मध्यकाल में जहां एक ओर बड़े शहरों में ब्राह्मणों द्वारा निर्धारित वर्ण व्यवस्था के कठोर नियम लागू थे, वहीं दूसरी ओर भारतीय उपमहाद्वीप में ऐसे अनेक समाज थे जो इन सामाजिक नियमों और असमानताओं को नहीं मानते थे:
- समानता और बंधुत्व: ये समाज कई ऊंच-नीच के वर्गों में विभाजित नहीं थे। प्रत्येक जनजाति के सदस्य आपस में नातेदारी (Kinship) के बंधनों से जुड़े होते थे।
- आजीविका: कई जनजातियां खेती से अपनी आजीविका चलाती थीं, जबकि कई अन्य शिकारी-संग्राहक या पशुपालक थीं। वे अपने निवास क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का पूरा उपयोग करने के लिए इन गतिविधियों का मिला-जुला रूप अपनाती थीं। कुछ जनजातियां खानाबदोश थीं जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमती रहती थीं।
- सामूहिक संपत्ति: जनजाति के लोग भूमि और चारागाहों पर पूरे कुनबे का संयुक्त नियंत्रण रखते थे और अपने नियमों के अनुसार परिवारों में उसका बंटवारा करते थे।