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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 7 • Social Science • अध्याय 7
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

जनजातियां, खानाबदोश और एक जगह बसे हुए समुदाय (Tribes, Nomads and Settled Communities)

कक्षा 7 इतिहास का यह अध्याय "जनजातियाँ, खानाबदोश और एक जगह बसे हुए समुदाय" (Tribes, Nomads and Settled Communities) मध्यकालीन भारत के उन समाजों का प्रामाणिक अध्ययन कराता है जो वर्ण व्यवस्था और रूढ़िवादी सामाजिक नियमों से पूरी तरह स्वतंत्र थे। इस अध्याय में जनजातियों की सामाजिक-आर्थिक विशेषताएं, मौखिक इतिहास परंपरा, बंजारों के व्यापारिक कारवां (टांडा), झारखंड के चेर, मुंडा और संथाल विद्रोहियों का ऐतिहासिक योगदान, गढ़-कटंगा की गोंड प्रशासनिक प्रणाली (चौरासी व बरहोत), वीरांगना रानी दुर्गावती का बलिदान, तथा असम के अहोम राज्य की पाइक (Paik) व्यवस्था व "बुरंजी" ऐतिहासिक साहित्यों का गहन विश्लेषण शामिल है।

🏹 क्या आपने कभी सोचा है?

🌲 जब भारत के बड़े-बड़े राजा और नवाब कागजों पर इतिहास लिख रहे थे, तब जंगलों और पहाड़ों में रहने वाले जनजातीय समाज ने बिना कोई एक भी शब्द लिखे हजारों साल का इतिहास कैसे जीवित रखा?

वे अपने पूर्वजों की गाथाएं लिखित किताबों में नहीं, बल्कि अपने गीतों, गाथाओं और मौखिक परंपराओं (Oral Traditions) में पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखते थे! मध्यकाल में बंजारों के एक-एक कारवां में 600 से अधिक लोग और एक लाख बैल अनाज ढोते थे जिनके बिना अलाउद्दीन खिलजी या मुगलों की विशाल सेनाएं एक दिन भी युद्ध नहीं लड़ सकती थीं। वहीं गढ़-कटंगा की गोंड महारानी दुर्गावती ने मुगलों की विशाल सेना के सामने आत्मसमर्पण करने के बजाय लड़ते-लड़ते अपने सीने में खंजर घोंपकर अमर होना चुना!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

झारखंड और पूरे मध्य भारत की ऐतिहासिक पहचान को समझने के लिए यह अध्याय अनिवार्य है। चेर, मुंडा, संथाल और उरांव जनजातियों की गौरवशाली परंपराएं, सामुदायिक भूमि स्वामित्व की भावना और स्वाभिमान इसी इतिहास से प्रेरित हैं। इसके अलावा यह अध्याय दिखाता है कि किस प्रकार जनजातीय और गैर-जनजातीय समाजों के निरंतर संपर्क और सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने भारतीय संस्कृति को विविधता और मजबूती प्रदान की।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • वर्ण व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) और जाति व्यवस्था का प्रारंभिक ज्ञान।
  • पशुपालन, कृषि और झूम (स्थानांतरित) खेती की अवधारणा।
  • झारखंड, मध्य प्रदेश और पूर्वोत्तर भारत (असम) का सामान्य भूगोल।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • जनजातीय समाज की विशेषताओं एवं पारंपरिक मौखिक इतिहास प्रणाली को समझना।
  • भारत के विभिन्न क्षेत्रों (पंजाब, बलोच, चेर, मुंडा, संथाल, भील) में जनजातियों के वितरण का मानचित्रण करना।
  • बंजारों की भूमिका, उनके कारवां "टांडा" (Tanda) तथा युद्ध और व्यापार में उनके योगदान को जानना।
  • जातियों के उदय, वर्ण से जाति में परिवर्तन तथा राजपूतों के रूप में नई श्रेणियों के उभार का विश्लेषण करना।
  • गोंडवाना के गढ़-कटंगा राज्य की प्रशासनिक इकाई (गढ़ ➔ चौरासी ➔ बरहोत) तथा रानी दुर्गावती के संघर्ष का मूल्यांकन करना।
  • असम के अहोम राज्य की पाइक (Paik) श्रम प्रणाली, खेल (Khel) संरचना और बुरंजी (Buranji) इतिहास को स्पष्ट करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. जनजातीय समाज: वर्ण व्यवस्था से प...
2 2. भारत के प्रमुख जनजातीय क्षेत्र ए...
3 3. खानाबदोश पशुपालक और बंजारे: "टां...
4 4. ऐतिहासिक केस स्टडी: गोंड राज्य (...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. जनजातीय समाज: वर्ण व्यवस्था से परे समानता एवं मौखिक परंपराएं

मध्यकाल में जहां एक ओर बड़े शहरों में ब्राह्मणों द्वारा निर्धारित वर्ण व्यवस्था के कठोर नियम लागू थे, वहीं दूसरी ओर भारतीय उपमहाद्वीप में ऐसे अनेक समाज थे जो इन सामाजिक नियमों और असमानताओं को नहीं मानते थे:

  • समानता और बंधुत्व: ये समाज कई ऊंच-नीच के वर्गों में विभाजित नहीं थे। प्रत्येक जनजाति के सदस्य आपस में नातेदारी (Kinship) के बंधनों से जुड़े होते थे।
  • आजीविका: कई जनजातियां खेती से अपनी आजीविका चलाती थीं, जबकि कई अन्य शिकारी-संग्राहक या पशुपालक थीं। वे अपने निवास क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का पूरा उपयोग करने के लिए इन गतिविधियों का मिला-जुला रूप अपनाती थीं। कुछ जनजातियां खानाबदोश थीं जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमती रहती थीं।
  • सामूहिक संपत्ति: जनजाति के लोग भूमि और चारागाहों पर पूरे कुनबे का संयुक्त नियंत्रण रखते थे और अपने नियमों के अनुसार परिवारों में उसका बंटवारा करते थे।
मौखिक इतिहास की शक्ति: समकालीन इतिहासकारों और यात्रियों ने जनजातियों के बारे में बहुत कम लिखा है क्योंकि वे बाहरी दुनिया से दूर जंगलों में रहते थे और कोई लिखित दस्तावेज नहीं रखते थे। लेकिन प्रत्येक नई पीढ़ी अपने पुरखों की वीर गाथाओं और रीति-रिवाजों को मौखिक रूप से (Oral Traditions) कंठस्थ करके जीवित रखती थी। आज के इतिहासकार इन्हीं मौखिक साक्ष्यों के आधार पर जनजातीय इतिहास लिखते हैं।

2. भारत के प्रमुख जनजातीय क्षेत्र एवं झारखंड के चेर, मुंडा और संथाल

उपमहाद्वीप के लगभग हर क्षेत्र में जनजातियां निवास करती थीं:

क्षेत्र प्रमुख जनजातियां ऐतिहासिक विशेषताएं
पंजाब व पश्चिमोत्तर खोखर, गक्खर, बलोच 13वीं-14वीं सदी में खोखर अत्यंत प्रभावशाली थे। बाद में गक्खर प्रमुख बने; उनके प्रमुख कमाल खान गक्खर को सम्राट अकबर ने मनसबदार बनाया था। बलोच अलग-अलग कुलों में बंटे शक्तिशाली लोग थे।
झारखंड, बिहार व उड़ीसा चेर (Chero), मुंडा (Munda), संथाल (Santhal) 12वीं सदी तक चेर सरदारों के शक्तिशाली राज्य बन चुके थे। 1591 में अकबर के सेनापति राजा मानसिंह ने चेरों पर हमला कर उन्हें हराया और भारी लूट हासिल की, किंतु वे पूरी तरह अधीन नहीं हुए। औरंगजेब के समय मुगलों ने चेरों के अनेक किलों पर कब्जा किया। मुंडा और संथाल इस क्षेत्र के अन्य प्रमुख समुदाय थे।
पश्चिमी व मध्य भारत भील (Bhil), कोली 16वीं सदी के अंत तक कई भील समुदाय खेतिहर और जमींदार बन चुके थे, यद्यपि कई भील परिवार शिकारी-संग्राहक बने रहे।
पूर्वोत्तर भारत नागा, अहोम, खासी पूर्वोत्तर के सुदूर पहाड़ी व जंगली भागों पर इन जनजातियों का पूर्ण आधिपत्य था।

3. खानाबदोश पशुपालक और बंजारे: "टांडा" एवं व्यापारिक संजाल

खानाबदोश पशुपालक:

खानाबदोश लोग अपने रेवड़ों और जानवरों के साथ एक चारागाह से दूसरे चारागाह घूमते थे। वे मुख्यतः दूध, घी और ऊन पर जीवित रहते थे और किसानों को घी-ऊन देकर उनके बदले अनाज, कपड़े, बर्तन और लोहे के औजार प्राप्त करते थे।

बंजारा और उनका "टांडा" (Tanda):

बंजारे मध्यकालीन भारत के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारी-खानाबदोश थे:

  • बंजारों के कारवां को "टांडा" कहा जाता था। एक बड़े टांडा में कई परिवार और 600-700 तक लोग होते थे। उनके पास हजारों बैल होते थे।
  • वे जहां अनाज सस्ता मिलता था, वहां से खरीदते थे और जहां महंगा बिकता था, वहां ले जाकर बेचते थे।
  • सैन्य अभियानों में भूमिका: अलाउद्दीन खिलजी ने नगर के बाजारों तक अनाज की ढुलाई के लिए बंजारों का प्रयोग किया। सम्राट जहांगीर ने लिखा है कि बंजारे अपने बैलों पर विभिन्न इलाकों से अनाज लादकर शहरों में बेचते थे। जब मुगलों की विशाल सेना युद्ध के लिए निकलती थी, तो बंजारे उनके लिए रसद ढोते थे; किसी बड़े अभियान में एक लाख तक बैल अनाज ढो रहे होते थे।
वर्ण से जाति में परिवर्तन:

अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ जब नए शिल्पों की जरूरत हुई, तो ब्राह्मणों ने सुनारों, लोहारों, बढ़इयों और राजमिस्त्रियों को अलग-अलग जातियों (Jatis) के रूप में मान्यता दी। 11वीं और 12वीं सदी तक क्षत्रियों के बीच नए राजपूत वंशों (हुण, चंदेल, चालुक्य आदि) का प्रभाव बढ़ा। कई जनजातीय शासकों ने ब्राह्मणों की मदद से जाति व्यवस्था में क्षत्रिय का स्थान पा लिया, किंतु आम जनजातीय लोग निचली जातियों में ही शामिल हो सके।

4. ऐतिहासिक केस स्टडी: गोंड राज्य (गढ़-कटंगा) एवं अहोम साम्राज्य

(A) गोंड राज्य और रानी दुर्गावती

गोंड लोग गोंडवाना (गोंडों का विशाल वन प्रदेश) में रहते थे और स्थानांतरित कृषि (झूम खेती) करते थे। अकबरनामा में गढ़-कटंगा नामक एक समृद्ध गोंड राज्य का उल्लेख है जिसमें 70,000 गाँव थे।

प्रशासनिक पदानुक्रम:
राज्य ➔ गढ़ (प्रत्येक खास गोंड कुल के अधीन)
गढ़ ➔ चौरासी (84 गाँवों की प्रशासनिक इकाई)
चौरासी ➔ बरहोत (12-12 गाँवों की उप-इकाई)

गढ़-कटंगा के राजा अमनदास ने संग्राम शाह की उपाधि धारण की। उनके पुत्र दलपत का विवाह महोबा के चंदेल राजपूत राजा की पुत्री रानी दुर्गावती से हुआ। दलपत की मृत्यु के बाद रानी दुर्गावती ने अपने 5 वर्षीय पुत्र वीर नारायण के नाम पर शासन किया। 1565 में जब आसफ खान के नेतृत्व में मुगल सेना ने गढ़-कटंगा पर हमला किया, तो रानी ने हार मानने के स्थान पर वीरतापूर्वक लड़ते हुए आत्मबलिदान दे दिया।

(B) अहोम साम्राज्य (पूर्वोत्तर भारत)

अहोम लोग 13वीं सदी में म्यांमार से आकर ब्रह्मपुत्र घाटी में बसे। उन्होंने भुइयां (जमींदार) लोगों की पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को समाप्त कर एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की।

  • पाइक (Paik) व्यवस्था: अहोम राज्य बेगार (जबरन श्रम) पर निर्भर था। जिन लोगों से राज्य के लिए अनिवार्य शारीरिक श्रम लिया जाता था, उन्हें "पाइक" कहा जाता था। प्रत्येक गाँव को रोटेशन के आधार पर पाइक भेजने पड़ते थे।
  • खेल (Khel): अहोम समाज कुलों में बंटा था जिसे खेल कहा जाता था। एक खेल के नियंत्रण में प्रायः कई गाँव होते थे।
  • बुरंजी (Buranji): अहोम लोगों ने इतिहास लेखन की उत्कृष्ट परंपरा शुरू की। उनके ऐतिहासिक ग्रंथों को "बुरंजी" कहा जाता था, जिन्हें पहले अहोम भाषा में और बाद में असमिया में लिखा गया।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

गोंड प्रशासनिक ढांचा
गढ़ ➔ चौरासी (84 गांव) ➔ बरहोत (12 गांव)
गढ़-कटंगा की विकेंद्रीकृत व्यवस्था
बंजारा कारवां सूत्र
टांडा (Tanda) = सैकड़ों परिवार + हजारों बैल + सचल बाजार
युद्ध व व्यापार की जीवनरेखा
अहोम श्रम व्यवस्था
पाइक (Paik) = अनिवार्य चक्रीय बेगार श्रम
जनगणना आधारित श्रम आवंटन
अहोम ऐतिहासिक दस्तावेज
बुरंजी (Buranji) = अहोम व असमिया भाषा में लिखित इतिहास
पूर्वोत्तर भारत का प्रामाणिक स्रोत
झारखंड चेर प्रतिरोध
1591 ई. (राजा मानसिंह का आक्रमण)
पलामू व छोटानागपुर के जनजातीय किले

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
Q1 (सामाजिक तुलना): मध्यकालीन जनजातीय समाज जाति और वर्ण पर आधारित समाज से किन-किन बुनियादी बातों में भिन्न था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. वर्गविहीन समाज: वर्ण आधारित समाज ब्राह्मणों द्वारा बनाए गए कठोर नियमों और ऊंच-नीच के कई स्तरों में बंटा था, जबकि जनजातीय समाज में इस प्रकार का कोई कठोर सामाजिक भेदभाव नहीं था।
2. नातेदारी का बंधन: जनजाति के सभी सदस्य रक्त और नातेदारी (Kinship) के पवित्र बंधनों से जुड़े होते थे, जिससे उनमें अद्भुत एकता और बंधुत्व की भावना होती थी।
3. सामूहिक स्वामित्व: वर्ण समाज में भूमि व्यक्तिगत संपत्ति होती थी, जबकि जनजातीय समाज में चारागाह, जंगल और जमीन पूरे कबीले की संयुक्त संपत्ति होती थी और जरूरत के अनुसार परिवारों में बांटी जाती थी।

उदाहरण 2
Q2 (आर्थिक व सामरिक महत्व): बंजारे कौन थे? उनका कारवां किस नाम से जाना जाता था और सल्तनत व मुगल काल में उनका क्या योगदान था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. परिचय: बंजारे मध्यकालीन भारत के सबसे महत्वपूर्ण और बड़े घुमंतू व्यापारी (खानाबदोश) थे। उनके गतिशील व्यापारिक कारवां को "टांडा" (Tanda) कहा जाता था।
2. आर्थिक योगदान: बंजारे दूर-दराज के गांवों से जहां अनाज सस्ता होता था, खरीदकर लाते थे और बड़े शहरों व मंडियों में बेचते थे, जिससे शहरों में भुखमरी नहीं होती थी।
3. सामरिक योगदान: अलाउद्दीन खिलजी ने दिल्ली के बाजारों में अनाज की आपूर्ति के लिए बंजारों को नियुक्त किया था। मुगलों के सैन्य अभियानों में जब लाखों सैनिक युद्ध पर जाते थे, तो बंजारे अपने बैलों पर (कभी-कभी एक लाख बैल तक) उनके लिए राशन और रसद की ढुलाई करते थे।

उदाहरण 3
Q3 (झारखंड क्षेत्रीय इतिहास): झारखंड और बिहार के "चेर" (Chero) समुदाय का ऐतिहासिक महत्व क्या है? अकबर के समय उनके साथ क्या संघर्ष हुआ?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. चेरों का प्रभुत्व: 12वीं सदी तक बिहार और झारखंड (विशेषकर पलामू क्षेत्र) में शक्तिशाली चेर सरदारों की स्वतंत्र रियासतें स्थापित हो चुकी थीं। वे अपने जंगलों और दुर्गम पहाड़ी किलों में स्वायत्त रूप से शासन करते थे।
2. मुगल संघर्ष (1591 ई.): 1591 में अकबर के प्रसिद्ध सेनापति राजा मानसिंह ने चेर सरदारों पर एक बड़ा सैन्य अभियान किया। मुगलों ने चेरों को पराजित किया और उनके विशाल खजाने तथा हाथियों को लूट लिया।
3. दीर्घकालिक परिणाम: मानसिंह की जीत के बावजूद चेर पूरी तरह मुगलों के अधीन नहीं हुए और वे लगातार छोटानागपुर के जंगलों से प्रतिरोध करते रहे। अंततः औरंगजेब के समय मुगल सेनापति दाउद खान ने चेरों के किलों पर कब्जा किया।

उदाहरण 4
Q4 (प्रशासनिक संरचना): गोंडवाना के राज्य "गढ़-कटंगा" की प्रशासनिक व्यवस्था का वर्णन कीजिए। यह किस प्रकार इकाइयों में बंटा था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
अकबरनामा के अनुसार गढ़-कटंगा एक विशाल और संपन्न गोंड राज्य था जिसमें लगभग 70,000 गांव शामिल थे:
1. गढ़ (Gadh): राज्य कई बड़े प्रशासनिक क्षेत्रों में बंटा था जिन्हें गढ़ कहा जाता था। प्रत्येक गढ़ किसी विशिष्ट गोंड कुल (कबीले) के नियंत्रण में होता था।
2. चौरासी (Chaurasi): प्रत्येक गढ़ आगे 84 गांवों की एक प्रशासनिक इकाई में विभाजित था, जिसे चौरासी कहा जाता था।
3. बरहोत (Barhot): चौरासी को पुनः 12-12 गांवों की छोटी उप-इकाइयों में विभाजित किया गया था, जिन्हें बरहोत कहा जाता था। यह व्यवस्था अत्यंत सुव्यवस्थित और विकेंद्रीकृत थी।

उदाहरण 5
Q5 (पूर्वोत्तर भारत की श्रम व्यवस्था): अहोम राज्य की "पाइक" (Paik) व्यवस्था क्या थी और इसने अहोम समाज को कैसे प्रभावित किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. पाइक की संकल्पना: असम का अहोम राज्य बेगार (जबरन बिना पारिश्रमिक के श्रम) पर निर्भर था। जिन वयस्क पुरुषों से राज्य के लिए अनिवार्य रूप से बांध बनाने, सिंचाई नहरें खोदने या सेना में सेवा देने के लिए श्रम लिया जाता था, उन्हें पाइक कहा जाता था।
2. रोटेशन व्यवस्था: राज्य द्वारा प्रत्येक गांव की नियमित जनगणना की जाती थी। अधिक आबादी वाले गांवों से लोगों को कम आबादी वाले स्थानों पर जबरन भेज दिया जाता था। प्रत्येक गांव को अपनी बारी आने पर निश्चित संख्या में पाइक भेजने पड़ते थे।
3. प्रभाव: इस जबरन स्थानांतरण के कारण अहोमों के पुराने जनजातीय कुल (Clans) बिखर गए और 17वीं सदी के मध्य तक प्रशासन पूरी तरह केंद्रीकृत हो गया।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

जनजातियों के पास लिखित किताबें न होने के कारण उन्हें असभ्य या इतिहासविहीन समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

जनजातीय समाजों में अत्यंत समृद्ध और जीवंत मौखिक परंपराएं (Oral Traditions) थीं, जो गीतों और लोकगाथाओं के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी शुद्धता से संरक्षित की जाती थीं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

बंजारों के "टांडा" को केवल किसी एक परिवार का तंबू समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

टांडा बंजारों का एक विशाल सचल व्यापारिक कारवां था, जिसमें सैकड़ों परिवार, 600-700 लोग और हजारों मालवाहक बैल एक साथ चलते थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

गोंड प्रशासनिक इकाई "चौरासी" और "बरहोत" में गांवों की संख्या में भ्रमित होना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

याद रखें: चौरासी में ठीक 84 गांव होते थे, और बरहोत में 12-12 गांव (84 = 12 × 7 बरहोत) होते थे।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

मध्यकालीन जनजातीय व खानाबदोश सामाजिक व्यवस्था
जनजातीय समानता व मौखिक इतिहास ➔ झारखंड चेर, मुंडा व संथाल ➔ बंजारा टांडा व खाद्य आपूर्ति ➔ गढ़-कटंगा (चौरासी व रानी दुर्गावती) ➔ अहोम साम्राज्य (पाइक, खेल व बुरंजी)

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
जनजातीय समाज वर्ण व्यवस्था के कठोर नियमों से मुक्त थे और नातेदारी व समानता के बंधनों से जुड़े थे।
मुख्य बिंदु 2
जनजातियां कोई लिखित दस्तावेज नहीं रखती थीं, बल्कि समृद्ध मौखिक परंपराओं (Oral Traditions) से इतिहास संरक्षित रखती थीं।
मुख्य बिंदु 3
झारखंड और बिहार के चेर, मुंडा और संथाल प्रमुख जनजातियां थीं; 1591 में राजा मानसिंह ने चेरों को पराजित किया था।
मुख्य बिंदु 4
बंजारे मध्यकाल के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारी-खानाबदोश थे, जिनके कारवां को "टांडा" कहा जाता था।
मुख्य बिंदु 5
अलाउद्दीन खिलजी और मुगलों ने नगरों और युद्ध अभियानों में रसद आपूर्ति के लिए बंजारों के बैलों का उपयोग किया।
मुख्य बिंदु 6
अर्थव्यवस्था के विकास के साथ वर्णों के भीतर नई जातियों (Jatis) और नए राजपूत कुलों का उदय हुआ।
मुख्य बिंदु 7
गढ़-कटंगा एक विशाल गोंड राज्य था जिसमें 70,000 गांव थे; यह गढ़ ➔ चौरासी (84 गांव) ➔ बरहोत (12 गांव) में बंटा था।
मुख्य बिंदु 8
महारानी दुर्गावती ने 1565 में मुगल सेनापति आसफ खान के विरुद्ध गढ़-कटंगा की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की।
मुख्य बिंदु 9
असम के अहोम राज्य में बेगार करने वाले अनिवार्य श्रमिकों को "पाइक" और कुलों को "खेल" कहा जाता था।
मुख्य बिंदु 10
अहोमों ने इतिहास लेखन की अनूठी परंपरा शुरू की, जिनके ऐतिहासिक ग्रंथों को "बुरंजी" (Buranji) कहा जाता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
जनजातियां अपने इतिहास और परंपराओं को सुरक्षित रखने के लिए किस माध्यम का उपयोग करती थीं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: जनजातियां लिखित पुस्तकों के स्थान पर अपने पूर्वजों की गाथाओं, गीतों और रीति-रिवाजों को "मौखिक परंपराओं" (Oral Traditions) के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी कंठस्थ करके सुरक्षित रखती थीं।
2
बंजारों के व्यापारिक कारवां को क्या कहा जाता था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: बंजारों के व्यापारिक कारवां को "टांडा" (Tanda) कहा जाता था, जिसमें सैकड़ों परिवार और हजारों बैल शामिल होते थे।
3
1591 ईस्वी में अकबर के किस सेनापति ने झारखंड के चेर सरदारों पर आक्रमण किया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 1591 ईस्वी में अकबर के प्रसिद्ध सेनापति और आमेर के शासक "राजा मानसिंह" ने चेर सरदारों पर आक्रमण कर उन्हें परास्त किया था।
4
गोंडवाना के गढ़-कटंगा राज्य में "चौरासी" और "बरहोत" का क्या अर्थ था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: चौरासी 84 गांवों की एक प्रशासनिक इकाई थी, जो आगे चलकर 12-12 गांवों की छोटी इकाइयों में बंटी थी जिन्हें बरहोत कहा जाता था।
5
असम के अहोम राज्य के ऐतिहासिक ग्रंथों को किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अहोम राज्य के ऐतिहासिक ग्रंथों को "बुरंजी" (Buranji) कहा जाता है, जो पहले अहोम भाषा में और बाद में असमिया भाषा में लिखे गए।
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अध्याय 1: हज़ार वर्षों के दौरान हुए परिवर्तनों की पड़ताल (Tracing Changes Through a Thousand Years) अध्याय 2: नए राजा और साम्राज्य (New Kings and Kingdoms) अध्याय 3: दिल्ली के सुल्तान (The Delhi Sultans) अध्याय 4: मुगल साम्राज्य (The Mughal Empire) अध्याय 5: शासक और इमारतें (Rulers and Buildings) अध्याय 6: नगर, व्यापारी और शिल्पकार (Towns, Traders and Craftspersons) अध्याय 7: जनजातियां, खानाबदोश और एक जगह बसे हुए समुदाय (Tribes, Nomads and Settled Communities) अध्याय 8: ईश्वर से अनुराग (Devotional Paths to the Divine) अध्याय 9: क्षेत्रीय संस्कृतियों का निर्माण (The Making of Regional Cultures) अध्याय 10: अठारहवीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन (Eighteenth-Century Political Formations) अध्याय 11: पर्यावरण (Environment) अध्याय 12: हमारी पृथ्वी के अंदर (Inside Our Earth) अध्याय 13: हमारी बदलती पृथ्वी (Our Changing Earth) अध्याय 14: वायु (Air) अध्याय 15: जल (Water) अध्याय 16: मानव-पर्यावरण अंतःक्रिया: उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र (Human-Environment Interactions: The Tropical and the Subtropical Region) अध्याय 17: रेगिस्तान में जीवन (Life in the Deserts) अध्याय 18: समानता (On Equality) (On Equality) अध्याय 19: स्वास्थ्य में सरकार की भूमिका (Role of the Government in Health) अध्याय 20: राज्य शासन कैसे काम करता है (How the State Government Works) अध्याय 21: लड़के और लड़कियों के रूप में बड़ा होना (Growing Up as Boys and Girls) अध्याय 22: औरतों ने बदली दुनिया (Women Change the World) अध्याय 23: संचार माध्यमों को समझना (Understanding Media) अध्याय 24: हमारे आस-पास के बाज़ार (Markets Around Us) अध्याय 25: बाज़ार में एक कमीज़ (A Shirt in the Market) अध्याय 26: समानता के लिए संघर्ष (Struggles for Equality)

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