अध्याय 6: Hindi Literature - Sahitya Sagar: Poetry
ICSE • कक्षा 9 • Hindi • अध्याय 6
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत
Hindi Literature - Sahitya Sagar: Poetry
आईसीएसई कक्षा 9 हिन्दी साहित्य (प्रश्न-पत्र 2, साहित्य सागर: पद्य संकलन) के अंतर्गत चार अद्वितीय एवं कालजयी काव्य-रचनाएँ निर्धारित हैं: संत कबीरदास की ज्ञानमार्गी "साखी", गिरिधर कविराय की लोक-नीतिपरक "कुंडलियाँ", राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की ओजस्वी रचना "स्वर्ग बना सकते हैं" तथा राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी का राष्ट्रीय गौरव गान "वह जन्मभूमि मेरी"। ये कविताएँ मध्यकालीन निर्गुण भक्ति, लोक-व्यवहार की व्यावहारिक चतुराई, कुरुक्षेत्र के प्रसंग में सामाजिक समता व न्याय की स्थापना, तथा मातृभूमि के प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक वैभव का साक्षात्कार कराती हैं। इस विस्तृत अध्ययन मार्गदर्शिका में प्रत्येक कविता का सप्रसंग भावार्थ, पद-व्याख्या, छंद व अलंकार (दोहा, कुंडलिया, मुक्त छंद, अनुप्रास, रूपक, दृष्टांत), सदुक्कड़ी व ओजपूर्ण भाषा-शैली, शब्दार्थ तथा सीआईएससीई आधारित अवतरण-विशिष्ट प्रश्नोत्तरी का सांगोपांग विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
कुरुक्षेत्र की रक्त-रंजित भूमि पर बाणों की शैय्या पर लेटे भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को धरती को स्वर्ग बनाने का कौन-सा रहस्य बताया था?
महाभारत के भीषण नरसंहार के पश्चात जब महाराज युधिष्ठिर आत्म-ग्लानि और पश्चाताप से दग्ध होकर बाणों की शैय्या पर लेटे पितामह भीष्म के चरणों में बैठे, तब पितामह ने कहा था: "धर्मराज, यह भूमि किसी की नहीं क्रीत है दासी, / सोई है सब जन पर इसके, समान सबका भाग्य।" पितामह ने उद्घोष किया था कि जब तक समाज में एक व्यक्ति दूसरे का शोषण करता रहेगा, तब तक संसार में शांति का सूरज कभी उदित नहीं हो सकता! कबीर के निर्गुण ज्ञान से लेकर दिनकर की क्रांतिकारी सामाजिक समता तक, हिन्दी कविता मनुष्य की चेतना को जगाने वाली दिव्य ज्योति है। क्या आप जानते हैं कि गिरिधर कविराय ने एक साधारण लाठी को संसार का सबसे बड़ा मित्र क्यों कहा? आइए, इन अमर काव्यों के रस में डूबकर उच्चतम अंक अर्जित करें।
यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है
साहित्य सागर (पद्य संकलन) आईसीएसई साहित्य प्रश्न-पत्र में 16 अंकों का अवतरण-आधारित प्रश्न खंड है। काव्य का अनुशीलन छात्रों में सौंदर्यबोध, मानवीय संवेदना, नीतिपरक विवेक और उत्कृष्ट काव्यानुभूति का विकास करता है।
अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)
हिन्दी पद्य पठन एवं दोहा-छंद की आधारभूत समझ।
मध्यकालीन ब्रज/सदुक्कड़ी तथा आधुनिक खड़ी बोली हिन्दी की सामान्य शब्दावली।
अलंकार (अनुप्रास, यमक, रूपक, दृष्टांत) और रस (शांत, वीर) की प्राथमिक पहचान।
इस अध्याय के लक्ष्य
कबीरदास की साखियों में निहित गुरु-महिमा, अहंकार-नाश, अंतःकरण की शुद्धि तथा प्रेम की महत्ता को समझना।
गिरिधर कविराय की कुंडलियों से लोक-व्यवहार, भविष्योन्मुखी चिंतन (बीती ताहि बिसारि दे) तथा बिना विचारे कार्य न करने की नीति सीखना।
दिनकर जी की कविता "स्वर्ग बना सकते हैं" में सामाजिक न्याय, शोषण-मुक्ति तथा प्राकृतिक संपदा पर समान अधिकार का बोध प्राप्त करना।
सोहनलाल द्विवेदी की "वह जन्मभूमि मेरी" में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य एवं सांस्कृतिक गौरव की सप्रसंग व्याख्या करना।
बोर्ड परीक्षा हेतु अवतरण-आधारित काव्यात्मक प्रश्नों के सटीक एवं तर्कसंगत उत्तर लिखना।
अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति
11. "साखी" (कबीरदास): निर्गुण भक्ति,...
22. "गिरिधर की कुंडलियाँ" (गिरिधर कव...
33. "स्वर्ग बना सकते हैं" (रामधारी स...
44. "वह जन्मभूमि मेरी" (सोहनलाल द्वि...
55. पद्य संकलन के महत्वपूर्ण अवतरण-आ...
66. "गिरिधर की कुंडलियाँ" एवं "वह जन...
77. काव्य-सौंदर्य, रस एवं अलंकार परि...
सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन
1. "साखी" (कबीरदास): निर्गुण भक्ति, ज्ञान एवं आत्म-बोध
काव्य 1: कबीर की साखियाँ
क. प्रमुख दोहों का सप्रसंग भावार्थ:
1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय॥ भावार्थ: कबीर कहते हैं कि जब मेरे समक्ष गुरु और ईश्वर (गोविंद) दोनों एक साथ उपस्थित हों, तो मैं पहले किसके चरण स्पर्श करूँ? यह बड़ा धर्मसंकट है। किंतु मैं सर्वप्रथम अपने गुरु के चरणों में नतमस्तक होता हूँ, क्योंकि गुरु ने ही कृपा करके मुझे ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाया है। गुरु का पद ईश्वर से भी श्रेष्ठ है।
2. जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। सब अंधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माहिं॥ भावार्थ: 'मैं' का अर्थ है अहंकार (Ego)। जब तक मनुष्य के हृदय में अहंकार रहता है, तब तक ईश्वर (हरि) का वास नहीं हो सकता। जब ज्ञान का दीपक जलता है, तो अज्ञान रूपी अंधकार मिट जाता है और ईश्वर की अनुभूति होती है।
3. कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढै बन माहिं। ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखै नाहिं॥ भावार्थ: हिरन की अपनी ही नाभि में कस्तूरी की सुगंध छिपी होती है, किंतु वह अज्ञानवश उसे पूरे जंगल में ढूंढता फिरता है। उसी प्रकार ईश्वर प्रत्येक प्राणी के घट-घट (हृदय) में विद्यमान हैं, किंतु अज्ञानी मनुष्य उन्हें मंदिरों, मस्जिदों और तीर्थों में खोजता रहता है।
4. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥ भावार्थ: केवल धार्मिक ग्रंथ और वेद-पुराण पढ़कर कोई वास्तविक ज्ञानी नहीं बनता। जो मनुष्य प्रेम और आत्मीयता का ढाई अक्षर समझ लेता है, वही सच्चा पंडित है।
2. "गिरिधर की कुंडलियाँ" (गिरिधर कविराय): व्यावहारिक लोक-नीति
काव्य 2: कुंडलियाँ
ख. नीतिपरक कुंडलियों का विश्लेषण:
1. बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेइ। जो बनि आवै सहज में, ताही में चित देइ॥ भावार्थ: जो बीत गया, उस पर शोक मनाना व्यर्थ है; उसे भूलकर भविष्य की सुध लेनी चाहिए। जो कार्य सहजता से संभव हो, उसी में अपना ध्यान लगाना चाहिए। यदि हम अतीत के दुखों में उलझे रहेंगे, तो वर्तमान और भविष्य दोनों नष्ट हो जाएंगे।
2. बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताय। काम बिगारे आपनो, जग में होत हँसाय॥ भावार्थ: जो व्यक्ति बिना सोचे-समझे उतावलेपन में कोई कार्य करता है, उसे बाद में पछताना पड़ता है। उसका अपना कार्य तो बिगड़ता ही है, साथ ही संसार में उसका उपहास भी उड़ता है और उसे मन में कभी शांति नहीं मिलती।
3. लाठी में गुन बहुत हैं, सदा राखिए संग। गहरि नदी, नाली जहाँ, तहाँ बचावै अंग॥ भावार्थ: कवि साधारण लाठी की उपयोगिता बताते हैं। लाठी गहरी नदी-नालों में मार्ग की गहराई नापने, गड्ढों को पार करने तथा कुत्ते या शत्रु के आक्रमण से रक्षा करने में सदा सहायक होती है। साधारण वस्तु भी विपत्ति में अमूल्य सिद्ध होती है।
4. दौलत पाय न कीजिए, सपनेहूँ अभिमान। चंचल जल दिन चारि को, ठाउँ न रहत निदान॥ भावार्थ: धन-दौलत प्राप्त होने पर कभी स्वप्न में भी अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि धन चंचल जल की भांति अस्थिर है; वह कभी एक स्थान पर स्थायी नहीं रहता।
3. "स्वर्ग बना सकते हैं" (रामधारी सिंह 'दिनकर'): समता एवं सामाजिक क्रांति
काव्य 3: स्वर्ग बना सकते हैं
ग. भीष्म-युधिष्ठिर संवाद एवं सामाजिक न्याय:
राष्ट्रकवि दिनकर रचित 'कुरुक्षेत्र' महाकाव्य के इस अंश में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को समझाते हैं कि युद्ध की विभीषिका तभी समाप्त होगी जब समाज में समानता स्थापित होगी:
समान प्राकृतिक अधिकार:"धर्मराज, यह भूमि किसी की नहीं क्रीत है दासी, / सोई है सब जन पर इसके, प्रथम परस्पर वासी।" प्रकृति ने सूर्य का प्रकाश, स्वच्छ वायु और जल किसी एक राजा या वर्ग के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानव जाति के लिए समान रूप से बनाया है।
शांति का वास्तविक आधार: जब तक समाज में एक व्यक्ति का संचित भोग दूसरे के शोषण पर आधारित रहेगा, तब तक अशांति का कोलाहल कभी शांत नहीं हो सकता: "जब तक दनुज-मनुज का भाग न सम होगा, / शमित न होगा कोलाहल, संघर्ष न कम होगा।"
धरती को स्वर्ग बनाना: यदि प्रत्येक मानव को उसकी आवश्यकतानुसार न्याय, भोजन और सम्मान मिले, तो यह धरती बिना किसी दैवीय चमत्कार के अभी 'स्वर्ग' में रूपांतरित हो सकती है।
4. "वह जन्मभूमि मेरी" (सोहनलाल द्विवेदी): राष्ट्रीय गौरव एवं सौंदर्य
काव्य 4: वह जन्मभूमि मेरी
घ. भारत भूमि का विराट स्वरूप:
प्राकृतिक वैभव: उत्तर दिशा में शीश उठाए खड़ा अभेद्य हिमालय, जो आकाश को चूमता है; दक्षिण में अनवरत चरण पखारता अगाध हिंद महासागर; तथा धरती को शस्य-श्यामला बनातीं पवित्र नदियाँ—गंगा, यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी।
आध्यात्मिक व सांस्कृतिक गौरव: यह वही पावन धरा है जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने धर्म की मर्यादा स्थापित की, योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में श्रीमद्भगवद्गीता का अमर उपदेश दिया, तथा भगवान बुद्ध ने संसार को दया, अहिंसा और करुणा का मार्ग दिखाया।
मातृभूमि का वंदन: कवि इसे 'जन्मभूमि', 'कर्मभूमि', 'स्वर्णभूमि' और 'धर्मभूमि' कहकर श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं।
5. पद्य संकलन के महत्वपूर्ण अवतरण-आधारित प्रश्नोत्तर
अवतरण 1: दिनकर जी की कविता 'स्वर्ग बना सकते हैं'
अवतरण: "जब तक मनुज-मनुज का यह सुख-भाग न सम होगा, / शमित न होगा कोलाहल, संघर्ष न कम होगा।"
प्रश्न 1: कवि इन पंक्तियों में किस संघर्ष और कोलाहल की बात कर रहे हैं? (3 अंक)
उत्तर: कवि मानव समाज में व्याप्त वर्ग-संघर्ष, अशांति, युद्ध और वैमनस्य के कोलाहल की बात कर रहे हैं, जो अमीरी-गरीबी की गहरी खाई तथा एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के शोषण के कारण उत्पन्न होता है।
प्रश्न 2: समाज में वास्तविक शांति की स्थापना कब संभव होगी? (4 अंक)
उत्तर: जब तक संसार के प्रत्येक मनुष्य को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं (रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और सम्मान) में समान और न्यायोचित हिस्सा (सुख-भाग) नहीं मिलेगा, तब तक वास्तविक शांति स्थापित नहीं हो सकती। समता और न्याय ही शांति की आधारशिला हैं।
अवतरण 2: कबीर की साखी
अवतरण: "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। / ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥"
प्रश्न 1: कबीरदास जी के अनुसार केवल धार्मिक पुस्तकें पढ़ने से कोई ज्ञानी क्यों नहीं बन सकता? (3 अंक)
उत्तर: क्योंकि जब तक मनुष्य के हृदय में करुणा, दया, मानवीय प्रेम और परोपकार का भाव जाग्रत नहीं होता, तब तक शास्त्रों और ग्रंथों का शुष्क अध्ययन केवल अहंकार को बढ़ाता है, वास्तविक आत्म-ज्ञान नहीं देता।
प्रश्न 2: "ढाई आखर प्रेम का" से कबीर का क्या आध्यात्मिक आशय है? (4 अंक)
उत्तर: इसका आशय है कि ईश्वर का साक्षात्कार और जीवन की सार्थकता संपूर्ण चराचर जगत से निस्वार्थ प्रेम करने में है। जो व्यक्ति परमात्मा के सभी जीवों से आत्मीय प्रेम करता है, वही संसार का सबसे बड़ा ज्ञानी और सच्चा पंडित है।
6. "गिरिधर की कुंडलियाँ" एवं "वह जन्मभूमि मेरी" के गहन अवतरण
अवतरण: गिरिधर की कुंडलियाँ
अवतरण: "बिना बिचारे जो करै, सो पाछे पछिताय। / काम बिगारै आपनो, जग में होत हँसाय॥"
प्रश्न 1: कवि के अनुसार बिना सोचे-समझे कार्य करने का क्या दुष्परिणाम होता है? (3 अंक)
उत्तर: बिना विचारे उतावलेपन में कार्य करने से मनुष्य का अपना कार्य तो नष्ट-भ्रष्ट हो ही जाता है, साथ ही समूचे समाज में उसका उपहास उड़ता है, जिससे उसे अत्यधिक आत्म-ग्लानि और पश्चाताप का सामना करना पड़ता है।
प्रश्न 2: इस कुंडली में कवि मनुष्य को क्या व्यावहारिक सीख देते हैं? (4 अंक)
उत्तर: कवि सीख देते हैं कि किसी भी कार्य को प्रारंभ करने से पूर्व उसके भले-बुरे परिणामों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, ताकि बाद में लज्जित न होना पड़े और मन में शांति बनी रहे।
अवतरण: वह जन्मभूमि मेरी
अवतरण: "जन्मे जहाँ थे रघुपति, जन्मी जहाँ थी सीता, / श्रीकृष्ण ने सुनाई, बंसी पुनीत गीता।"
प्रश्न 1: कवि ने भारत भूमि के किन सांस्कृतिक अवतारों का स्मरण किया है? (3 अंक)
उत्तर: कवि ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम, पतिव्रत धर्म की प्रतीक माता सीता तथा कर्मयोग का संदेश देने वाले भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया है।
प्रश्न 2: "पुनीत गीता" से कवि का क्या तात्पर्य है? (4 अंक)
उत्तर: 'पुनीत' का अर्थ है पवित्र। भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में मोहग्रस्त अर्जुन को जो निष्काम कर्मयोग का अमर उपदेश श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में दिया था, वही संसार का सबसे पवित्र जीवन-दर्शन है।
7. काव्य-सौंदर्य, रस एवं अलंकार परिचय
काव्य-सौंदर्य तत्व
क. प्रमुख काव्यगत विशेषताओं का विश्लेषण:
कबीर की साखी: भाषा सदुक्कड़ी (अवधी, राजस्थानी, ब्रज, पंजाबी का मिश्रण); दोहा छंद; शांत एवं भक्ति रस; रूपक व दृष्टांत अलंकार की प्रचुरता।
गिरिधर की कुंडलियाँ: कुंडलिया छंद (दोहा और रोला का अद्भुत समन्वय); सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा; शांत एवं नीतिपरक रस; दृष्टांत और अनुप्रास अलंकार।
स्वर्ग बना सकते हैं (दिनकर): ओजपूर्ण खड़ी बोली हिन्दी; मुक्त छंद व तुकांत युक्त प्रवाह; वीर एवं शांत रस; प्रगतिशील समाजवादी चेतना।
वह जन्मभूमि मेरी (सोहनलाल द्विवेदी): संगीतात्मक एवं लयात्मक खड़ी बोली; राष्ट्रीय वीर एवं भक्ति रस; मानवीकरण, अनुप्रास एवं उपमा अलंकार।
सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)
सामान्य भ्रम / गलत उत्तर
वर्तनी, मात्राओं अथवा विराम-चिह्नों की उपेक्षा करना।
सही वैज्ञानिक तथ्य
मानक देवनागरी वर्तनी का प्रयोग करें और पूर्णविराम व अल्पविराम का उचित स्थान पर प्रयोग करें।
सामान्य भ्रम / गलत उत्तर
गद्यांश से हूबहू वाक्यों की नकल करना अथवा निर्धारित शब्द-सीमा का उल्लंघन करना।
सही वैज्ञानिक तथ्य
उत्तर सदैव अपनी भाषा में लिखें और निर्धारित शब्द-सीमा का कड़ाई से पालन करें।
आईसीएसई कक्षा 9 हिन्दी साहित्य सागर (पद्य): 4 अमर काव्य-धाराएँ
अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष
मुख्य बिंदु 1
पाठ्यक्रम: कक्षा 9 साहित्य सागर (पद्य) में 4 कविताएँ हैं: साखी (कबीर), कुंडलियाँ (गिरिधर), स्वर्ग बना सकते हैं (दिनकर), तथा वह जन्मभूमि मेरी (द्विवेदी)।
मुख्य बिंदु 2
कबीर के अनुसार गुरु का स्थान: गुरु ही ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं, इसलिए कबीर गुरु को गोविंद से भी उच्च स्थान देते हैं।
मुख्य बिंदु 3
अहंकार और ईश्वर का विरोध: जब तक हृदय में "मैं" (अहंकार) है, तब तक "हरि" (ईश्वर) का वास नहीं हो सकता; दोनों एक साथ नहीं रह सकते।
मुख्य बिंदु 4
कस्तूरी मृग का रूपक: जिस प्रकार मृग अपनी नाभि की सुगंध को बाहर जंगल में खोजता है, वैसे ही मनुष्य अपने हृदय में स्थित ईश्वर को बाहर तीर्थों में ढूंढता है।
मुख्य बिंदु 5
बीती ताहि बिसारि दे: गिरिधर कविराय अतीत के दुखों पर व्यर्थ रोने के बजाय भविष्य की योजना बनाने और वर्तमान कर्म पर ध्यान देने की सीख देते हैं।
मुख्य बिंदु 6
बिना विचारे जो करे: बिना सोचे-समझे कार्य करने से कार्य तो बिगड़ता ही है, संसार में उपहास भी होता है और आत्म-शांति नष्ट होती है।
मुख्य बिंदु 7
प्रकृति पर सबका समान अधिकार: दिनकर जी के अनुसार धरती, सूर्य का प्रकाश और वायु किसी एक व्यक्ति की दासी नहीं, बल्कि सभी मानवों की साझी धरोहर है।
मुख्य बिंदु 8
शांति की पूर्व-शर्त: जब तक समाज में शोषण समाप्त नहीं होगा और सबको अपना न्यायोचित अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक वास्तविक शांति असंभव है।
मुख्य बिंदु 9
मातृभूमि का प्राकृतिक गौरव: सोहनलाल द्विवेदी हिमालय को प्रहरी और हिंद महासागर को निरंतर भारत माता के चरण धोने वाला सेवक बताते हैं।
मुख्य बिंदु 10
सांस्कृतिक समन्वय: भारत केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं, बल्कि राम, कृष्ण और बुद्ध के त्याग, ज्ञान और अहिंसा से सिंचित तपोभूमि है।
स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)
मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।
1
"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय"—कबीर ने गुरु के चरण पहले स्पर्श करने का क्या कारण बताया है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: कबीरदास जी कहते हैं कि यदि गुरु और ईश्वर दोनों एक साथ खड़े हों, तो वे सर्वप्रथम गुरु के चरणों में नमन करेंगे, क्योंकि गुरु ने ही अपनी कृपा और ज्ञान द्वारा उन्हें ईश्वर (गोविंद) तक पहुँचने का मार्ग दिखाया है। आईसीएसई मूल्यांकन मानक
2
"कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढै बन माहिं"—इस दोहे में कबीर क्या दार्शनिक सत्य उद्घाटित करते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: जिस प्रकार कस्तूरी की सुगंध हिरन की अपनी ही नाभि में विद्यमान होती है किंतु वह अज्ञानतावश उसे पूरे वन में खोजता रहता है; ठीक उसी प्रकार परमात्मा प्रत्येक प्राणी के अंतःकरण (हृदय) में निवास करते हैं, किंतु अज्ञानी मनुष्य उन्हें बाह्य मंदिरों और तीर्थों में खोजता है। आईसीएसई मूल्यांकन मानक
3
गिरिधर कविराय "बीती ताहि बिसारि दे" कहकर मनुष्य को क्या जीवन-दर्शन सिखाते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: वे सिखाते हैं कि जो समय बीत चुका है और जो गलतियां हो चुकी हैं, उन पर पश्चाताप करके वर्तमान को नष्ट नहीं करना चाहिए; बल्कि अतीत को भूलकर भविष्य के कार्यों को सुधारने में चित्त लगाना चाहिए। आईसीएसई मूल्यांकन मानक
4
कवि गिरिधर के अनुसार "दौलत" पाकर अहंकार क्यों नहीं करना चाहिए?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि धन-दौलत चंचल जल की भांति अस्थिर होती है। यह कुछ ही दिनों का मेहमान है और कभी किसी के पास स्थायी रूप से नहीं ठहरता। आईसीएसई मूल्यांकन मानक
5
"स्वर्ग बना सकते हैं" कविता में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को शांति का क्या मूल रहस्य बताते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पितामह बताते हैं कि सच्ची शांति केवल युद्ध-विराम से नहीं आ सकती; वह तभी संभव है जब समाज के प्रत्येक व्यक्ति को उसका न्यायोचित अधिकार प्राप्त हो और किसी भी मनुष्य का संचित सुख दूसरे के शोषण पर आधारित न हो। आईसीएसई मूल्यांकन मानक
6
"यह भूमि किसी की नहीं क्रीत है दासी"—इस पंक्ति का क्या आशय है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: इसका आशय है कि धरती किसी एक राजा, धनवान या शक्तिशाली व्यक्ति की खरीदी हुई दासी या निजी संपत्ति नहीं है; प्रकृति के संपूर्ण संसाधनों पर संसार के प्रत्येक मनुष्य का समान जन्मसिद्ध अधिकार है। आईसीएसई मूल्यांकन मानक
7
"वह जन्मभूमि मेरी" कविता में भारत की किन प्राकृतिक विशेषताओं का उल्लेख किया गया है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: उत्तर में आकाश चूमते अभेद्य हिमालय पर्वत का, दक्षिण में निरंतर चरण पखारते अथाह समुद्र का, तथा गंगा, यमुना और सरस्वती की पुण्य-सलिला त्रिवेणी का उल्लेख किया गया है। आईसीएसई मूल्यांकन मानक
8
सोहनलाल द्विवेदी ने भारत को किन चार विशेषणों से अलंकृत किया है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: कवि ने भारत को "जन्मभूमि" (जहाँ जन्म लिया), "मातृभूमि" (जो माता के समान पालन करती है), "पुण्यभूमि / धर्मभूमि" (जहाँ धर्म और अध्यात्म फला-फूला), तथा "स्वर्णभूमि" (प्राकृतिक संपदा से समृद्ध) कहा है। आईसीएसई मूल्यांकन मानक
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?
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