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CBSE • कक्षा XII • Chemistry • अध्याय 7
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

ऐल्कोहॉल, फ़ीनॉल एवं ईथर

ऐल्कोहॉल ($R-OH$), फीनॉल ($Ar-OH$) एवं ईथर ($R-O-R'$) कार्बनिक रसायन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऑक्सीजन-युक्त क्रियात्मक समूह हैं, जो औद्योगिक विलायकों, औषधियों, प्लास्टिक एवं दैनिक उपयोग के रासायनिक उत्पादों की आधारशिला हैं। ऐल्कोहॉलों में हाइड्रॉक्सिल समूह ($-OH$) एलिफैटिक कार्बन से जुड़ा होता है, जबकि फीनॉल में यह सीधे ऐरोमैटिक बेंजीन वलय से आबंधित होता है। फीनॉल का अम्लीय व्यवहार ऐल्कोहॉलों की तुलना में लगभग दस लाख गुना अधिक होता है, जिसका कारण फीनॉक्साइड आयन ($C_6H_5O^-$) का बेंजीन वलय के साथ होने वाला अत्यधिक प्रभावी अनुनादी स्थायित्व (Resonance Stabilisation) है। अध्याय में ऐल्कोहॉलों के निर्माण की आधुनिक औद्योगिक विधियों—ऐल्कीनों के अम्ल-उत्प्रेरित जलयोजन (मार्कोनीकॉफ नियम), हाइड्रोबोरोनन-ऑक्सीकरण (Anti-Markovnikov हाइड्रेशन) तथा ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक की कार्बोनिल यौगिकों पर अभिक्रिया का अध्ययन किया जाता है। प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक ऐल्कोहॉलों में विभेद हेतु ल्युकास परीक्षण ($ZnCl_2 + HCl$) तथा विक्टर मेयर विधि अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। फीनॉल के अंतर्गत क्यूमीन प्रक्रम (औद्योगिक विधि), कोल्बे अभिक्रिया (सैलिसिलिक अम्ल निर्माण) तथा राइमर-टीमैन अभिक्रिया (सैलिसिलैल्डिहाइड निर्माण) बोर्ड परीक्षा के केंद्र में रहते हैं। अंत में ईथरों के संश्लेषण की अमर विधि विलियमसन ईथर संश्लेषण ($R-X + R'O^-Na^+ \rightarrow R-O-R'$) तथा हाइड्रोजन आयोडाइड ($HI$) द्वारा ईथर विदलन की क्रियाविधि ($1^\circ$ बनाम $3^\circ$ एल्किल समूह) का गहन विश्लेषण किया गया है।

अस्पताल का जीवन रक्षक एंटीसेप्टिक और सिरदर्द की एस्पिरिन: फीनॉल का जादुई संसार!

क्या आप जानते हैं कि 19वीं सदी तक शल्य चिकित्सा (Surgery) के बाद आधे से अधिक मरीज केवल घाव के संक्रमण (Sepsis) से मर जाते थे? तब जोसेफ लिस्टर ने पहली बार 'कार्बोलिक एसिड' (फीनॉल) का उपयोग रोगाणुरोधक (Antiseptic) के रूप में किया और आधुनिक चिकित्सा में क्रांति आ गई! और आज जब भी आपको तेज सिरदर्द या बुखार होता है, तो आप जो 'एस्पिरिन' गोली खाते हैं, वह किस रसायन से बनती है? वह फीनॉल की 'कोल्बे अभिक्रिया' से बनने वाले सैलिसिलिक अम्ल के एसीटिलन से ही तैयार की जाती है! यही नहीं, आधुनिक समय में शल्य क्रिया से पूर्व मरीज को बेहोश करने वाला पहला सुरक्षित निश्चेतक भी 'डाइएथिल ईथर' ही था! आइए जानें ऐल्कोहॉल, फीनॉल और ईथर के अणुओं की वह आंतरिक संरचना जो इन्हें इतना बहुपयोगी बनाती है!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

CBSE और CBSE बोर्ड परीक्षा में इस अध्याय से 7 अंकों के प्रश्न प्रतिवर्ष पूछे जाते हैं: 1. फीनॉल की अम्लीय प्रकृति: फीनॉल ऐल्कोहॉल से अधिक अम्लीय क्यों है? नाइट्रोफीनॉल ($-NO_2$) तथा क्रेसोल ($-CH_3$) के अम्लीय सामर्थ्य की तुलना। 2. प्राथमिक, द्वितीयक व तृतीयक ऐल्कोहॉलों में विभेद: ल्युकास परीक्षण ($ZnCl_2 + HCl$) द्वारा धुंधलापन (Turbidity) आने के समय के आधार पर पहचान। 3. नेम रिएक्शंस (Name Reactions): कोल्बे अभिक्रिया, राइमर-टीमैन अभिक्रिया, विलियमसन ईथर संश्लेषण। 4. ईथर का $HI$ द्वारा विदलन: असममित ईथर जैसे अनिसोल ($C_6H_5-O-CH_3$) या तृतीयक ईथर $(CH_3)_3C-O-CH_3$ की $HI$ से क्रिया पर कौन सा एल्किल आयोडाइड और ऐल्कोहॉल बनेगा, इस पर 3 अंक का क्रियाविधि आधारित प्रश्न।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • हाइड्रोजन आबंधन (अंतर-आण्विक व अंतःआण्विक एच-बॉन्डिंग)।
  • मार्कोनीकॉफ तथा एन्टी-मार्कोनीकॉफ योग नियम।
  • कार्बोनिल यौगिकों ($C=O$) पर नाभिकरागी योग की आधारभूत समझ।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • ऐल्कीनों, कार्बोनिल यौगिकों तथा ग्रिग्नार्ड अभिकर्मकों से ऐल्कोहॉलों के निर्माण के रासायनिक समीकरण लिखना।
  • ल्युकास अभिकर्मक तथा ऑक्सीकरण परीक्षणों द्वारा $1^\circ, 2^\circ, 3^\circ$ ऐल्कोहॉलों में स्पष्ट विभेद करना।
  • फीनॉक्साइड आयन की अनुनादी संरचनाएं बनाकर फीनॉल की उच्च अम्लीयता की वैज्ञानिक व्याख्या करना।
  • कोल्बे तथा राइमर-टीमैन अभिक्रियाओं की क्रियाविधि तथा औद्योगिक महत्व के उत्पादों को समझना।
  • विलियमसन ईथर संश्लेषण की सीमाओं तथा $HI$ द्वारा ईथर विदलन के उत्पादों का सटीक पूर्वानुमान लगाना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. ऐल्कोहॉल के निर्माण की आधुनिक वि...
2 2. फीनॉल का निर्माण एवं अम्लीय प्रक...
3 3. फीनॉल की विशिष्ट अभिक्रियाएं (Ko...
4 4. ईथरों का संश्लेषण एवं $HI$ द्वार...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. ऐल्कोहॉल के निर्माण की आधुनिक विधियाँ एवं ल्युकास परीक्षण

(क) ऐल्कीनों से निर्माण:

  1. अम्ल-उत्प्रेरित जलयोजन (Acid-Catalysed Hydration - मार्कोनीकॉफ नियम): तनु $H_2SO_4$ की उपस्थिति में ऐल्कीन पर जल का योग मार्कोनीकॉफ नियमानुसार होता है (मध्यवर्ती कार्बोधनायन बनता है):

$$CH_3-CH=CH_2 + H_2O \xrightarrow{H^+} CH_3-CH(OH)-CH_3 \quad (\text{प्रोपेन-2-ऑल})$$

  1. हाइड्रोबोरोनन-ऑक्सीकरण (Hydroboration-Oxidation - एन्टी-मार्कोनीकॉफ योग): डाइबोरेन ($B_2H_6$) से क्रिया के पश्चात क्षारीय हाइड्रोजन परॉक्साइड ($H_2O_2/OH^-$) द्वारा ऑक्सीकरण कराने पर प्राथमिक ऐल्कोहॉल प्राप्त होता है:

$$CH_3-CH=CH_2 \xrightarrow{(i)\; BH_3\cdot THF \quad (ii)\; H_2O_2, OH^-} CH_3-CH_2-CH_2-OH \quad (\text{प्रोपेन-1-ऑल})$$

(ख) ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक ($RMgX$) द्वारा कार्बोनिल से:

  • फॉर्मेल्डिहाइड ($HCHO$) + $RMgX$: $\rightarrow$ प्राथमिक ऐल्कोहॉल ($1^\circ$)
  • अन्य ऐल्डिहाइड ($R'CHO$) + $RMgX$: $\rightarrow$ द्वितीयक ऐल्कोहॉल ($2^\circ$)
  • कीटोन ($R'_2CO$) + $RMgX$: $\rightarrow$ तृतीयक ऐल्कोहॉल ($3^\circ$)

$1^\circ, 2^\circ, 3^\circ$ ऐल्कोहॉलों में विभेद: ल्युकास परीक्षण (Lucas Test):

ल्युकास अभिकर्मक = सांद्र $HCl$ + निर्जल $ZnCl_2$। यह ऐल्कोहॉल को अविलेय ऐल्किल क्लोराइड में बदलता है जिससे विलयन में धुंधलापन (Turbidity) आता है:

  1. तृतीयक ऐल्कोहॉल ($3^\circ$): ल्युकास अभिकर्मक मिलाते ही तुरंत (Instantaneous) धुंधलापन उत्पन्न होता है (स्थायी $3^\circ$ कार्बोधनायन बनने के कारण)।
  2. द्वितीयक ऐल्कोहॉल ($2^\circ$): लगभग 5 मिनट बाद कमरे के ताप पर धुंधलापन आता है।
  3. प्राथमिक ऐल्कोहॉल ($1^\circ$): कमरे के ताप पर कोई धुंधलापन नहीं आता; केवल गर्म करने पर ही धुंधलापन दिखाई देता है।

2. फीनॉल का निर्माण एवं अम्लीय प्रकृति की गहन व्याख्या

(क) क्यूमीन प्रक्रम से फीनॉल का औद्योगिक निर्माण (Cumene Process):

आइसोप्रोपिल बेंजीन (क्यूमीन) का वायु द्वारा ऑक्सीकरण कराकर क्यूमीन हाइड्रोपरॉक्साइड बनाते हैं, जिसे तनु अम्ल से जल-अपघटित करने पर फीनॉल तथा मूल्यवान सह-उत्पाद एसीटोन प्राप्त होता है:

$$C_6H_5-CH(CH_3)_2 \xrightarrow{O_2} C_6H_5-C(CH_3)_2-O-OH \xrightarrow{H^+, H_2O} C_6H_5-OH + CH_3COCH_3$$

(ख) फीनॉल की अम्लीय प्रकृति: ऐल्कोहॉल बनाम फीनॉल:

फीनॉल ऐल्कोहॉलों से लगभग $10^6$ गुना अधिक अम्लीय है ($pK_a \approx 10$ जबकि ऐल्कोहॉल का $pK_a \approx 16-18$)। इसके दो प्रमुख वैज्ञानिक कारण हैं:

  1. फीनॉक्साइड आयन का अनुनादी स्थायित्व: फीनॉल जब प्रोटॉन ($H^+$) त्यागता है, तो बनने वाला फीनॉक्साइड आयन ($C_6H_5O^-$) अनुनाद द्वारा वलय के ऑर्थो व पैरा स्थानों पर ऋणावेश वितरित कर अत्यधिक स्थायी हो जाता है:

$$C_6H_5OH \rightleftharpoons C_6H_5O^- + H^+$$

इसके विपरीत ऐल्कोहॉल से बना ऐल्कॉक्साइड आयन ($R-O^-$) अनुनाद नहीं दर्शा सकता; बल्कि एल्किल समूह का $+I$ प्रभाव ऋणावेश को और बढ़ाकर उसे अस्थायी बना देता है! 2. प्रतिस्थापियों का प्रभाव (Substituent Effects):

  • इलेक्ट्रॉन-आकर्षी समूह ($-NO_2, -CN, -Cl$): ऋणावेश को आकर्षित कर फीनॉक्साइड आयन को और अधिक स्थायी बनाते हैं, अतः अम्लीय सामर्थ्य बढ़ता है।
    • अम्लीयता क्रम: $o\text{-नाइट्रोफीनॉल} > p\text{-नाइट्रोफीनॉल} > m\text{-नाइट्रोफीनॉल} > \text{फीनॉल}$।
    • पिक्रिक अम्ल (2,4,6-ट्राइनाइट्रोफीनॉल) तो इतना प्रबल अम्ल है कि यह खनिज अम्लों जैसा व्यवहार करता है!
  • इलेक्ट्रॉन-दाता समूह ($-CH_3, -OCH_3$): वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाकर फीनॉक्साइड को अस्थायी करते हैं, अतः अम्लीय सामर्थ्य घटता है (क्रेसोल फीनॉल से दुर्बल अम्ल है)।

3. फीनॉल की विशिष्ट अभिक्रियाएं (Kolbe व Reimer-Tiemann)

1. कोल्बे अभिक्रिया (Kolbe's Reaction):

सोडियम फीनॉक्साइड को कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) के साथ $400\text{ K}$ ताप तथा $4-7\text{ atm}$ दाब पर गर्म करके अम्लीय करने पर मुख्य उत्पाद के रूप में 2-हाइड्रॉक्सीबेन्जोइक अम्ल (सैलिसिलिक अम्ल) बनता है:

$$C_6H_5ONa + CO_2 \xrightarrow{400\text{ K}, 4-7\text{ atm}} \text{सोडियम सैलिसिलेट} \xrightarrow{H^+} \underset{\text{सैलिसिलिक अम्ल}}{C_6H_4(OH)(COOH)}$$

सैलिसिलिक अम्ल के एसीटिलन ($Acetic anhydride$) द्वारा दर्द निवारक औषधि एस्पिरिन (एसिटिल सैलिसिलिक अम्ल) बनाई जाती है।

2. राइमर-टीमैन अभिक्रिया (Reimer-Tiemann Reaction):

फीनॉल की जलीय $NaOH$ की उपस्थिति में क्लोरोफॉर्म ($CHCl_3$) के साथ $340\text{ K}$ पर अभिक्रिया कराने पर वलय के ऑर्थो स्थान पर $-CHO$ समूह प्रविष्ट हो जाता है, जिससे सैलिसिलैल्डिहाइड बनता है:

$$C_6H_5OH + CHCl_3 + 3NaOH \xrightarrow{340\text{ K}} \underset{\text{सैलिसिलैल्डिहाइड}}{C_6H_4(OH)(CHO)} + 3NaCl + 2H_2O$$

इस अभिक्रिया में इलेक्ट्रॉनरागी मध्यवर्ती डाइक्लोरोकार्बीन ($:CCl_2$) बनता है!

3. जिंक चूर्ण के साथ अपचयन:

फीनॉल को जिंक डस्ट ($Zn$) के साथ गर्म करने पर यह बेंजीन में अपचयित हो जाता है:

$$C_6H_5OH + Zn \xrightarrow{\Delta} C_6H_6 + ZnO$$

4. ईथरों का संश्लेषण एवं $HI$ द्वारा विदलन

(क) विलियमसन ईथर संश्लेषण (Williamson Ether Synthesis):

एल्किल हैलाइड की सोडियम ऐल्कॉक्साइड ($R'O^-Na^+$) के साथ $S_N2$ क्रिया द्वारा ईथर का निर्माण होता है:

$$R-X + R'-O^-Na^+ \rightarrow R-O-R' + NaX$$

  • महत्वपूर्ण सीमा (Very Important Limitation):
    • उत्तम लब्धि हेतु एल्किल हैलाइड हमेशा प्राथमिक ($1^\circ$) होना चाहिए!
    • यदि तृतीयक एल्किल हैलाइड ($(CH_3)_3C-Br$) लिया जाए, तो नाभिकरागी प्रतिस्थापन के स्थान पर विलोपन (Elimination) हो जाता है और मुख्य उत्पाद ऐल्कीन (Isobutylene) बनती है, ईथर नहीं!
    • अतः $(CH_3)_3C-O-CH_3$ बनाने हेतु सोडियम तृतीयक-ब्यूटॉक्साइड ($(CH_3)_3C-O^-Na^+$) तथा मैथिल ब्रोमाइड ($CH_3Br$) की क्रिया कराई जाती है।

(ख) हाइड्रोजन आयोडाइड ($HI$) द्वारा ईथर का विदलन:

ईथर में $C-O$ आबंध अत्यंत स्थायी होता है, जिसे केवल सांद्र हैलोजन अम्लों ($HI, HBr$) द्वारा उच्च ताप पर तोड़ा जा सकता है:

  1. प्राथमिक/द्वितीयक एल्किल समूहों युक्त ईथर ($S_N2$ पथ): आयोडीन आयन ($I^-$) छोटे एल्किल समूह पर आक्रमण करता है:

$$CH_3-CH_2-O-CH_3 + HI \rightarrow CH_3-I + CH_3CH_2-OH$$

  1. यदि एक एल्किल समूह तृतीयक ($3^\circ$) हो ($S_N1$ पथ): यहाँ अत्यधिक स्थायी तृतीयक कार्बोधनायन बनने के कारण आयोडाइड तृतीयक कार्बन से जुड़ता है:

$$(CH_3)_3C-O-CH_3 + HI \rightarrow (CH_3)_3C-I + CH_3-OH$$

  1. ऐनिसोल (फेनिल मैथिल ईथर): फीनोलिक आबंध में अनुनाद के कारण आंशिक द्वि-आबंध लक्षण होता है, अतः $O-CH_3$ आबंध टूटता है और फीनॉल व मैथिल आयोडाइड बनते हैं:

$$C_6H_5-O-CH_3 + HI \rightarrow C_6H_5-OH + CH_3-I$$

महत्वपूर्ण रासायनिक सूत्र, अभिक्रियाएँ एवं समीकरण

ल्युकास परीक्षण विभेद समय सारणी
3° ऐल्कोहॉल: तुरंत धुंधलापन; 2° ऐल्कोहॉल: 5 मिनट में धुंधलापन; 1° ऐल्कोहॉल: केवल गर्म करने पर धुंधलापन (ल्युकास अभिकर्मक = सांद्र HCl + निर्जल ZnCl2)।
फीनॉल अम्लीयता क्रम एवं प्रतिस्थापी प्रभाव
2,4,6-ट्राइनाइट्रोफीनॉल > p-नाइट्रोफीनॉल > o-नाइट्रोफीनॉल > फीनॉल > क्रेसोल > ऐल्कोहॉल (-I, -R समूह अम्लीयता बढ़ाते हैं; +I, +R समूह घटाते हैं)।
कोल्बे एवं राइमर-टीमैन अभिक्रियाएं
कोल्बे: फीनॉल + NaOH + CO2 (400 K, 4-7 atm) -> सैलिसिलिक अम्ल (एस्पिरिन का पूर्ववर्ती); राइमर-टीमैन: फीनॉल + CHCl3 + NaOH -> सैलिसिलैल्डिहाइड (इलेक्ट्रॉनरागी: :CCl2)।
विलियमसन ईथर संश्लेषण एवं HI विदलन नियम
R-X (1° अनिवार्य) + R'ONa -> R-O-R'; HI विदलन: 1°/2° में छोटा R-I बनता है (SN2); 3° समूह होने पर 3° R-I बनता है (SN1); ऐनिसोल + HI -> फीनॉल + CH3I।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
फीनॉल, एथेनॉल की तुलना में अधिक अम्लीय क्यों है? फीनॉक्साइड आयन की अनुनादी संरचनाओं की सहायता से स्पष्ट कीजिए। (CBSE Board 5 Marks Question)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: फीनॉल, एथेनॉल की तुलना में लगभग $10^6$ गुना अधिक प्रबल अम्ल है। इसके दो मुख्य कारण हैं:

  1. फीनॉक्साइड आयन का अनुनादी स्थायित्व: जब फीनॉल एक प्रोटॉन ($H^+$) त्यागता है, तो फीनॉक्साइड आयन ($C_6H_5O^-$) बनता है:

$$C_6H_5OH \rightleftharpoons C_6H_5O^- + H^+$$

फीनॉक्साइड आयन में ऑक्सीजन पर उपस्थित ऋणावेश बेंजीन वलय के $\pi$-इलेक्ट्रॉनों के साथ अनुनाद करता है। इसके फलस्वरूप ऋणावेश ऑर्थो (दोनों $o$-स्थानों) तथा पैरा ($p$-स्थान) पर विस्थानिकृत (delocalise) हो जाता है। इस आवेश के बिखर जाने के कारण फीनॉक्साइड आयन अत्यधिक स्थायी हो जाता है और साम्यावस्था दाहिनी ओर विस्थापित रहती है।

  1. एथॉक्साइड आयन ($C_2H_5O^-$) का अस्थायित्व: एथेनॉल द्वारा प्रोटॉन त्यागने पर एथॉक्साइड आयन ($CH_3CH_2O^-$) बनता है:

$$C_2H_5OH \rightleftharpoons C_2H_5O^- + H^+$$

एथिल समूह ($C_2H_5$) का धनात्मक प्रेरणिक प्रभाव ($+I$ effect) होता है जो ऑक्सीजन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व को और अधिक बढ़ा देता है, जिससे एथॉक्साइड आयन अत्यंत अस्थायी हो जाता है और तुरंत प्रोटॉन ग्रहण कर पुनः एथेनॉल बना लेता है। इसमें कोई अनुनाद संभव नहीं है।

अतः फीनॉक्साइड आयन के अनुनादी स्थायित्व के कारण फीनॉल एथेनॉल से बहुत अधिक अम्लीय होता है।

उदाहरण 2
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के रासायनिक समीकरण लिखिए: (i) कोल्बे अभिक्रिया (Kolbe's Reaction) (ii) राइमर-टीमैन अभिक्रिया (Reimer-Tiemann Reaction) (iii) विलियमसन ईथर संश्लेषण द्वारा अनिसोल का निर्माण
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: (i) कोल्बे अभिक्रिया: सोडियम फीनॉक्साइड को कार्बन डाइऑक्साइड के साथ $400\text{ K}$ ताप एवं $4-7\text{ atm}$ दाब पर गर्म करने के उपरांत तनु $HCl$ से अम्लीकृत करने पर 2-हाइड्रॉक्सीबेन्जोइक अम्ल (सैलिसिलिक अम्ल) प्राप्त होता है:

$$C_6H_5ONa + CO_2 \xrightarrow{400\text{ K}, 4-7\text{ atm}} C_6H_4(OH)COONa \xrightarrow{H^+} C_6H_4(OH)COOH$$

(ii) राइमर-टीमैन अभिक्रिया: फीनॉल की जलीय सोडियम हाइड्रॉक्साइड की उपस्थिति में क्लोरोफॉर्म ($CHCl_3$) के साथ $340\text{ K}$ पर अभिक्रिया कराने पर सैलिसिलैल्डिहाइड (2-हाइड्रॉक्सीबेन्जैल्डिहाइड) मुख्य उत्पाद बनता है:

$$C_6H_5OH + CHCl_3 + 3NaOH \rightarrow C_6H_4(OH)CHO + 3NaCl + 2H_2O$$

(iii) विलियमसन संश्लेषण द्वारा अनिसोल: सोडियम फीनॉक्साइड की अभिक्रिया मैथिल आयोडाइड (या ब्रोमाइड) से कराने पर अनिसोल (मेथॉक्सीबेंजीन) बनता है:

$$C_6H_5O^-Na^+ + CH_3-I \rightarrow C_6H_5-O-CH_3 + NaI$$

उदाहरण 3
ल्युकास परीक्षण क्या है? इसके द्वारा प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक ऐल्कोहॉलों में विभेद किस प्रकार किया जाता है? (CBSE Board High-Yield Question)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: ल्युकास अभिकर्मक (Lucas Reagent): सांद्र हाइड्रोक्लोरिक अम्ल ($HCl$) तथा निर्जल जिंक क्लोराइड ($ZnCl_2$) के 1:1 मिश्रण को ल्युकास अभिकर्मक कहते हैं।

सिद्धांत: जब ऐल्कोहॉल ल्युकास अभिकर्मक से क्रिया करता है, तो ऐल्किल क्लोराइड बनता है जो जल में अविलेय होने के कारण विलयन में धुंधलापन (Turbidity / Cloudiness) उत्पन्न करता है:

$$R-OH + HCl \xrightarrow{\text{anhyd. } ZnCl_2} R-Cl (\text{धुंधलापन}) + H_2O$$

विभेद की विधि:

  1. तृतीयक ऐल्कोहॉल ($3^\circ$): कमरे के तापमान पर ल्युकास अभिकर्मक मिलाते ही तुरंत (हाथों-हाथ) तैलीय धुंधलापन उत्पन्न होता है, क्योंकि तृतीयक कार्बोधनायन ($3^\circ R^+$) अत्यधिक स्थायी होने से तुरंत अभिक्रिया करता है।
  2. द्वितीयक ऐल्कोहॉल ($2^\circ$): कमरे के तापमान पर लगभग 5 मिनट के भीतर धुंधलापन आता है।
  3. प्राथमिक ऐल्कोहॉल ($1^\circ$): कमरे के सामान्य तापमान पर कोई धुंधलापन नहीं आता; विलयन पारदर्शी रहता है। केवल गर्म करने पर ही कुछ समय बाद धुंधलापन दिखाई देता है।
उदाहरण 4
कारण स्पष्ट कीजिए: (i) ऐल्कोहॉलों का क्वथनांक समान अणुभार वाले हाइड्रोकार्बनों व ईथरों से काफी ऊँचा होता है। (ii) तृतीयक ब्यूटिल मैथिल ईथर बनाने के लिए $(CH_3)_3C-Br + CH_3ONa$ का उपयोग क्यों नहीं किया जा सकता?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: (i) क्वथनांक ऊँचा होने का कारण: ऐल्कोहॉलों के अणुओं में अत्यधिक विद्युत-ऋणात्मक ऑक्सीजन से हाइड्रोजन सीधे जुड़ी होती है, जिसके कारण ऐल्कोहॉल के अणुओं के मध्य प्रबल अन्तराण्विक हाइड्रोजन आबंधन (Intermolecular Hydrogen Bonding) पाया जाता है। अणुओं को अलग करने हेतु अत्यधिक ऊष्मीय ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत ईथर तथा हाइड्रोकार्बनों में कोई हाइड्रोजन आबंधन नहीं होता (केवल दुर्बल वान्डर वाल्स बल होते हैं), अतः ऐल्कोहॉलों का क्वथनांक बहुत अधिक होता है।

(ii) विलियमसन संश्लेषण की सीमा: सोडियम मेथॉक्साइड ($CH_3O^-$) केवल एक अच्छा नाभिकरागी ही नहीं, बल्कि एक प्रबल क्षार (Strong Base) भी है। जब यह तृतीयक ब्यूटिल ब्रोमाइड ($(CH_3)_3C-Br$) पर आक्रमण करता है, तो तृतीयक कार्बन पर भारी त्रिविम बाधा होने के कारण प्रतिस्थापन ($S_N2$) नहीं हो पाता। इसके बजाय यह $\beta$-हाइड्रोजन को खींच लेता है और विलोपन ($E2$) अभिक्रिया संपन्न होकर मुख्य उत्पाद के रूप में 2-मेथिलप्रोपीन (Isobutylene ऐल्कीन) बन जाती है। अतः तृतीयक ईथर बनाने हेतु हमेशा प्राथमिक एल्किल हैलाइड ($CH_3Br$) तथा तृतीयक एल्कॉक्साइड ($(CH_3)_3C-O^-Na^+$) का उपयोग किया जाता है।

उदाहरण 5
निम्नलिखित ईथरों की हाइड्रोजन आयोडाइड ($HI$) के साथ अभिक्रिया के मुख्य उत्पादों की प्रागुक्ति (पूर्वानुमान) कीजिए तथा क्रियाविधि स्पष्ट कीजिए: (i) $CH_3-CH_2-O-CH_3 + HI$ (ii) $(CH_3)_3C-O-CH_3 + HI$
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: (i) $CH_3-CH_2-O-CH_3 + HI \rightarrow CH_3-I + CH_3CH_2-OH$ क्रियाविधि: यहाँ दोनों एल्किल समूह प्राथमिक ($1^\circ$) हैं। प्रथम पद में ईथर के ऑक्सीजन पर प्रोटॉनीकरण ($H^+$ जुड़ना) होता है। दूसरे पद में नाभिकरागी आयोडाइड आयन ($I^-$) $S_N2$ क्रियाविधि द्वारा कम त्रिविम बाधा वाले छोटे मैथिल समूह ($-CH_3$) पर पीछे से आक्रमण करता है। अतः मैथिल आयोडाइड ($CH_3I$) तथा एथेनॉल ($C_2H_5OH$) बनते हैं।

(ii) $(CH_3)_3C-O-CH_3 + HI \rightarrow (CH_3)_3C-I + CH_3-OH$ क्रियाविधि: यहाँ एक एल्किल समूह तृतीयक ($3^\circ$) है। प्रोटॉनीकरण के पश्चात $C-O$ आबंध टूटकर अत्यधिक स्थायी तृतीयक ब्यूटिल कार्बोधनायन ($(CH_3)_3C^+$) बनाता है ($S_N1$ क्रियाविधि)। इसके उपरांत आयोडाइड आयन इस स्थायी कार्बोधनायन से जुड़कर तृतीयक ब्यूटिल आयोडाइड बनाता है और दूसरा उत्पाद मेथेनॉल ($CH_3OH$) होता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

तृतीयक एल्किल हैलाइड की सोडियम एल्कॉक्साइड से क्रिया कराकर तृतीयक ईथर बनाना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

तृतीयक एल्किल हैलाइड के साथ विलोपन ($E2$) होकर ऐल्कीन बनती है; तृतीयक ईथर बनाने के लिए एल्किल हैलाइड को हमेशा प्राथमिक ($CH_3X$) और एल्कॉक्साइड को तृतीयक लेना होगा।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

ऐनिसोल की $HI$ से क्रिया में आयोडोबेंजीन और मेथेनॉल बनाना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

बेंजीन वलय और ऑक्सीजन के बीच अनुनाद के कारण आंशिक द्वि-आबंध होता है जो नहीं टूटता; अतः उत्पाद फीनॉल ($C_6H_5OH$) और मैथिल आयोडाइड ($CH_3I$) बनते हैं।

ऐल्कोहॉल, फीनॉल एवं ईथर: ल्युकास परीक्षण, अम्लीयता एवं ईथर संश्लेषण

ऐल्कोहॉल एवं ल्युकास परीक्षण • अभिकर्मक: सांद्र HCl + ZnCl₂ • 3° ऐल्कोहॉल: तुरंत धुंधलापन • 2° ऐल्कोहॉल: 5 मिनट में • 1° ऐल्कोहॉल: केवल गर्म करने पर • Hydroboration: Anti-Markovnikov कार्बोधनायन स्थायित्व पर आधारित फीनॉल: अनुनाद व नेम रिएक्शंस • फीनॉक्साइड आयन अत्यधिक स्थायी • अम्लीयता: पिक्रिक > NO₂-फीनॉल > फीनॉल • Kolbe: CO₂ से सैलिसिलिक अम्ल • Reimer-Tiemann: CHCl₃ से सैलिसिलैल्डिहाइड • Cumene प्रक्रम: औद्योगिक निर्माण ऐल्कोहॉल से 10⁶ गुना अधिक अम्लीय ईथर: विलियमसन व HI विदलन • Williamson: R-X (1°) + R'ONa • 3° R-X लेने पर ऐल्कीन बनती है! • HI विदलन (1°): छोटा R-I बनता है • HI विदलन (3°): 3° R-I बनता है • Anisole + HI → फीनॉल + CH₃I SN1 बनाम SN2 का सटीक नियम

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
ऐल्कीनों के अम्ल-उत्प्रेरित जलयोजन से मार्कोनीकॉफ तथा हाइड्रोबोरोनन-ऑक्सीकरण से एन्टी-मार्कोनीकॉफ ऐल्कोहॉल बनते हैं।
मुख्य बिंदु 2
फॉर्मेल्डिहाइड + RMgX से 1°, अन्य ऐल्डिहाइड से 2° तथा कीटोन से 3° ऐल्कोहॉल प्राप्त होता है।
मुख्य बिंदु 3
ल्युकास अभिकर्मक (सांद्र HCl + निर्जल ZnCl₂) द्वारा 3° ऐल्कोहॉल तुरंत, 2° 5 मिनट में तथा 1° गर्म करने पर धुंधलापन देते हैं।
मुख्य बिंदु 4
फीनॉल का औद्योगिक निर्माण क्यूमीन (आइसोप्रोपिल बेंजीन) के ऑक्सीकरण व अम्ल अपघटन द्वारा एसीटोन के साथ किया जाता है।
मुख्य बिंदु 5
फीनॉक्साइड आयन के अनुनादी स्थायित्व के कारण फीनॉल ऐल्कोहॉल की तुलना में अत्यधिक प्रबल अम्लीय होता है।
मुख्य बिंदु 6
इलेक्ट्रॉन-आकर्षी समूह (-NO₂) फीनॉल की अम्लीयता को बढ़ाते हैं, जबकि इलेक्ट्रॉन-दाता समूह (-CH₃) घटाते हैं।
मुख्य बिंदु 7
कोल्बे अभिक्रिया में सोडियम फीनॉक्साइड CO₂ से क्रिया कर सैलिसिलिक अम्ल बनाता है, जिससे एस्पिरिन संश्लेषित होती है।
मुख्य बिंदु 8
राइमर-टीमैन अभिक्रिया में फीनॉल CHCl₃ व NaOH से क्रिया कर सैलिसिलैल्डिहाइड बनाता है (मध्यवर्ती :CCl₂)।
मुख्य बिंदु 9
विलियमसन ईथर संश्लेषण में एल्किल हैलाइड हमेशा प्राथमिक होना चाहिए; तृतीयक हैलाइड लेने पर विलोपन से ऐल्कीन बनती है।
मुख्य बिंदु 10
HI द्वारा ईथर विदलन में 1°/2° समूह होने पर SN2 द्वारा छोटा एल्किल आयोडाइड तथा 3° समूह होने पर SN1 द्वारा 3° आयोडाइड बनता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
ल्युकास अभिकर्मक के साथ कमरे के ताप पर तुरंत धुंधलापन देने वाला ऐल्कोहॉल कौन सा है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C
2
निम्नलिखित में से कौन सा यौगिक सर्वाधिक प्रबल अम्लीय है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C
3
राइमर-टीमैन अभिक्रिया में भाग लेने वाला क्रियाशील इलेक्ट्रॉनरागी मध्यवर्ती कौन सा है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
4
अनिसोल (C₆H₅-O-CH₃) को सांद्र HI के साथ गर्म करने पर मुख्य उत्पाद क्या प्राप्त होते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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