प्राचीन काल में विशाल साम्राज्य में दूरदराज के क्षेत्रों से कर वसूलने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए राजाओं ने कौन-सी नई व्यवस्था बनाई थी?
सामंत व्यवस्था का स्वरूप:
7वीं से 12वीं शताब्दी के मध्य भारत में भू-स्वामित्व पर आधारित एक नई व्यवस्था फैली जिसे सामंत व्यवस्था (Feudal System) कहते हैं। राजा नकद वेतन के अभाव में अथवा धार्मिक पुण्य हेतु भूमिदान करते थे:
• ब्रह्मदेय (Brahmadeya): ब्राह्मणों को धार्मिक एवं शैक्षणिक कार्यों हेतु दिया गया पूर्णतः करमुक्त (टैक्स-फ्री) कृषि भूखंड।
• अग्रहार (Agrahara): मंदिरों, मठों अथवा विहारों के संचालन हेतु प्रदत्त करमुक्त गाँव।
सामंती पदानुक्रम (The Feudal Pyramid):
१. सर्वोच्च शिखर पर सम्राट या राजा होता था।
२. राजा के अधीन बड़े प्रांतों के शासक महासामंत होते थे।
३. उनके नीचे सामंत और सामंतप्रमुख होते थे।
४. सबसे नीचे भोगिक, ग्रामिक और सामान्य किसान होते थे जो खेती करते और लगान चुकाते थे।
सामंतों के दायित्व: युद्ध के समय राजा को सेना उपलब्ध कराना, वार्षिक भेंट व कर भेजना तथा राजदरबार में उपस्थित होकर निष्ठा प्रदर्शित करना।
पाल और सेन युग के अनेक ताम्रपत्रों में भूमि की सीमाओं तथा शाही अधिकारियों के उस जमीन में प्रवेश निषेध (सर्वकरपरिहार्य) के कठोर नियम अंकित हैं।
यूरोपीय सामंतवाद से अंतर:
यूरोप में सामंतवाद अत्यंत कठोर था—राजा → लॉर्ड (Lord) → नाइट (Knight) → भूदास या सर्फ (Serf)। यूरोप का सर्फ स्वामी की जमीन से बंधा होता था और उसकी अनुमति के बिना कहीं जा नहीं सकता था। इसके विपरीत, भारत में किसान भूदास नहीं थे; वे उपज का एक हिस्सा लगान के रूप में देते थे, परंतु जमीन पर उनका पारंपरिक अधिकार बना रहता था।
याद रखें: ब्रह्मदेय ब्राह्मणों को दी गई करमुक्त भूमि थी। सामंत व्यवस्था में राजा, सामंत और किसान का पदानुक्रम बना। भारतीय किसान यूरोप के सर्फ की तरह दास नहीं थे।