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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा XII • Political Science • अध्याय 1
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

शीतयुद्ध काल (The Cold War Era)

झारखण्ड शैक्षणिक परिषद् (JAC) कक्षा 12 राजनीति विज्ञान (समकालीन विश्व राजनीति) का प्रथम अध्याय "शीतयुद्ध का दौर" (The Cold War Era) 1945 से 1991 तक के उस ऐतिहासिक कालखंड का संपूर्ण एवं प्रामाणिक विश्लेषण करता है, जिसने संपूर्ण 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध की वैश्विक भू-राजनीति को आकार दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध में धुरी शक्तियों (जर्मनी, जापान, इटली) की पराजय तथा मित्र राष्ट्रों की विजय के उपरांत संयुक्त राज्य अमेरिका (पूंजीवादी-उदारवादी गुट) और सोवियत संघ (साम्यवादी-समाजवादी गुट) के मध्य विचारधारा, सैन्य प्रभुत्व, अंतरिक्ष अनुसंधान, परमाणु अस्त्रों की होड़ और कूटनीतिक प्रभाव का अभूतपूर्व द्वंद्व प्रारंभ हुआ। इस अध्याय में 1962 का ऐतिहासिक क्यूबा मिसाइल संकट, अपरोध का तर्क (Logic of Deterrence), नाटो (NATO), सिएटो (SEATO), सेंटो (CENTO) बनाम वारसॉ पैक्ट (Warsaw Pact) जैसे सैन्य गठबंधन, कोरिया व वियतनाम संकट जैसे शीतयुद्ध के प्रमुख दायरे, परमाणु अस्त्र नियंत्रण संधियाँ (LTBT, NPT, SALT, START), गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के संस्थापकों की भूमिका, नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) तथा शीतयुद्ध में भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का अत्यंत विस्तृत, प्रामाणिक एवं परीक्षा-उन्मुख अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।

🚀 क्या आपने कभी सोचा है: जब दो परमाणु महाशक्तियों के पास पूरी दुनिया को 100 बार नष्ट करने वाले बम थे, तब 45 वर्षों तक उनके बीच एक भी सीधा युद्ध क्यों नहीं हुआ?

🌊 अक्टूबर 1962: कैरेबियाई सागर में अमेरिकी युद्धपोत तैनात थे और सोवियत परमाणु पनडुब्बियाँ आगे बढ़ रही थीं। पूरी दुनिया की सांसें थम चुकी थीं कि क्या कुछ ही घंटों में तीसरा विश्वयुद्ध (परमाणु प्रलय) शुरू हो जाएगा?

अमेरिकी जासूसी विमान U-2 ने क्यूबा द्वीप पर सोवियत संघ द्वारा मध्यम दूरी की परमाणु मिसाइलें तैनात किए जाने की गुप्त तस्वीरें खींच ली थीं। ये मिसाइलें अमेरिका के वॉशिंगटन सहित प्रमुख शहरों को मात्र 2 से 5 मिनट में पूरी तरह भस्म कर सकती थीं! राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी ने अमेरिकी नौसेना को क्यूबा की पूर्ण नौसैनिक घेराबंदी (Naval Quarantine) का आदेश दिया।

लेकिन भीषण तनाव के 13 दिनों के पश्चात सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने मिसाइलें वापस बुलाने का ऐतिहासिक फैसला किया और दोनों महाशक्तियाँ विनाश के कगार से पीछे हट गईं।

इस घटना को शीतयुद्ध का चरम बिंदु (High Point) क्यों कहा जाता है? जब दोनों देशों के पास लाखों परमाणु हथियार थे, तो उन्हें सीधे युद्ध (Hot War) से किस अदृश्य शक्ति ने रोका? और भारत जैसे नव-स्वतंत्र, गरीब देशों ने इन दोनों दैत्याकार गुटों से अलग रहकर विश्व शांति और अपनी संप्रभुता की रक्षा कैसे की? आइए, आधुनिक विश्व इतिहास के इस सबसे रोमांचक अध्याय में उतरते हैं।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

शीतयुद्ध ने 1945 से 1991 तक पूरे विश्व की राजनीति, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं, व्यापारिक मार्गों और सैन्य गठबंधनों को निर्धारित किया। आज के रूस-यूक्रेन युद्ध, नाटो (NATO) के विस्तार, ताइवान संकट, भारत-रूस रणनीतिक संबंधों तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की माँग को समझने के लिए शीतयुद्ध के घटनाक्रमों की गहरी समझ अपरिहार्य है। झारखण्ड अधिविद्य परिषद् (JAC) बोर्ड परीक्षा में इस अध्याय से 1-अंक, 2-अंक, 3-अंक और 5-अंक के सर्वाधिक वैचारिक प्रश्न पूछे जाते हैं, साथ ही CUET (UG) राजनीति विज्ञान डोमेन के लिए यह नींव का पत्थर है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) के दो खेमों: मित्र राष्ट्र (USA, USSR, ब्रिटेन, फ्रांस) तथा धुरी शक्तियाँ (जर्मनी, इटली, जापान) की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि।
  • अगस्त 1945 में अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा ('Little Boy' - 15 kt) और नागासाकी ('Fat Man' - 21 kt) पर परमाणु बम गिराए जाने के वैश्विक परिणाम।
  • पूंजीवाद (व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजी संपत्ति एवं बाजार अर्थव्यवस्था) तथा समाजवाद/साम्यवाद (राज्य नियंत्रित साधन, सामाजिक समानता एवं एकदलीय व्यवस्था) का सैद्धांतिक अंतर।
  • राष्ट्रसंघ (League of Nations) की विफलता के बाद 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) की स्थापना और शांति स्थापना का दायित्व।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • शीतयुद्ध की सटीक परिभाषा, पृष्ठभूमि, कारण तथा दोनों महाशक्तियों के मध्य गहरे वैचारिक व कूटनीतिक संघर्ष का सविस्तार विश्लेषण कर सकेंगे।
  • क्यूबा मिसाइल संकट (1962) के संपूर्ण घटनाक्रम को समझकर इसे शीतयुद्ध का 'चरम बिंदु' (High Point) प्रमाणित कर सकेंगे।
  • अपरोध का तर्क (Logic of Deterrence) तथा पारस्परिक सुनिश्चित विनाश (Mutually Assured Destruction - MAD) के गणितीय-सामरिक सिद्धांत की व्याख्या कर सकेंगे।
  • पश्चिमी गठबंधन (NATO, SEATO, CENTO) एवं पूर्वी गठबंधन (Warsaw Pact) की उत्पत्ति, संरचना, उद्देश्यों तथा छोटे देशों को शामिल करने के कारणों का परीक्षण कर सकेंगे।
  • शीतयुद्ध के प्रमुख दायरों (Arenas: कोरिया, बर्लिन, कांगो, वियतनाम, अफगानिस्तान) में हुए भीषण छद्म युद्धों (Proxy Wars) का ऐतिहासिक मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • परमाणु अस्त्र नियंत्रण एवं निशस्त्रीकरण संधियों (LTBT, NPT, SALT-I, SALT-II, START-I, START-II) के प्रावधानों एवं सीमाओं का तुलनात्मक विश्लेषण कर सकेंगे।
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के पंचप्रणेताओं (नेहरू, टीटो, नासिर, सुकर्णो, नक्रूमा), 1961 के बेलग्रेड सम्मेलन तथा तीसरे विश्व (Third World) के देशों की भूमिका को स्पष्ट कर सकेंगे।
  • नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO), 1972 की UNCTAD रिपोर्ट के प्रस्तावों तथा समकालीन विश्व में भारत की स्वतंत्र व सक्रिय विदेश नीति का आलोचनात्मक मूल्यांकन कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. शीतयुद्ध की अवधारणा, ऐतिहासिक पृ...
2 2. क्यूबा मिसाइल संकट 1962: शीतयुद्...
3 3. दो-ध्रुवीय विश्व का प्रादुर्भाव...
4 4. शीतयुद्ध के दायरे एवं अस्त्र निय...
5 5. गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM): तीसरे...
6 6. नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्थ...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. शीतयुद्ध की अवधारणा, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं वैचारिक संघर्ष (Concept, Genesis & Ideological Struggle)

शीतयुद्ध (Cold War) की वैज्ञानिक परिभाषा: शीतयुद्ध से अभिप्राय द्वितीय विश्वयुद्ध (1945) के उपरांत संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ (USSR) तथा उनके संबंधित गुटों के मध्य व्याप्त उस स्थायी तनाव, वैचारिक शत्रुता, कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा, मनोवैज्ञानिक युद्ध और हथियारों की अंधाधुंध होड़ से है, जिसमें युद्ध जैसी विस्फोटक परिस्थितियाँ निरंतर बनी रहीं, लेकिन यह तनाव कभी भी दोनों महाशक्तियों के मध्य प्रत्यक्ष परमाणु महायुद्ध (Hot War) में तब्दील नहीं हुआ।

'शीतयुद्ध' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अमेरिकी वित्त विशेषज्ञ बर्नार्ड बारूक (Bernard Baruch) ने 1947 में किया था तथा प्रसिद्ध पत्रकार वाल्टर लिपमैन (Walter Lippmann) ने अपनी पुस्तक 'The Cold War' द्वारा इसे विश्वभर में लोकप्रिय बनाया।

(क) वैचारिक संघर्ष की वास्तविक प्रकृति (Nature of Ideological Conflict)

शीतयुद्ध केवल दो महाशक्तियों के बीच सैन्य शक्ति और वैश्विक भू-भागों पर नियंत्रण की सामान्य लड़ाई नहीं थी; यह मानव सभ्यता, राजनीतिक व्यवस्था और आर्थिक संगठन के संचालन की दो सर्वथा विरोधी जीवन-शैलियों और विचारधाराओं का ऐतिहासिक महासंग्राम था:

तुलना का आधारपश्चिमी गुट (संयुक्त राज्य अमेरिका - USA)पूर्वी गुट (सोवियत संघ - USSR)
मूल विचारधाराउदारवादी लोकतंत्र (Liberal Democracy) एवं पूंजीवाद (Capitalism)मार्क्सवादी समाजवाद (Socialism) एवं साम्यवाद (Communism)
आर्थिक प्रणालीबाजार आधारित खुली अर्थव्यवस्था (Market Economy), मुक्त व्यापार, लाभ की प्रेरणा, निजी उद्यम।राज्य-नियंत्रित केंद्रीय नियोजित अर्थव्यवस्था (Command Economy), उत्पादन साधनों का राष्ट्रीयकरण।
संपत्ति का अधिकारव्यक्तिगत व निजी संपत्ति का असीमित मौलिक अधिकार।निजी संपत्ति का उन्मूलन; संपूर्ण संपत्ति और भूमि पर पूरे समाज/राज्य का साझा स्वामित्व।
राजनीतिक संरचनाबहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था, आवधिक स्वतंत्र चुनाव, नागरिक स्वतंत्रताएँ, स्वतंत्र न्यायपालिका व प्रेस।सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी (CPSU) का एकाधिकार, एकदलीय शासन व्यवस्था, राज्य-नियंत्रित मीडिया।
वैश्विक दृष्टिकोणसाम्यवाद के विस्तार को रोकना (Containment of Communism - ट्रूमैन सिद्धांत)।पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शोषण का अंत कर विश्वभर में सर्वहारा क्रांति को प्रोत्साहित करना।
💡 अपरोध का तर्क (Logic of Deterrence) एवं MAD का सिद्धांत:
प्रश्न उठता है कि जब दोनों पक्षों के बीच इतनी घोर नफरत और प्रतिद्वंद्विता थी, तो तृतीय विश्वयुद्ध क्यों नहीं हुआ? इसका उत्तर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का सबसे मौलिक सिद्धांत है—'अपरोध का तर्क' (Logic of Deterrence)।
जब दोनों विरोधी गुटों के पास इतनी विशाल संख्या में परमाणु हथियार हों कि यदि कोई एक पक्ष अचानक पहला प्रहार (First Strike) करके विरोधी को नष्ट करने का प्रयास भी करे, तब भी दूसरे पक्ष के पास इतने परमाणु हथियार सुरक्षित बच जाएँगे कि वह जवाबी प्रहार (Second Strike) करके पहले हमलावर को पूरी तरह भस्म कर दे! इसे सामरिक विज्ञान में पारस्परिक सुनिश्चित विनाश (Mutually Assured Destruction - MAD) कहते हैं। जब युद्ध में किसी भी पक्ष की विजय की कोई संभावना ही न हो और दोनों का समूल विनाश निश्चित हो, तो कोई भी महाशक्ति परमाणु युद्ध का दुस्साहस नहीं कर सकती। इसी अपरोध ने शीतयुद्ध को कभी 'तप्त युद्ध' (Hot War) में तब्दील नहीं होने दिया।

2. क्यूबा मिसाइल संकट 1962: शीतयुद्ध का चरम बिंदु (Cuban Missile Crisis: The Zenith of Cold War)

क्यूबा मिसाइल संकट (Cuban Missile Crisis - अक्टूबर 1962) शीतयुद्ध के संपूर्ण 45 वर्षों के इतिहास की वह सर्वाधिक भयावह और खतरनाक घटना थी जब संपूर्ण विश्व तीसरे विश्वयुद्ध (परमाणु सर्वनाश) के कगार पर पहुँच चुका था। इसे इतिहास में 'शीतयुद्ध का चरम बिंदु' (High Point of the Cold War) कहा जाता है।

(क) संकट की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं कारण

  • भौगोलिक स्थिति एवं फिदेल कास्त्रो की क्रांति: क्यूबा अमेरिका के फ्लोरिडा तट से मात्र 140 किलोमीटर (90 मील) दूर स्थित एक छोटा द्वीपीय देश था। जनवरी 1959 में फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में साम्यवादी क्रांति हुई, जिससे अमेरिका के ठीक दरवाजे पर साम्यवादी शासन स्थापित हो गया। क्यूबा को सोवियत संघ से भारी कूटनीतिक, वित्तीय और सैन्य सहायता मिलने लगी।
  • बे ऑफ पिग्स आक्रमण (Bay of Pigs - अप्रैल 1961): अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने क्यूबाई निर्वासितों के जरिए कास्त्रो सरकार का तख्तापलट करने का असफल प्रयास किया। इससे सोवियत संघ और क्यूबा दोनों को दृढ़ विश्वास हो गया कि अमेरिका किसी भी समय क्यूबा पर प्रत्यक्ष सैन्य आक्रमण कर देगा।
  • सोवियत संघ का रणनीतिक दांव: सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव (Nikita Khrushchev) ने क्यूबा को अमेरिका के संभावित आक्रमण से बचाने और अमेरिका को सीधे रणनीतिक मात देने के उद्देश्य से क्यूबा को एक 'रूसी सैन्य छावनी' में बदलने का गुप्त निर्णय लिया।

(ख) संकट का चरम दौर (14 से 28 अक्टूबर 1962: 13 दिन का वैश्विक तनाव)

तिथि / कालखंडघटनाक्रम एवं सामरिक महत्व
14 अक्टूबर 1962अमेरिकी U-2 जासूसी टोही विमान ने क्यूबा में स्थापित किए जा रहे सोवियत मध्यम-दूरी (MRBM) और मध्यवर्ती-दूरी (IRBM) परमाणु मिसाइल ठिकानों की तस्वीरें खींचीं।
16 अक्टूबर 1962राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी (John F. Kennedy) को तस्वीरें दिखाई गईं। इन मिसाइलों की मारक क्षमता 1,600 से 3,200 किमी थी, जिससे पूरा अमेरिका (वॉशिंगटन, न्यूयॉर्क, शिकागो) सोवियत परमाणु निशाने पर आ गया था। अमेरिका की चेतावनी का समय 30 मिनट से घटकर मात्र 2-3 मिनट रह गया था!
22 अक्टूबर 1962राष्ट्रपति कैनेडी ने अमेरिकी राष्ट्र को लाइव टेलीविजन पर संबोधित किया। उन्होंने क्यूबा की कड़ी नौसैनिक घेराबंदी (Naval Quarantine) की घोषणा की और चेतावनी दी कि सोवियत जहाजों को रोक दिया जाएगा; क्यूबा से किसी भी परमाणु हमले को सीधे सोवियत संघ द्वारा अमेरिका पर किया गया हमला माना जाएगा और पूर्ण जवाबी परमाणु प्रहार किया जाएगा।
24-27 अक्टूबर 1962सोवियत परमाणु-सज्जित मालवाहक जहाज अमेरिकी नौसैनिक घेरे की ओर बढ़ रहे थे। 27 अक्टूबर ('Black Saturday') को क्यूबा के ऊपर एक अमेरिकी U-2 विमान को मार गिराया गया। दोनों महाशक्तियाँ युद्ध के बटन पर हाथ रखे खड़ी थीं।
28 अक्टूबर 1962कूटनीतिक सूझबूझ की विजय हुई। ख्रुश्चेव ने सार्वजनिक घोषणा की कि सोवियत संघ क्यूबा से अपनी सभी मिसाइलें हटा लेगा और उन्हें वापस बुला लेगा। इसके बदले में राष्ट्रपति कैनेडी ने सार्वजनिक वचन दिया कि अमेरिका क्यूबा पर कभी आक्रमण नहीं करेगा, तथा गुप्त रूप से तुर्की और इटली में तैनात अमेरिकी 'ज्यूपिटर' (Jupiter) परमाणु मिसाइलों को हटाने पर सहमति जताई। संकट शांतिपूर्ण समाप्त हुआ।
📌 क्यूबा संकट के दूरगामी ऐतिहासिक परिणाम:
1. दोनों महाशक्तियों को अहसास हुआ कि गलतफहमी या संचार की कमी से दुनिया का अंत हो सकता है। अतः 1963 में व्हाइट हाउस (वाशिंगटन) और क्रेमलिन (मॉस्को) के बीच सीधी आपातकालीन 'हॉट-लाइन' (Hot-Line) स्थापित की गई।
2. हथियारों की अनियंत्रित होड़ पर रोक लगाने के लिए 1963 में प्रथम बहुपक्षीय संधि LTBT (सीमित परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि) पर हस्ताक्षर किए गए।

3. दो-ध्रुवीय विश्व का प्रादुर्भाव एवं सैन्य गठबंधन प्रणालियाँ (Bipolar World & Military Alliances)

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के साथ ही सदियों से चली आ रही यूरोपीय शक्तियों (ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी) की वैश्विक दादागीरी समाप्त हो गई और विश्व राजनीति दो-ध्रुवीय (Bipolar) बन गई, जिसके दो केंद्र वॉशिंगटन और मॉस्को थे। यूरोप शीतयुद्ध का मुख्य अखाड़ा बना, जहाँ दोनों महाशक्तियों ने अपने प्रभाव-क्षेत्र (Spheres of Influence) को मजबूत करने के लिए विशाल सैन्य गठबंधनों का निर्माण किया।

(क) महाशक्तियों को छोटे देशों की आवश्यकता क्यों पड़ी? (JAC 4/5 Marks Question)

छात्रों के मन में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जब महाशक्तियों के पास स्वयं अपार सैन्य बल और परमाणु हथियार थे, तो उन्हें एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कमजोर, छोटे और गरीब देशों के साथ गठबंधन करने की क्या आवश्यकता थी? इसके 4 प्रमुख सामरिक और रणनीतिक कारण थे:

  1. महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन (Vital Mineral & Oil Resources): छोटे देशों के पास कच्चा तेल (मध्य-पूर्व), यूरेनियम (परमाणु हथियारों हेतु) और अन्य सामरिक खनिज भंडार थे, जिन पर महाशक्तियाँ अपना एकाधिकार चाहती थीं।
  2. रणनीतिक भू-क्षेत्र एवं सैन्य अड्डे (Strategic Territory & Military Bases): महाशक्तियों को विरोधी गुट की सीमाओं के निकट अपनी मिसाइलें, रडार स्टेशन, नौसैनिक अड्डे और लड़ाकू विमान तैनात करने के लिए अनुकूल जमीन की आवश्यकता थी।
  3. जासूसी एवं गुप्त निगरानी के ठिकाने (Espionage & Intelligence Gathering): पड़ोसी छोटे देशों की सीमाओं से विरोधी महाशक्ति की सैन्य गतिविधियों, संचार सिग्नलों और रक्षा तैयारियों पर चौबीसों घंटे जासूसी करना आसान होता था।
  4. सैनिक खर्च का वित्तीय भार साझा करना (Economic Support & Cost Sharing): कई छोटे सहयोगी देश मिलकर अपनी धरती पर तैनात महाशक्ति के सैनिकों का स्थानीय राशन, छावनी और रसद खर्च उठाते थे, जिससे महाशक्ति का वित्तीय बोझ घटता था।
  5. वैचारिक वैधता (Ideological Legitimacy): छोटे देशों का गठबंधन में शामिल होना यह सिद्ध करता था कि महाशक्ति की विचारधारा (पूंजीवाद या समाजवाद) लोकप्रिय है और विश्व समुदाय उसके साथ है।

(ख) प्रतिद्वंद्वी सैन्य गठबंधनों का तुलनात्मक चार्ट

सैन्य गठबंधनस्थापना तिथिनेतृत्वकर्तामुख्यालयसंस्थापक / सदस्य देशमूल सिद्धांत एवं रणनीतिक उद्देश्य
नाटो (NATO - North Atlantic Treaty Organization)4 अप्रैल 1949संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)ब्रुसेल्स (बेल्जियम)12 संस्थापक देश (USA, UK, फ्रांस, कनाडा, इटली आदि)सामूहिक सुरक्षा (Collective Defence - अनुच्छेद 5): उत्तरी अमेरिका या यूरोप में किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला सभी 12 देशों पर हमला माना जाएगा और सभी मिलकर सैन्य जवाब देंगे।
वारसॉ पैक्ट (Warsaw Pact)14 मई 1955सोवियत संघ (USSR)मॉस्को (USSR)8 पूर्वी यूरोपीय देश (USSR, पोलैंड, पूर्वी जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया, हंगरी आदि)नाटो का प्रत्युत्तर: नाटो में पश्चिमी जर्मनी के शामिल होने के जवाब में बना। इसका मुख्य कार्य यूरोप में नाटो सेनाओं का मुकाबला करना तथा पूर्वी यूरोप में सोवियत प्रभुत्व की रक्षा करना था।
सिएटो (SEATO - South-East Asia Treaty Organization)8 सितंबर 1954USA एवं पश्चिमी मित्रबैंकॉक (थाईलैंड)USA, UK, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, फिलीपींस, थाईलैंडदक्षिण-पूर्व एशिया में साम्यवाद (विशेषकर चीनी और वियतनामी प्रभाव) के प्रसार को रोकना। (1977 में भंग)।
सेंटो (CENTO - Central Treaty Organization)24 फरवरी 1955USA एवं पश्चिमी मित्रअंकारा (तुर्की)ईरान, इराक, पाकिस्तान, तुर्की, यूनाइटेड किंगडम (शुरुआत में 'बगदाद पैक्ट')मध्य-पूर्व (तेल उत्पादक खाड़ी क्षेत्र) में सोवियत संघ के प्रभाव और कम्युनिस्ट घुसपैठ को रोकना। (1979 में भंग)।

4. शीतयुद्ध के दायरे एवं अस्त्र नियंत्रण संधियाँ (Arenas of the Cold War & Arms Control Treaties)

शीतयुद्ध के दायरे (Arenas of the Cold War): 'दायरे' से अभिप्राय उन भौगोलिक क्षेत्रों और संघर्षों से है जहाँ दोनों महाशक्तियाँ और उनके सैन्य गठबंधन सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने आए, जहाँ गंभीर संकट पैदा हुए, खूनी छद्म युद्ध (Proxy Wars) लड़े गए और भारी जन-धन की हानि हुई, परंतु संकट के बावजूद यह संघर्ष दोनों महाशक्तियों के मध्य प्रत्यक्ष वैश्विक परमाणु महायुद्ध में नहीं बदला।

(क) शीतयुद्ध के पाँच प्रमुख ऐतिहासिक दायरे

संघर्ष का क्षेत्र एवं समयघटनाक्रम एवं महाशक्तियों की भूमिकाशांति स्थापना एवं परिणाम
1. कोरियाई संकट (1950 - 1953)38वीं समानांतर रेखा पर कोरिया विभाजित था। जून 1950 में सोवियत व चीनी समर्थन से साम्यवादी उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर हमला किया। अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सेना के बैनर तले जनरल मैकआर्थर के नेतृत्व में हस्तक्षेप किया। भीषण युद्ध में 30 लाख से अधिक लोग मारे गए।भारत के प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू और संयुक्त राष्ट्र में भारतीय राजनयिकों ने युद्धविराम में केंद्रीय मध्यस्थ की भूमिका निभाई। 1953 में 38वीं समानांतर रेखा पर युद्धविराम हुआ; कोरिया आज भी विभाजित है।
2. बर्लिन संकट एवं दीवार (1958 - 1961)जर्मनी के विभाजन के बाद सोवियत संघ ने पश्चिमी बर्लिन की नाकेबंदी की (1948 बर्लिन एयरलिफ्ट)। लाखों कुशल नागरिक साम्यवादी पूर्वी बर्लिन छोड़कर लोकतांत्रिक पश्चिमी बर्लिन भाग रहे थे। इसे रोकने के लिए अगस्त 1961 में पूर्वी जर्मनी की सोवियत समर्थक सरकार ने 155 किमी लंबी कंक्रीट की बर्लिन की दीवार खड़ी कर दी।बर्लिन की दीवार शीतयुद्ध का सबसे घिनौना और प्रत्यक्ष प्रतीक बनी। यह 28 वर्षों तक खड़ी रही और अंततः 9 नवंबर 1989 को आम जनता द्वारा गिरा दी गई, जिसने सोवियत गुट के पतन की शुरुआत की।
3. कांगो संकट (1960 का दशक)बेल्जियम से आजादी के तुरंत बाद खनिज समृद्ध अफ्रीकी देश कांगो में गृहयुद्ध छिड़ गया। राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री पैट्रिस लुमुम्बा की सोवियत झुकाव के कारण हत्या कर दी गई और पश्चिमी शक्तियों ने कटांगा प्रांत के अलगाव का समर्थन किया।संयुक्त राष्ट्र महासचिव डैग हैमरशोल्ड ने ऐतिहासिक शांति मिशन भेजा (जिसमें उनकी एक विमान दुर्घटना में रहस्यमय मौत हो गई)। भारत ने शांति सेना में ब्रिगेडियर राजा के नेतृत्व में अपनी सैन्य टुकड़ी भेजी।
4. वियतनाम युद्ध (1954 - 1975)17वीं समानांतर रेखा पर वियतनाम का विभाजन हुआ था। साम्यवादी नेता हो ची मिन्ह के नेतृत्व में उत्तरी वियतनाम ने दक्षिण वियतनाम को मुक्त कराने की लड़ाई लड़ी। अमेरिका ने साम्यवाद के फैलाव ('डोमिनो सिद्धांत') को रोकने के लिए 5 लाख से अधिक अमेरिकी सैनिक उतारे और भारी बमबारी व जहरीले रासायनिक हथियारों (Agent Orange, Napalm) का प्रयोग किया।अभूतपूर्व जन-प्रतिरोध और भारी जनहानि के बाद 1973 में अमेरिका को अपमानजनक तरीके से पीछे हटना पड़ा। 1975 में साइगॉन के पतन के साथ वियतनाम का साम्यवाद के अधीन पूर्ण एकीकरण हुआ। यह शीतयुद्ध में अमेरिका की सबसे बड़ी नैतिक व कूटनीतिक पराजय थी।
5. अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप (1979 - 1989)दिसंबर 1979 में सोवियत संघ ने काबुल में अपनी समर्थक कम्युनिस्ट सरकार को बचाने के लिए अपनी लाल सेना (Red Army) भेजी। अमेरिका, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने सोवियत सेना के खिलाफ अफगान 'मुजाहिदीन' को अत्याधुनिक हथियार (जैसे स्टिंगर विमानभेदी मिसाइलें) और अरबों डॉलर की सहायता दी।10 वर्षों तक चले इस खूनी संघर्ष को 'सोवियत संघ का वियतनाम' कहा गया। 15,000 से अधिक सोवियत सैनिक मारे गए। 1989 में सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव ने सेना वापस बुला ली। इस युद्ध ने सोवियत अर्थव्यवस्था को खोखला कर उसके विघटन की नींव रखी।

(ख) महाशक्तियों के मध्य अस्त्र नियंत्रण संधियाँ (Arms Control Treaties)

हथियारों की अंतहीन होड़ के वित्तीय बोझ और आकस्मिक परमाणु युद्ध के डर से दोनों महाशक्तियों ने 1960 के दशक के बाद कई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय व बहुपक्षीय निशस्त्रीकरण संधियाँ कीं:

संधि का पूरा नामसंक्षिप्त रूपवर्ष एवं स्थानहस्ताक्षरकर्तामुख्य प्रावधान एवं ऐतिहासिक महत्व
सीमित परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (Limited Test Ban Treaty)LTBT5 अगस्त 1963 (मॉस्को)USA, USSR, UKवायुमंडल (Atmosphere), बाहरी अंतरिक्ष (Outer Space) तथा जल के भीतर (Underwater) परमाणु हथियारों के परीक्षण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया। केवल भूमिगत (Underground) परीक्षण की छूट दी गई।
परमाणु अप्रसार संधि (Nuclear Non-Proliferation Treaty)NPT1 जुलाई 1968 (लागू 5 मार्च 1970)वाशिंगटन, लंदन, मॉस्कोकेवल उन 5 देशों को परमाणु हथियार रखने की अनुमति दी जिन्होंने 1 जनवरी 1967 से पहले परमाणु परीक्षण कर लिया था (USA, USSR, UK, फ्रांस, चीन)। बाकी सभी देशों पर परमाणु हथियार बनाने या हासिल करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। (भारत ने इसे भेदभावपूर्ण मानकर इस पर हस्ताक्षर करने से स्पष्ट इनकार कर दिया)।
सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता-I (Strategic Arms Limitation Talks I)SALT-I26 मई 1972 (मॉस्को)रिचर्ड निक्सन (USA) व लियोनिद ब्रेझनेव (USSR)दो समझौते हुए: (1) एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल (ABM) संधि जिसके तहत रक्षात्मक मिसाइल प्रणालियों को सीमित किया गया, (2) रणनीतिक आक्रामक हथियारों (ICBM, SLBM) की संख्या को 5 वर्षों के लिए फ्रीज किया गया।
सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता-II (Strategic Arms Limitation Talks II)SALT-II18 जून 1979 (वियना)जिमी कार्टर (USA) व लियोनिद ब्रेझनेव (USSR)रणनीतिक परमाणु लॉन्चरों की संख्या 2,250 तक सीमित की गई। (अफगानिस्तान पर सोवियत हमले के कारण अमेरिकी सीनेट ने इसे कभी मंजूरी नहीं दी)।
मध्यम-दूरी परमाणु बल संधि (Intermediate-Range Nuclear Forces Treaty)INF8 दिसंबर 1987 (वाशिंगटन)रोनाल्ड रीगन (USA) व मिखाइल गोर्बाचेव (USSR)इतिहास में पहली बार 500 से 5,500 किमी मारक क्षमता वाली मध्यम व लघु दूरी की सभी भूमि-आधारित परमाणु मिसाइलों की संपूर्ण श्रेणी को नष्ट करने का समझौता हुआ।
सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण संधि-I (Strategic Arms Reduction Treaty I)START-I31 जुलाई 1991 (मॉस्को)जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश (USA) व मिखाइल गोर्बाचेव (USSR)हथियारों को केवल सीमित करने के बजाय दोनों देशों के रणनीतिक परमाणु हथियारों की संख्या में वास्तविक कटौती (लगभग 30-40% कमी) करने की ऐतिहासिक संधि।
सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण संधि-II (Strategic Arms Reduction Treaty II)START-II3 जनवरी 1993 (मॉस्को)जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश (USA) व बोरिस येल्तसिन (रूस)मल्टीपल-वॉरहेड (MIRV) आईसीबीएम मिसाइलों पर प्रतिबंध लगाने का समझौता।

5. गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM): तीसरे विश्व का सशक्त विकल्प (Non-Aligned Movement - NAM)

द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरांत एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के दर्जनों देश सदियों की औपनिवेशिक गुलामी से आजाद हो रहे थे। इन नव-स्वतंत्र देशों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी: गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, स्वास्थ्य संकट और अपनी संप्रभुता की रक्षा। दोनों महाशक्तियाँ इन नवोदित राष्ट्रों को अपने-अपने सैन्य गुटों में घसीटना चाहती थीं। ऐसी विषम परिस्थिति में इन देशों ने किसी भी गुट का पिछलग्गू बनने से इनकार कर दिया और एक स्वतंत्र, गौरवमयी व शांतिपूर्ण विदेश नीति का मार्ग चुना, जिसे गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement - NAM) कहा गया।

(क) गुटनिरपेक्ष आंदोलन के ऐतिहासिक पंचप्रणेता (Five Founding Pillars)

गुटनिरपेक्ष आंदोलन किसी एक व्यक्ति की उपज नहीं थी, बल्कि यह तीन महाद्वीपों के 5 दूरदर्शी राष्ट्रनायकों की ऐतिहासिक मैत्री और साझा समझ का परिणाम था:

संस्थापक राजनेतादेशपद / स्थितिऐतिहासिक योगदान एवं विचार
1. पंडित जवाहरलाल नेहरूभारत 🇮🇳प्रथम प्रधानमंत्रीगुटनिरपेक्षता के मुख्य दार्शनिक वास्तुकार। उन्होंने पंचशील (Panchsheel - 1954) के 5 शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के सिद्धांत दिए और शीतयुद्ध की प्रतिद्वंद्विता से एशिया-अफ्रीका को दूर रखने का आह्वान किया।
2. जोसिप ब्रोज़ टीटो (Josip Broz Tito)यूगोस्लाविया 🇷🇸राष्ट्रपतिपूर्वी यूरोप में रहकर भी उन्होंने स्टालिन के सोवियत प्रभाव को खारिज किया और स्वतंत्र साम्यवादी राष्ट्र का नेतृत्व करते हुए बेलग्रेड में प्रथम शिखर सम्मेलन आयोजित किया।
3. गमाल अब्दुल नासिर (Gamal Abdel Nasser)मिस्र 🇪🇬राष्ट्रपति1956 के स्वेज नहर संकट में पश्चिमी साम्राज्यवाद का डटकर मुकाबला किया तथा अरब राष्ट्रवाद और अफ्रीकी एकता के सबसे बड़े प्रतीक बने।
4. सुकर्णो (Sukarno)इंडोनेशिया 🇮🇩प्रथम राष्ट्रपतिडच उपनिवेशवाद से इंडोनेशिया को आजाद कराया और 1955 के ऐतिहासिक बांडुंग सम्मेलन की मेजबानी की, जिसने गुटनिरपेक्षता की नींव रखी।
5. क्वामे नक्रूमा (Kwame Nkrumah)घाना 🇬🇭प्रथम प्रधानमंत्री/राष्ट्रपतिउप-सहारा अफ्रीका में स्वतंत्रता प्राप्त करने वाले पहले देश (घाना - 1957) के नेता; उन्होंने 'अखिल-अफ्रीकीवाद' (Pan-Africanism) और नव-उपनिवेशवाद विरोध का झंडा बुलंद किया।

(ख) बांडुंग सम्मेलन से बेलग्रेड शिखर सम्मेलन तक की यात्रा

  • बांडुंग सम्मेलन (Bandung Conference - अप्रैल 1955): इंडोनेशिया के बांडुंग शहर में 29 अफ्रीकी और एशियाई देशों का प्रथम ऐतिहासिक सम्मेलन हुआ। इसे 'एफ्रो-एशियाई सम्मेलन' भी कहते हैं। इसमें औपनिवेशिक दासता, रंगभेद और सैन्य गठबंधनों की भर्त्सना की गई तथा विश्व शांति व सहयोग के 10 सिद्धांत (Ten Principles of Bandung) स्वीकार किए गए।
  • प्रथम गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन (First NAM Summit - सितंबर 1961): यूगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड (Belgrade) में 1 से 6 सितंबर 1961 को प्रथम शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। इसमें 25 सदस्य देशों ने पूर्ण सदस्यता के साथ भाग लिया तथा 3 देशों ने पर्यवेक्षक के रूप में शिरकत की।
  • बेलग्रेड सम्मेलन की पृष्ठभूमि में 3 प्रमुख कारक थे: (1) इन पाँचों देशों के मध्य घनिष्ठ मैत्री व सहयोग, (2) शीतयुद्ध का अत्यधिक प्रसार और उसके बढ़ते खतरे (बर्लिन दीवार संकट), (3) 1960 में संयुक्त राष्ट्र में 16 नए स्वतंत्र अफ्रीकी देशों का ऐतिहासिक प्रवेश।

(ग) वैचारिक स्पष्टता: गुटनिरपेक्षता क्या नहीं है? (What NAM is NOT)

1. पृथकतावाद नहीं है (NOT Isolationism)

पृथकतावाद का अर्थ होता है विश्व राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय मामलों से अपने-आप को पूरी तरह अलग-थलग (Cut-off) कर लेना; जैसे अमेरिका ने 1787 के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध तक अपनाया था।
गुटनिरपेक्ष देशों ने कभी खुद को अलग-थलग नहीं किया! इसके विपरीत, भारत और अन्य गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों ने कोरियाई संकट, स्वेज संकट, कांगो संकट आदि में सक्रिय रूप से महाशक्तियों के बीच शांति मध्यस्थ की भूमिका निभाई।

2. तटस्थता नहीं है (NOT Neutrality)

तटस्थता का अर्थ मुख्य रूप से युद्ध से दूर रहने की एक वैधानिक नीति है (जैसे स्विट्जरलैंड)। तटस्थ देश न तो किसी युद्ध में भाग लेते हैं और न ही युद्ध के सही या गलत होने का कोई नैतिक फैसला करते हैं।
गुटनिरपेक्ष देश कभी तटस्थ नहीं रहे! गुटनिरपेक्ष देशों ने अन्याय, साम्राज्यवाद, रंगभेद और आक्रमण का मुखर विरोध किया। उन्होंने युद्धों को रोकने के लिए सक्रिय प्रयास किए और जब युद्ध हुए तो मध्यस्थता कर शांति स्थापित करवाई।

6. नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) एवं शीतयुद्ध में भारत की भूमिका (NIEO & India's Role)

(क) नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (New International Economic Order - NIEO)

1970 के दशक तक गुटनिरपेक्ष आंदोलन के चरित्र में एक क्रांतिकारी बदलाव आया। पहले यह मुख्य रूप से राजनीतिक गुटबंदी से दूर रहने का मंच था, लेकिन जल्द ही नव-स्वतंत्र देशों ने महसूस किया कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता व्यर्थ है यदि देश आर्थिक रूप से गरीब और पश्चिमी अमीर देशों का गुलाम बना रहे। गुटनिरपेक्ष देशों के अधिकांश सदस्य अल्पविकसित देश (Least Developed Countries - LDCs) थे।

इस असमान वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को बदलने के लिए 1972 में संयुक्त राष्ट्र के व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD - United Nations Conference on Trade and Development) ने एक ऐतिहासिक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसका शीर्षक था: 'टुवर्ड्स अ न्यू ट्रेड पॉलिसी फॉर डेवलपमेंट' (Towards a New Trade Policy for Development)।

1972 UNCTAD रिपोर्ट के चार प्रमुख आर्थिक सुधार:
  1. प्राकृतिक संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण: अल्पविकसित देशों को अपने ही प्राकृतिक संसाधनों (कच्चा तेल, खनिज, वन, कृषि संपदा) पर पूर्ण संप्रभु नियंत्रण का अधिकार मिले, जिनका दोहन अब तक पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs) करती आ रही थीं।
  2. पश्चिमी बाजारों तक आसान पहुँच: विकासशील देशों के विनिर्मित उत्पादों को विकसित पश्चिमी देशों के बाजारों में रियायती दरों पर बिना किसी भेदभाव के प्रवेश मिले, ताकि गरीब देश अपने निर्यात से विदेशी मुद्रा कमा सकें।
  3. आधुनिक तकनीक की सस्ती उपलब्धता: विकसित पश्चिमी देशों द्वारा अल्पविकसित देशों को दी जाने वाली आधुनिक औद्योगिक तकनीक की लागत (Technology Transfer Cost) को कम और रियायती किया जाए।
  4. अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में निर्णयकारी भूमिका: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (World Bank) जैसी वैश्विक आर्थिक संस्थाओं में विकासशील और गरीब देशों को अपनी जनसंख्या व वास्तविक जरूरतों के अनुपात में मतदान शक्ति और निर्णायक आवाज मिले।

(ख) शीतयुद्ध के दौरान भारत की स्वतंत्र व सक्रिय भूमिका (India's Policy during Cold War)

शीतयुद्ध के दौरान भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति दोहरे स्तर (Dual Strategy) पर संचालित हुई:

  • प्रथम स्तर: भारत ने स्वयं को दोनों महाशक्तियों के सैन्य गठबंधनों (नाटो, वारसॉ आदि) से पूरी तरह अलग रखा और कभी भी किसी महाशक्ति का पिछलग्गू नहीं बना।
  • द्वितीय स्तर: भारत ने नव-स्वतंत्र औपनिवेशिक देशों को इन महाशक्तियों के चंगुल में फँसने से बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जोरदार आवाज उठाई तथा महाशक्तियों के बीच युद्धविराम कराने में निष्पक्ष शांतिदूत की भूमिका निभाई।

(ग) भारत की नीति के आलोचकों के तर्क एवं भारतीय प्रत्युत्तर

आलोचकों के आक्षेप (Criticisms)भारतीय विदेश नीति का यथार्थवादी उत्तर (India's Defense)
1. सिद्धांतविहीन नीति (Unprincipled Policy): आलोचक कहते हैं कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों की आड़ में कई महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार व संप्रभुता के मामलों पर स्पष्ट रुख लेने से बचता रहा।भारत का प्राथमिक राष्ट्रीय हित नवजात लोकतंत्र की रक्षा, आंतरिक आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन था। किसी एक महाशक्ति का पक्ष लेकर दूसरे को शत्रु बनाना राष्ट्रीय आत्मघाती होता।
2. 1971 की भारत-सोवियत मैत्री संधि (Indo-Soviet Treaty of 1971): अगस्त 1971 में भारत ने सोवियत संघ के साथ 20-वर्षीय शांति, मित्रता एवं सहयोग की संधि पर हस्ताक्षर किए। आलोचकों ने कहा कि भारत ने गुटनिरपेक्षता का त्याग कर सोवियत गुट की सदस्यता ले ली।यह विशुद्ध कूटनीतिक अनिवार्यता थी। 1971 में बांग्लादेश संकट के समय अमेरिका, चीन और पाकिस्तान का एक खतरनाक त्रिकोण भारत के खिलाफ खड़ा था। भारत को इस सैन्य दबाव से निपटने के लिए एक सुपरपावर के कूटनीतिक व सैन्य कवच की तत्काल आवश्यकता थी। इसके बावजूद भारत ने अपने किसी भी बंदरगाह या जमीन को सोवियत सैन्य अड्डा नहीं बनने दिया और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति जारी रखी।
🌟 समकालीन एकध्रुवीय/बहुध्रुवीय विश्व में गुटनिरपेक्षता की प्रासंगिकता:
1991 में सोवियत संघ के विघटन के पश्चात कुछ आलोचकों ने कहा कि जब शीतयुद्ध ही समाप्त हो गया तो गुटनिरपेक्षता की क्या प्रासंगिकता बची? परंतु आज 120 सदस्य देशों के साथ NAM अत्यंत प्रासंगिक है, क्योंकि यह विकासशील देशों को किसी भी एक महाशक्ति के दबाव में आए बिना अपने संप्रभु राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेने की स्वतंत्रता (Strategic Autonomy), जलवायु न्याय, आतंकवाद विरोध और संयुक्त राष्ट्र के लोकतंत्रीकरण का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक मंच प्रदान करता है।

महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक सिद्धांत एवं कालक्रम

1945
द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति, हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु हमला, संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) की स्थापना।
1947
ट्रूमैन सिद्धांत (Truman Doctrine) एवं मार्शल योजना (Marshall Plan) - साम्यवाद के प्रसार की रोकथाम।
1949
उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) की स्थापना (12 संस्थापक देश) तथा सोवियत संघ का प्रथम सफल परमाणु परीक्षण।
1950-1953
कोरियाई युद्ध (Korean War) - 38वीं समानांतर रेखा पर भीषण संघर्ष; भारत द्वारा युद्धविराम मध्यस्थता।
1954-1955
सिएटो (SEATO) व सेंटो (CENTO) की स्थापना; बांडुंग सम्मेलन (1955) तथा सोवियत वारसॉ पैक्ट (Warsaw Pact) का गठन।
1961
बर्लिन की दीवार का निर्माण (13 अगस्त) तथा बेलग्रेड में प्रथम गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन (25 देश)।
1962
क्यूबा मिसाइल संकट (Cuban Missile Crisis - अक्टूबर) - शीतयुद्ध का उच्चतम चरम तनाव बिंदु।
1963
सीमित परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (LTBT) पर हस्ताक्षर तथा वॉशिंगटन-मॉस्को हॉटलाइन की स्थापना।
1968
परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर (लागू 1970) - भारत द्वारा भेदभावपूर्ण मानकर अस्वीकार।
1972
UNCTAD की ऐतिहासिक रिपोर्ट (NIEO का जन्म) तथा अमेरिका-सोवियत साल्ट-1 (SALT-I) व ABM संधि।
1979-1989
अफगानिस्तान में सोवियत सेना का प्रवेश (1979); 1989 में सोवियत वापसी तथा 9 नवंबर 1989 को बर्लिन दीवार का पतन।
1991
स्टार्ट-1 (START-I) संधि पर हस्ताक्षर (जुलाई) तथा दिसंबर 1991 में सोवियत संघ (USSR) का औपचारिक विघटन एवं शीतयुद्ध की समाप्ति।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
Q1 (दीर्घ उत्तरीय - JAC 5 Marks): 'गुटनिरपेक्षता का अर्थ न तो पृथकतावाद (Isolationism) है और न ही तटस्थता (Neutrality)।' इस कथन की सविस्तार समीक्षा कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) शीतयुद्ध के दौर में नव-स्वतंत्र राष्ट्रों द्वारा अपनाई गई एक सकारात्मक, गतिशील और स्वतंत्र विदेश नीति थी। इसे पृथकतावाद या तटस्थता समझना एक गंभीर भूल है, जिसका विश्लेषण निम्नलिखित बिंदुओं में स्पष्ट है:

1. पृथकतावाद (Isolationism) का स्पष्ट खंडन:
  • पृथकतावाद का अर्थ: अंतर्राष्ट्रीय मामलों, वैश्विक समस्याओं और कूटनीति से स्वयं को पूरी तरह काटकर एकांतवास में चले जाना। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका ने 1787 के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर प्रथम विश्वयुद्ध (1914) तक लगभग सवा सौ वर्षों तक पृथकतावाद की नीति अपनाई थी।
  • गुटनिरपेक्षता का विपरीत आचरण: भारत और अन्य गुटनिरपेक्ष देशों ने कभी भी विश्व से खुद को अलग-थलग नहीं किया। इसके विपरीत, उन्होंने शीतयुद्ध के दौर में शांति स्थापना के लिए वैश्विक मंचों पर अत्यधिक सक्रिय भागीदारी निभाई। भारत ने 1950-53 के कोरियाई युद्ध में युद्धबंदियों की अदला-बदली और युद्धविराम में केंद्रीय भूमिका निभाई। 1956 के स्वेज नहर संकट और 1960 के कांगो संकट में संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सक्रिय मध्यस्थता की।
2. तटस्थता (Neutrality) का स्पष्ट खंडन:
  • तटस्थता का अर्थ: युद्ध की स्थिति में कानूनी तौर पर किसी भी पक्ष में शामिल न होना तथा युद्ध के कारणों, औचित्य या सही-गलत पर कोई नैतिक दृष्टिकोण व्यक्त न करना। उदाहरण के लिए स्विट्जरलैंड की स्थायी तटस्थता की नीति।
  • गुटनिरपेक्षता का क्रियाशील दृष्टिकोण: गुटनिरपेक्ष देश युद्ध में तटस्थ मूकदर्शक नहीं बने रहे। उन्होंने गलत नीतियों, उपनिवेशवाद, रंगभेद और विदेशी आक्रमण की खुलकर आलोचना की। गुटनिरपेक्ष देशों ने महाशक्तियों के बीच युद्ध टालने के लिए सक्रिय कूटनीति की और जब भी किसी देश पर अन्याय हुआ, तो अंतर्राष्ट्रीय कानून के पक्ष में मतदान किया।
निष्कर्ष: अतः गुटनिरपेक्षता पलायनवाद या चुप्पी की नीति नहीं, बल्कि प्रत्येक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे पर गुण-दोष (Merits & Demerits) के आधार पर स्वतंत्र और निर्भीक निर्णय लेने की संप्रभु नीति है।
उदाहरण 2
Q2 (दीर्घ उत्तरीय - JAC 5 Marks): महाशक्तियों को छोटे देशों के साथ सैन्य गठबंधन बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? महाशक्तियों और छोटे देशों दोनों के दृष्टिकोण से कारणों का विश्लेषण कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: शीतयुद्ध के दौरान दोनों परमाणु महाशक्तियों (USA और USSR) तथा उनके गठबंधन में शामिल छोटे देशों के बीच परस्पर लाभ का संबंध था:

(क) महाशक्तियों को छोटे देशों से 4 प्रमुख लाभ:
  1. महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन (Vital Resources): छोटे देशों के खनिज, यूरेनियम (परमाणु हथियारों हेतु) और पेट्रोलियम भंडारों (विशेषकर मध्य-पूर्व के तेल कुओं) पर रणनीतिक नियंत्रण स्थापित करना।
  2. रणनीतिक भू-भाग एवं सैन्य अड्डे (Territory for Bases): विरोधी महाशक्ति के समीप अपने सैन्य अड्डे, रडार स्टेशन, जासूसी संचार केंद्र और मिसाइल लांचर स्थापित करने के लिए उपयुक्त जमीन प्राप्त करना (जैसे सोवियत संघ द्वारा क्यूबा का उपयोग)।
  3. सैनिक निगरानी एवं जासूसी (Surveillance & Espionage): पड़ोसी छोटे देशों की सीमाओं से विरोधी खेमे की सैन्य गतिविधियों और गुप्त योजनाओं पर चौबीसों घंटे निगाह रखना।
  4. आर्थिक बोझ साझा करना (Economic Cost-Sharing): कई छोटे सहयोगी देश मिलकर अपनी धरती पर तैनात महाशक्ति के विशाल सैन्य बलों का स्थानीय राशन, परिवहन और आवास का खर्च वहन करते थे।
(ख) छोटे देशों को महाशक्तियों के गठबंधन में शामिल होने से लाभ:
  • सुरक्षा का पुख्ता आश्वासन: छोटे देशों को अपने क्षेत्रीय शत्रु पड़ोसियों के आक्रमण से महाशक्ति के परमाणु और सैन्य छत्र (Security Umbrella) की सुरक्षा मिलती थी।
  • आधुनिक हथियार एवं सैन्य प्रशिक्षण: महाशक्तियाँ अपने सहयोगियों को निःशुल्क या रियायती दरों पर उन्नत लड़ाकू विमान, टैंक और मिसाइलें प्रदान करती थीं।
  • भारी आर्थिक सहायता व अनुदान: अवसंरचना विकास, सड़क, बिजली और औद्योगिकीकरण हेतु विशाल वित्तीय ऋण व तकनीकी मदद मिलती थी।
उदाहरण 3
Q3 (लघु उत्तरीय - JAC 3 Marks): 'अपरोध का तर्क' (Logic of Deterrence) क्या है? इसने शीतयुद्ध को तीसरे विश्वयुद्ध में बदलने से कैसे रोका?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: 1. अवधारणा: 'अपरोध' (Deterrence) का अर्थ है—प्रतिशोध और असहनीय विनाश के भय से शत्रु को युद्ध शुरू करने से रोकना।
2. कार्यप्रणाली: जब दो विरोधी पक्षों (USA और USSR) के पास इतनी विशाल संख्या में परमाणु हथियार उपलब्ध हों कि कोई भी पक्ष पहले अचानक हमला (First Strike) करके दूसरे को पूरी तरह पंगु नहीं बना सकता। पीड़ित पक्ष के पास हमेशा इतने परमाणु हथियार सुरक्षित बचेंगे कि वह अपने 'दूसरे प्रहार' (Second Strike) में पहले हमलावर देश का संपूर्ण अस्तित्व ही समाप्त कर दे।
3. परिणाम: इस स्थिति को सामरिक भाषा में 'पारस्परिक सुनिश्चित विनाश' (Mutually Assured Destruction - MAD) कहा जाता है। चूंकि इस युद्ध में विजेता और पराजित दोनों का समूल विनाश निश्चित था, अतः किसी भी महाशक्ति ने परमाणु बटन दबाने का पागलपन नहीं दिखाया और 45 वर्षों तक युद्ध का तनाव रहने के बावजूद तीसरा विश्वयुद्ध नहीं हुआ।
उदाहरण 4
Q4 (लघु उत्तरीय - JAC 3 Marks): क्यूबा मिसाइल संकट (1962) को शीतयुद्ध का चरम बिंदु (High Point) क्यों कहा जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: क्यूबा मिसाइल संकट को शीतयुद्ध का चरम बिंदु इसलिए कहा जाता है क्योंकि:
  1. सीधी परमाणु भिड़ंत का निकटतम अवसर: शीतयुद्ध के संपूर्ण इतिहास में यह एकमात्र ऐसा क्षण था जब दोनों परमाणु महाशक्तियों की नौसेनाएँ और मिसाइलें एक-दूसरे के बिल्कुल आमने-सामने खड़ी थीं और किसी भी सैनिक की एक छोटी-सी चूक या गलतफहमी से वैश्विक परमाणु प्रलय शुरू हो सकती थी।
  2. अमेरिकी मुख्यभूमि पर अभूतपूर्व खतरा: क्यूबा में सोवियत संघ द्वारा मध्यम दूरी की परमाणु मिसाइलें तैनात करने से वाशिंगटन सहित अमेरिका का लगभग संपूर्ण मुख्य भूभाग सोवियत परमाणु निशाने पर आ चुका था।
  3. उच्चतम कूटनीतिक सूझबूझ: कैनेडी और ख्रुश्चेव दोनों ने विनाश के अंतिम क्षण में समझदारी दिखाई, मिसाइलें वापस ली गईं और इस संकट के टलने के बाद ही दोनों देशों ने हॉटलाइन और LTBT जैसी शस्त्र नियंत्रण वार्ताओं की शुरुआत की।
उदाहरण 5
Q5 (अवधारणात्मक - JAC 4 Marks): 1972 की UNCTAD रिपोर्ट द्वारा प्रस्तावित 'नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था' (NIEO) के मुख्य सुधार क्या थे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
उत्तर: 1972 में संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) ने 'Towards a New Trade Policy for Development' नामक रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसके मुख्य 4 प्रस्ताव थे:
  1. प्राकृतिक संसाधनों पर संप्रभुता: अल्पविकसित देशों (LDCs) को अपने खनिज, तेल और कृषि संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण का अधिकार मिले, जिनका औपनिवेशिक काल से पश्चिमी अमीर देश दोहन कर रहे थे।
  2. पश्चिमी बाजारों तक पहुंच: गरीब देशों द्वारा बनाए गए सामानों को पश्चिमी अमीर देशों के बाजारों में बिना कठोर आयात शुल्कों (Tariffs) के बिकने की अनुमति मिले ताकि वे निर्यात से विदेशी मुद्रा कमा सकें।
  3. प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की घटी हुई लागत: पश्चिमी विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को आधुनिक औद्योगिक तकनीक रियायती और सस्ती दरों पर दी जाए।
  4. वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में बड़ी भूमिका: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (World Bank) के नीति-निर्माण में विकासशील देशों को वास्तविक मतदान शक्ति और निर्णायक आवाज दी जाए।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भ्रम: छात्र अक्सर यह मान लेते हैं कि गुटनिरपेक्षता (NAM) एक निष्क्रिय (Passive), तटस्थ (Neutral) या कायरतापूर्ण पलायनवादी नीति थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वास्तविकता: गुटनिरपेक्षता कभी तटस्थता या निष्क्रियता नहीं थी। यह अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी स्वतंत्र राय रखने, शांति स्थापित करने और महाशक्तियों के अनैतिक दबाव को नकारने की एक अत्यधिक साहसी, सक्रिय (Active) और संप्रभु विदेश नीति थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भ्रम: नाटो (NATO) और वारसॉ पैक्ट (Warsaw Pact) की स्थापना के वर्षों में भ्रमित होना और वारसॉ को पहले बना मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वास्तविकता: NATO की स्थापना पहले हुई थी—4 अप्रैल 1949 (अमेरिकी गुट द्वारा)। इसके 6 वर्ष बाद, जब 1955 में पश्चिमी जर्मनी को नाटो में शामिल किया गया, तब इसके सीधे जवाब में सोवियत संघ ने 14 मई 1955 को 'वारसॉ पैक्ट' बनाया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भ्रम: परमाणु अप्रसार संधि (NPT - 1968) के तहत दुनिया के किसी भी देश को परमाणु हथियार रखने की अनुमति नहीं थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वास्तविकता: NPT एक घोर भेदभावपूर्ण संधि थी। इसने 1 जनवरी 1967 से पूर्व परमाणु परीक्षण कर चुके केवल 5 स्थायी सुरक्षा परिषद देशों (USA, USSR, UK, फ्रांस, चीन) को परमाणु हथियार रखने की कानूनी छूट दी और बाकी सभी देशों पर प्रतिबंध लगा दिया। इसी कारण भारत ने इस पर हस्ताक्षर करने से मना किया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भ्रम: क्यूबा मिसाइल संकट में केवल सोवियत संघ ही पीछे हटा और अमेरिका ने कोई समझौता नहीं किया।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वास्तविकता: समझौते के तहत जहाँ सोवियत संघ ने क्यूबा से अपनी मिसाइलें हटाईं, वहीं अमेरिका ने भी सार्वजनिक वचन दिया कि वह क्यूबा पर आक्रमण नहीं करेगा, तथा गुप्त रूप से तुर्की और इटली में तैनात अपनी अमेरिकी 'ज्यूपिटर' (Jupiter) परमाणु मिसाइलें भी हटाईं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भ्रम: शीतयुद्ध के 45 वर्षों में कहीं कोई वास्तविक युद्ध या मौतें नहीं हुईं, यह केवल शब्दों की लड़ाई थी।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वास्तविकता: हालांकि दोनों महाशक्तियों के बीच सीधा युद्ध नहीं हुआ, लेकिन उनके छद्म युद्धों (कोरिया संकट, वियतनाम युद्ध, अफगानिस्तान संघर्ष, कांगो, अंगोला) में 50 लाख से अधिक निर्दोष सैनिक और नागरिक मारे गए।

शीतयुद्ध की दो-ध्रुवीय व्यवस्था एवं गुटनिरपेक्षता की मध्यस्थता वास्तुकला (Cold War Bipolar Structure & NAM Architecture)

द्वि-ध्रुवीय विश्व संरचना (1945 - 1991) एवं अपरोध का संतुलन

पूंजीवादी पश्चिमी गुट $\iff$ अपरोध का तर्क (MAD) $\iff$ साम्यवादी पूर्वी गुट
W
पश्चिमी गुट (Western Bloc)
नेतृत्व: संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)
विचारधारा: उदारवादी लोकतंत्र एवं पूंजीवाद
सैन्य गठबंधन: NATO (1949), SEATO (1954), CENTO (1955)
रणनीति: ट्रूमैन सिद्धांत, मार्शल योजना (आर्थिक पुनरुद्धार)
E
पूर्वी गुट (Eastern Bloc)
नेतृत्व: सोवियत संघ (USSR)
विचारधारा: साम्यवाद एवं राज्य-नियंत्रित समाजवाद
सैन्य गठबंधन: वारसॉ पैक्ट (Warsaw Pact - 1955)
रणनीति: कॉमेकॉन (COMECON), कोमिन्फॉर्म, सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयता
⚡ शीतयुद्ध के प्रमुख दायरे (Arenas of Proxy Wars)
🇰🇷 कोरिया संकट (1950-53) 🇩🇪 बर्लिन की दीवार (1961) 🇨🇺 क्यूबा मिसाइल संकट (1962) 🇨🇩 कांगो संकट (1960s) 🇻🇳 वियतनाम युद्ध (1954-75) 🇦🇫 अफगान युद्ध (1979-89)
3
तीसरी दुनिया का विकल्प: गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM)
1961 बेलग्रेड सम्मेलन (25 संस्थापक देश)
नेहरू 🇮🇳
भारत (पंचशील सिद्धांत)
टीटो 🇷🇸
यूगोस्लाविया (स्वतंत्र साम्यवाद)
नासिर 🇪🇬
मिस्र (स्वेज संकट/अरब एकता)
सुकर्णो 🇮🇩
इंडोनेशिया (1955 बांडुंग सम्मेलन)
नक्रूमा 🇬🇭
घाना (अफ्रीकी स्वतंत्रता आंदोलन)
🕊️ मुख्य भूमिका: दोनों महाशक्तियों के बीच शांति मध्यस्थता, अस्त्र नियंत्रण का दबाव एवं NIEO (1972) द्वारा आर्थिक संप्रभुता

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
शीतयुद्ध की परिभाषा: 1945 से 1991 के मध्य अमेरिका (पूंजीवादी गुट) और सोवियत संघ (साम्यवादी गुट) के बीच सैन्य होड़, वैचारिक संघर्ष और कूटनीतिक तनाव की वह स्थिति जो कभी सीधे परमाणु महायुद्ध में नहीं बदली।
मुख्य बिंदु 2
अपरोध का तर्क (MAD): जब दोनों पक्षों के पास इतने परमाणु हथियार हों कि एक-दूसरे का समूल विनाश निश्चित हो, तो कोई भी पक्ष युद्ध शुरू करने का दुस्साहस नहीं करता। इसी निवारक ने तीसरे विश्वयुद्ध को रोके रखा।
मुख्य बिंदु 3
क्यूबा मिसाइल संकट (1962): सोवियत संघ द्वारा क्यूबा में मिसाइलें तैनात करने और अमेरिकी नौसैनिक घेराबंदी से उत्पन्न संकट शीतयुद्ध का 'चरम बिंदु' था, जो अंततः शांतिपूर्ण कूटनीतिक समझौते से सुलझा।
मुख्य बिंदु 4
महाशक्तियों के सैन्य गठबंधन: अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी गठबंधन NATO (1949), SEATO (1954), CENTO (1955) बने; जबकि सोवियत नेतृत्व में पूर्वी यूरोप का वारसॉ पैक्ट (1955) बना।
मुख्य बिंदु 5
छोटे देशों की आवश्यकता: महाशक्तियों को छोटे देशों से खनिज/तेल संसाधन, सैन्य अड्डे स्थापित करने हेतु भू-भाग, जासूसी ठिकाने तथा सैन्य खर्च का स्थानीय आर्थिक सहयोग प्राप्त होता था।
मुख्य बिंदु 6
शीतयुद्ध के दायरे (Arenas): कोरिया युद्ध (1950-53), बर्लिन दीवार संकट (1961), कांगो संकट (1960s), वियतनाम युद्ध (1954-75) और सोवियत-अफगान युद्ध (1979-89) प्रमुख खूनी क्षेत्रीय संघर्ष थे जहाँ महाशक्तियाँ आमने-सामने थीं।
मुख्य बिंदु 7
अस्त्र नियंत्रण संधियाँ: परमाणु खतरे को नियंत्रित करने के लिए LTBT (1963), NPT (1968), SALT-I (1972), SALT-II (1979), INF (1987) तथा START-I (1991) जैसी संधियों पर हस्ताक्षर किए गए।
मुख्य बिंदु 8
गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM): 1955 के बांडुंग सम्मेलन और 1961 के बेलग्रेड सम्मेलन (25 देश) से जन्मा NAM एशिया-अफ्रीका के नव-स्वतंत्र देशों द्वारा किसी भी सैन्य गुट में न शामिल होकर स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने का ऐतिहासिक मंच था।
मुख्य बिंदु 9
पंचप्रणेता एवं वैचारिकी: पं. नेहरू (भारत), टीटो (यूगोस्लाविया), नासिर (मिस्र), सुकर्णो (इंडोनेशिया) और नक्रूमा (घाना) इसके 5 संस्थापक थे। गुटनिरपेक्षता का अर्थ न तो 'पृथकतावाद' है और न ही 'तटस्थता'।
मुख्य बिंदु 10
NIEO एवं भारत का योगदान: 1972 की UNCTAD रिपोर्ट द्वारा नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) की माँग उठी। भारत ने शीतयुद्ध में गुटों से दूर रहकर शांति मध्यस्थ की भूमिका निभाई तथा 1971 की सोवियत मैत्री संधि द्वारा अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा की।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
शीतयुद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियों के पास भारी परमाणु हथियार होने के बावजूद उनके बीच कभी सीधा युद्ध (Hot War) क्यों नहीं हुआ?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अपरोध के तर्क (Logic of Deterrence) तथा पारस्परिक सुनिश्चित विनाश (Mutually Assured Destruction - MAD) के कारण। दोनों में से कोई भी पक्ष पहले प्रहार द्वारा विरोधी के सभी परमाणु हथियारों को नष्ट नहीं कर सकता था, और दूसरे पक्ष के जवाबी हमले में पहले हमलावर का पूर्ण विनाश निश्चित था।
सोचिए: यदि जीतने वाले का भी पूर्ण विनाश निश्चित हो, तो क्या कोई युद्ध लड़ेगा?
2
क्यूबा मिसाइल संकट (1962) के समय सोवियत संघ, संयुक्त राज्य अमेरिका और क्यूबा के शीर्ष नेताओं के नाम क्या थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सोवियत संघ: निकिता ख्रुश्चेव (Nikita Khrushchev), संयुक्त राज्य अमेरिका: जॉन एफ. कैनेडी (John F. Kennedy), क्यूबा: फिदेल कास्त्रो (Fidel Castro)।
तीनों नेताओं के ऐतिहासिक निर्णय ही संकट के समाधान का कारण बने।
3
गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के पाँच संस्थापक नेताओं (पंचप्रणेता) के नाम और उनके संबंधित देशों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
  1. पं. जवाहरलाल नेहरू (भारत), 2. जोसिप ब्रोज़ टीटो (यूगोस्लाविया), 3. गमाल अब्दुल नासिर (मिस्र), 4. सुकर्णो (इंडोनेशिया), 5. क्वामे नक्रूमा (घाना)।

1961 के बेलग्रेड सम्मेलन में इन पाँचों नेताओं ने मुख्य भूमिका निभाई थी।
4
भारत ने 1968 की परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर करने से क्यों इनकार कर दिया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: भारत ने NPT को अत्यंत भेदभावपूर्ण (Discriminatory) माना क्योंकि यह 1 जनवरी 1967 से पूर्व परमाणु परीक्षण करने वाले केवल 5 देशों (USA, USSR, UK, फ्रांस, चीन) को परमाणु हथियार रखने की अनुमति देती थी और शेष सभी देशों पर प्रतिबंध लगाती थी। भारत सार्वभौमिक और गैर-भेदभावपूर्ण निशस्त्रीकरण का पक्षधर है।
NPT परमाणु संपन्न देशों का एक 'विशेष क्लब' बनाती है।
5
1972 में संयुक्त राष्ट्र के व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) की ऐतिहासिक रिपोर्ट का मुख्य उद्देश्य क्या था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अल्पविकसित देशों (LDCs) को अपने प्राकृतिक संसाधनों पर संप्रभु नियंत्रण देना, पश्चिमी बाजारों तक आसान पहुँच प्रदान करना, तकनीक हस्तांतरण की लागत घटाना और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं (IMF, World Bank) में विकासशील देशों की निर्णयकारी भूमिका सुनिश्चित करना।
इसे नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) का आधार माना जाता है।
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