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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 7 • Social Science • अध्याय 10
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

अठारहवीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन (Eighteenth-Century Political Formations)

कक्षा 7 इतिहास का यह अध्याय "अठारहवीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन" (Eighteenth-Century Political Formations) 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य के विघटन और भारतीय उपमहाद्वीप में स्वतंत्र क्षेत्रीय शक्तियों के उदय का प्रामाणिक व व्यापक ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस अध्याय में नादिर शाह (1739) और अहमद शाह अब्दाली के विनाशकारी आक्रमण, पुराने मुगल सूबों (अवध के सआदत खान, बंगाल के मुर्शिद कुली खान, हैदराबाद के निजाम-उल-मुल्क आसफ जाह) का उदय, साहूकारों (जगत सेठ) और इजारेदारी प्रथा का प्रभाव, सवाई राजा जयसिंह की वेधशालाएं (जंतर-मंतर), सिखों के मिसल, दल खालसा व राखी प्रणाली, मराठों की पेशवा व्यवस्था, चौथ व सरदेशमुखी कर, तथा सूरजमल के जाट राज्य का गहन व परीक्षा-उन्मुख अध्ययन शामिल है।

⚔️ क्या आपने कभी सोचा है?

👑 18वीं सदी के आरंभ में जो मुगल सल्तनत काबुल से कन्याकुमारी तक दुनिया का सबसे धनी साम्राज्य मानी जाती थी, वह मात्र 50 वर्षों के भीतर कैसे बिखर गई?

1739 में ईरान के बादशाह नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला कर मुगलों का सदियों पुराना गौरव, करोड़ों के हीरे-जवाहरात और विश्वप्रसिद्ध मयूर सिंहासन (तख्त-ए-ताऊस) व कोहिनूर एक झटके में लूट लिया! उसी दौर में छत्रपति शिवाजी महाराज के मराठों ने पूरे भारत पर "चौथ" और "सरदेशमुखी" कर थोप दिया, सिखों ने महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में अभेद्य दल खालसा बनाया, और भरतपुर के राजा सूरजमल ने ऐसी अजेय जाट सेना खड़ी की जिसे अंग्रेज भी नहीं झुका सके। आइए जानें कि कैसे अठारहवीं सदी ने आधुनिक भारत के राजनीतिक मानचित्र की नींव रखी!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

यह अध्याय मध्यकालीन भारत और आधुनिक भारत के बीच का सबसे महत्वपूर्ण संक्रमणकालीन सेतु (Transition Bridge) है। मुगल साम्राज्य के पतन और क्षेत्रीय शक्तियों (मराठा, सिख, अवध, बंगाल) के आपसी संघर्ष को समझे बिना हम यह कभी नहीं समझ सकते कि सात समंदर पार से आई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत जैसे विशाल देश को अपना गुलाम कैसे बना लिया।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • मुगल साम्राज्य के चरमोत्कर्ष और औरंगजेब की दक्कन नीतियों का सामान्य ज्ञान।
  • सामंती राजस्व व्यवस्था (जागीरदारी व मनसबदारी)।
  • भारत के प्रमुख ऐतिहासिक क्षेत्र (पंजाब, महाराष्ट्र, अवध, बंगाल, राजपूताना)।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • 1707 के बाद मुगल साम्राज्य के पतन के आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक कारणों का विश्लेषण करना।
  • नादिर शाह (1739) और अहमद शाह अब्दाली के आक्रमणों के प्रभावों का मूल्यांकन करना।
  • अवध, बंगाल और हैदराबाद के अर्ध-स्वतंत्र सूबों तथा इजारेदारी व्यवस्था को समझना।
  • आमेर के सवाई राजा जयसिंह के वैज्ञानिक योगदान (जंतर-मंतर) को स्पष्ट करना।
  • सिखों के मिसल संगठन, दल खालसा, गुरमत्ता और "राखी" (Rakhi) सुरक्षा प्रणाली की कार्यप्रणाली सीखना।
  • मराठों के पेशवा प्रशासन, चौथ व सरदेशमुखी करों तथा पानीपत के तृतीय युद्ध (1761) के परिणामों को समझना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. मुगल साम्राज्य का संकट एवं विदेश...
2 2. पुराने मुगल सूबों का उदय: हैदराब...
3 3. राजपूतों के वतन जागीर एवं सवाई र...
4 4. स्वतंत्र राज्य: सिख (मिसल), मराठ...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. मुगल साम्राज्य का संकट एवं विदेशी आक्रमण (नादिर शाह व अब्दाली)

1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य तेजी से पतन की ओर अग्रसर हुआ जिसके कई कारण थे:

  • संसाधनों का क्षय: औरंगजेब ने दक्कन में 25 वर्षों तक (1679-1707) लंबी लड़ाइयां लड़ीं, जिससे साम्राज्य के सैन्य और वित्तीय संसाधन पूरी तरह नष्ट हो गए।
  • अक्षम उत्तरवर्ती शासक: औरंगजेब के उत्तराधिकारी कमजोर और अयोग्य थे। दरबारी अभिजात दो प्रमुख विरोधी गुटों—ईरानी (शिया) और तुरानी (सुन्नी)—में बंट गए और कठपुतली बादशाहों को गद्दी पर बैठाने-उतारने लगे (जैसे सैयद बंधु)।
  • नादिर शाह का आक्रमण (1739 ई.): ईरान के शासक नादिर शाह ने 1739 में दिल्ली पर हमला कर भयंकर कत्लेआम मचाया। वह शाही खजाने से 60 लाख रुपये, एक करोड़ मूल्य के सोने के बर्तन, 50 करोड़ के जवाहरात तथा शाहजहां का प्रसिद्ध "तख्त-ए-ताऊस" (मयूर सिंहासन) व कोहिनूर हीरा लूटकर ले गया।
  • अहमद शाह अब्दाली: इसके बाद अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली ने 1748 से 1761 के बीच उत्तरी भारत पर पांच बार विनाशकारी हमले किए और मुगलों को पंगु बना दिया।

2. पुराने मुगल सूबों का उदय: हैदराबाद, अवध एवं बंगाल

18वीं सदी में मुगलों के तीन बड़े प्रांत स्वतंत्र राज्यों के रूप में उभरे:

राज्य एवं संस्थापक प्रशासनिक सुधार विशेषताएं व साहूकार वर्ग
हैदराबाद
निजाम-उल-मुल्क आसफ जाह (1724 ई.)
उसने उत्तरी भारत से कुशल सैनिकों और प्रशासकों को लाकर मनसब और जागीरें दीं। उसने मुगल सम्राट के हस्तक्षेप के बिना स्वतंत्र रूप से शासन किया। उसे पश्चिम में मराठों और कोरोमंडल तट के तेलुगु नायकों के साथ लगातार संघर्ष करना पड़ा। उसने मुगलों को केवल औपचारिक संप्रभु माना।
अवध
बुरहान-उल-मुल्क सआदत खान (1722 ई.)
अवध गंगा के समृद्ध उपजाऊ मैदान में स्थित था। उसने मुगल जागीरों की संख्या घटा दी और राजस्व वसूली के लिए इजारेदारी (ठेकेदारी) व्यवस्था लागू की। राज्य राजस्व के लिए महाजनों और साहूकारों पर निर्भर रहने लगा जो इजारेदारों की जमानत देते थे। इस प्रकार साहूकार वर्ग की राजनीतिक ताकत बढ़ी।
बंगाल
मुर्शिद कुली खान
उसने सभी बड़े जमींदारों से कठोरता से नकद राजस्व वसूलने की व्यवस्था की। जो जमींदार कर नहीं दे पाते थे, उनकी जमीनें नीलाम कर दी जाती थीं। मुर्शिद कुली खान और अलीवर्दी खान के समय जगत सेठ (Jagat Seth) का बैंकिंग घराना अत्यंत प्रभावशाली और धनवान बन गया।

3. राजपूतों के वतन जागीर एवं सवाई राजा जयसिंह

कई राजपूत शासकों ने मुगलों की सेवा में अपनी "वतन जागीर" (पैतृक जागीर) पर पूर्ण स्वायत्तता का आनंद लिया था। 18वीं सदी में जोधपुर के अजीत सिंह और आमेर के सवाई राजा जयसिंह ने अपने आसपास के क्षेत्रों पर विस्तार का प्रयास किया:

सवाई राजा जयसिंह का वैज्ञानिक योगदान (Astronomical Observatories):

आमेर के राजा सवाई जयसिंह एक दूरदर्शी राजनीतिज्ञ, खगोलशास्त्री और नगर नियोजक थे। उन्होंने 1727 में अपनी नई राजधानी जयपुर की स्थापना की जो अपने समकोण पर आधारित आधुनिक नगर नियोजन के लिए प्रसिद्ध है:

  • उन्होंने खगोलीय गणनाओं, ग्रहों और नक्षत्रों की गति का शुद्ध अध्ययन करने के लिए 5 स्थानों पर विशाल पत्थर की वेधशालाएं—"जंतर-मंतर" बनवाईं: दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी।
  • जयपुर का जंतर-मंतर आज भी यूनेस्को का विश्व धरोहर स्थल है जिसमें दुनिया की सबसे बड़ी पत्थर की सूर्य घड़ी (सम्राट यंत्र) मौजूद है।

4. स्वतंत्र राज्य: सिख (मिसल), मराठा (पेशवा) एवं जाट (सूरजमल)

(A) सिख: मिसल, दल खालसा एवं राखी व्यवस्था

गुरु गोबिंद सिंह के बाद बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में सिखों ने मुगलों के खिलाफ खुला विद्रोह किया। 18वीं सदी में सिख योद्धाओं ने स्वयं को 12 अलग-अलग जत्थों या "मिसलों" (Misls) में संगठित किया:

  • इन सभी मिसलों की संयुक्त सेना को "दल खालसा" कहा जाता था। वे वर्ष में दो बार (बैसाखी और दीवाली पर) अमृतसर में एकत्रित होते थे और सर्वसम्मति से सामूहिक निर्णय लेते थे जिसे "गुरमत्ता" (गुरु का मत) कहा जाता था।
  • राखी (Rakhi) व्यवस्था: सिखों ने किसानों को बाहरी हमलों से सुरक्षा देने के बदले उनकी उपज का 20 प्रतिशत कर के रूप में लेने की व्यवस्था चलाई जिसे "राखी" कहा गया।
  • 1799 में महाराजा रणजीत सिंह ने सभी मिसलों को एकजुट कर लाहौर को अपनी राजधानी बनाया और एक शक्तिशाली सिख साम्राज्य की स्थापना की।
(B) मराठा: पेशवाओं का उत्थान एवं चौथ-सरदेशमुखी

छत्रपति शिवाजी महाराज (1627-1680) द्वारा स्थापित मराठा राज्य को 18वीं सदी में पेशवाओं (प्रधानमंत्रियों) ने एक अजेय अखिल भारतीय साम्राज्य में बदल दिया। पेशवा बालाजी विश्वनाथ और उनके पुत्र बाजीराव प्रथम ने मराठा शक्ति को दिल्ली, गुजरात, मालवा और राजस्थान तक फैला दिया:

  • चौथ (Chauth): मराठों द्वारा पड़ोसी राज्यों और मुगलों के इलाकों से वसूला जाने वाला वह कर जो कुल भू-राजस्व का 25% (एक-चौथाई) होता था। इसके बदले मराठे उस क्षेत्र पर आक्रमण न करने की गारंटी देते थे।
  • सरदेशमुखी (Sardeshmukhi): दक्कन में पुश्तैनी मुख्य राजस्व अधिकारी होने के नाते मराठों द्वारा वसूला जाने वाला 9 से 10 प्रतिशत का अतिरिक्त उपकर।
  • पानीपत का तृतीय युद्ध (1761 ई.): मराठों और अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली के बीच हुआ, जिसमें मराठों की पराजय हुई और उनका दिल्ली पर प्रत्यक्ष शासन का सपना टूट गया।
(C) जाट राज्य और राजा सूरजमल:

चूड़ामन के नेतृत्व में जाटों ने दिल्ली के पश्चिम में नियंत्रण किया। राजा सूरजमल (1756-1763) के समय भरतपुर एक अत्यंत शक्तिशाली जाट राज्य बना। सूरजमल को उनकी असाधारण राजनीतिक बुद्धि और रणनीति के कारण "जाटों का प्लेटो" (Plato of the Jats) कहा जाता है। उन्होंने डीग में भव्य महल और अभेद्य लोहागढ़ किला बनवाया जिसे अंग्रेज भी नहीं जीत सके।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

नादिर शाह का आक्रमण
1739 ई. (दिल्ली लूट + कोहिनूर व मयूर सिंहासन)
मुगल साम्राज्य की कमर टूटी
मराठा प्रमुख कर
चौथ (25% लगान / सुरक्षा कर) + सरदेशमुखी (9-10% अतिरिक्त कर)
पेशवाओं द्वारा दक्कन व उत्तर भारत से वसूली
सिख रक्षा सूत्र
दल खालसा ➔ गुरमत्ता (सामूहिक निर्णय) ➔ राखी (20% पर सुरक्षा)
18वीं सदी का सिख गणतांत्रिक ढांचा
सवाई जयसिंह की 5 वेधशालाएं
दिल्ली + जयपुर + उज्जैन + मथुरा + वाराणसी (जंतर-मंतर)
खगोलीय गणनाओं के केंद्र
पानीपत का तृतीय युद्ध
1761 ई. (मराठा बनाम अहमद शाह अब्दाली)
मराठा शक्ति का गंभीर आघात

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
Q1 (पतन के कारण): 18वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में मुगल साम्राज्य के तेजी से पतन के प्रमुख आंतरिक और बाह्य कारण क्या थे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. आंतरिक कारण:
- औरंगजेब की 25 वर्षों तक चलने वाली लंबी दक्कन लड़ाइयों ने साम्राज्य के राजकोष और प्रशिक्षित सेना को समाप्त कर दिया।
- उत्तरवर्ती मुगल शासक कमजोर थे और दरबार ईरानी और तुरानी गुटों की आपसी साजिशों का अखाड़ा बन गया।
- शक्तिशाली मनसबदारों और सूबेदारों ने केंद्र को राजस्व भेजना बंद कर दिया और अर्ध-स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए।
2. बाह्य कारण:
- 1739 में ईरान के नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला कर भारी कत्लेआम किया और मयूर सिंहासन तथा कोहिनूर सहित 70 करोड़ से अधिक की संपत्ति लूट ली।
- 1748 से 1761 के बीच अहमद शाह अब्दाली के पांच हमलों ने दिल्ली सल्तनत के बचे-खुचे ढांचे को भी चकनाचूर कर दिया।

उदाहरण 2
Q2 (आर्थिक व प्रशासनिक अंतर): मराठों द्वारा वसूले जाने वाले "चौथ" (Chauth) और "सरदेशमुखी" (Sardeshmukhi) करों में क्या अंतर था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. चौथ (Chauth):
- यह कुल भू-राजस्व (लगान) का एक-चौथाई (25 प्रतिशत) भाग होता था।
- यह कर मराठे उन गैर-मराठा क्षेत्रों (जैसे मुगलों के दक्कनी सूबों या पड़ोसी राजाओं) से इस शर्त पर वसूलते थे कि मराठा सेना उन पर आक्रमण नहीं करेगी और उन्हें अन्य शत्रुओं से सुरक्षा प्रदान करेगी।
2. सरदेशमुखी (Sardeshmukhi):
- यह कुल राजस्व का लगभग 9 से 10 प्रतिशत अतिरिक्त उपकर (Cess) होता था।
- छत्रपति शिवाजी महाराज और मराठा शासक स्वयं को पूरे महाराष्ट्र और दक्कन का परंपरागत सर्वोच्च वंशानुगत राजस्व प्रमुख (सरदेशमुख) मानते थे, अतः वे इस वैधानिक अधिकार के दावे के तहत यह कर वसूलते थे।

उदाहरण 3
Q3 (सैन्य व सामाजिक संगठन): 18वीं सदी में सिखों के "मिसल" (Misl), "दल खालसा" और "राखी" (Rakhi) व्यवस्था ने सिखों को किस प्रकार एक शक्तिशाली राज्य में बदला?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. मिसल व दल खालसा: 18वीं सदी में मुगलों और अफगानों के हमलों का सामना करने के लिए सिखों ने 12 अलग-अलग जत्थों (सैन्य कबीलों) का गठन किया जिन्हें मिसल कहा गया। इन सभी मिसलों की संयुक्त राष्ट्रीय सेना को दल खालसा कहा जाता था जो किसी भी संकट में एकजुट होकर लड़ती थी।
2. गुरमत्ता: हर वर्ष दीवाली और बैसाखी पर अमृतसर के अकाल तख्त पर सभी नेता मिलकर सामूहिक रूप से सर्वसम्मत राजनीतिक-सैन्य निर्णय लेते थे जिसे गुरमत्ता (गुरु का फैसला) कहा जाता था।
3. राखी व्यवस्था: सिखों ने किसानों को आक्रमणकारियों से सुरक्षा देने के बदले उनकी फसल का 20% कर के रूप में लेने की प्रणाली चलाई, जिससे सिखों को नियमित आय और लाखों किसानों का अटूट समर्थन मिला। 1799 में महाराजा रणजीत सिंह ने इसी आधार पर एक शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित किया।

उदाहरण 4
Q4 (वैज्ञानिक व नगर दृष्टि): आमेर के सवाई राजा जयसिंह के वैज्ञानिक और स्थापत्य योगदान की विवेचना कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. जंतर-मंतर (वेधशालाएं): सवाई जयसिंह केवल एक कुशल शासक ही नहीं बल्कि गणित और खगोलशास्त्र के प्रकांड विद्वान थे। उन्होंने ग्रहों, तारों और सूर्य की गति के सूक्ष्म वैज्ञानिक प्रेक्षण के लिए 5 नगरों—दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में पत्थर और चूने से विशाल यंत्रों वाली खगोलीय वेधशालाएं बनवाईं।
2. जयपुर नगर नियोजन (1727 ई.): उन्होंने 1727 में अपनी राजधानी जयपुर की स्थापना की। यह भारत का पहला योजनाबद्ध शहर था जो आधुनिक ग्रिड प्रणाली (समकोण पर काटती चौड़ी सड़कें), सुरक्षित जल निकासी और मजबूत सुरक्षा प्राचीरों के आधार पर बनाया गया था।

उदाहरण 5
Q5 (बैंकिंग व राजनीति): 18वीं सदी में बंगाल और अवध के अर्ध-स्वतंत्र राज्यों में "साहूकारों" और "जगत सेठ" जैसे बैंकरों का राजनीतिक महत्व क्यों बढ़ गया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. इजारेदारी व्यवस्था: अवध और बंगाल के नवाबों ने राजस्व एकत्र करने के लिए सबसे ऊंची बोली लगाने वाले ठेकेदारों (इजारेदारों) को अधिकार दिया। नवाब को अग्रिम निश्चित धन चाहिए होता था।
2. साहूकारों की भूमिका: ठेकेदार समय पर नवाब को कर चुका सकें, इसके लिए स्थानीय साहूकार और महाजन राज्य को अग्रिम गारंटी (जमानत) देते थे और जरूरत पड़ने पर नवाबों को भारी ऋण उपलब्ध कराते थे।
3. जगत सेठ का उत्थान: बंगाल में जगत सेठ का बैंकिंग घराना इतना शक्तिशाली हो गया कि वह राज्य के सिक्कों की ढलाई, कर वसूली और नवाबों के तख्तापलट (जैसे प्लासी के युद्ध 1757 में नवाब सिराजुद्दौला के विरुद्ध अंग्रेजों का साथ देना) तक में निर्णायक भूमिका निभाने लगा।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

अवध, बंगाल और हैदराबाद को मुगलों से पूरी तरह औपचारिक रूप से अलग हुआ घोषित राज्य मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

इन राज्यों के नवाबों ने वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त करने के बावजूद कभी भी मुगल सम्राट से औपचारिक संबंध नहीं तोड़े; वे अपने सिक्कों पर मुगल बादशाह का नाम रखते थे और स्वयं को मुगल सूबेदार ही कहते थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

चौथ और सरदेशमुखी दोनों को एक ही प्रकार का कर समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

चौथ पड़ोसी राज्यों से आक्रमण न करने के बदले लिया जाने वाला 25% कर था, जबकि सरदेशमुखी दक्कन के कानूनी सरदेशमुख होने के नाते लिया जाने वाला 9-10% अतिरिक्त अधिकार कर था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

जंतर-मंतर को केवल जयपुर में स्थित समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सवाई जयसिंह ने कुल 5 शहरों—दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में जंतर-मंतर वेधशालाएं बनवाई थीं।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

18वीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन का मानचित्र प्रवाह
मुगल पतन (नादिर शाह 1739) ➔ पुराने सूबे (अवध, बंगाल, हैदराबाद) ➔ सवाई जयसिंह (जंतर-मंतर) ➔ सिख (दल खालसा व राखी) ➔ मराठा (पेशवा, चौथ व पानीपत 1761)

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद अयोग्य उत्तरवर्ती शासकों और अमीर गुटों की साजिशों से मुगल साम्राज्य कमजोर हुआ।
मुख्य बिंदु 2
1739 में नादिर शाह ने दिल्ली को लूटा और मयूर सिंहासन (तख्त-ए-ताऊस) व कोहिनूर ले गया; इसके बाद अब्दाली ने 5 हमले किए।
मुख्य बिंदु 3
हैदराबाद (निजाम-उल-मुल्क आसफ जाह 1724), अवध (सआदत खान 1722) और बंगाल (मुर्शिद कुली खान) अर्ध-स्वतंत्र राज्य बने।
मुख्य बिंदु 4
इन नए राज्यों में इजारेदारी (राजस्व ठेकेदारी) और साहूकारों (जैसे बंगाल के जगत सेठ) का राजनीतिक प्रभाव अत्यधिक बढ़ा।
मुख्य बिंदु 5
आमेर के सवाई राजा जयसिंह ने जयपुर बसाया और दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, मथुरा व वाराणसी में 5 जंतर-मंतर वेधशालाएं बनवाईं।
मुख्य बिंदु 6
सिखों ने 12 मिसलों में संगठित होकर दल खालसा बनाया और अमृतसर में सामूहिक निर्णय (गुरमत्ता) लिए।
मुख्य बिंदु 7
सिखों ने किसानों को सुरक्षा देने के बदले 20% उपज लेने की "राखी" व्यवस्था चलाई; 1799 में रणजीत सिंह ने लाहौर को राजधानी बनाया।
मुख्य बिंदु 8
पेशवाओं (बालाजी विश्वनाथ, बाजीराव प्रथम) के नेतृत्व में मराठों ने पूरे भारत पर प्रभुत्व जमाया और चौथ (25%) व सरदेशमुखी (9-10%) कर वसूले।
मुख्य बिंदु 9
1761 में पानीपत के तीसरे युद्ध में अहमद शाह अब्दाली ने मराठों को पराजित किया।
मुख्य बिंदु 10
राजा सूरजमल (जाटों का प्लेटो) के नेतृत्व में भरतपुर का जाट राज्य अपनी शक्ति के चरम पर पहुँचा।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
1739 ईस्वी में दिल्ली पर आक्रमण कर मयूर सिंहासन और कोहिनूर हीरा लूटने वाले ईरानी शासक का क्या नाम था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 1739 ईस्वी में दिल्ली पर आक्रमण करने वाले ईरान के शासक का नाम "नादिर शाह" (Nadir Shah) था।
2
हैदराबाद राज्य की स्थापना 1724 ईस्वी में किस शक्तिशाली मुगल सूबेदार ने की थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: हैदराबाद राज्य की स्थापना 1724 ईस्वी में चिन किलिच खान, जिन्हें "निजाम-उल-मुल्क आसफ जाह" की उपाधि मिली थी, ने की थी।
3
सवाई राजा जयसिंह द्वारा बनवाई गई खगोलीय वेधशालाओं (जंतर-मंतर) के किन्हीं तीन नगरों के नाम बताइए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सवाई जयसिंह ने 5 नगरों में जंतर-मंतर बनवाए: दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी (छात्र इनमें से कोई भी 3 लिख सकते हैं)।
4
मराठों द्वारा पड़ोसी राज्यों से वसूले जाने वाले "चौथ" कर की दर क्या थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मराठों द्वारा पड़ोसी राज्यों से सुरक्षा और अनाक्रमण के बदले वसूले जाने वाले चौथ कर की दर कुल भू-राजस्व की "25 प्रतिशत" (एक-चौथाई) थी।
5
सिखों द्वारा 18वीं सदी में किसानों को सुरक्षा देने के बदले उपज का 20 प्रतिशत लेने वाली व्यवस्था का क्या नाम था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सिखों द्वारा किसानों को सुरक्षा देने के बदले 20 प्रतिशत उपज वसूलने वाली व्यवस्था का नाम "राखी" (Rakhi) प्रणाली था।
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