शीतयुद्ध (Cold War) की वैज्ञानिक परिभाषा: शीतयुद्ध से अभिप्राय द्वितीय विश्वयुद्ध (1945) के उपरांत संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ (USSR) तथा उनके संबंधित गुटों के मध्य व्याप्त उस स्थायी तनाव, वैचारिक शत्रुता, कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा, मनोवैज्ञानिक युद्ध और हथियारों की अंधाधुंध होड़ से है, जिसमें युद्ध जैसी विस्फोटक परिस्थितियाँ निरंतर बनी रहीं, लेकिन यह तनाव कभी भी दोनों महाशक्तियों के मध्य प्रत्यक्ष परमाणु महायुद्ध (Hot War) में तब्दील नहीं हुआ।
'शीतयुद्ध' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अमेरिकी वित्त विशेषज्ञ बर्नार्ड बारूक (Bernard Baruch) ने 1947 में किया था तथा प्रसिद्ध पत्रकार वाल्टर लिपमैन (Walter Lippmann) ने अपनी पुस्तक 'The Cold War' द्वारा इसे विश्वभर में लोकप्रिय बनाया।
(क) वैचारिक संघर्ष की वास्तविक प्रकृति (Nature of Ideological Conflict)
शीतयुद्ध केवल दो महाशक्तियों के बीच सैन्य शक्ति और वैश्विक भू-भागों पर नियंत्रण की सामान्य लड़ाई नहीं थी; यह मानव सभ्यता, राजनीतिक व्यवस्था और आर्थिक संगठन के संचालन की दो सर्वथा विरोधी जीवन-शैलियों और विचारधाराओं का ऐतिहासिक महासंग्राम था:
| तुलना का आधार | पश्चिमी गुट (संयुक्त राज्य अमेरिका - USA) | पूर्वी गुट (सोवियत संघ - USSR) |
|---|---|---|
| मूल विचारधारा | उदारवादी लोकतंत्र (Liberal Democracy) एवं पूंजीवाद (Capitalism) | मार्क्सवादी समाजवाद (Socialism) एवं साम्यवाद (Communism) |
| आर्थिक प्रणाली | बाजार आधारित खुली अर्थव्यवस्था (Market Economy), मुक्त व्यापार, लाभ की प्रेरणा, निजी उद्यम। | राज्य-नियंत्रित केंद्रीय नियोजित अर्थव्यवस्था (Command Economy), उत्पादन साधनों का राष्ट्रीयकरण। |
| संपत्ति का अधिकार | व्यक्तिगत व निजी संपत्ति का असीमित मौलिक अधिकार। | निजी संपत्ति का उन्मूलन; संपूर्ण संपत्ति और भूमि पर पूरे समाज/राज्य का साझा स्वामित्व। |
| राजनीतिक संरचना | बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था, आवधिक स्वतंत्र चुनाव, नागरिक स्वतंत्रताएँ, स्वतंत्र न्यायपालिका व प्रेस। | सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी (CPSU) का एकाधिकार, एकदलीय शासन व्यवस्था, राज्य-नियंत्रित मीडिया। |
| वैश्विक दृष्टिकोण | साम्यवाद के विस्तार को रोकना (Containment of Communism - ट्रूमैन सिद्धांत)। | पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शोषण का अंत कर विश्वभर में सर्वहारा क्रांति को प्रोत्साहित करना। |
प्रश्न उठता है कि जब दोनों पक्षों के बीच इतनी घोर नफरत और प्रतिद्वंद्विता थी, तो तृतीय विश्वयुद्ध क्यों नहीं हुआ? इसका उत्तर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का सबसे मौलिक सिद्धांत है—'अपरोध का तर्क' (Logic of Deterrence)।
जब दोनों विरोधी गुटों के पास इतनी विशाल संख्या में परमाणु हथियार हों कि यदि कोई एक पक्ष अचानक पहला प्रहार (First Strike) करके विरोधी को नष्ट करने का प्रयास भी करे, तब भी दूसरे पक्ष के पास इतने परमाणु हथियार सुरक्षित बच जाएँगे कि वह जवाबी प्रहार (Second Strike) करके पहले हमलावर को पूरी तरह भस्म कर दे! इसे सामरिक विज्ञान में पारस्परिक सुनिश्चित विनाश (Mutually Assured Destruction - MAD) कहते हैं। जब युद्ध में किसी भी पक्ष की विजय की कोई संभावना ही न हो और दोनों का समूल विनाश निश्चित हो, तो कोई भी महाशक्ति परमाणु युद्ध का दुस्साहस नहीं कर सकती। इसी अपरोध ने शीतयुद्ध को कभी 'तप्त युद्ध' (Hot War) में तब्दील नहीं होने दिया।