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CBSE • कक्षा XII • Chemistry • अध्याय 6
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन

हैलोऐल्केन (एल्किल हैलाइड, $R-X$) तथा हैलोऐरीन (एरिल हैलाइड, $Ar-X$) कार्बनिक रसायन विज्ञान के आधारभूत स्तंभ हैं, जिनका निर्माण एलिफैटिक तथा ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बनों में हाइड्रोजन परमाणुओं के हैलोजन ($F, Cl, Br, I$) द्वारा प्रतिस्थापन से होता है। हैलोऐल्केनों में $C-X$ आबंध का कार्बन $sp^3$ संकरित होता है, जबकि हैलोऐरीनों में यह $sp^2$ संकरित होता है, जो दोनों वर्गों के भौतिक व रासायनिक व्यवहार में विशाल अंतर उत्पन्न करता है। प्रस्तुत अध्याय का केंद्रीय आकर्षण नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएं (Nucleophilic Substitution Reactions) हैं, जो दो प्रतिस्पर्धात्मक क्रियाविधियों—$S_N1$ (एक-आण्विक, दो पदों में, कार्बोधनायन मध्यवर्ती, रेसिमीकरण) तथा $S_N2$ (द्वि-आण्विक, एकल पद, संक्रमण अवस्था, वाल्डेन प्रतिलोमन Walden Inversion) द्वारा संपन्न होती हैं। इसके अतिरिक्त विलोपन अभिक्रियाएं ($E2$, सेटजेफ नियम Saytzeff Rule) तथा धातु के साथ अभिक्रियाएं (ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक $RMgX$, वुर्ट्ज, वुर्ट्ज-फिटिग व फिटिग अभिक्रिया) कार्बन-कार्बन आबंध निर्माण की शक्तिशाली विधियां प्रदान करती हैं। हैलोऐरीनों की नाभिकरागी प्रतिस्थापन के प्रति अत्यधिक मंद क्रियाशीलता (अनुनाद प्रभाव, $sp^2$ संकरण, फेनिल धनायन का अस्थायित्व) तथा पर्यावरण में पॉलीहैलोजन यौगिकों जैसे क्लोरोफॉर्म ($CHCl_3$), फ्रीऑन ($CF_2Cl_2$) एवं $D.D.T.$ के उपयोग व ओजोन क्षरण पर विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

अग्नि बुझाने वाला पाइरीन और मलेरिया का काल बना DDT: हैलोजन का दोहरा वरदान व अभिशाप!

क्या आप जानते हैं कि एक साधारण हाइड्रोकार्बन मिथेन ($CH_4$) के चारों हाइड्रोजनों को क्लोरीन से बदल देने पर बनने वाला कार्बन टेट्राक्लोराइड ($CCl_4$, पाइरीन) विद्युत उपकरणों में लगी भीषण आग को बुझा सकता है, क्योंकि यह अत्यंत भारी व अज्वलनशील वाष्प बनाकर ऑक्सीजन का संपर्क काट देता है? और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान लाखों सैनिकों को मलेरिया और टाइफस जैसी घातक बीमारियों से बचाने वाला कीटनाशक $DDT$ इतना चमत्कारी था कि इसके आविष्कारक पॉल मुलर को नोबेल पुरस्कार मिला! किंतु यही यौगिक जब खाद्य श्रृंखला में जमा होने लगे, तो पक्षियों के अंडों के छिलके पतले होकर टूटने लगे और पर्यावरण का विनाश होने लगा! आण्विक संरचना में एक हैलोजन का जुड़ना किसी अणु के गुणधर्म को अमृत से विष में कैसे बदल देता है? आइए समझें हैलोऐल्केन और हैलोऐरीन के क्रांतिकारी रसायन को!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

CBSE तथा CBSE 12वीं बोर्ड परीक्षा में 'हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन' कार्बनिक रसायन की सबसे महत्वपूर्ण नींव है जिससे 7 अंकों के प्रश्न आते हैं: 1. $S_N1$ तथा $S_N2$ क्रियाविधि में तुलना, ऊर्जा आरेख, कार्बोधनायन स्थायित्व ($3^\circ > 2^\circ > 1^\circ$) तथा त्रिविम रसायन (वालडेन प्रतिलोमन व रेसिमीकरण) पर प्रतिवर्ष 3 से 5 अंक का प्रश्न निश्चित होता है। 2. सेटजेफ नियम (Saytzeff's Rule) पर आधारित विलोपन अभिक्रिया (Dehydrohalogenation)। 3. हैलोऐरीनों की नाभिकरागी प्रतिस्थापन के प्रति अनुत्प्रेरक (कम सक्रिय) प्रकृति के चार प्रमुख कारण (अनुनाद, $sp^2$ संकरण, द्विध्रुव आघूर्ण, इलेक्ट्रॉनिक प्रतिकर्षण)। 4. नेम रिएक्शंस (Name Reactions): फिंकेलस्टाइन अभिक्रिया, स्वार्ट्ज अभिक्रिया, वुर्ट्ज-फिटिग अभिक्रिया, सैन्डमायर अभिक्रिया तथा क्लोरोफॉर्म का फॉसजीन गैस ($COCl_2$) में ऑक्सीकरण।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • कार्बन का संकरण ($sp^3, sp^2$) एवं ज्यामिति।
  • प्रेरणिक प्रभाव ($+I, -I$) एवं अनुनाद प्रभाव ($+R, -R$)।
  • नाभिकरागी (Nucleophile) तथा इलेक्ट्रॉनरागी (Electrophile) की मूलभूत अवधारणा।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • हैलोऐल्केनों एवं हैलोऐरीनों का $IUPAC$ नामकरण एवं प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक, एलिलिक व बेंजिलिक वर्गीकरण करना।
  • $S_N1$ एवं $S_N2$ अभिक्रियाओं की क्रियाविधि, वेग नियम तथा त्रिविम रासायनिक परिणामों का सटीक विश्लेषण करना।
  • अल्कोहॉल, एल्कीन तथा हैलोजन विनिमय (Finkelstein & Swarts) द्वारा हैलोऐल्केनों के निर्माण की विधियां लिखना।
  • हैलोऐरीनों के अनुनादी संरचनाओं द्वारा उनके मंद नाभिकरागी प्रतिस्थापन का वैज्ञानिक कारण स्पष्ट करना।
  • वुड-फिटिग, फिटिग एवं ग्रिग्नार्ड अभिक्रियाओं द्वारा विभिन्न हाइड्रोकार्बनों का संश्लेषण करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. हैलोऐल्केन एवं हैलोऐरीन का वर्गी...
2 2. हैलोऐल्केनों के निर्माण की महत्व...
3 3. नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाए...
4 4. हैलोऐरीन (क्लोरोबेंजीन) का रसायन...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. हैलोऐल्केन एवं हैलोऐरीन का वर्गीकरण तथा नामकरण

संरचनात्मक वर्गीकरण:

  1. $sp^3$ संकरित $C-X$ आबंध वाले यौगिक:
    • एल्किल हैलाइड (Haloalkanes): प्राथमिक ($1^\circ: R-CH_2-X$), द्वितीयक ($2^\circ: R_2CH-X$), तृतीयक ($3^\circ: R_3C-X$)।
    • एलिलिक हैलाइड (Allylic Halides): हैलोजन परमाणु द्वि-आबंध कार्बन ($C=C$) के समीपवर्ती $sp^3$ कार्बन से जुड़ा हो: $CH_2=CH-CH_2-X$।
    • बेंजिलिक हैलाइड (Benzylic Halides): हैलोजन परमाणु बेंजीन वलय से सीधे जुड़े $sp^3$ कार्बन से आबंधित हो: $C_6H_5-CH_2-X$।
  2. $sp^2$ संकरित $C-X$ आबंध वाले यौगिक:
    • वाइनिलिक हैलाइड (Vinylic Halides): हैलोजन परमाणु सीधे द्वि-आबंधित कार्बन से जुड़ा हो: $CH_2=CH-X$।
    • एरिल हैलाइड (Aryl Halides / Haloarenes): हैलोजन सीधे ऐरोमैटिक बेंजीन वलय से आबंधित हो: $C_6H_5-X$।

$C-X$ आबंध की ध्रुवीय प्रकृति:

हैलोजन की विद्युत-ऋणात्मकता कार्बन से बहुत अधिक होती है, जिसके कारण कार्बन पर आंशिक धनावेश ($\delta^+$) तथा हैलोजन पर आंशिक ऋणावेश ($\delta^-$) आ जाता है:

$$\overset{\delta^+}{C} - \overset{\delta^-}{X}$$

  • आबंध लंबाई का क्रम: $C-F < C-Cl < C-Br < C-I$ ($C-I$ सबसे लंबा व सबसे दुर्बल आबंध है)।
  • द्विध्रुव आघूर्ण क्रम: $CH_3-Cl (1.860\text{ D}) > CH_3-F (1.847\text{ D}) > CH_3-Br (1.830\text{ D}) > CH_3-I (1.636\text{ D})$। ध्यान रहे कि $CH_3Cl$ का द्विध्रुव आघूर्ण $CH_3F$ से अधिक होता है क्योंकि $C-Cl$ की आबंध दूरी $C-F$ की तुलना में अधिक प्रभावी होती है ($\mu = q \times d$)!

2. हैलोऐल्केनों के निर्माण की महत्वपूर्ण विधियाँ

(क) ऐल्कोहॉलों से (सर्वोत्तम विधियां):

  1. थायोनाइल क्लोराइड ($SOCl_2$) द्वारा (डार्जन प्रक्रम Darzens Process):

$$R-OH + SOCl_2 \xrightarrow{\text{Pyridine}} R-Cl + SO_2\uparrow + HCl\uparrow$$

यह शुद्ध एल्किल क्लोराइड बनाने की सर्वोत्तम विधि है क्योंकि उप-उत्पाद $SO_2$ तथा $HCl$ दोनों गैसें होने के कारण अभिक्रिया मिश्रण से बाहर निकल जाती हैं। 2. फास्फोरस हैलाइडों द्वारा:

$$3R-OH + PCl_3 \rightarrow 3R-Cl + H_3PO_3$$

$$R-OH + PCl_5 \rightarrow R-Cl + POCl_3 + HCl$$

  1. हैलोजन अम्लों द्वारा ($HX$):

$$R-OH + HCl \xrightarrow{\text{निर्जल } ZnCl_2} R-Cl + H_2O \quad (\text{ल्युकास अभिकर्मक})$$

(ख) हैलोजन विनिमय अभिक्रियाएं (Name Reactions):

  1. फिंकेलस्टाइन अभिक्रिया (Finkelstein Reaction): एल्किल क्लोराइड या ब्रोमाइड की शुष्क एसीटोन में सोडियम आयोडाइड ($NaI$) के साथ अभिक्रिया कराने पर एल्किल आयोडाइड बनता है:

$$R-Cl + NaI \xrightarrow{\text{Dry Acetone}} R-I + NaCl\downarrow$$

एसीटोन में $NaCl$ और $NaBr$ अविलेय होकर अवक्षेपित हो जाते हैं, जिससे ला-शातेलिए नियमानुसार अभिक्रिया अग्र दिशा में बढ़ती है। 2. स्वार्ट्ज अभिक्रिया (Swarts Reaction): एल्किल क्लोराइड/ब्रोमाइड को धात्विक फ्लोराइड जैसे $AgF, Hg_2F_2, CoF_2$ अथवा $SbF_3$ के साथ गर्म करने पर एल्किल फ्लोराइड बनता है:

$$CH_3-Br + AgF \rightarrow CH_3-F + AgBr\downarrow$$

3. नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएं ($S_N1$ बनाम $S_N2$ क्रियाविधि)

नाभिकरागी प्रतिस्थापन में एक प्रबल नाभिकरागी ($Nu^-$) एल्किल हैलाइड के धनावेशित कार्बन पर आक्रमण कर दुर्बल अवशिष्ट समूह (हैलोजन आयन, $X^-$) को प्रतिस्थापित कर देता है:

$$R-X + Nu^- \rightarrow R-Nu + X^-$$

विस्तृत तुलनात्मक तालिका ($S_N1$ vs $S_N2$):

गुणधर्म $S_N1$ (एक-आण्विक प्रतिस्थापन) $S_N2$ (द्वि-आण्विक प्रतिस्थापन)
पदों की संख्या दो पद (Two steps) एकल पद (Single step)
मध्यवर्ती समतलीय कार्बोधनायन ($R^+$) बनता है कोई मध्यवर्ती नहीं, पंच-संयोजी संक्रमण अवस्था (Transition State)
अभिक्रिया वेग $\text{Rate} = k[R-X]$ (प्रथम कोटि) $\text{Rate} = k[R-X][Nu^-]$ (द्वितीय कोटि)
क्रियाशीलता क्रम $3^\circ > 2^\circ > 1^\circ > CH_3X$ (कार्बोधनायन स्थायित्व पर) $CH_3X > 1^\circ > 2^\circ > 3^\circ$ (त्रिविम बाधा Steric Hindrance कम होने पर)
त्रिविम रसायन रेसिमीकरण (Racemisation) (समतलीय $R^+$ पर दोनों ओर से आक्रमण) वालडेन प्रतिलोमन (Inversion of Configuration) (पीछे से आक्रमण Backside attack)
विलायक ध्रुवीय प्रोटिक विलायक ($H_2O, ROH$) अनुकूल ध्रुवीय अप्रोटिक विलायक ($Acetone, DMSO, DMF$) अनुकूल
नाभिकरागी दुर्बल नाभिकरागी ($H_2O, ROH$) पर्याप्त प्रबल नाभिकरागी ($OH^-, RO^-, CN^-$) आवश्यक

विलोपन अभिक्रिया (Elimination Reaction - $\beta$-विलोपन):

जब $\beta$-हाइड्रोजन युक्त एल्किल हैलाइड को एल्कोहॉलिक $KOH$ के साथ गर्म किया जाता है, तो ऐल्कीन बनती है।

  • सेटजेफ नियम (Saytzeff's Rule): यदि विलोपन से एक से अधिक ऐल्कीन बनने की संभावना हो, तो वह ऐल्कीन मुख्य उत्पाद (Major Product) बनती है जिसके द्वि-आबंधित कार्बनों पर एल्किल समूहों की संख्या अधिकतम हो (अधिक प्रतिस्थापित ऐल्कीन):

$$CH_3-CH_2-CH(Br)-CH_3 \xrightarrow{\text{alc. } KOH} \underset{\text{मुख्य उत्पाद (81%)}}{\text{But-2-ene}} + \underset{\text{अल्प उत्पाद (19%)}}{\text{But-1-ene}}$$

4. हैलोऐरीन (क्लोरोबेंजीन) का रसायन एवं कम क्रियाशीलता

नाभिकरागी प्रतिस्थापन के प्रति हैलोऐरीनों की कम क्रियाशीलता के कारण:

क्लोरोबेंजीन ($C_6H_5Cl$) साधारण परिस्थितियों में जलीय $NaOH$ के साथ प्रतिस्थापन नहीं दर्शाता। इसके 4 वैज्ञानिक कारण हैं:

  1. अनुनाद प्रभाव (Resonance Effect): क्लोरीन के अयुग्मित इलेक्ट्रॉन युग्म बेंजीन वलय के $\pi$-इलेक्ट्रॉनों के साथ संयुग्मन में होते हैं। अनुनादी संरचनाओं में $C-Cl$ आबंध में आंशिक द्वि-आबंध लक्षण (Partial Double Bond Character) आ जाता है, जिससे इसे तोड़ना $R-X$ के एकल आबंध की तुलना में बहुत कठिन होता है।
  2. कार्बन परमाणु के संकरण में अंतर: हैलोऐल्केन में कार्बन $sp^3$ संकरित होता है (25% s-लक्षण), जबकि हैलोऐरीन में कार्बन $sp^2$ संकरित होता है (33.3% s-लक्षण)। अधिक s-लक्षण के कारण $sp^2$ कार्बन अधिक विद्युत-ऋणात्मक होता है और $C-Cl$ आबंध इलेक्ट्रॉन युग्म को अधिक मजबूती से पकड़ता है, जिससे आबंध लंबाई छोटी ($169\text{ pm}$) व दृढ़ होती है।
  3. फेनिल धनायन का अस्थायित्व: यदि विषम-अपघटनी विदलन हो भी जाए, तो बनने वाला फेनिल धनायन ($C_6H_5^+$) अनुनाद द्वारा स्थायीकृत नहीं हो सकता।
  4. इलेक्ट्रॉनिक प्रतिकर्षण: इलेक्ट्रॉन-धनी नाभिकरागी जब इलेक्ट्रॉन-धनी बेंजीन वलय के समीप आता है, तो उनके बीच स्थिर-विद्युत प्रतिकर्षण होता है।

डाउ प्रक्रम (Dow's Process - कठोर परिस्थितियां):

जब क्लोरोबेंजीन को $623\text{ K}$ ताप तथा $300\text{ atm}$ उच्च दाब पर $NaOH$ के साथ गर्म किया जाता है और फिर अम्लीकरण करते हैं, तब फीनॉल बनता है:

$$C_6H_5-Cl + NaOH \xrightarrow{623\text{ K}, 300\text{ atm}} C_6H_5-ONa \xrightarrow{H^+} C_6H_5-OH$$

यदि ऑर्थो व पैरा स्थितियों पर प्रबल इलेक्ट्रॉन-आकर्षी समूह ($-NO_2$) उपस्थित हों, तो नाभिकरागी प्रतिस्थापन सुगमता से होता है क्योंकि $-NO_2$ मध्यवर्ती कार्बेनायन के ऋणावेश को अनुनाद द्वारा स्थायी कर देता है!

धातु के साथ अभिक्रियाएं (Name Reactions):

  1. वुर्ट्ज-फिटिग अभिक्रिया (Wurtz-Fittig Reaction):

$$Ar-X + 2Na + R-X \xrightarrow{\text{Dry Ether}} Ar-R + 2NaX \quad (\text{एल्किल बेंजीन, जैसे टॉलुईन})$$

  1. फिटिग अभिक्रिया (Fittig Reaction):

$$2Ar-X + 2Na \xrightarrow{\text{Dry Ether}} Ar-Ar + 2NaX \quad (\text{डाइफेनिल Diphenyl})$$

महत्वपूर्ण रासायनिक सूत्र, अभिक्रियाएँ एवं समीकरण

$S_N1$ वेग नियम एवं क्रियाशीलता क्रम
Rate = k[R-X]; 3° > 2° > 1° > CH3X (कार्बोधनायन स्थायित्व: 3° > 2° > 1° > CH3+; विलायक: ध्रुवीय प्रोटिक; रेसिमीकरण)।
$S_N2$ वेग नियम एवं क्रियाशीलता क्रम
Rate = k[R-X][Nu-]; CH3X > 1° > 2° > 3° (त्रिविम बाधा कम होने पर; संक्रमण अवस्था; वाल्डेन प्रतिलोमन)।
सेटजेफ विलोपन नियम (Saytzeff Rule)
R-CH2-CH(X)-CH3 + alc. KOH -> R-CH=CH-CH3 (अधिक प्रतिस्थापित एल्कीन मुख्य उत्पाद बनती है)।
हैलोजन विनिमय एवं कपलिंग अभिक्रियाएं
Finkelstein: R-Cl + NaI (Acetone) -> R-I; Swarts: R-Br + AgF -> R-F; Wurtz-Fittig: Ar-X + 2Na + R-X -> Ar-R; Fittig: 2Ar-X + 2Na -> Ar-Ar.

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
$S_N1$ तथा $S_N2$ अभिक्रियाओं में चार प्रमुख अंतर लिखिए। प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड $S_N2$ क्रियाविधि क्यों दर्शाते हैं? (CBSE Board 5 Marks Question)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: 1. $S_N1$ तथा $S_N2$ में चार प्रमुख अंतर: (i) कोटि एवं पद: $S_N1$ अभिक्रिया दो पदों में संपन्न होती है और प्रथम कोटि की होती है (वेग = $k[R-X]$), जबकि $S_N2$ एकल पद में संपन्न होती है और द्वितीय कोटि की होती है (वेग = $k[R-X][Nu^-]$)। (ii) मध्यवर्ती: $S_N1$ में मध्यवर्ती समतलीय कार्बोधनायन ($R^+$) बनता है, जबकि $S_N2$ में कोई मध्यवर्ती नहीं बनता बल्कि एक पंच-संयोजी संक्रमण अवस्था (Transition state) बनती है। (iii) क्रियाशीलता क्रम: $S_N1$ में क्रियाशीलता का क्रम $3^\circ > 2^\circ > 1^\circ$ (कार्बोधनायन के स्थायित्व पर आधारित), जबकि $S_N2$ में क्रम $1^\circ > 2^\circ > 3^\circ$ (त्रिविम बाधा के आधार पर) होता है। (iv) त्रिविम रसायन: $S_N1$ में रेसिमीकरण (Racemisation) होता है, जबकि $S_N2$ में विन्यास का पूर्ण वाल्डेन प्रतिलोमन (Inversion of Configuration) होता है।

2. प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड ($1^\circ$) द्वारा $S_N2$ दर्शाने का कारण: प्राथमिक ऐल्किल हैलाइडों ($CH_3X$ या $R-CH_2-X$) में कार्बन पर केवल छोटे हाइड्रोजन परमाणु या केवल एक एल्किल समूह जुड़ा होता है, जिससे त्रिविम बाधा (Steric Hindrance) नगण्य होती है। अतः आने वाला नाभिकरागी कार्बन पर पीछे से आसानी से आक्रमण कर संक्रमण अवस्था बना लेता है। इसके विपरीत, $1^\circ$ कार्बोधनायन अत्यधिक अस्थायी होता है, इसलिए यह $S_N1$ पथ का अनुसरण नहीं करता।

उदाहरण 2
क्लोरोबेंजीन नाभिकरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के प्रति ऐल्किल क्लोराइडों की तुलना में अत्यधिक कम क्रियाशील क्यों होती है? कोई तीन वैज्ञानिक कारण लिखिए। (CBSE Board High-Yield Question)
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: क्लोरोबेंजीन की नाभिकरागी प्रतिस्थापन के प्रति अत्यंत मंद क्रियाशीलता के तीन प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  1. अनुनाद प्रभाव (Resonance Effect): क्लोरीन परमाणु पर उपस्थित एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म ($:Cl:$) बेंजीन वलय के $\pi$-इलेक्ट्रॉनों के साथ अनुनाद में भाग लेते हैं। इसके फलस्वरूप $C-Cl$ आबंध में आंशिक द्वि-आबंध लक्षण (Partial Double Bond Character) आ जाता है। द्वि-आबंध की सामर्थ्य एकल आबंध से अधिक होती है, अतः इसे तोड़ना अत्यंत कठिन होता है।
  2. $C-Cl$ आबंध के कार्बन का $sp^2$ संकरण: क्लोरोबेंजीन में क्लोरीन से जुड़ा कार्बन $sp^2$ संकरित होता है (33.3% s-लक्षण), जबकि ऐल्किल क्लोराइड में कार्बन $sp^3$ संकरित होता है (25% s-लक्षण)। अधिक s-लक्षण होने से $sp^2$ कार्बन अधिक विद्युत-ऋणात्मक होता है तथा आबंध इलेक्ट्रॉन युग्म को नाभिक के पास कसकर रखता है, जिससे $C-Cl$ आबंध लंबाई छोटी ($169\text{ pm}$) व दृढ़ हो जाती है।
  3. इलेक्ट्रॉनिक प्रतिकर्षण: आक्रमणकारी नाभिकरागी स्वयं इलेक्ट्रॉन-धनी होता है। जब वह बेंजीन वलय की ओर बढ़ता है, तो वलय का विस्तृत $\pi$-इलेक्ट्रॉन अभ्र उसे स्थिर-विद्युत रूप से प्रतिकर्षित करता है।
उदाहरण 3
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में मुख्य कार्बनिक उत्पाद की संरचना एवं नाम लिखिए: (i) $CH_3-CH(Br)-CH_2-CH_3 + \text{alc. } KOH \xrightarrow{\Delta}$ (ii) $CH_3-CH_2-Cl + NaI \xrightarrow{\text{Dry Acetone}}$ (iii) $C_6H_5-Cl + 2Na + CH_3-Cl \xrightarrow{\text{Dry Ether}}$
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर: (i) ब्यूट-2-ईन ($CH_3-CH=CH-CH_3$): यह सेटजेफ विलोपन ($\beta$-elimination) अभिक्रिया है। यहाँ द्वितीयक हैलाइड से हाइड्रोजन निकलने पर अधिक प्रतिस्थापित और अधिक स्थायी ऐल्कीन ब्यूट-2-ईन मुख्य उत्पाद (81%) बनती है। (ii) आयोडोएथेन ($CH_3-CH_2-I$): यह फिंकेलस्टाइन अभिक्रिया (Finkelstein reaction) है। एसीटोन में $NaCl$ अवक्षेपित हो जाता है और एथिल आयोडाइड प्राप्त होता है। (iii) टॉलुईन ($C_6H_5-CH_3$): यह वुर्ट्ज-फिटिग अभिक्रिया (Wurtz-Fittig reaction) है, जिसमें एरिल हैलाइड और एल्किल हैलाइड सोडियम धातु के साथ शुष्क ईथर की उपस्थिति में जुड़कर एल्किल बेंजीन बनाते हैं।

उदाहरण 4
क्लोरोफॉर्म को गहरे रंग की बोतलों में मुँह तक भरकर तथा थोड़ा एथेनॉल मिलाकर अंधेरे में क्यों रखा जाता है? रासायनिक समीकरण सहित स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. फॉसजीन गैस का निर्माण: क्लोरोफॉर्म ($CHCl_3$) वायु की ऑक्सीजन तथा सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में धीरे-धीरे ऑक्सीकृत होकर अत्यंत विषैली व दमघोंटू गैस फॉसजीन (कार्बोनिल क्लोराइड, $COCl_2$) बनाती है:

$$2CHCl_3 + O_2 \xrightarrow{\text{प्रकाश}} 2COCl_2 (\text{फॉसजीन}) + 2HCl$$

यदि क्लोरोफॉर्म को निश्चेतक (Anesthetic) के रूप में प्रयुक्त किया जाए, तो फॉसजीन की उपस्थिति रोगी की मृत्यु का कारण बन सकती है। 2. सुरक्षात्मक उपाय:

  • गहरे रंग (भूरे/नीले) की बोतलें प्रकाश को रोकती हैं और मुँह तक भरने से हवा (ऑक्सीजन) के लिए स्थान नहीं बचता।
  • इसमें लगभग 1% एथिल ऐल्कोहॉल ($C_2H_5OH$) मिला दिया जाता है, जो दो कार्य करता है: (क) यह ऋणात्मक उत्प्रेरक (Negative Catalyst) के रूप में ऑक्सीकरण की गति को धीमा करता है, तथा (ख) यदि थोड़ी फॉसजीन बन भी जाए, तो उससे क्रिया कर उसे अविषाक्त डाइएथिल कार्बोनेट में बदल देता है:

$$COCl_2 + 2C_2H_5OH \rightarrow CO(OC_2H_5)_2 (\text{डाइएथिल कार्बोनेट}) + 2HCl$$

उदाहरण 5
वालडेन प्रतिलोमन (Walden Inversion) एवं रेसिमीकरण (Racemisation) से आप क्या समझते हैं? त्रिविम रासायनिक दृष्टिकोण से व्याख्या कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:

  1. वालडेन प्रतिलोमन (Inversion of Configuration): $S_N2$ अभिक्रिया में आने वाला नाभिकरागी ($Nu^-$) अवशिष्ट समूह ($X^-$) के ठीक विपरीत (180° पीछे) से आक्रमण करता है। अभिक्रिया के पूर्ण होने पर कार्बन के अन्य तीनों बंधों की दिशा उलट जाती है, ठीक वैसे ही जैसे तेज आंधी में छाता उलट जाता है। प्रकाशिक सक्रिय यौगिक के विन्यास के इस पूर्ण उलट जाने को वालडेन प्रतिलोमन कहते हैं (जैसे $d$-रूप का $l$-रूप में बदलना)।

  2. रेसिमीकरण (Racemisation): $S_N1$ अभिक्रिया के प्रथम पद में हैलोजन के हटने पर एक समतलीय (Planar) $sp^2$ संकरित कार्बोधनायन मध्यवर्ती बनता है। दूसरे पद में नाभिकरागी समतल के ऊपर (Front-side) अथवा नीचे (Back-side) दोनों ओर से 50-50% समान प्रायिकता से आक्रमण कर सकता है। इसके फलस्वरूप 50% अणु समान विन्यास वाले (Retention) तथा 50% अणु उल्टे विन्यास वाले (Inversion) बनते हैं। इस प्रकार प्राप्त 1:1 मिश्रण प्रकाशिक अक्रिय (Optically Inactive) हो जाता है, जिसे रेसिमिक मिश्रण ($d,l$ या $\pm$) कहते हैं और इस प्रक्रम को रेसिमीकरण कहा जाता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

$S_N1$ और $S_N2$ के क्रियाशीलता क्रम को आपस में मिला देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

$S_N1$ में क्रम $3^\circ > 2^\circ > 1^\circ$ (कार्बोधनायन के स्थायित्व द्वारा नियंत्रित) होता है, जबकि $S_N2$ में क्रम $1^\circ > 2^\circ > 3^\circ$ (त्रिविम बाधा द्वारा नियंत्रित) होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

क्लोरोबेंजीन को सामान्य ताप पर $NaOH$ से अभिकृत कराकर फीनॉल बना देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

क्लोरोबेंजीन अनुनाद के कारण सामान्य ताप पर अभिक्रिया नहीं करता; इसके लिए डाउ प्रक्रम की कठोर परिस्थितियां ($623\text{ K}, 300\text{ atm}$) आवश्यक हैं।

हैलोऐल्केन व हैलोऐरीन: SN1 बनाम SN2 एवं अभिक्रिया मानचित्र

SN1: एक-आण्विक प्रतिस्थापन • दो पद (Two Steps) • मध्यवर्ती: कार्बोधनायन (R⁺) • वेग = k[R-X] (प्रथम कोटि) • क्रम: 3° > 2° > 1° > CH₃X • परिणाम: रेसिमीकरण (50:50) ध्रुवीय प्रोटिक विलायक अनुकूल SN2: द्वि-आण्विक प्रतिस्थापन • एकल पद (Single Step) • संक्रमण अवस्था (Transition State) • वेग = k[R-X][Nu⁻] (द्वितीय कोटि) • क्रम: CH₃X > 1° > 2° > 3° • परिणाम: वाल्डेन प्रतिलोमन (100%) कम त्रिविम बाधा आवश्यक हैलोऐरीन व महत्वपूर्ण नेम रिएक्शंस • C-Cl आंशिक द्वि-आबंध (अनुनाद) • Dow's Process: 623 K, 300 atm • Wurtz-Fittig: Ar-X + R-X → Ar-R • Fittig: 2 Ar-X → Ar-Ar • Saytzeff: अधिक प्रतिस्थापित ऐल्कीन कार्बनिक संश्लेषण की आधारशिला

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
हैलोऐल्केन में कार्बन sp³ तथा हैलोऐरीन में कार्बन sp² संकरित होता है।
मुख्य बिंदु 2
थायोनाइल क्लोराइड (SOCl₂) द्वारा एल्कोहॉल से एल्किल क्लोराइड का निर्माण डार्जन प्रक्रम कहलाता है जो शुद्धतम उत्पाद देता है।
मुख्य बिंदु 3
हैलोजन विनिमय: फिंकेलस्टाइन अभिक्रिया द्वारा एल्किल आयोडाइड तथा स्वार्ट्ज अभिक्रिया द्वारा एल्किल फ्लोराइड बनाए जाते हैं।
मुख्य बिंदु 4
SN1 अभिक्रिया दो पदों में संपन्न होती है, कार्बोधनायन मध्यवर्ती बनता है और क्रियाशीलता 3° > 2° > 1° तथा रेसिमीकरण होता है।
मुख्य बिंदु 5
SN2 अभिक्रिया एकल पद में संक्रमण अवस्था द्वारा संपन्न होती है, क्रियाशीलता 1° > 2° > 3° तथा वाल्डेन प्रतिलोमन होता है।
मुख्य बिंदु 6
सेटजेफ नियम के अनुसार विलोपन अभिक्रिया में वह ऐल्कीन मुख्य उत्पाद बनती है जिसमें द्वि-आबंध पर अधिक एल्किल प्रतिस्थापी हों।
मुख्य बिंदु 7
हैलोऐरीन अनुनाद, sp² संकरण तथा इलेक्ट्रॉनिक प्रतिकर्षण के कारण नाभिकरागी प्रतिस्थापन के प्रति अत्यंत कम क्रियाशील होते हैं।
मुख्य बिंदु 8
डाउ प्रक्रम द्वारा उच्च ताप (623 K) व दाब (300 atm) पर क्लोरोबेंजीन से फीनॉल का निर्माण किया जाता है।
मुख्य बिंदु 9
वुर्ट्ज-फिटिग अभिक्रिया में एल्किल व एरिल हैलाइड के मिश्रण से एल्किल बेंजीन तथा फिटिग अभिक्रिया में डाइफेनिल बनता है।
मुख्य बिंदु 10
क्लोरोफॉर्म सूर्य के प्रकाश व वायु में विषैली फॉसजीन गैस (COCl₂) बनाता है, जिसे रोकने हेतु 1% एथेनॉल मिलाया जाता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
निम्नलिखित में से कौन सा यौगिक SN1 अभिक्रिया के प्रति सर्वाधिक क्रियाशील होगा?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C
2
स्वार्ट्ज अभिक्रिया (Swarts Reaction) का मुख्य उपयोग किसे बनाने के लिए किया जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
3
2-ब्रोमोब्यूटेन को एल्कोहॉलिक KOH के साथ गर्म करने पर मुख्य उत्पाद क्या प्राप्त होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: B
4
SN2 अभिक्रिया के दौरान प्रकाशिक सक्रिय अभिकारक के विन्यास में क्या परिवर्तन होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: C
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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