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ICSE • कक्षा 8 • Hindi • अध्याय 6
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

बतुकम्मा

आईसीएसई कक्षा 8 हिन्दी पाठ्यचर्या के अंतर्गत "बतुकम्मा" तेलंगाना राज्य के अत्यंत जीवंत, रंगारंग और आस्था से परिपूर्ण राजकीय पुष्प-उत्सव (फूलों के त्योहार) पर आधारित एक अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं सांस्कृतिक अध्याय है। बतुकम्मा तेलुगु संस्कृति की आत्मा, नारीत्व के सम्मान, प्रकृति-पूजा तथा मातृ-शक्ति (माता गौरी) की आराधना का नौ दिवसीय भव्य लोकपर्व है, जो आश्विन मास के पितृ अमावस्या (महालय) से प्रारंभ होकर दुर्गाष्टमी (सद्दुला बतुकम्मा) तक उल्लासपूर्वक मनाया जाता है। तेलुगु भाषा में "बतुकम्मा" का शाब्दिक अर्थ होता है—"माँ! जीवित रहो" या "हे जीवनदायिनी माँ! हमें जीवन दो"। इस उत्सव में महिलाएं विभिन्न प्रकार के मौसमी औषधीय एवं सुगंधित वनों के फूलों (गुनुगु, तंगेडु, चामंती, गड्डी पुव्वु) को सात परतों में पीतल या तांबे की थाली (तांबालम) में शंक्वाकार मंदिर के गोपुरम की भांति अत्यंत कलात्मकता से सजाती हैं और उसके शीर्ष पर हल्दी की गौरी (गौरम्मा) स्थापित करती हैं। सायंकाल पारंपरिक वस्त्रों (पट्टू साड़ियों) में सुसज्जित होकर महिलाएं बतुकम्मा के चारों ओर गोल घेरा बनाकर मधुर लोकगीत गाते हुए नृत्य करती हैं। अंतिम दिन बतुकम्मा का पवित्र जल-स्रोतों में विसर्जन किया जाता है। प्रस्तुत अध्ययन सामग्री में बतुकम्मा की पौराणिक कथाएं, सामाजिक व पर्यावरणीय महत्व तथा अभ्यास प्रश्नोत्तरी का सांगोपांग विवेचन प्रस्तुत है।

संसार में केवल पत्थर, मिट्टी या धातु की मूर्तियों की पूजा क्यों होती है? जानिए उस अनूठे त्योहार के बारे में जहां प्रकृति के रंग-बिरंगे जीवित फूलों का मंदिर बनाया जाता है!

जब समूचा भारत शारदीय नवरात्रि में माँ दुर्गा की मिट्टी की प्रतिमाओं की आराधना में लीन होता है, तब दक्षिण भारत के तेलंगाना राज्य की धरती पर एक अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है। वहाँ कोई मिट्टी या धातु की मूर्ति नहीं लाई जाती, बल्कि खेतों, जंगलों और पहाड़ियों से तोड़े गए लाखों रंग-बिरंगे, ताजे, सुगंधित फूलों को शंकु के आकार में पिरामिड की तरह सजाकर साक्षात प्रकृति-माता का रूप दिया जाता है! यही है बतुकम्मा—विश्व का एकमात्र ऐसा महापर्व जो पूर्णतः ताजे फूलों और प्रकृति को समर्पित है! इन फूलों में केवल सुंदरता ही नहीं होती; तंगेडु और गुनुगु जैसे जंगली फूलों में ऐसे चमत्कारी औषधीय गुण होते हैं कि जब वे जल में विसर्जित होते हैं, तो वे तालाबों के जल को बैक्टीरिया-मुक्त और शुद्ध कर देते हैं! बतुकम्मा का शाब्दिक अर्थ क्या है? क्यों इसे नारी अस्मिता का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है? आइए, इस सुरमयी लोक-पर्व की खुशबू का अनुभव करें।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

यह अध्याय विद्यार्थियों को भारत की समृद्ध लोक-संस्कृति, क्षेत्रीय पर्वों, प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण तथा नारी-सशक्तिकरण के पावन मूल्यों से अवगत कराता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • भारतीय लोक-त्योहारों (नवरात्रि, पोंगल, ओणम) की सामान्य समझ।
  • प्रकृति पूजा एवं फूलों के औषधीय गुणों की प्रारंभिक जानकारी।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • बतुकम्मा उत्सव की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं पौराणिक पृष्ठभूमि को समझना।
  • फूलों की पिरामिडनुमा सजावट और प्रयुक्त औषधीय वनस्पतियों के पर्यावरणीय महत्व का विश्लेषण करना।
  • सामूहिक लोक-नृत्य, पारंपरिक गीतों और सामाजिक समरसता की भावना को आत्मसात करना।
  • पाठगत क्षेत्रीय शब्दावली, व्याकरणिक प्रयोगों एवं प्रश्नोत्तरों में दक्षता प्राप्त करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. बतुकम्मा का अर्थ एवं उत्सव का स्...
2 2. फूलों की कलात्मक सजावट एवं पर्या...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. बतुकम्मा का अर्थ एवं उत्सव का स्वरूप

अर्थ व स्वरूप
A. शाब्दिक अर्थ:

तेलुगु भाषा में 'बतुकु' का अर्थ है—जीवन/जीना, और 'अम्मा' का अर्थ है—माता। इस प्रकार 'बतुकम्मा' का अर्थ है—"हे जीवनदायिनी माँ! जीवित रहो / हमें जीवन प्रदान करो"।

B. नौ दिवसीय महापर्व:
  • यह उत्सव भाद्रपद मास की अमावस्या (महालय अमावस्या) से प्रारंभ होकर आश्विन मास की दुर्गाष्टमी (सद्दुला बतुकम्मा) तक पूरे नौ दिनों तक उल्लासपूर्वक मनाया जाता है।
  • प्रथम दिन को 'एंगिली पूला बतुकम्मा' तथा नौवें व अंतिम दिन को 'सद्दुला बतुकम्मा' (महा-बतुकम्मा) कहा जाता है।

2. फूलों की कलात्मक सजावट एवं पर्यावरणीय विज्ञान

पर्यावरणीय सौंदर्य
A. शंक्वाकार गोपुरम निर्माण:

एक चौड़ी पीतल या तांबे की थाली (तांबालम) में पत्तों का आधार बनाकर मौसमी वनों के फूलों को वृत्ताकार क्रम में एक के ऊपर एक परत दर परत शंक्वाकार रूप में मंदिर के गोपुरम की भांति सजाया जाता है:

  • प्रमुख फूल: तंगेडु (पीले पुष्प), गुनुगु (सफेद व गुलाबी शंक्वाकार), चामंती (गुलदाउदी), कटला, मल्ले (चमेली), गन्धेर।
  • गौरम्मा की स्थापना: फूलों के शिखर पर शुद्ध हल्दी से बनी गौरी माता (गौरम्मा) की लघु पिंडिका रखी जाती है, जिसे अक्षत और कुमकुम से पूजा जाता है।
B. जल-शुद्धिकरण का प्राचीन विज्ञान:

तंगेडु और गुनुगु के फूलों में रोगाणुरोधी (Antibacterial) एवं जल-शोधक औषधीय गुण होते हैं। जब लाखों बतुकम्मा झीलों, बावड़ियों और तालाबों में विसर्जित की जाती हैं, तो इन फूलों के प्राकृतिक रस से वर्षा ऋतु के बाद गंदला हुआ जलाशयों का पानी कीटाणुमुक्त और शुद्ध हो जाता है!

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

बतुकम्मा शब्दार्थ सूत्र
"बतुकु" (जीवन) + "अम्मा" (माता) = "हे जीवनदायिनी माँ, सदा जीवित रहो"
तेलुगु लोक-संस्कृति की सर्वोच्च नारी-शक्ति वंदना।

हिन्दी: बतुकम्मा पुष्प-उत्सव की संरचना एवं सांस्कृतिक परंपरा

बतुकम्मा: तेलंगाना का भव्य लोक-पुष्प पर्व एवं पर्यावरण चेतना बतुकम्मा पुष्प-शिखर संरचना हल्दी की गौरम्मा सात रंगों व परतों में सजे औषधीय पुष्प तंगेडु • गुनुगु • चामंती • कटला फूल सांस्कृतिक व पर्यावरणीय महत्व • नौ दिवसीय मातृ-शक्ति व प्रकृति उत्सव • महिलाओं द्वारा सामूहिक गोल घेरे में नृत्य व गान • पारंपरिक पट्टू (रेशम) साड़ियों का वैभव • जल-शुद्धिकरण: औषधीय फूलों से तालाब स्वच्छ • सद्दुला बतुकम्मा: नवमी पर जलाशयों में विसर्जन • प्रसाद: 'मलेदा' (गुड़ व भुने मक्के/चावल का चूर्ण) प्रकृति और नारी शक्ति की जयकार • बतुकम्मा भारतीय लोक-संस्कृति का गौरवशाली पर्व है

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
बतुकम्मा तेलंगाना राज्य का अत्यंत प्रसिद्ध राजकीय पुष्प-उत्सव है।
मुख्य बिंदु 2
तेलुगु में "बतुकम्मा" का अर्थ है "हे जीवनदायिनी माँ! सदा जीवित रहो"।
मुख्य बिंदु 3
यह पर्व महालय अमावस्या से दुर्गाष्टमी तक नौ दिनों तक मनाया जाता है।
मुख्य बिंदु 4
अंतिम दिन को "सद्दुला बतुकम्मा" (महा-बतुकम्मा) कहा जाता है।
मुख्य बिंदु 5
महिलाएं वनों से तंगेडु, गुनुगु और चामंती जैसे औषधीय फूल एकत्र करती हैं।
मुख्य बिंदु 6
फूलों को थाली में सात परतों में पिरामिड (शंक्वाकार मंदिर गोपुरम) के रूप में सजाया जाता है।
मुख्य बिंदु 7
फूलों के शीर्ष पर हल्दी से निर्मित गौरी माता (गौरम्मा) की स्थापना की जाती है।
मुख्य बिंदु 8
शाम को महिलाएं नए वस्त्र पहनकर बतुकम्मा के चारों ओर गोल घेरा बनाकर लोकगीत गाती हैं।
मुख्य बिंदु 9
तंगेडु और गुनुगु के औषधीय फूल विसर्जित होकर जलाशयों के जल को शुद्ध करते हैं।
मुख्य बिंदु 10
यह उत्सव नारी-सम्मान, सामाजिक समरसता और पर्यावरण संरक्षण का अनुपम संदेश देता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
"बतुकम्मा" किस राज्य का प्रमुख लोक-पर्व है? इसका शाब्दिक अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

• राज्य: बतुकम्मा दक्षिण भारत के तेलंगाना राज्य का प्रमुख और अत्यंत लोकप्रिय राजकीय लोक-उत्सव है।
• शाब्दिक अर्थ: तेलुगु भाषा में "बतुकु" का अर्थ है—जीवन/जीना तथा "अम्मा" का अर्थ है—माँ। इस प्रकार बतुकम्मा का अर्थ है: "हे जीवनदायिनी माँ! जीवित रहो" अथवा "हे माँ! हमें जीवन का वरदान दो"। यह साक्षात प्रकृति रूपी मातृ-शक्ति (गौरी) की वंदना है।


तेलंगाना राज्य का पर्व; अर्थ: "हे जीवनदायिनी माँ! जीवित रहो"।
2
बतुकम्मा की सजावट किस प्रकार की जाती है और इसके शीर्ष पर किसकी स्थापना होती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

• सजावट: एक चौड़ी पीतल या तांबे की थाली (तांबालम) में पत्तों का आधार बनाकर रंग-बिरंगे सुगंधित एवं औषधीय फूलों (तंगेडु, गुनुगु, चामंती, कनकंबरा) को गोल चक्राकार क्रम में एक के ऊपर एक सात परतों में पिरामिड (मंदिर के गोपुरम) की भांति अत्यंत कलात्मकता से सजाया जाता है।
• शीर्ष पर स्थापना: फूलों के इस शंकु के सर्वोच्च शिखर पर शुद्ध हल्दी से बनाई गई माता गौरी (गौरम्मा) की छोटी पिंडी स्थापित की जाती है और उस पर कुमकुम लगाया जाता है।


पीतल की थाली में सात परतों में पिरामिडनुमा फूलों की सजावट; शीर्ष पर हल्दी की गौरम्मा की स्थापना।
3
बतुकम्मा उत्सव का पर्यावरणीय एवं वैज्ञानिक महत्व क्या है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

• बतुकम्मा में उपयोग किए जाने वाले मुख्य जंगली फूल जैसे तंगेडु (पीले फूल) और गुनुगु अत्यधिक रोगाणुरोधी (Antibacterial) और औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं।
• वर्षा ऋतु की समाप्ति पर तालाबों और झीलों का जल गंदला हो जाता है। जब उत्सव के अंतिम दिन हजारों बतुकम्मा को जलाशयों में विसर्जित किया जाता है, तो इन फूलों के औषधीय तत्व पानी में घुलकर जल को बैक्टीरिया-मुक्त और शुद्ध कर देते हैं।
• यह पर्व यह सिद्ध करता है कि भारतीय लोक-त्योहारों में प्राचीन पर्यावरण-संरक्षण विज्ञान गहराई से समाहित है।


तंगेडु और गुनुगु के औषधीय फूल जलाशयों के पानी को बैक्टीरिया-मुक्त और स्वच्छ बनाते हैं।
4
बतुकम्मा उत्सव कितने दिनों तक चलता है? इसके प्रथम और अंतिम दिन को क्या कहते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

• अवधि: बतुकम्मा उत्सव पूरे नौ दिनों तक उल्लासपूर्वक चलता है।
• प्रथम दिन: भाद्रपद अमावस्या को पड़ने वाले पहले दिन को "एंगिली पूला बतुकम्मा" कहा जाता है।
• अंतिम दिन: आश्विन मास की दुर्गाष्टमी पर पड़ने वाले नौवें व सबसे बड़े उत्सव के दिन को "सद्दुला बतुकम्मा" (महा-बतुकम्मा) कहा जाता है।


नौ दिन चलता है; पहला दिन "एंगिली पूला बतुकम्मा", अंतिम दिन "सद्दुला बतुकम्मा"।
5
बतुकम्मा उत्सव के अवसर पर महिलाएं किस प्रकार का नृत्य और गायन करती हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

सायंकाल महिलाएं सुंदर पारंपरिक रेशमी वस्त्रों (पट्टू साड़ियों) और आभूषणों से सुसज्जित होकर अपने घरों के आंगनों या सार्वजनिक मैदानों में बतुकम्मा को मध्य में रखती हैं। वे उसके चारों ओर हाथों में तालियां बजाते हुए एक सुंदर गोल घेरा (वृत्त) बनाकर कदम-ताल मिलाते हुए घूमती हैं। वे तेलंगाना की संस्कृति, प्रकृति, परिवार और देवी गौरी की महिमा का बखान करने वाले अत्यंत मधुर और लयबद्ध लोकगीत गाती हैं।


पारंपरिक पट्टू साड़ियों में बतुकम्मा के चारों ओर गोल घेरा बनाकर ताली बजाते हुए लोकगीत गाती हैं।
6
सद्दुला बतुकम्मा के दिन कौन सा विशेष प्रसाद बनाया और वितरित किया जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

सद्दुला बतुकम्मा के दिन विशेष पारंपरिक नैवेद्य तैयार किया जाता है, जिसमें मुख्य रूप से "मलेदा" (गुड़, घी और भुने हुए मक्के या गेहूं के आटे से बने स्वादिष्ट लड्डू) तथा पांच प्रकार के चावल के व्यंजन (इमली चावल, तिल चावल, नारियल चावल, दही चावल और मूंगफली चावल) बनाकर देवी को अर्पित किए जाते हैं और आपस में बांटे जाते हैं।


"मलेदा" (गुड़, घी और मक्के के लड्डू) तथा विभिन्न प्रकार के चावल के व्यंजन।
7
बतुकम्मा उत्सव से नारी-सशक्तिकरण और सामाजिक समरसता का क्या संदेश मिलता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

बतुकम्मा पूर्णतः मातृ-शक्ति और स्त्रियों को समर्पित महापर्व है। इस अवसर पर जाति, पंथ और वर्ग का सारा भेदभाव मिट जाता है; समाज के सभी वर्गों की महिलाएं एक साथ मिलकर फूल चुनती हैं, बतुकम्मा सजाती हैं और एक ही घेरे में हाथ से हाथ मिलाकर नृत्य करती हैं। यह पर्व महिलाओं में आत्मविश्वास, सामूहिक एकता और सामाजिक समरसता की सुदृढ़ भावना का संचार करता है।


सभी वर्गों की महिलाएं एकजुट होकर प्रकृति की वंदना करती हैं, जिससे जातिगत भेद मिटता है।
8
निम्नलिखित शब्दों के अर्थ लिखिए: (क) तांबालम, (ख) गौरम्मा, (ग) विसर्जन।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

• (क) तांबालम: पीतल या तांबे की बड़ी चौड़ी थाली जिसमें बतुकम्मा सजाई जाती है।
• (ख) गौरम्मा: हल्दी से बनाई गई माता गौरी की पवित्र लघु प्रतिमा।
• (ग) विसर्जन: उत्सव की समाप्ति पर आदरपूर्वक जल में प्रवाहित करना।


तांबालम = पीतल की थाली; गौरम्मा = हल्दी की गौरी; विसर्जन = जल-प्रवाह।
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