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WBB • कक्षा 7 • History & Environment (অতীত ও ঐতিহ্য) • अध्याय 3
अनुमानित समय: 50 मिनट
प्रगति: अध्ययनरत

भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति की कुछ धाराएँ: 7वीं से 12वीं शताब्दी

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 7 "अतीत एवं विरासत" (History & Environment) पाठ्यक्रम का तृतीय अध्याय "भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति की कुछ धाराएँ: 7वीं से 12वीं शताब्दी"। इस अध्याय में भारतीय सामंतवाद (सामंती पदानुक्रम, करमुक्त ब्रह्मदेय एवं अग्रहार भूमिदान) तथा यूरोपीय सामंतवाद से तुलना, पाल एवं सेन काल में बंगाल की कृषि अर्थव्यवस्था, मुख्य फसलें एवं कराधान प्रणाली (भाग, भोग, कर, हिरण्य), चोल काल में दक्षिण भारत का स्थानीय स्वशासन (उर, सभा, नगरम, नाडु एवं मंडलम) तथा उत्तरमेरुर अभिलेख, प्राचीन बंगाली समाज का खान-पान एवं रहन-सहन ('प्राकृत-पैंगल' काव्य का विवरण), बृहद्धर्म पुराण के अनुसार वर्ण-व्यवस्था एवं उपजातियों का उदय, बांग्ला भाषा का विकास एवं 1907 में महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री द्वारा नेपाल के राजदरबार से चर्यापद की खोज, संध्‍या भाषा एवं बौद्ध सिद्धाचार्य, लोक संस्कृति में डाक एवं खना के वचन, लक्ष्मणसेन की सभा में जयदेव का गीतगोविंदम्, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध महाविहार (नालंदा, विक्रमशिला, सोमपुर, जगद्दल), आयुर्वेदज्ञ चक्रपाणि दत्त, तिब्बत में बौद्ध धर्म सुधारक अतीश दीपांकर श्रीज्ञान तथा वरेंद्र के दो महान मूर्तिकार धीमान एवं वीतपाल की प्राच्य शिल्परीति का विस्तृत व प्रामाणिक अध्ययन शामिल है।

प्राचीन राजा बिना कोई कर लिए हजारों उपजाऊ गाँव ब्राह्मणों और मंदिरों को हमेशा के लिए मुफ्त में दान क्यों दे देते थे?

सोचिए एक ऐसी व्यवस्था जहाँ राजा अपने अधिकारियों और विद्वानों को वेतन के बदले पूरा का पूरा गाँव दान में दे देता था! उस जमीन पर राजा को भी कर लेने का कोई अधिकार नहीं होता था। इसी निष्कर भूमिदान से एक शक्तिशाली 'सामंत वर्ग' का उदय हुआ। और इसी युग में बंगाल के महान आचार्य अतीश दीपांकर बर्फ से ढके हिमालय पर्वत को पैदल पार कर सुदूर तिब्बत पहुँचे और वहाँ बुद्ध के समान पूजनीय बन गए! साथ ही नेपाल के राजपुस्तकालय की धूल में छिपी मिली हमारी बांग्ला भाषा की पहली जन्मकुंडली—'चर्यापद'!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

यह अध्याय विद्यार्थियों को यह समझाता है कि इतिहास केवल राजाओं के युद्धों का नाम नहीं है, बल्कि आम जनता के दैनिक जीवन, उनकी भोजन संस्कृति, भाषा के उद्भव और लोक साहित्य का दर्पण है। इसी कालखंड में हमारी बांग्ला भाषा की प्रथम कृति चर्यापद का जन्म हुआ और बंगाल के विद्वानों ने नालंदा व विक्रमशिला से लेकर तिब्बत तक ज्ञान का प्रकाश फैलाया।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • इतिहास के प्राथमिक साहित्यिक स्रोतों की समझ।
  • पाल और सेन काल की सामान्य राजनीतिक रूपरेखा।
  • मध्यकालीन भारतीय कृषि एवं समाज की आधारभूत जानकारी।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • भारतीय सामंतवाद की संरचना और यूरोपीय सामंतवाद से उसके अंतर को स्पष्ट करना।
  • पाल-सेन युग की कर प्रणाली (भाग, भोग, कर, हिरण्य) तथा चोल ग्रामीण परिषदों (उर, सभा, नगरम) की कार्यप्रणाली को समझना।
  • प्राकृत-पैंगल व पुराणों के आधार पर तत्कालीन समाज के खान-पान, वेशभूषा और वर्ण-व्यवस्था का वर्णन करना।
  • चर्यापद की खोज, संध्‍या भाषा तथा खना के वचनों के लोक-वैज्ञानिक महत्व का विश्लेषण करना।
  • बौद्ध महाविहारों, अतीश दीपांकर के तिब्बत अभियान तथा धीमान व वीतपाल की प्राच्य शिल्परीति की उपलब्धियों का मूल्यांकन करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 १. भारतीय सामंत व्यवस्था की संरचना...
2 २. कृषि अर्थव्यवस्था, कर प्रणाली एव...
3 ३. प्राचीन बंगाल का सामाजिक जीवन, ख...
4 ४. बांग्ला भाषा की उत्पत्ति, चर्याप...
5 ५. महान विद्वान (अतीश दीपांकर, चक्र...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

१. भारतीय सामंत व्यवस्था की संरचना एवं यूरोपीय सामंतवाद से तुलना

चरण १: 👁️ अवलोकन एवं खोज

प्राचीन काल में विशाल साम्राज्य में दूरदराज के क्षेत्रों से कर वसूलने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए राजाओं ने कौन-सी नई व्यवस्था बनाई थी?

चरण २: 🧠 मुख्य अवधारणा की समझ

सामंत व्यवस्था का स्वरूप:
7वीं से 12वीं शताब्दी के मध्य भारत में भू-स्वामित्व पर आधारित एक नई व्यवस्था फैली जिसे सामंत व्यवस्था (Feudal System) कहते हैं। राजा नकद वेतन के अभाव में अथवा धार्मिक पुण्य हेतु भूमिदान करते थे:
• ब्रह्मदेय (Brahmadeya): ब्राह्मणों को धार्मिक एवं शैक्षणिक कार्यों हेतु दिया गया पूर्णतः करमुक्त (टैक्स-फ्री) कृषि भूखंड।
• अग्रहार (Agrahara): मंदिरों, मठों अथवा विहारों के संचालन हेतु प्रदत्त करमुक्त गाँव।

सामंती पदानुक्रम (The Feudal Pyramid):
१. सर्वोच्च शिखर पर सम्राट या राजा होता था।
२. राजा के अधीन बड़े प्रांतों के शासक महासामंत होते थे।
३. उनके नीचे सामंत और सामंतप्रमुख होते थे।
४. सबसे नीचे भोगिक, ग्रामिक और सामान्य किसान होते थे जो खेती करते और लगान चुकाते थे।
सामंतों के दायित्व: युद्ध के समय राजा को सेना उपलब्ध कराना, वार्षिक भेंट व कर भेजना तथा राजदरबार में उपस्थित होकर निष्ठा प्रदर्शित करना।

चरण ३: 🔍 साक्ष्यों से जुड़ाव

पाल और सेन युग के अनेक ताम्रपत्रों में भूमि की सीमाओं तथा शाही अधिकारियों के उस जमीन में प्रवेश निषेध (सर्वकरपरिहार्य) के कठोर नियम अंकित हैं।

चरण ४: 💡 ऐतिहासिक विश्लेषण

यूरोपीय सामंतवाद से अंतर:
यूरोप में सामंतवाद अत्यंत कठोर था—राजा → लॉर्ड (Lord) → नाइट (Knight) → भूदास या सर्फ (Serf)। यूरोप का सर्फ स्वामी की जमीन से बंधा होता था और उसकी अनुमति के बिना कहीं जा नहीं सकता था। इसके विपरीत, भारत में किसान भूदास नहीं थे; वे उपज का एक हिस्सा लगान के रूप में देते थे, परंतु जमीन पर उनका पारंपरिक अधिकार बना रहता था।

चरण ५: 🎯 मुख्य निष्कर्ष

याद रखें: ब्रह्मदेय ब्राह्मणों को दी गई करमुक्त भूमि थी। सामंत व्यवस्था में राजा, सामंत और किसान का पदानुक्रम बना। भारतीय किसान यूरोप के सर्फ की तरह दास नहीं थे।

२. कृषि अर्थव्यवस्था, कर प्रणाली एवं दक्षिण भारत का स्थानीय स्वशासन (उर, सभा और नगरम)

चरण १: 👁️ अवलोकन एवं खोज

मध्यकालीन बंगाल में किसान राजा को कौन-कौन से कर देते थे? और दक्षिण भारत के गाँव बिना केंद्रीय हस्तक्षेप के अपना शासन कैसे चलाते थे?

चरण २: 🧠 मुख्य अवधारणा की समझ

पाल एवं सेन काल की कर प्रणाली:
बंगाल की अर्थव्यवस्था पूर्णतः कृषि पर आधारित थी। गंगा और पद्मा के उपजाऊ मैदानों में धान, गन्ना, सरसों, पान, सुपारी और पटसन की प्रचुर उपज होती थी। राजा सुरक्षा के बदले कई प्रकार के कर लेता था:
१. भाग (Bhaga): कुल कृषि उपज का छठा हिस्सा (1/6 भाग), जो राजा का मुख्य पारंपरिक राजस्व था।
२. भोग (Bhoga): राजा को दैनिक रूप से भेंट की जाने वाली वस्तुएँ—फल, फूल, शाक-सब्जी और जलावन की लकड़ी।
३. कर (Kara): वार्षिक निश्चित भू-राजस्व अथवा संपत्ति कर।
४. हिरण्य (Hiranya): अनाज के बदले सीधे सोने या नकद मुद्रा में दिया जाने वाला कर।
५. उपरिकर: अतिरिक्त भूमि उपकर।

दक्षिण भारत में चोल ग्रामीण स्वशासन:
चोल साम्राज्य में प्रांत को मंडलम, मंडलम को वलनाडु और वलनाडु को नाडु (जिला) में बाँटा गया था। गाँवों का प्रशासन अत्यंत स्वायत्त था:
• उर (Ur): सामान्य करदाता किसानों एवं ग्रामीणों की आम सभा।
• सभा (Sabha): केवल ब्राह्मणों के ब्रह्मदेय गाँवों की विशिष्ट सभा। यह विभिन्न समितियों (वारियम) के माध्यम से सिंचाई, न्याय और कर प्रबंधन करती थी। लॉटरी (कुडवोलाई पद्धति) द्वारा योग्य व ईमानदार सदस्यों का चयन होता था।
• नगरम (Nagaram): व्यापारियों, शिल्पियों और हाट-बाजार के प्रबंधकों की व्यापारिक संस्था।

चरण ३: 🔍 साक्ष्यों से जुड़ाव

तमिलनाडु के उत्तरमेरुर अभिलेख (Uttaramerur Inscription) में चोल राजा परांतक प्रथम के समय सभा की चुनाव प्रक्रिया, योग्यता (आयु 35-70 वर्ष, वेदों का ज्ञान, भूमि का स्वामित्व) का विस्तृत वर्णन मिलता है।

चरण ४: 💡 ऐतिहासिक विश्लेषण

उत्तर भारत की केंद्रीय नौकरशाही की तुलना में चोलों की ग्राम व्यवस्था दर्शाती है कि मध्यकालीन भारत में जमीनी स्तर पर प्रत्यक्ष लोकतंत्र की जड़ें कितनी सुदृढ़ थीं।

चरण ५: 🎯 मुख्य निष्कर्ष

याद रखें: कृषि उपज का 1/6 भाग 'भाग' कर कहलाता था। चोल काल में किसानों की सभा 'उर', ब्राह्मणों की सभा 'सभा' और व्यापारियों की संस्था 'नगरम' कहलाती थी। उत्तरमेरुर अभिलेख इसका मुख्य प्रमाण है।

३. प्राचीन बंगाल का सामाजिक जीवन, खान-पान, वर्ण-व्यवस्था एवं समाज

चरण १: 👁️ अवलोकन एवं खोज

एक हजार वर्ष पहले बंगाली भोजन की थाली में क्या परोसा जाता था? क्या उनका खान-पान और पहनावा आज जैसा ही था?

चरण २: 🧠 मुख्य अवधारणा की समझ

खान-पान की पारंपरिक संस्कृति:
प्राचीन काल से ही बंगालियों का मुख्य भोजन भात, साग और मछली रहा है। 13वीं सदी के प्राकृत काव्य 'प्राकृत-पैंगल' (Prakrita-Paingala) में एक साधारण बंगाली गृहस्थ के भोजन का सुंदर चित्रण है:
"ओग्गर भत्ता रंभअ पत्ता, गाइक घित्ता दुग्ध सजुत्ता।
माइनी मच्छा नालिच गच्छा, दिज्जइ कंता खा पुन्नवंता।।"

(अर्थ: केले के पत्ते पर परोसा गया गरम सुगंधित भात, गाय का शुद्ध घी, गाढ़ा दूध, मौराला मछली का झोल और नालते का साग—पुण्यवान पति इसे बड़े चाव से खाता है)।
हिल्सा (इलीश), रोहू, केकड़ा, खीर, पायस और गुड़ के पकवान बहुत लोकप्रिय थे। भोजन के उपरांत पान-सुपारी खाने का चलन सर्वत्र था।

वेशभूषा एवं आभूषण:
पुरुष धोती और उत्तरीय चादर पहनते थे; स्त्रियाँ साड़ी पहनती थीं। धनी लोग सोने के कुंडल, अंगूठियाँ और स्त्रियाँ कंगन, शंख की चूड़ियाँ, मोतियों की माला और नूपुर धारण करती थीं।

वर्ण-व्यवस्था एवं सामाजिक ढाँचा:
पाल काल में बौद्ध धर्म के कारण जाति-प्रथा कुछ लचीली थी, परंतु सेन काल में रूढ़िवादी ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान से कठोर वर्ण-व्यवस्था लागू हुई। 'बृहद्धर्म पुराण' और 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' में बंगाल के समाज को अनेक मिश्रित जातियों (उपजातियों) में बाँटा गया। शूद्रों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया—उत्तम संकर (करण, अंबष्ठ/वैद्य), मध्यम संकर और अधम संकर (अंत्यज अछूत वर्ग)। समाज में स्त्रियों की स्थिति सीमित थी और बाल विवाह का प्रचलन बढ़ रहा था।

चरण ३: 🔍 साक्ष्यों से जुड़ाव

पहाड़पुर के सोमपुर महाविहार की पकी मिट्टी की पट्टिकाओं (टेराकोटा) पर ढोल बजाते नर्तकों, शिकारियों और मछली पकड़ते आम लोगों के सजीव चित्र उकेरे हुए हैं।

चरण ४: 💡 ऐतिहासिक विश्लेषण

राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद बंगालियों की मूल खान-पान संस्कृति—भात, मछली और साग—हजारों वर्षों से निरंतर बनी हुई है। किंतु सेन काल की जातिगत संकीर्णता ने समाज को कमजोर किया।

चरण ५: 🎯 मुख्य निष्कर्ष

याद रखें: प्राकृत-पैंगल में केले के पत्ते पर भात, घी और मछली का वर्णन मिलता है। सेन काल में बृहद्धर्म पुराण द्वारा कठोर वर्ण-व्यवस्था और उपजातियों का निर्माण हुआ।

४. बांग्ला भाषा की उत्पत्ति, चर्यापद, खना के वचन एवं समकालीन साहित्य

चरण १: 👁️ अवलोकन एवं खोज

हमारी मधुर बांग्ला भाषा का सबसे पहला लिखित प्रमाण कहाँ और कब मिला था? और खना के वचन जैसी कृषि कहावतें सदियों से जनमानस में कैसे जीवित रहीं?

चरण २: 🧠 मुख्य अवधारणा की समझ

बांग्ला भाषा का उद्भव:
प्राचीन संस्कृत से प्राकृत और अपभ्रंश (मागधी अपभ्रंश-अवहट्ठ) के क्रमिक विकास से 8वीं से 10वीं सदी के आसपास प्राचीन बांग्ला भाषा का जन्म हुआ।

चर्यापद (Charyapada) — बांग्ला साहित्य का आदि ग्रंथ:
• खोज: प्रसिद्ध भाषाविद् महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने 1907 में नेपाल के राजदरबार के पुस्तकालय (रॉयल लाइब्रेरी) से ताड़पत्र पर लिखी चर्यापद की पांडुलिपि खोजी। 1916 में इसे 'हजार बछरेर पुराण बांगाला भाषाय रचित बौद्धगान ओ दोहा' नाम से प्रकाशित किया गया।
• रचयिता: इसके रचयिता बौद्ध सहजिया सिद्धाचार्य थे। लुइपा, कान्हपा, भुसुकुपा, सरहपा आदि 24 सिद्धाचार्यों ने कुल 46.5 पद रचे (पहला पद लुइपा का है: "काआ तरुवर पंच वि डाल...")।
• भाषा: इसकी भाषा को 'संध्‍या भाषा' (Sandhya Bhasha / गोधूलि की भाषा) कहा जाता है, क्योंकि इसका एक बाहरी अर्थ और एक गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ होता है। डॉ. सुनीतिकुमार चटर्जी ने अपनी पुस्तक 'ODBL' में वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया कि चर्यापद की भाषा प्राचीन बांग्ला है।

डाक एवं खना के वचन (Khana's Agricultural Proverbs):
खना के वचन ग्रामीण बंगाल में मौसम पूर्वानुमान और खेती की विधियों का मौखिक लोक-विज्ञान थे, जैसे:
"षोल चाषे मूला, तार अर्धेके तुला। तार अर्धेके धान, बिना चाषे पान।"
(अर्थात: मूली के लिए 16 जुताई, कपास के लिए 8, धान के लिए 4 और पान के लिए बिना जुताई के भूमि चाहिए)।

संस्कृत दरबारी साहित्य:
सेन काल में लक्ष्मणसेन के राजकवि जयदेव ने अमर काव्य 'गीतगोविंदम्' की रचना की। कवि धोयी ने 'पवनदूत' रचा। संध्याकर नंदी ने 'रामचरित' लिखा।

चरण ३: 🔍 साक्ष्यों से जुड़ाव

चर्यापद के पदों में बंगाल की नदियों, नावों, डोम व शबर जनजातियों के जीवन और शिकार के सजीव रूपक सुरक्षित हैं।

चरण ४: 💡 ऐतिहासिक विश्लेषण

चर्यापद केवल धार्मिक पद नहीं, बल्कि बांग्ला भाषा और जातीय अस्मिता का सबसे प्राचीन दस्तावेज है। इसके कई शब्द आज भी हमारी दैनिक भाषा में यथावत प्रयुक्त होते हैं।

चरण ५: 🎯 मुख्य निष्कर्ष

याद रखें: 1907 में हरप्रसाद शास्त्री ने नेपाल में चर्यापद की खोज की। इसकी भाषा संध्‍या भाषा (प्राचीन बांग्ला) है। जयदेव ने गीतगोविंदम् और धोयी ने पवनदूत लिखा।

५. महान विद्वान (अतीश दीपांकर, चक्रपाणि दत्त), बौद्ध महाविहार एवं प्राच्य शिल्परीति

चरण १: 👁️ अवलोकन एवं खोज

हजार वर्ष पूर्व जब यूरोप में विश्वविद्यालय नहीं थे, तब बंगाल और बिहार के नालंदा व विक्रमशिला में विश्व भर से दस हजार छात्र पढ़ने क्यों आते थे? और अतीश दीपांकर तिब्बत के पूज्य आचार्य कैसे बने?

चरण २: 🧠 मुख्य अवधारणा की समझ

अंतरराष्ट्रीय बौद्ध महाविहार:
पाल राजाओं के संरक्षण में पूर्व भारत में विश्वविख्यात आवासीय विश्वविद्यालय फले-फूले:
१. नालंदा महाविहार: प्राचीन भारत का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय जहाँ 10,000 छात्र और 1,500 शिक्षक थे। कठिन द्वारपंडित परीक्षा द्वारा प्रवेश होता था। पुस्तकालय का नाम 'धर्मगंज' (रत्नसागर, रत्नोदधि, रत्नरंजक) था।
२. विक्रमशिला महाविहार: पाल सम्राट धर्मपाल द्वारा स्थापित, जो तंत्रयान और तर्कशास्त्र का केंद्र था।
३. सोमपुर महाविहार: धर्मपाल द्वारा पहाड़पुर (अब बांग्लादेश) में निर्मित विशाल बौद्ध विहार।
४. ओदंतपुरी एवं जगद्दल महाविहार: उच्च शिक्षा के अन्य प्रमुख केंद्र।

महान विद्वान:
• अतीश दीपांकर श्रीज्ञान (982–1054 ई.): ढाका के विक्रमपुर (वज्रयोगिनी गाँव) में जन्मे। बाल्यनाम चंद्रगर्भ था। नालंदा व ओदंतपुरी में शिक्षा पाकर वे सुमात्रा (इंडोनेशिया) गए और 12 वर्ष तक बौद्ध दर्शन पढ़ा। लौटकर वे विक्रमशिला के प्रधान आचार्य बने। तिब्बत के राजा के विशेष आमंत्रण पर 60 वर्ष की आयु में उन्होंने बर्फीले हिमालय को पार किया। तिब्बत में उन्होंने बौद्ध धर्म में फैली कुरीतियों को दूर कर शुद्ध महायान की स्थापना की और 100 से अधिक ग्रंथों का अनुवाद किया। तिब्बत में उन्हें बुद्ध के बाद सबसे पवित्र 'बोधिसत्व' माना जाता है।
• चक्रपाणि दत्त: बीरभूम में जन्मे पाल काल के महान आयुर्वेद शास्त्री एवं चिकित्सक। उन्होंने 'चिकित्सा-संग्रह', 'आयुर्वेद-दीपिका' और 'द्रव्यगुण-संग्रह' ग्रंथों की रचना की। वे चिकित्सा में लौह भस्म व पारे के औषधीय उपयोग के प्रवर्तक थे।

प्राच्य शिल्परीति (Eastern School of Art):
पाल काल में वरेंद्र (उत्तरी बंगाल) के दो पिता-पुत्र मूर्तिकारों—धीमान (Dhiman) और वीतपाल (Vitapala) ने मूर्तिकला की एक नई शैली स्थापित की जिसे 'प्राच्य शिल्परीति' कहते हैं। इसकी विशेषताएँ:
१. चिकने व चमकदार काले कसौटी पत्थर (Black Basalt) पर बनी देवी-देवताओं की अत्यंत सुंदर मूर्तियाँ।
२. अष्टधातु व कांस्य की ढलाई से बनी मूर्तियाँ जो समूचे एशिया में प्रसिद्ध हुईं।
३. मंदिरों की दीवारों पर आम जनजीवन को दर्शाती पकी मिट्टी की टेराकोटा पट्टिकाएँ।

चरण ३: 🔍 साक्ष्यों से जुड़ाव

तिब्बती इतिहासकार तारानाथ ने धीमान और वीतपाल की कला की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। आज भी कोलकाता के भारतीय संग्रहालय और नालंदा संग्रहालय में इनकी मूर्तियाँ सुरक्षित हैं।

चरण ४: 💡 ऐतिहासिक विश्लेषण

12वीं सदी के अंत में तुर्क आक्रमणों से नालंदा और विक्रमशिला के पुस्तकालय नष्ट हो गए। किंतु तिब्बत और नेपाल के मठों में सुरक्षित पांडुलिपियों के कारण इस गौरवशाली ज्ञान परंपरा के साक्ष्य आज भी हमारे पास सुरक्षित हैं।

चरण ५: 🎯 मुख्य निष्कर्ष

याद रखें: अतीश दीपांकर विक्रमशिला के आचार्य थे और उन्होंने तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार किया। चक्रपाणि दत्त आयुर्वेद के विद्वान थे। धीमान और वीतपाल पाल काल की प्राच्य शिल्परीति के जनक थे।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

ब्रह्मदेय भूमि अनुदान के विशेषाधिकार
100% पूर्ण करमुक्ति (सर्व-कर-परिहार)
ब्राह्मणों, विद्वानों व बौद्ध विहारों को दी गई वंशानुगत निष्कर भूमि
धार्मिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं को दिए गए ताम्रपत्र आधारित भूमि अनुदानों से राज्य कोई कर नहीं लेता था।
शास्त्रीय कृषि करों का त्रिविध स्वरूप (भाग, भोग व कर)
भाग (⅙ उपज हिस्सा) भोग (फल/फूल/इमारती लकड़ी) कर (आवधिक नकद कर)
ग्रामीण कृषकों द्वारा राज्य को दिए जाने वाले पारंपरिक तीन प्रमुख कर
भाग मुख्य अनाज कर था, भोग राजा को भेंट स्वरूप फल-फूल आदि थे तथा हिरण्य नकद कर था।
मध्यकालीन भारतीय सामंती पदसोपान
महाराजाधिराज (सर्वोच्च सम्राट) महासामंत सामंत भोगिक / किसान
विकेंद्रीकृत सामंतवादी व्यवस्था जहां स्थानीय सामंत अपनी निजी सेना रखते थे
राजा की कमजोरी के समय ये सामंत स्वतंत्र होकर अपनी मुद्राएं और सेना चलाने लगते थे।
चोल साम्राज्य की स्वायत्त ग्रामीण संस्थाएं
उर (सामान्य कृषकों की सभा) सभा (ब्राह्मण विद्वानों की परिषद) नगरम (व्यापारियों व शिल्पियों की संस्था)
स्थानीय स्वशासन समितियां (वारियम) जो सिंचाई, न्याय व कर प्रबंधन करती थीं
उत्तरमेरूर शिलालेख चोल कालीन लोकतांत्रिक ग्रामीण चुनाव व प्रशासन का प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रदान करता है।
चर्यापद: प्राचीन बांग्ला भाषा का प्रथम साक्ष्य
46½ रहस्यवादी पद 24 बौद्ध सिद्धाचार्यों द्वारा रचित गीत
1907 में हरप्रसाद शास्त्री द्वारा नेपाल के राजदरबार पुस्तकालय से खोजा गया
8वीं से 12वीं शताब्दी के मध्य संध्या भाषा में लिखे गए ये बौद्ध गीत बांग्ला भाषा के प्राचीनतम रूप हैं।
नालंदा एवं विक्रमशिला महाविहार की शैक्षणिक श्रेष्ठता
द्वारपंडित की कठोर प्रवेश परीक्षा | 10,000 विद्यार्थी : 1,500 आचार्य
चीन, तिब्बत एवं कोरिया के विद्वानों का विश्वप्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय आवासीय केंद्र
शीलभद्र और दीपंकर श्रीज्ञान अतीश जैसे आचार्यों ने इन विश्वविद्यालयों को वैश्विक प्रतिष्ठा दिलाई।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
भारतीय सामंत व्यवस्था में "ब्रह्मदेय" एवं "अग्रहार" से क्या तात्पर्य है और इससे सामंतों की शक्ति कैसे बढ़ी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
ब्रह्मदेय एवं अग्रहार व्यवस्था का विश्लेषण:
१. तात्पर्य: ब्राह्मणों को धार्मिक एवं शैक्षणिक कार्यों हेतु दान दी गई पूर्णतः करमुक्त कृषि भूमि को 'ब्रह्मदेय' और मंदिरों अथवा बौद्ध विहारों को दी गई भूमि को 'अग्रहार' कहा जाता था।
२. विशेषताएँ: इन भूखंडों पर राजा का कोई कर नहीं लगता था और न ही राजकीय अधिकारी वहाँ हस्तक्षेप कर सकते थे।
३. सामंतों का उदय: वंशानुगत भू-स्वामित्व और किसानों से लगान वसूलने के अधिकार के कारण ये भूस्वामी अत्यंत धनी हो गए। उन्होंने अपनी निजी सेना रखनी शुरू की और धीरे-धीरे वे राजा के समकक्ष स्वतंत्र 'सामंत' बन गए, जिससे राजा की केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई।
उदाहरण 2
चोल साम्राज्य की ग्रामीण स्वायत्त संस्थाओं "उर", "सभा" एवं "नगरम" के कार्यों में क्या अंतर था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
चोल ग्रामीण परिषदों के कार्यों में अंतर:
१. उर (Ur): यह सामान्य किसान निवासियों की आम सभा थी जो गाँव की खेती, जल वितरण और सामान्य विवादों को सुलझाती थी।
२. सभा (Sabha): यह ब्राह्मणों के ब्रह्मदेय गाँवों की विशिष्ट सभा थी। उत्तरमेरुर अभिलेख के अनुसार, इसके सदस्य लॉटरी पद्धति द्वारा विभिन्न समितियाँ (वारियम) बनाकर सिंचाई, कर वसूली और न्याय का सुचारू संचालन करते थे।
३. नगरम (Nagaram): यह व्यापारियों और शिल्पियों की संस्था थी जो बाजारों के नियम, माप-तौल और व्यापारिक सुरक्षा का ध्यान रखती थी।
उदाहरण 3
अतीश दीपांकर श्रीज्ञान कौन थे और तिब्बत के इतिहास में उनका क्या योगदान है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
अतीश दीपांकर एवं उनका ऐतिहासिक योगदान:
१. परिचय: अतीश दीपांकर (982–1054 ई.) प्राचीन बंगाल के विक्रमपुर में जन्मे प्रकांड बौद्ध विद्वान और विक्रमशिला महाविहार के प्रधान आचार्य थे।
२. तिब्बत गमन: 60 वर्ष की आयु में तिब्बती राजा के विशेष आग्रह पर उन्होंने दुर्गम हिमालय पार कर तिब्बत की यात्रा की।
३. योगदान: तिब्बत में फैले अंधविश्वास और विकृत तांत्रिक आचरण को समाप्त कर उन्होंने शुद्ध महायान बौद्ध धर्म की पुनर्स्थापना की और 100 से अधिक ग्रंथों की रचना व अनुवाद किया।
४. सम्मान: तिब्बत के लोग उन्हें भगवान बुद्ध के बाद दूसरा सबसे बड़ा 'बोधिसत्व' मानकर पूजते हैं।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

चर्यापद को आधुनिक बांग्ला की कविताएँ समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

चर्यापद आधुनिक नहीं, बल्कि 8वीं से 12वीं सदी के मध्य बौद्ध सिद्धाचार्यों द्वारा रचित प्राचीनतम बांग्ला भाषा (संध्‍या भाषा) का ग्रंथ है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

यूरोपीय सर्फ (भूदास) और भारतीय किसानों को एक समान मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

यूरोप के सर्फ स्वामी की निजी संपत्ति की तरह बंधुआ मजदूर थे; जबकि भारतीय किसान सामंत को लगान देते थे, पर उन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्राप्त थी और वे जमीन से बेदखल नहीं किए जाते थे।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

धीमान और वीतपाल को लेखक या दरबारी कवि समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

धीमान और वीतपाल कवि नहीं थे; वे पाल काल के वरेंद्र के महान मूर्तिकार व कांस्य शिल्पी थे जिन्होंने काले कसौटी पत्थर की मूर्तियों की 'प्राच्य शिल्परीति' स्थापित की।

समाज, अर्थव्यवस्था एवं संस्कृति: सामंत व्यवस्था, कर, चर्यापद, अतीश दीपांकर एवं प्राच्य शिल्परीति (Visual Model)

INDIAN SOCIETY, ECONOMY & CULTURE (7th – 12th CENTURY CE) WBBSE CLASS 7 HISTORY • FEUDALISM • AGRARIAN TAXATION • UR & SABHA • CHARYAPADA • ATISA DIPANKARA • DHIMAN & VITAPALA 1. The Indian Feudal Hierarchy (সামন্ত ব্যবস্থা) RAJA (KING) MAHASAMANTA SAMANTA / FEUDATORIES BHOGIKA / GRAMIKA Feudal Mechanics • Land Grants: Brahmadeya Tax-free land to Brahmins • Agrahara: Grants to temples • Samanta Duties: - Supply troops in wartime - Pay annual royal tribute - Attend imperial darbar European: King > Lord > Serf 2. Agrarian Economy & South Indian Governance Bengal Pala/Sena Taxes • Bhaga (ভাগ): 1/6th of grain harvest (King's customary agricultural share) • Bhoga (ভোগ): Fruits, flowers & fuel (Daily perishables gifted to king) • Kara (কর): Periodic property tax • Hiranya (হিরণ্য): Cash gold tax • Uparikara: Extra land surcharge Crops: Paddy, Betel, Sugarcane, Mustard Chola Local Self-Government • UR (উর): Assembly of common peasant farmers & village residents • SABHA (সভা): Exclusive assembly of learned Brahmin Brahmadeya holders • NAGARAM (নগরম): Guild council of traders, artisans & merchants • Nadu & Mandalam: District & Prov. Documented in Uttaramerur Inscriptions 3. Bengali Language, Charyapada & Agrarian Lore CHARYAPADA (চর্যাপদ) • Earliest Bengali Literature • Discovered in 1907 by Haraprasad Shastri at Nepal Royal Court Library. • 46.5 mystical verses in Sandhya Bhasha by Buddhist Siddhas (Luipa, Kanhapa, Sarahapa). Dak & Khana's Lore (খনার বচন) • Centuries of oral peasant wisdom • Monsoon predicting & weather • Optimal crop sowing cycles "ষোল চাষে মূলা, তার অর্ধেক তুলা..." Sena Court Literature • Jayadeva: Gita Govinda • Dhoyi: Pavanaduta • Sandhyakar Nandi: Ramacharita Pancharatna literary circle of Nadia 4. Mahaviharas, Atisa & Eastern School of Art Atisa Dipankara Srijnana (অতীশ দীপঙ্কর শ্রীজ্ঞান • 982–1054 CE) • Born in Vajrayogini (Bikrampur, Bengal); Chancellor of Vikramashila Mahavihara. • Traveled to Tibet across high Himalayas; restored Buddhism; revered as a Bodhisattva. • Mahaviharas: Nalanda, Vikramashila, Somapura (Paharpur), Odantapuri, Jagaddala. Eastern School of Medieval Art (প্রাচ্য শিল্পরীতি) • Master artists of Varendra (Pala era): Dhiman (ধীমান) and his son Vitapala (বীতপাল). • Renowned for exquisite Kashtipathar (Black Basalt) stone carvings & bronze casting. • Somapura terracotta narrative plaques depicting daily folk life, animals & lore.

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
प्राचीन व मध्यकालीन भारत में "ब्रह्मदेय" व्यवस्था से क्या तात्पर्य है और इसकी मुख्य विशेषता क्या थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: ब्राह्मणों को धार्मिक एवं शैक्षणिक कार्यों हेतु दी गई पूर्णतः करमुक्त (निष्कर) भूमि को ब्रह्मदेय कहा जाता था। इस पर राजा का कोई कर या प्रशासनिक दखल नहीं होता था।
राजा ताम्रपत्रों पर यह भूमि अनुदान स्थायी रूप से लिखवा देते थे।
2
चोल शासन में दक्षिण भारत की ग्रामीण परिषदों "उर" और "सभा" में क्या अंतर था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 'उर' साधारण करदाता किसानों की आम सभा थी, जबकि 'सभा' केवल ब्राह्मणों के ब्रह्मदेय गाँवों की विशिष्ट परिषद थी।
उत्तरमेरुर अभिलेख में सभा की चुनाव प्रक्रिया का उल्लेख है।
3
बांग्ला भाषा का सबसे प्राचीन ग्रंथ "चर्यापद" किसने, कब और कहाँ से खोजा था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने 1907 में नेपाल के राजदरबार के पुस्तकालय (रॉयल लाइब्रेरी) से ताड़पत्रों पर लिखा चर्यापद खोजा था।
1916 में बंगीय साहित्य परिषद द्वारा इसे प्रकाशित किया गया था।
4
काव्य 'प्राकृत-पैंगल' में वर्णित बंगाली गृहस्थ के भोजन की थाली में कौन-से मुख्य व्यंजन शामिल थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: केले के पत्ते पर परोसा गया गरम सुगंधित भात, गाय का घी, गाढ़ा दूध, मौराला मछली और नालते का साग।
श्लोक: "ओग्गर भत्ता रंभअ पत्ता, गाइक घित्ता... माइनी मच्छा नालिच गच्छा"।
5
पाल काल की "प्राच्य शिल्परीति" के प्रवर्तक वरेंद्र के पिता-पुत्र मूर्तिकारों का नाम क्या था और वे किस माध्यम में मूर्तियाँ बनाते थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पिता धीमान (Dhiman) एवं पुत्र वीतपाल (Vitapala); वे मुख्यतः काले कसौटी पत्थर (Black Basalt) और कांस्य/अष्टधातु की मूर्तियाँ बनाते थे।
तिब्बती इतिहासकार तारानाथ ने उनकी कला की बहुत प्रशंसा की है।
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