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WBB • कक्षा 7 • History & Environment (অতীত ও ঐতিহ্য) • अध्याय 8
अनुमानित समय: 50 मिनट
प्रगति: अध्ययनरत

मुग़ल साम्राज्य का संकट

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 7 इतिहास एवं पर्यावरण पाठ्यपुस्तक "अतीत और विरासत" का पांचवां अध्याय "मुग़ल साम्राज्य (1526–1707 ई.)"। इस अध्याय में 1526 ई. में पानीपत के प्रथम युद्ध व 1527 ई. में खानवा के युद्ध में बाबर द्वारा मुग़ल सत्ता की स्थापना, बाबरनामा, हुमायूं का आरंभिक शासन, भाइयों का विरोध तथा शेरशाह सूरी के हाथों चौसा (1539) व कन्नौज (1540) के युद्धों में पराजय के उपरांत 15 वर्षों का निर्वासन, शेरशाह सूरी का प्रशासनिक चमत्कार (सरकार व परगना का विभाजन, पट्टा व कबूलियत प्रथा, चांदी का प्रामाणिक 'रुपिया' व तांबे का 'दाम', सड़क-ए-आज़म या ग्रैंड ट्रंक रोड व डाक-चौकी व्यवस्था), हुमायूं की वापसी एवं 1556 ई. में पानीपत के द्वितीय युद्ध में बैरम खां द्वारा हेमू की पराजय के साथ अकबर का राज्याभिषेक, अकबर की मनसबदारी प्रणाली (जात व सवार पद, दाग व चेहरा), राजा टोडरमल का दहसाला बंदोबस्त (जब्ती व्यवस्था, 1/3 भाग लगान, 4 प्रकार की भूमि—पोलज, परौती, चाचर, बंजर), सूबा प्रशासन, अकबर की उदार धार्मिक नीति व राजपूत नीति (तीर्थकर व जजिया कर की समाप्ति), फतेहपुर सीकरी का इबादत खाना, महज़रनामा, सुलह-ए-कुल व दीन-ए-इलाही, नवरत्न सभा (बीरबल, टोडरमल, मानसिंह, अबुल फजल, तानसेन आदि), जहांगीर की न्याय की जंजीर व नूरजहां जुंटा, सर थॉमस रो का आगमन, शाहजहां का वास्तुकला का स्वर्ण युग (ताजमहल, लाल किला, मयूर सिंहासन), उत्तराधिकार का युद्ध तथा अंततः औरंगजेब आलमगीर की कट्टर धार्मिक नीतियां, जजिया की पुनर्स्थापना, सिखों व मराठों (शिवाजी महाराज) से संघर्ष तथा 26 वर्षों का विनाशकारी 'दक्कन का नासूर' (Deccan Ulcer) जिसके कारण मुग़ल साम्राज्य के पतन का मार्ग प्रशस्त हुआ, का प्रामाणिक एवं विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया गया है।

कैसे मात्र 5 साल के शासन में एक अफगान योद्धा ने भारत का चांदी का 'रुपया' और 2500 किमी लंबी 'जीटी रोड' बना दी?

कल्पना कीजिए एक ऐसे शाही घटनाक्रम की, जहां एक मुग़ल बादशाह अपनी जान बचाने के लिए उफनती गंगा नदी में कूद गया और एक साधारण भिश्ती (मशक से पानी भरने वाले) ने उसकी जान बचाई, जिसके बदले उस भिश्ती को एक दिन के लिए हिंदुस्तान का बादशाह बनाकर चमड़े के सिक्के जारी करने का मौका मिला! उस बादशाह हुमायूं को खदेड़ने वाले सूर सम्राट शेरशाह सूरी ने केवल पांच वर्षों में शुद्ध चांदी का ऐसा सिक्का ढाला जिसका नाम रखा 'रुपिया'—जो आज भी हमारी जेब के नोटों और रुपयों की जड़ है! और उनकी बनाई 'सड़क-ए-आज़म' पर लोग सदियों तक बंगाल के सोनारगांव से पेशावर तक बिना रुके सफर करते रहे!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

मुग़ल साम्राज्य भारतीय इतिहास का अत्यंत प्रभावशाली युग था। शेरशाह और मुग़लों द्वारा शुरू की गई मुद्रा प्रणाली ('रुपिया'), राजमार्ग ('जीटी रोड'), वैज्ञानिक भू-राजस्व व्यवस्था ('टोडरमल का बंदोबस्त') और सांस्कृतिक समन्वय ('सुलह-ए-कुल') ने आधुनिक भारत की प्रशासनिक, आर्थिक एवं सामाजिक आधारशिला तैयार की।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • दिल्ली सल्तनत का पतन तथा 1526 ई. के पानीपत के प्रथम युद्ध की पृष्ठभूमि।
  • मध्यकालीन भारत का भू-राजनीतिक मानचित्र और प्रमुख प्रांतीय राज्य।
  • मनसब, जागीर, सूबा, जजिया जैसी बुनियादी ऐतिहासिक प्रशासनिक शब्दावली की समझ।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • बाबर और हुमायूं के आरंभिक संघर्षों और मुग़ल वंश की स्थापना के प्रमुख चरणों का विश्लेषण करना।
  • शेरशाह सूरी के भूमि सुधारों (पट्टा व कबूलियत), मुद्रा सुधार (रुपिया) और बुनियादी ढांचे का मूल्यांकन करना।
  • अकबर की मनसबदारी व्यवस्था (जात व सवार) और राजा टोडरमल की दहसाला प्रणाली की कार्यप्रणाली समझना।
  • अकबर के धार्मिक समन्वयवाद (सुलह-ए-कुल, इबादत खाना, दीन-ए-इलाही) और नवरत्नों के योगदान का परीक्षण करना।
  • शाहजहां की स्थापत्य कला और औरंगजेब की दक्कन नीति ('दक्कन का नासूर') के साम्राज्य पर प्रभावों की समीक्षा करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 १. मुग़ल साम्राज्य की स्थापना: बाबर...
2 २. सूर साम्राज्य का मध्यांतर: शेरशा...
3 ३. अकबर महान: बैरम खां, पानीपत का द...
4 ४. अकबर की धार्मिक नीति, सुलह-ए-कुल...
5 ५. उत्तरवर्ती मुग़ल: जहांगीर, शाहजह...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

१. मुग़ल साम्राज्य की स्थापना: बाबर व हुमायूं के संघर्ष, कन्नौज का युद्ध एवं निर्वासन

चरण १: 👁️ अवलोकन एवं खोज

मध्य एशिया की फरगाना घाटी का एक बेघर राजकुमार अपनी मातृभूमि गंवाने के बाद कैसे खैबर दर्रा पार कर हिंदुस्तान आया और मुग़ल साम्राज्य जैसी विशाल सल्तनत की नींव रखी?

चरण २: 🧠 मुख्य अवधारणा की समझ

जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर (1526–1530 ई.):
मुग़ल शब्द 'मंगोल' से बना है। बाबर पिता की ओर से तैमूर लंग का पांचवां और माता की ओर से चंगेज खां का चौदहवां वंशज था। मध्य एशिया में समरकंद गंवाने के बाद उसने काबुल पर अधिकार किया। पंजाब के सूबेदार दौलत खां लोदी और राणा सांगा के निमंत्रण पर उसने भारत पर आक्रमण किया:
१. पानीपत का प्रथम युद्ध (1526 ई.): इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली और आगरा पर अधिकार किया।
२. खानवा का युद्ध (1527 ई.): मेवाड़ के पराक्रमी शासक राणा सांगा की संयुक्त राजपूत सेना को बाबर ने तोपखाने और तुलुगमा रणनीति से हराया। इस युद्ध में बाबर ने 'जिहाद' का नारा दिया और विजयोपरांत 'गाजी' (धर्मयोद्धा) की उपाधि धारण की।
३. चंदेरी का युद्ध (1528 ई.) व घाघरा का युद्ध (1529 ई.): मेदिनी राय और अफगानों को परास्त कर उसने उत्तर भारत में सत्ता मजबूत की।
बाबर ने अपनी मातृभाषा चगताई तुर्की में प्रसिद्ध आत्मकथा 'बाबरनामा' (तुजुक-ए-बाबरी) लिखी, जिसमें भारत के पशु-पक्षी, फल-फूल, मौसम और सामाजिक जीवन का सजीव वर्णन है। 1530 ई. में आगरा में उसकी मृत्यु हुई।

नसीरुद्दीन हुमायूं (1530–1540 व 1555–1556 ई.):
हुमायूं का अर्थ 'भाग्यशाली' होता है, किंतु वह जीवन भर ठोकरें खाता रहा। पिता के आदेशानुसार उसने साम्राज्य को तीन भाइयों—कामरान, अस्करी और हिंदाल में बांटकर अपनी स्थिति कमजोर कर ली।
• शेरशाह से संघर्ष: बिहार के अफगान नायक शेर खां से उसका टकराव हुआ। 1539 ई. में चौसा के युद्ध में शेर खां ने अचानक हमला कर हुमायूं को पराजित किया। हुमायूं ने घोड़े सहित गंगा में कूदकर अपनी जान बचाई, जहां निज़ाम नामक भिश्ती ने उसे डूबने से बचाया।
• 1540 ई. में बिलग्राम (कन्नौज) के युद्ध में शेरशाह ने हुमायूं को अंतिम रूप से परास्त किया। हुमायूं बेघर होकर 15 वर्षों तक सिंध और फारस में निर्वासित रहा। बाद में फारस के शाह तहमास्प की मदद से 1555 ई. में उसने पुनः दिल्ली पर अधिकार किया।

चरण ३: 🔍 साक्ष्यों से जुड़ाव

हुमायूं की बहन गुलबदन बेगम की पुस्तक 'हुमायूंनामा' में हुमायूं के कष्टप्रद निर्वासन, चौसा की रात नदी में कूदने की घटना और पारिवारिक संघर्षों का प्रामाणिक विवरण मिलता है।

चरण ४: 💡 ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण

बाबर का सैन्य कौशल मुग़लों को भारत में स्थापित करने के लिए पर्याप्त था, परंतु उसकी असमय मृत्यु ने शासन को संस्थागत रूप नहीं लेने दिया। हुमायूं की व्यक्तिगत दुर्बलता और भाइयों की गद्दारी ने अफगानों को पुनः सत्ता में आने का अवसर दिया।

चरण ५: 🎯 स्व-मूल्यांकन एवं सारांश

याद रखें: बाबर ने तुर्की में बाबरनामा लिखी और खानवा में गाजी की उपाधि ली। हुमायूं चौसा (1539) और कन्नौज (1540) में शेरशाह से हारकर 15 वर्ष निर्वासित रहा।

२. सूर साम्राज्य का मध्यांतर: शेरशाह सूरी का प्रशासनिक व आर्थिक चमत्कार (1540–1545 ई.)

चरण १: 👁️ अवलोकन एवं खोज

मात्र पांच वर्ष के संक्षिप्त शासनकाल में एक शासक ने ऐसा प्रशासनिक ढांचा कैसे तैयार किया जिसे बाद में महान मुग़ल सम्राट अकबर और ब्रिटिश हुकूमत ने भी आधार बनाया?

चरण २: 🧠 मुख्य अवधारणा की समझ

फरीद खां से शेरशाह सूरी:
शेरशाह का मूल नाम फरीद खां था। बिहार के सूबेदार बहार खां लोहानी को शेर से बचाने के कारण उसे 'शेर खां' की उपाधि मिली। कन्नौज के युद्ध में हुमायूं को परास्त कर उसने द्वितीय अफगान साम्राज्य (सूर वंश) की स्थापना की।

भू-राजस्व सुधार (Agrarian Reforms):
शेरशाह ने किसानों और राज्य के बीच सीधा संबंध स्थापित किया:
• पट्टा (Patta): राज्य द्वारा किसान को दिया जाने वाला सरकारी अधिकार-पत्र, जिसमें भूमि का क्षेत्रफल, किस्म और उस पर लगने वाला निश्चित लगान स्पष्ट लिखा होता था।
• कबूलियत (Qabuliyat): किसान द्वारा सरकार को दिया जाने वाला इकरारनामा, जिसमें वह तय लगान चुकाने की सहमति देता था।
लगान सामान्यतः कुल उपज का एक-तिहाई (1/3 भाग) निर्धारित किया गया जिसे नगद या अनाज में दिया जा सकता था। अकाल के समय किसानों को ऋण (तकावी) की व्यवस्था की गई।

मुद्रा प्रणाली में सुधार (Currency Reforms):
शेरशाह ने पुराने खोटे सिक्कों को बंद कर शुद्ध धातु के मानक सिक्के जारी किए:
१. शुद्ध चांदी का सिक्का 'रुपिया' (178 ग्रेन)—जो आधुनिक भारतीय 'रुपये' का सीधा जनक है।
२. तांबे का सिक्का 'दाम' (380 ग्रेन)। 1 चांदी के रुपये में 40 तांबे के दाम होते थे।

यातायात व सार्वजनिक कार्य (Public Works):
• सड़क-ए-आज़म: बंगाल के सोनारगांव से शुरू होकर दिल्ली, लाहौर होते हुए पेशावर के पास अटक तक लगभग 2,500 किमी लंबी पक्की सड़क बनवाई, जिसे बाद में अंग्रेजों ने 'ग्रैंड ट्रंक रोड' (GT Road) नाम दिया।
• सड़क के दोनों ओर फलदार वृक्ष लगवाए और प्रत्येक 2 कोस (लगभग 4 मील) पर कुल 1,700 'सराय' (विश्राम गृह) बनवाए, जहां यात्रियों व व्यापारियों के लिए मुफ्त भोजन, पानी और हिंदू-मुस्लिमों के लिए अलग ठहरने की व्यवस्था थी।
• तेज संचार व्यवस्था के लिए हर सराय पर दो तेज घोड़े तैयार रखकर 'डाक-चौकी' प्रणाली शुरू की।

प्रशासनिक विभाजन:
साम्राज्य को 47 'सरकारों' (जिलों) और सरकारों को 'परगनों' में बांटा गया। 1545 ई. में कालिंजर दुर्ग के घेरे में बारूद के विस्फोट से शेरशाह की मृत्यु हो गई। बिहार के सासाराम में एक सुंदर झील के बीच उसका मकबरा स्थित है।

चरण ३: 🔍 साक्ष्यों से जुड़ाव

अब्बास खां सरवानी की कृति 'तारीख-ए-शेरशाही' में शेरशाह की न्यायप्रियता, सराय व्यवस्था और किसानों के प्रति संवेदनशील नीतियों के प्रामाणिक साक्ष्य दर्ज हैं।

चरण ४: 💡 ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण

शेरशाह मध्यकालीन भारत के सबसे महान राष्ट्र-निर्माता थे। उन्होंने दिखाया कि प्रजा की भलाई, पक्की सड़कें और स्थिर मुद्रा ही एक मजबूत राष्ट्र की असली रीढ़ होती है। अकबर का प्रशासनिक ढांचा शेरशाह के कार्यों का ही विस्तार था।

चरण ५: 🎯 स्व-मूल्यांकन एवं सारांश

याद रखें: शेरशाह ने पट्टा और कबूलियत शुरू की; चांदी का रुपिया और तांबे का दाम चलाया; सड़क-ए-आज़म (जीटी रोड), सराय व डाक-चौकी व्यवस्था बनाई। सासाराम में उनका मकबरा है।

३. अकबर महान: बैरम खां, पानीपत का द्वितीय युद्ध, मनसबदारी प्रथा व टोडरमल का बंदोबस्त

चरण १: 👁️ अवलोकन एवं खोज

मात्र 13 वर्ष की अल्पायु में एक बालक को तख्त मिला। उसने अपने बाहुबल, कूटनीति और सहिष्णुता से हिंदुस्तान के सबसे महान, विशाल और धर्मनिरपेक्ष साम्राज्य की स्थापना कैसे की?

चरण २: 🧠 मुख्य अवधारणा की समझ

अकबर का राज्याभिषेक (1556 ई.):
1556 ई. में दिल्ली के शेर मंडल पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरकर हुमायूं की मृत्यु हुई। पंजाब के कलानौर में 13 वर्ष की उम्र में अकबर का राज्याभिषेक हुआ। उसके विश्वस्त संरक्षक बैरम खां (खान-ए-खानां) ने रीजेंट के रूप में बागडोर संभाली।
• पानीपत का द्वितीय युद्ध (5 नवंबर 1556 ई.): अफगान सेनापति हेमू (हेमचंद्र विक्रमादित्य) ने दिल्ली व आगरा जीतकर स्वयं को स्वतंत्र राजा घोषित किया। पानीपत के मैदान में मुग़ल सेना और हेमू की सेना में घमासान हुआ। हेमू जीत के करीब था, तभी उसकी आंख में एक तीर लगा और वह बेहोश हो गया। हेमू की सेना में भगदड़ मच गई। बैरम खां ने हेमू का वध किया और दिल्ली पर मुग़ल सत्ता पुनः स्थापित हुई। 1560 ई. में अकबर ने स्वयं शासन की पूर्ण कमान संभाल ली।

मनसबदारी प्रणाली (The Mansabdari System - 1571 ई.):
अकबर ने अपने सैन्य और प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक श्रेणीबद्ध व्यवस्था लागू की जिसे 'मनसबदारी प्रणाली' कहते हैं। 'मनसब' का अर्थ पद या श्रेणी है।
• जात और सवार (Zat and Sawar): प्रत्येक मनसबदार को दो अंकों से पदवी मिलती थी:
१. जात (Zat): यह मनसबदार के व्यक्तिगत ओहदे, दरबार में उसके स्थान और उसके वेतन को निर्धारित करता था।
२. सवार (Sawar): यह इंगित करता था कि मनसबदार को सम्राट की सेवा के लिए कितने घुड़सवार सैनिक और घोड़े रखने होंगे (सवार संख्या जात से अधिक नहीं हो सकती थी)।
• मनसबदारों को वेतन नगद या राजस्व जागीर के रूप में दिया जाता था। यह पद वंशानुगत नहीं था; मृत्यु के पश्चात जागीर और संपत्ति जब्त हो जाती थी। घोड़ों को दागने ('दाग') और सैनिकों का हुलिया ('चेहरा') दर्ज करने का कड़ा नियम था।

राजा टोडरमल का दहसाला बंदोबस्त (Dahsala Bandobast - 1580 ई.):
अकबर के वित्त मंत्री राजा टोडरमल ने भू-राजस्व की वैज्ञानिक जब्ती प्रणाली या 'दहसाला बंदोबस्त' शुरू किया:
• भूमि नापने के लिए लोहे की कड़ियों वाले बांस के 'तनाब' का प्रयोग किया गया।
• पिछले 10 वर्षों (1571–1580 ई.) की औसत पैदावार और औसत बाजार मूल्य के आधार पर लगान तय किया गया।
• कर की दर औसत उपज का एक-तिहाई (1/3 भाग या 33.33%) निर्धारित की गई, जो किसानों को नगद देनी होती थी।
• भूमि का 4 श्रेणियों में विभाजन:
१. पोलज (Polaj): सबसे उपजाऊ भूमि, जहां हर वर्ष लगातार खेती होती थी।
२. परौती (Parauti): उर्वरा शक्ति लौटाने के लिए 1-2 वर्ष खाली छोड़ी जाने वाली भूमि।
३. चाचर (Chachar): 3-4 वर्ष तक बिना जोती छोड़ी गई भूमि।
४. बंजर (Banjar): 5 या अधिक वर्षों से बेकार पड़ी अनुपजाऊ भूमि।

सूबा प्रशासन: साम्राज्य को 12 'सूबों' (प्रांतों) में बांटा गया (दक्कन विजय के बाद 15 हो गए)। सूबे का प्रमुख 'सूबेदार' और राजस्व का प्रमुख 'दीवान' होता था।

चरण ३: 🔍 साक्ष्यों से जुड़ाव

अबुल फजल की अमर कृति 'आईन-ए-अकबरी' और 'अकबरनामा' में मनसबदारों की सूची, सूबों के राजस्व आंकड़े और भूमि माप की विधियों का गणितीय विवरण सुरक्षित है।

चरण ४: 💡 ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण

मनसबदारी प्रणाली ने तुर्क, ईरानी, भारतीय मुसलमान और राजपूत सरदारों को एक साझा शाही ढांचे में पिरोकर साम्राज्य को स्थिरता दी। टोडरमल के 10-वर्षीय औसत ने सूखे या बाढ़ के समय किसानों को लूट से बचाया।

चरण ५: 🎯 स्व-मूल्यांकन एवं सारांश

याद रखें: 1556 में पानीपत के द्वितीय युद्ध में बैरम खां ने हेमू को हराया। मनसब में 'जात' व्यक्तिगत वेतन व 'सवार' घुड़सवारों की संख्या थी। टोडरमल ने 1580 में दहसाला बंदोबस्त (1/3 लगान) लागू किया। चार प्रकार की भूमि: पोलज, परौती, चाचर, बंजर।

४. अकबर की धार्मिक नीति, सुलह-ए-कुल, इबादत खाना, दीन-ए-इलाही व नवरत्न

चरण १: 👁️ अवलोकन एवं खोज

जिस दौर में यूरोप में धर्म के नाम पर रक्तपात हो रहा था, उस 16वीं सदी में हिंदुस्तान के बादशाह ने सभी धर्मों के विद्वानों को एक मंच पर बैठाकर सत्य की खोज कैसे की?

चरण २: 🧠 मुख्य अवधारणा की समझ

उदार धार्मिक नीति व राजपूत सहयोग:
अकबर ने समझा कि बहुसंख्यक हिंदू प्रजा के विश्वास और राजपूतों के सहयोग के बिना भारत में स्थायी शासन संभव नहीं है। उसने आमेर (जयपुर) के राजा भारमल की पुत्री हरखा बाई (इतिहास में जोधाबाई) से विवाह किया और उन्हें पूजा की पूरी स्वतंत्रता दी।
• उसने 1563 ई. में तीर्थयात्रा कर और 1564 ई. में गैर-मुस्लिमों पर लगा जजिया कर समाप्त कर दिया।
• राजा मानसिंह, राजा भगवान दास और राजा टोडरमल को साम्राज्य के सर्वोच्च पदों व सेनापति के रूप में नियुक्त किया।

इबादत खाना व महज़रनामा (1575 व 1579 ई.):
1575 ई. में नई राजधानी फतेहपुर सीकरी में उसने 'इबादत खाना' (प्रार्थना गृह) बनवाया। आरंभ में केवल मुस्लिम विद्वानों को बुलाया गया, किंतु उनके आपसी झगड़ों से तंग आकर 1578 ई. में उसने सभी धर्मों के लिए इसके द्वार खोल दिए। हिंदू विद्वान पुरुषोत्तम व देवी, जैन मुनि हरिविजय सूरी, पारसी दस्तूर मेहरजी राणा और गोवा के ईसाई जेसुइट पादरी फादर एक्वाविवा व मोनसेराते ने इसमें भाग लिया।
1579 ई. में उसने 'महज़रनामा' (अभ्रांतता का घोषणा-पत्र) जारी कर धार्मिक विवादों में स्वयं को अंतिम निर्णायक (इमाम-ए-आदिल) घोषित किया।

सुलह-ए-कुल व दीन-ए-इलाही (1582 ई.):
• सुलह-ए-कुल: इसका अर्थ है 'सार्वभौमिक शांति व परम सहिष्णुता'। सभी धर्मों के प्रति सम्मान और जीवों के प्रति अहिंसा इसका मूल तत्व था।
• दीन-ए-इलाही (तौहीद-ए-इलाही): 1582 ई. में अकबर ने सभी धर्मों की अच्छाइयों को मिलाकर एक नैतिक आचार संहिता और सूफी बिरादरी बनाई। इसमें कोई मंदिर, मस्जिद, पुजारी या धर्मग्रंथ नहीं था। रविवार के दिन शिष्य सम्राट के सामने सिर झुकाते और सम्राट 'अल्लाहु अकबर' लिखी पगड़ी देते थे। इसके केवल 18-19 सदस्य थे; हिंदुओं में केवल बीरबल ने इसे स्वीकार किया था।

अकबर के नवरत्न (The Nine Gems):
अकबर के दरबार की शोभा 9 असाधारण विभूतियां थीं:
१. बीरबल (महेश दास): मुख्य सलाहकार व हाजिरजवाब विदूषक।
२. राजा टोडरमल: प्रसिद्ध वित्त मंत्री व भू-सुधारक।
३. राजा मानसिंह: प्रधान सेनापति जिन्होंने बंगाल व काबुल जीता।
४. अबुल फजल: मुख्य दरबारी इतिहासकार, 'अकबरनामा' के रचयिता।
५. फैजी: राजकवि और अबुल फजल के बड़े भाई।
६. मियां तानसेन: हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के सम्राट (ध्रुपद गायक, राग दीपक व मेघ मल्हार)।
७. अब्दुल रहीम खान-ए-खानां: वीर योद्धा और प्रसिद्ध हिंदी दोहाकार (बैरम खां के पुत्र)।
८. फकीर अजीजुद्दीन: सम्राट के आध्यात्मिक परामर्शदाता।
९. मुल्ला दो-प्याजा: कुशाग्र बुद्धि सलाहकार।
1573 ई. में गुजरात विजय की स्मृति में अकबर ने फतेहपुर सीकरी में एशिया का सबसे ऊंचा प्रवेश द्वार 'बुलंद दरवाजा' (176 फीट) बनवाया।

चरण ३: 🔍 साक्ष्यों से जुड़ाव

अब्दुल कादिर बदायूनी की पुस्तक 'मुंतखाब-उत-तवारीख' में कट्टर उलेमा के दृष्टिकोण से अकबर की सहिष्णु नीतियों की कड़ी आलोचना मिलती है, जो दर्शाती है कि अकबर ने रूढ़िवादिता को चुनौती दी थी।

चरण ४: 💡 ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण

सुलह-ए-कुल का सिद्धांत मध्यकालीन धार्मिक कट्टरता के बीच एक युगांतरकारी विचार था। अकबर की समावेशी नीति ने ही मुग़ल साम्राज्य को एक अखिल भारतीय साम्राज्य का स्वरूप प्रदान किया।

चरण ५: 🎯 स्व-मूल्यांकन एवं सारांश

याद रखें: अकबर ने 1563 में तीर्थकर व 1564 में जजिया समाप्त किया। फतेहपुर सीकरी में इबादत खाना (1575), महज़र (1579), सुलह-ए-कुल व दीन-ए-इलाही (1582) चलाए। बीरबल नवरत्नों में थे। गुजरात विजय पर बुलंद दरवाजा बना।

५. उत्तरवर्ती मुग़ल: जहांगीर, शाहजहां, उत्तराधिकार युद्ध एवं औरंगजेब का 'दक्कन का नासूर'

चरण १: 👁️ अवलोकन एवं खोज

जिस साम्राज्य के पास दुनिया का सबसे बड़ा खजाना था, जिसने ताजमहल और मयूर सिंहासन बनाया, वह औरंगजेब के समय भयानक संकट में क्यों फंस गया? 'दक्कन का नासूर' साम्राज्य को कैसे लील गया?

चरण २: 🧠 मुख्य अवधारणा की समझ

नूरुद्दीन मुहम्मद जहांगीर (1605–1627 ई.):
अकबर का पुत्र सलीम 'जहांगीर' (विश्व विजेता) के नाम से गद्दी पर बैठा।
• न्याय की जंजीर (Zanjir-i-Adl): उसने आगरा किले में 60 घंटियों वाली शुद्ध सोने की जंजीर लगवाई ताकि कोई भी पीड़ित सीधे सम्राट से फरियाद कर सके।
• नूरजहां जुंटा: 1611 ई. में मेहरुननिसा से विवाह कर 'नूरजहां' उपाधि दी। नूरजहां ने सिक्कों पर अपना नाम अंकित कराया और लगभग 16 वर्ष तक सत्ता का वास्तविक संचालन किया।
• गुरु अर्जुन देव का शहीदी दिवस (1606 ई.): विद्रोही शहजादे खुसरो की सहायता के आरोप में सिखों के 5वें गुरु अर्जुन देव को मृत्युदंड दिया, जिससे मुग़ल-सिख संबंधों में कटुता आई।
• अंग्रेजों का आगमन: ब्रिटेन के सम्राट जेम्स प्रथम के राजदूत कैप्टन विलियम हॉकिन्स (1608) और सर थॉमस रो (1615) दरबार में आए और सूरत में व्यापारिक कोठी खोलने का शाही फरमान प्राप्त किया।

शाहजहां (1628–1658 ई.) — स्थापत्य का स्वर्ण युग:
शाहजहां का काल मुग़ल वास्तुकला का स्वर्ण युग कहलाता है:
१. आगरा में अपनी बेगम मुमताज महल की याद में सफेद संगमरमर का विश्वप्रसिद्ध ताजमहल बनवाया (मुख्य वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी)।
२. दिल्ली में लाल किला, जामा मस्जिद और प्रसिद्ध 'मयूर सिंहासन' (तख्त-ए-ताऊस) बनवाया जिसमें विश्वप्रसिद्ध 'कोहिनूर' हीरा जड़ा था।
• उत्तराधिकार का युद्ध (1657–1658 ई.): शाहजहां के बीमार पड़ने पर उसके चार पुत्रों—दारा शिकोह, शाह शुजा, औरंगजेब और मुराद में खूनी संघर्ष हुआ। धर्मत और सामूगढ़ के युद्धों में दारा को परास्त कर औरंगजेब ने शाहजहां को आगरा किले में कैद कर लिया।

औरंगजेब आलमगीर (1658–1707 ई.) — विस्तार एवं पतन:
औरंगजेब अत्यंत कट्टर सुन्नी शासक था (उसे 'जिंदा पीर' कहा जाता था)। उसने अकबर की नीतियों को उलट दिया:
• दरबार में संगीत, ज्योतिष और झरोखा दर्शन बंद किए। 1679 ई. में उसने पुनः जजिया कर और तीर्थयात्रा कर लगा दिया। 1675 ई. में सिखों के 9वें गुरु तेग बहादुर का दिल्ली में वध कराया, जिसके प्रतिशोध में गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की। राजपूतों से शत्रुता मोल ली।

मराठा प्रतिरोध एवं छत्रपति शिवाजी महाराज:
शिवाजी महाराज ने छापामार युद्धनीति (गुरिल्ला युद्ध) से मुग़लों को भारी क्षति पहुंचाई। 1665 ई. में राजा जयसिंह के साथ शिवाजी की पुरंदर की संधि हुई। आगरा कैद से मिठाई की टोकरी में बच निकलने के बाद शिवाजी ने 1674 ई. में रायगढ़ में स्वयं को स्वतंत्र 'छत्रपति' घोषित किया।

दक्कन का नासूर (The Deccan Ulcer):
औरंगजेब ने बीजापुर (1686) और गोलकुंडा (1687) को जीत लिया, परंतु मराठों के गुरिल्ला हमलों को दबाने के लिए वह अपने जीवन के अंतिम 26 वर्ष (1681–1707 ई.) दक्कन के तंबुओं में ही भटकता रहा।
• इतिहासकार वी. ए. स्मिथ के अनुसार: "जिस प्रकार स्पेन के नासूर ने नेपोलियन को नष्ट किया, उसी प्रकार दक्कन के नासूर ने औरंगजेब को नष्ट कर दिया।"
• इस अंतहीन युद्ध ने शाही खजाना खाली कर दिया, सेना थक गई और उत्तर भारत में कानून व्यवस्था टूट गई। 1707 ई. में अहमदनगर में औरंगजेब की मृत्यु के साथ मुग़ल साम्राज्य के पतन की उल्टी गिनती शुरू हो गई।

चरण ३: 🔍 साक्ष्यों से जुड़ाव

औरंगजेब के अंतिम पत्रों के संग्रह 'रुक़ात-ए-आलमगीरी' में उसकी अंतरात्मा की पीड़ा, पुत्रों पर अविश्वास और दक्कन की व्यर्थ जंग में सब कुछ खो देने का पछतावा साफ झलकता है।

चरण ४: 💡 ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण

मुग़ल साम्राज्य का पतन केवल सैन्य कारणों से नहीं हुआ। अत्यधिक क्षेत्रीय विस्तार, मराठों का राष्ट्रवादी उभार, जागीरदारी संकट और औरंगजेब की असहिष्णु नीतियों ने साम्राज्य की बुनियाद को खोखला कर दिया।

चरण ५: 🎯 स्व-मूल्यांकन एवं सारांश

याद रखें: जहांगीर ने न्याय की जंजीर लगवाई व सर थॉमस रो आया। शाहजहां का काल स्थापत्य का स्वर्ण युग था (ताजमहल, मयूर सिंहासन)। औरंगजेब ने 1679 में जजिया पुनः लगाया। 26 वर्ष के 'दक्कन के नासूर' के बाद 1707 में उसकी मृत्यु हुई।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

शेरशाह सूरी की द्विधात्विक मुद्रा प्रणाली पैमाना
1 चांदी का रुपिया (178 ग्रेन) = 40 तांबे के दाम (380 ग्रेन)
मानक सिक्का: आधुनिक भारतीय राष्ट्रीय मुद्रा 'रुपया' का प्रत्यक्ष आधार
शेरशाह द्वारा शुरू किया गया शुद्ध चांदी का रुपिया आधुनिक भारत की राष्ट्रीय मुद्रा 'रुपया' का आधार बना।
टोडरमल का दहसाला भू-राजस्व पैमाना (1580 ई.)
33.3% (⅓ भाग) पिछले 10 वर्षों की औसत उपज एवं मूल्य का कर
1570-1580 ई. के आंकड़ों पर आधारित तथा नकद (माल) में देय
राजा टोडरमल की इस वैज्ञानिक व्यवस्था ने किसान और राज्य दोनों को वार्षिक उतार-चढ़ाव से सुरक्षा दी।
अकबर की मनसबदारी व्यवस्था (जात एवं सवार)
जात (व्यक्तिगत पद एवं वेतन श्रेणी) + सवार (रखे जाने वाले घुड़सवारों की संख्या)
श्रेणी: 10 से 10,000 तक | गैर-वंशानुगत सीधा शाही पद
मनसबदारों के पद पूर्णतः व्यक्तिगत थे; किसी भी अधिकारी का पद वंशानुगत नहीं था।
जब्ती प्रणाली में भूमि का चार स्तरीय वर्गीकरण
पोलाज (हर साल खेती योग्य) परौती (1-2 साल खाली) चाचर (3-4 साल खाली) बंजर (5 या अधिक वर्ष खाली)
भूमि की वास्तविक उर्वरता व चक्र के अनुसार वैज्ञानिक कर व्यवस्था
उर्वरता और खेती की निरंतरता के आधार पर कर की दरें तय की जाती थीं।
अकबर का वैचारिक सिद्धांत: सुलह-ए-कुल
सुलह-ए-कुल (सार्वभौमिक शांति एवं पूर्ण धार्मिक सहिष्णुता)
अबुल फजल के सहयोग से प्रतिपादित: सभी धर्मों व संप्रदायों के लिए समान न्याय
सभी धर्मों और संप्रदायों के प्रति समान सम्मान और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करने की नीति।
शेरशाह के कानूनी भू-दस्तावेज: पट्टा एवं कबूलियत
पट्टा (राज्य द्वारा प्रदत्त अधिकार व कर पत्र) ⇄ कबूलियत (किसान द्वारा कर स्वीकृति पत्र)
शेरशाह की द्विपक्षीय कानूनी व्यवस्था जिसने किसानों को बिचौलियों के शोषण से बचाया
किसानों के भूमि अधिकारों की रक्षा और कर की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए यह व्यवस्था बनाई गई।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
शेरशाह सूरी के भू-राजस्व सुधारों में 'पट्टा' और 'कबूलियत' व्यवस्था का क्या महत्व था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
शेरशाह के भूमि सुधार व पट्टा-कबूलियत:
१. पट्टा (Patta): सरकार की ओर से किसान को दी जाने वाली सनद, जिसमें किसान की जमीन का सटीक क्षेत्रफल, जमीन का प्रकार और उस पर देय लगान की निश्चित दर लिखी होती थी। इससे भ्रष्ट अधिकारी अतिरिक्त कर नहीं वसूल सकते थे।
२. कबूलियत (Qabuliyat): पट्टा मिलने पर किसान सरकार को एक लिखित इकरारनामा देता था कि वह निर्धारित दर पर लगान देने के लिए सहमत है।
महत्व: इस दोहरे अनुबंध से बिचौलियों का अत्याचार रुका, किसानों को अपनी जमीन पर कानूनी सुरक्षा मिली और राज्य का राजस्व निश्चित हुआ।
उदाहरण 2
अकबर की मनसबदारी व्यवस्था में 'जात' और 'सवार' के बीच क्या बुनियादी अंतर था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
जात व सवार का वर्गीकरण:
१. जात (Zat): यह मनसबदार का व्यक्तिगत पद था। दरबार में उसका स्थान कहां होगा और उसे कितना वेतन या जागीर मिलेगी, यह जात संख्या तय करती थी।
२. सवार (Sawar): यह इंगित करता था कि मनसबदार को सेना के लिए कितने प्रशिक्षित घुड़सवार सैनिक और घोड़े रखने होंगे।
नियम: सवार की संख्या कभी भी जात की संख्या से अधिक नहीं हो सकती थी। उदाहरण के लिए, 5000 जात / 3000 सवार वाले मनसबदार का व्यक्तिगत वेतन 5000 श्रेणी का होता था, परंतु उसे 3000 घुड़सवार रखने पड़ते थे।
उदाहरण 3
औरंगजेब की दक्कन नीति को 'दक्कन का नासूर' (Deccan Ulcer) क्यों कहा जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
दक्कन के नासूर का ऐतिहासिक प्रभाव:
१. समय व धन की बर्बादी: औरंगजेब 1681 से 1707 तक 26 वर्षों तक दिल्ली छोड़कर दक्कन में ही रहा। बीजापुर और गोलकुंडा जीतने के बाद भी वह मराठों के गुरिल्ला युद्ध को नहीं दबा सका।
२. राजकोष का दिवाला: लाखों सैनिकों के भरण-पोषण और युद्ध सामग्री में मुग़लों का विशाल संचित खजाना पूरी तरह समाप्त हो गया।
३. प्रशासनिक पतन: सम्राट की लंबी अनुपस्थिति के कारण उत्तर भारत में कानून व्यवस्था टूट गई और प्रांतीय सूबेदार स्वतंत्र होने लगे। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के साथ मुग़ल साम्राज्य का पतन निश्चित हो गया।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सोचना कि दीन-ए-इलाही एक नया संगठित धर्म था जिसे लाखों लोगों ने अपनाया था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

दीन-ए-इलाही कोई धर्म नहीं था; इसमें न कोई मंदिर था, न कोई ग्रंथ या पुरोहित। यह सभी धर्मों के तत्वों का एक सूफी आध्यात्मिक भाईचारा और नैतिक आचार संहिता थी। अकबर ने कभी किसी को इसके लिए बाध्य नहीं किया; बीरबल सहित केवल 18-19 दरबारी इसके सदस्य थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मानना कि भारतीय रुपये का आविष्कार अंग्रेजों ने या अकबर ने किया था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

शुद्ध चांदी का सिक्का 'रुपिया' (178 ग्रेन) सबसे पहले सूर शासक शेरशाह सूरी (1540–1545 ई.) ने चलाया था। अंग्रेजों और स्वतंत्र भारत ने उसी सिक्के को आगे बढ़ाया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

मानना कि मनसबदारी पद पिता के बाद पुत्र को स्वतः मिल जाता था।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मनसबदारी कभी भी वंशानुगत नहीं थी। मनसबदार की मृत्यु के बाद पद समाप्त हो जाता था और उसकी जागीर व संपत्ति राज्य द्वारा जब्त (जब्ती प्रथा) कर ली जाती थी। पुत्र को अपनी योग्यता से नया मनसब पाना होता था।

मुग़ल साम्राज्य: शासक क्रम, शेरशाह के सुधार, मनसबदारी व दक्कन का नासूर (Visual Model)

THE MUGHAL EMPIRE (1526 – 1707 CE) WBBSE CLASS 7 HISTORY • BABUR • SHER SHAH • AKBAR • MANSABDARI • DAHSALA • SULH-I-KUL • AURANGZEB 1. Mughal Imperial Dynastic Succession Babur (1526–30) & Humayun (1530–40, 55–56): Panipat (1526), Khanwa (1527) • Baburnama Sher Shah Suri Interregnum (1540–1545 CE): Grand Trunk Road • Rupiya • Patta/Qabuliyat Akbar the Great (1556–1605 CE): 2nd Panipat • Haldighati • Mansabdari • Sulh-i-Kul Jahangir (1605–27) & Shah Jahan (1628–58): Golden Age of Architecture (Taj Mahal) Aurangzeb Alamgir (1658–1707 CE): Reimposed Jizya (1679) • Deccan Campaign 2. Sher Shah Suri's Administrative Renaissance GRAND TRUNK ROAD (সড়ক-ই-আজম / Sadak-i-Azam) • Built from Sonargaon (Bengal) to Peshawar (over 2,500 km). • Lined with shade trees, wells, and 1,700 Sarais (inns) for travelers & trade. Standardized Coinage • Silver Rupiya: 178 grains (Ancestor of modern Rupee) • Copper Dam: Exchange ratio: 1 Rupiya = 40 Dams Abolished corrupted debased coins Patta & Qabuliyat (পাট্টা ও কবুলিয়ত) • Patta: Royal title deed specifying peasant's land & tax dues • Qabuliyat: Signed bond where peasant agreed to pay revenue Horse-courier postal system (Dak-Chauki) 3. Akbar's Mansabdari & Todar Mal's Dahsala Mansabdari Framework • Mansab = Official rank / status • Dual Rank Hierarchy: - Zat (জাত): Personal rank & salary - Sawar (সওয়ার): Number of troopers • Two Modes of Salary: - Naqdi: Direct cash from treasury - Jagir: Revenue land assignment Merged Rajputs into imperial governance Todar Mal's Dahsala (1580) • 10-Year Average: Produce & price averaged across 1570–1580 CE • State Demand: 1/3rd in cash • Four Land Classifications: 1. Polaj: Cultivated every year 2. Parauti: Fallowed 1–2 years 3. Chachar: Fallowed 3–4 years 4. Banjar: Uncultivated for 5+ years Land measured with bamboo-ring rods (Tanab) 4. Sulh-i-Kul, Navaratna & Imperial Climax Akbar's Religious Syncretism: Sulh-i-Kul & Din-i-Ilahi • Abolished Pilgrim Tax (1563) & Jizya (1564); constructed Ibadat Khana in 1575. • Sulh-i-Kul (সুলহ্-ই-কুল): Universal Peace with All faiths. • Din-i-Ilahi (1582): Ethical spiritual code of divine monotheism (Birbal joined). The Imperial Court & Later Climax • Navaratna (নবরত্ন): Abul Fazl (Akbarnama/Ain-i-Akbari), Birbal, Tansen, Todar Mal, Man Singh. • Shah Jahan: Golden Age of Architecture (Taj Mahal, Red Fort, Peacock Throne). • Aurangzeb: Reimposition of Jizya (1679); 25-year draining Deccan campaign. Deccan Ulcer ruined imperial finances, precipitating the 18th-century crisis.

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
1526 में पानीपत और 1527 में खानवा के युद्ध में तोपों और तुलुगमा के बल पर बाबर ने मुग़ल साम्राज्य स्थापित किया।
मुख्य बिंदु 2
हुमायूं चौसा (1539) और कन्नौज (1540) में शेरशाह से पराजित होकर 15 वर्ष तक फारस में निर्वासित रहा।
मुख्य बिंदु 3
शेरशाह सूरी ने पट्टा-कबूलियत, चांदी का रुपिया (178 ग्रेन), सड़क-ए-आज़म (जीटी रोड) व डाक-चौकी चलाई।
मुख्य बिंदु 4
1556 में पानीपत के द्वितीय युद्ध में बैरम खां ने हेमू को हराकर अकबर के लिए दिल्ली का तख्त सुरक्षित किया।
मुख्य बिंदु 5
अकबर ने मनसबदारी (जात व सवार) और राजा टोडरमल के जरिए 1580 में दहसाला बंदोबस्त (1/3 लगान) लागू किया।
मुख्य बिंदु 6
अकबर ने तीर्थकर व जजिया हटाया, इबादत खाना व महज़र चलाया तथा सार्वभौमिक शांति 'सुलह-ए-कुल' का संदेश दिया।
मुख्य बिंदु 7
जहांगीर के काल में न्याय की जंजीर लगी व सर थॉमस रो आया; शाहजहां का काल वास्तुकला का स्वर्ण युग था।
मुख्य बिंदु 8
औरंगजेब की जजिया की वापसी तथा 26 वर्षों के 'दक्कन के नासूर' ने मुग़ल साम्राज्य का पतन तय कर दिया।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
शेरशाह सूरी द्वारा किसानों के लिए शुरू किए गए दो प्रमुख दस्तावेजों के नाम और उनके कार्य क्या थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: वे दस्तावेज थे 'पट्टा' (सरकार द्वारा दिया गया भूमि अधिकार व लगान का पत्र) और 'कबूलियत' (किसान द्वारा लगान चुकाने की लिखित सहमति)।
एक दस्तावेज सरकार देती थी और दूसरा किसान देता था।
2
अकबर की मनसबदारी प्रणाली में 'जात' और 'सवार' शब्दों का क्या अर्थ था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 'जात' से मनसबदार का व्यक्तिगत पद और वेतन तय होता था; और 'सवार' से यह तय होता था कि उसे कितने घुड़सवार सैनिक रखने होंगे।
एक व्यक्तिगत ओहदा था और दूसरा घुड़सवारों की संख्या थी।
3
अकबर के वित्त मंत्री राजा टोडरमल ने 1580 ई. में कौन सी भू-राजस्व प्रणाली लागू की और लगान की दर क्या थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: उन्होंने 'दहसाला बंदोबस्त' (जब्ती व्यवस्था) लागू की और लगान की दर औसत उपज का एक-तिहाई (1/3 भाग या 33.33%) थी।
यह पिछले 10 वर्षों के औसत पर आधारित थी।
4
अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता हेतु किस सार्वभौमिक शांति के सिद्धांत का प्रचार किया और फतेहपुर सीकरी में कौन सा प्रार्थना गृह बनवाया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: उसने 'सुलह-ए-कुल' (सार्वभौमिक शांति) का सिद्धांत दिया और 1575 ई. में धर्म चर्चा हेतु 'इबादत खाना' बनवाया।
इसका अर्थ सभी के लिए शांति है और भवन का नाम इबादत खाना था।
5
औरंगजेब जीवन के अंतिम 26 वर्ष किस क्षेत्र में युद्ध लड़ता रहा और इतिहासकारों ने इसे क्या नाम दिया है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: औरंगजेब जीवन के अंतिम 26 वर्ष दक्कन (दक्षिण भारत) में लड़ता रहा, जिसे इतिहासकारों ने 'दक्कन का नासूर' (Deccan Ulcer) कहा है।
इसकी तुलना नेपोलियन के स्पेनिश नासूर से की जाती है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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