समाज में यह रूढ़िवादी धारणा गहराई से बैठी है कि कुछ विशेष प्रकार के काम महिलाओं के लिए उपयुक्त हैं और कुछ पुरुषों के लिए। सर्वेक्षणों में अधिकांश लोग नर्स, शिक्षिका और घरेलू सहायिका के रूप में महिलाओं की कल्पना करते हैं, जबकि वैज्ञानिक, पायलट, इंजीनियर और भारी कारखाने के मजदूर के रूप में पुरुषों को देखते हैं।
रूढ़िवादिता का मनोवैज्ञानिक षड्यंत्र
माना जाता है कि महिलाएं कोमल, सहनशील और आज्ञाकारी होती हैं, इसलिए वे देखभाल संबंधी व्यवसायों के उपयुक्त हैं। इसके विपरीत, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और रक्षा जैसे क्षेत्रों के लिए तकनीकी व तार्किक बुद्धि की आवश्यकता मानी जाती है जिसे समाज पुरुषों का एकाधिकार मान बैठता है। इस रूढ़ि के कारण लाखों प्रतिभाशाली बालिकाओं को इंजीनियरिंग या विज्ञान पढ़ने से रोका जाता है।
लक्ष्मी लाकड़ा : रूढ़ियों की पटरी पर दौड़ती ट्रेन
झारखंड के एक अत्यंत गरीब आदिवासी परिवार की 27 वर्षीय लक्ष्मी लाकड़ा ने उत्तर रेलवे (Northern Railways) की प्रथम महिला इंजन चालक (First Woman Engine Driver) बनकर इतिहास रच दिया।
- कठिन पारिवारिक परिस्थितियों में सरकारी स्कूल से पढ़ाई की, घर का काम संभाला और फिर इलेक्ट्रॉनिक्स में डिप्लोमा हासिल किया।
- रेलवे बोर्ड की कठिन परीक्षा पहले ही प्रयास में उत्तीर्ण कर उन्होंने यह साबित कर दिया कि ट्रेन का इंजन चलाने के लिए पुरुष होना जरूरी नहीं, बल्कि तकनीकी दक्षता और संकल्प अनिवार्य है।
- उनका प्रेरणादायी संदेश है: "मुझे जोखिम भरे काम पसंद हैं। जब भी लोग कहते हैं कि यह काम लड़कियों के लिए नहीं है, मैं उसे करके दिखाती हूँ।"