयन से अवतरण-आधारित प्रश्न (16 अंक प्रति प्रश्न)

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
पाठ्यक्रम: कक्षा 9 एकांकी संचयन में 4 एकांकियाँ हैं: संस्कार और भावना, बहू की विदा, मातृभूमि का मान, तथा सूखी डाली।
मुख्य बिंदु 2
संस्कार और भावना का द्वंद्व: एकांकी रूढ़िवादी संस्कारों और सच्चे मानवीय प्रेम के बीच द्वंद्व को दर्शाती है, जिसमें अंततः मातृत्व की विजय होती है।
मुख्य बिंदु 3
उमा का आदर्श चरित्र: उमा ने अपनी सास द्वारा बहिष्कृत किए जाने पर भी अपने बीमार पति की प्राण-प्रण से सेवा करके भारतीय नारी के त्याग का सर्वोच्च उदाहरण दिया।
मुख्य बिंदु 4
दहेज का दोहरा चरित्र: जीवनलाल अपनी बहू के परिवार से दहेज की मांग करता है, किंतु जब उसकी अपनी बेटी की विदाई दहेज के कारण रुकती है, तो उसे अपनी गलती का भान होता है।
मुख्य बिंदु 5
राजेश्वरी का मातृत्व: राजेश्वरी जीवनलाल के दहेज-लोभ का विरोध करती है और सिद्ध करती है कि बेटी और बहू दोनों समान सम्मान की अधिकारी हैं।
मुख्य बिंदु 6
वीर सिंह का अदम्य स्वाभिमान: वीर सिंह मेवाड़ का अन्न खाता था, किंतु अपनी जन्मभूमि बूंदी के नकली दुर्ग का अपमान भी वह सहन नहीं कर सका।
मुख्य बिंदु 7
मातृभूमि की पवित्रता: एकांकी संदेश देती है कि मातृभूमि का मान व्यक्तिगत निष्ठा और जीवन से भी ऊपर होता है।
मुख्य बिंदु 8
परिवार रूपी वटवृक्ष: दादा मूलराज पूरे परिवार को एक विशाल वटवृक्ष मानते हैं, जिससे अलग होने पर कोई भी डाली जीवित और हरी-भरी नहीं रह सकती।
मुख्य बिंदु 9
मनोवैज्ञानिक समाधान: दादा मूलराज ने बेला के अहंकार को दंड से नहीं, बल्कि अत्यधिक आदर और मनोवैज्ञानिक दूरी बनाकर तोड़ा।
मुख्य बिंदु 10
परीक्षा प्रस्तुति: एकांकी के अवतरण प्रश्नों में वक्ता, श्रोता, संदर्भ, संवाद के अंतर्निहित भाव तथा नाटकीय प्रभाव का उल्लेख अवश्य करें।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
"संस्कार और भावना" एकांकी में मां के मन में क्या अंतर्द्वंद्व चल रहा था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मां के मन में प्राचीन कुलीन संस्कारों (विजातीय बहू को स्वीकार न करने की जिद) और अपने पुत्र के प्रति मातृ-हृदय की स्वाभाविक भावना व ममता के बीच भीषण द्वंद्व चल रहा था।
आईसीएसई मूल्यांकन मानक
2
"बहू की विदा" एकांकी में जीवनलाल ने कमला को विदा करने से क्यों मना कर दिया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि जीवनलाल एक दहेजलोभी व्यक्ति था; उसने कहा कि विवाह में पांच हजार रुपये का दहेज कम मिला था, जब तक वह राशि नहीं दी जाएगी, वह बहू को विदा नहीं करेगा।
आईसीएसई मूल्यांकन मानक
3
जीवनलाल का हृदय-परिवर्तन किस घटना से हुआ?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: जब उसका अपना बेटा रमेश अपनी बहन गौरी को विदा कराए बिना लौट आया और उसने बताया कि गौरी के ससुराल वालों ने भी दहेज कम होने के कारण उसकी विदाई रोक दी है, तब जीवनलाल को अपने पाप का अहसास हुआ।
आईसीएसई मूल्यांकन मानक
4
"मातृभूमि का मान" एकांकी में वीर सिंह ने मिट्टी के नकली दुर्ग की रक्षा के लिए प्राण क्यों दिए?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: वीर सिंह हाड़ा राजपूत था; उसने कहा कि बूंदी चाहे असली हो या मिट्टी का नकली दुर्ग, वह हाड़ा राजपूतों की मातृभूमि का प्रतीक है और उसके जीते-जी कोई भी उसकी मातृभूमि का मान भंग नहीं कर सकता।
आईसीएसई मूल्यांकन मानक
5
"सूखी डाली" एकांकी में दादा मूलराज परिवार की तुलना किससे करते हैं और क्यों?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: दादा मूलराज परिवार की तुलना एक विशाल वटवृक्ष से करते हैं और परिवार के सदस्यों को उसकी डालियाँ बताते हैं। वे कहते हैं कि पेड़ से जुड़ी रहकर ही डाली हरी-भरी रहती है; पेड़ से अलग होकर वह सूख जाती है और नष्ट हो जाती है।
आईसीएसई मूल्यांकन मानक
6
बेला को अपनी भूल का अहसास किस प्रकार हुआ?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: जब दादा जी के निर्देश पर परिवार के सभी सदस्यों ने बेला से बोलना बंद कर दिया और उसका अत्यधिक औपचारिक सम्मान करने लगे, तो वह एकाकीपन और अलगाव से घुटने लगी और उसे अपनी संकीर्णता का अहसास हुआ।
आईसीएसई मूल्यांकन मानक
7
"मातृभूमि का मान" एकांकी में महाराणा लाखा ने क्या अविवेकपूर्ण प्रतिज्ञा की थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक वे बूंदी के दुर्ग को जीतकर उसमें प्रवेश नहीं कर लेंगे, तब तक वे अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे।
आईसीएसई मूल्यांकन मानक
8
"बहू की विदा" एकांकी समाज को क्या मुख्य संदेश देती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: यह एकांकी दहेज-प्रथा के क्रूर अभिशाप पर कड़ा प्रहार करती है और संदेश देती है कि समाज को बेटी और बहू में कोई भेद नहीं करना चाहिए तथा नारी को सम्मान देना चाहिए।
आईसीएसई मूल्यांकन मानक
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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