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ICSE • कक्षा 8 • Hindi • अध्याय 3
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

संगीत के साथी

आईसीएसई कक्षा 8 हिन्दी के अंतर्गत "संगीत के साथी" भारतीय शास्त्रीय एवं लोक वाद्ययंत्रों, नाद-ब्रह्म की संकल्पना तथा मानव जीवन में संगीत के भावनात्मक व सांस्कृतिक प्रभाव पर आधारित एक अत्यंत सुरुचिपूर्ण एवं ज्ञानवर्धक अध्याय है। इस पाठ में भारतीय संगीत परंपरा के चार प्रमुख वाद्य-वर्गों—तत (तार वाले वाद्य: वीणा, सितार, सरोद), सुषिर (फूंक कर बजाए जाने वाले वाद्य: बांसुरी, शहनाई), अवनद्ध (चमड़े से मढ़े ताल वाद्य: तबला, पखावज, मृदंग) तथा घन (धातु के वाद्य: मंजीरा, जलतरंग, झांझ) का प्रामाणिक परिचय दिया गया है। वाद्ययंत्र केवल काष्ठ और धातु के निर्जीव उपकरण नहीं हैं, बल्कि वे मानव की गहनतम अनुभूतियों, हर्ष, विरह और भक्ति को ध्वन्यात्मक स्वरूप प्रदान करने वाले सच्चे "साथी" हैं। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई, पंडित रविशंकर का सितार और पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी ने भारतीय संस्कृति की सुरमयी सुगंध को समूचे विश्व में फैलाया। प्रस्तुत अध्ययन सामग्री में वाद्यों का वर्गीकरण, इतिहास, ध्वनि-विज्ञान तथा अभ्यास प्रश्नोत्तरी का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत है।

एक सूखी खोखली बांस की नली में सात छेद करने से उसमें से स्वर्गिक संगीत की अमृतधारा कैसे बहने लगती है?

जरा विचार कीजिए, जंगल में उगने वाला एक साधारण बांस, जब काटा जाता है और उसमें सात छोटे-छोटे छिद्र किए जाते हैं, तब जब एक सिद्ध फूँक उसमें प्रविष्ट होती है, तो पत्थर भी पिघल उठते हैं! यह चमत्कार है भारतीय संगीत के वाद्ययंत्रों का! संगीत मानव आत्मा की वह सार्वभौमिक भाषा है जिसके लिए शब्दों के अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती। वीणा माँ सरस्वती के हाथों में सुशोभित है, भगवान श्रीकृष्ण के अधरों पर मुरली है, और देवाधिदेव महादेव के हाथ में डमरू का नाद सृष्टि के उद्भव का प्रतीक है। वाद्ययंत्र मनुष्य के सुख-दुख के शाश्वत साथी रहे हैं। संगीत के इन अनमोल साथियों का उद्भव कैसे हुआ? तत, सुषिर और अवनद्ध वाद्ययंत्रों में क्या अंतर है? आइए, संगीत की इस पावन दुनिया की यात्रा करें।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

यह अध्याय विद्यार्थियों में भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं सांस्कृतिक धरोहर के प्रति सम्मान, कलात्मक सुरुचि तथा वाद्य-शिल्प के वैज्ञानिक व सौंदर्यपरक पक्षों की गहरी समझ विकसित करता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • भारतीय संगीत की प्रारंभिक जानकारी (स्वर, ताल, लय)।
  • सामान्य वाद्ययंत्रों (बांसुरी, तबला, ढोलक) की पहचान।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • भारतीय वाद्ययंत्रों के चार प्रमुख वर्गीकरणों (तत, सुषिर, अवनद्ध, घन) को समझना।
  • प्रमुख वाद्यों (सितार, शहनाई, बांसुरी, तबला) की बनावट व वादन-शैली का ज्ञान प्राप्त करना।
  • महान भारतीय संगीत-साधकों के योगदान का मूल्यांकन करना।
  • संगीत की संवेदनात्मक एवं आध्यात्मिक महत्ता को आत्मसात करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. भारतीय वाद्ययंत्रों का चतुर्विध...
2 2. अमर संगीत साधक एवं उनके वाद्य

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. भारतीय वाद्ययंत्रों का चतुर्विध वर्गीकरण

वर्गीकरण
भरतमुनि के नाट्यशास्त्र अनुसार चार वाद्य-वर्ग:
  1. तत वाद्य (तंतु वाद्य): जिनमें तारों के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है (जैसे: वीणा, सितार, सरोद, संतूर, सारंगी)।
  2. सुषिर वाद्य (वायु वाद्य): जो फूंक मारकर हवा के दबाव और स्तम्भ से बजाए जाते हैं (जैसे: बांसुरी, शहनाई, नफीरी, शंख, हारमोनियम)।
  3. अवनद्ध वाद्य (ताल वाद्य): जो चमड़े से मढ़े होते हैं और जिन पर आघात करके ताल दी जाती है (जैसे: तबला, पखावज, मृदंग, ढोलक, डमरू)।
  4. घन वाद्य (धातु वाद्य): जो ठोस धातु या काष्ठ के परस्पर टकराने से गूंजते हैं (जैसे: मंजीरा, झांझ, जलतरंग, खड़ताल, घंटी)।

2. अमर संगीत साधक एवं उनके वाद्य

महान साधक
  • उस्ताद बिस्मिल्लाह खां (शहनाई): शादी-ब्याह के साधारण लोकवाद्य शहनाई को विश्व मंच पर शास्त्रीय गरिमा दिलाई; भारत रत्न से सम्मानित।
  • पंडित रविशंकर (सितार): भारतीय सितार वादन को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करने वाले युगद्रष्टा कलाकार।
  • पंडित हरिप्रसाद चौरसिया (बांसुरी): बांसुरी के सुरों से प्रकृति की मधुरता बिखेरने वाले अप्रतिम वादक।
  • उस्ताद जाकिर हुसैन (तबला): अपनी उंगलियों के जादू से तबले पर जादुई ताल सृजित करने वाले विश्वप्रसिद्ध उस्ताद।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

भारतीय वाद्य वर्गीकरण सूत्र
वाद्ययंत्र = तत (तार) + सुषिर (वायु) + अवनद्ध (चर्म) + घन (धातु)
शास्त्रीय संगीत का आधारभूत विभाजन।

हिन्दी: भारतीय वाद्ययंत्रों का वर्गीकरण एवं प्रमुख वादक

संगीत के साथी: भारतीय वाद्ययंत्रों का स्वरूप एवं वर्गीकरण 1. तत वाद्य (तार) • तारों के कंपन से ध्वनि • वीणा, सितार, सरोद • सारंगी, संतूर, गिटार महान साधक: पं. रविशंकर (सितार) उ. अमजद अली (सरोद) 2. सुषिर वाद्य (वायु) • फूंक व वायु स्तम्भ से • बांसुरी, शहनाई, शंख • नफीरी, हारमोनियम महान साधक: उ. बिस्मिल्लाह खां पं. हरिप्रसाद चौरसिया 3. अवनद्ध (चर्म) • चमड़े से मढ़े ताल वाद्य • तबला, पखावज, मृदंग • ढोलक, डमरू, नगाड़ा महान साधक: उ. जाकिर हुसैन पं. किशन महाराज 4. घन वाद्य (ठोस) • ठोस धातु/काष्ठ आघात • मंजीरा, झांझ, करताल • जलतरंग, घंटा, चिमटा विशेषता: लय व ताल की स्थिरता भक्ति संगीत का आधार नाद-ब्रह्म की साधना • वाद्ययंत्र मानव की आंतरिक अनुभूतियों के सच्चे संगीत-साथी हैं

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
भारतीय संगीत में वाद्ययंत्रों को मुख्य रूप से चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है।
मुख्य बिंदु 2
तत वाद्य वे हैं जिनमें तारों (तंतुओं) के कंपन से ध्वनि पैदा होती है (जैसे सितार, वीणा)।
मुख्य बिंदु 3
सुषिर वाद्य फूंक मारकर हवा के दबाव से बजाए जाते हैं (जैसे बांसुरी, शहनाई)।
मुख्य बिंदु 4
अवनद्ध वाद्य चमड़े से मढ़े होते हैं और ताल देने के काम आते हैं (जैसे तबला, मृदंग)।
मुख्य बिंदु 5
घन वाद्य ठोस धातु या काष्ठ के आघात से बजते हैं (जैसे मंजीरा, जलतरंग)।
मुख्य बिंदु 6
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने शहनाई को अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलवाई।
मुख्य बिंदु 7
पंडित रविशंकर ने सितार वादन से विश्व भर में भारतीय संगीत का परचम लहराया।
मुख्य बिंदु 8
वाद्ययंत्र केवल मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और ध्यान के माध्यम हैं।
मुख्य बिंदु 9
भारतीय संस्कृति में प्रत्येक प्रमुख देवी-देवता के साथ किसी न किसी वाद्य का संबंध है।
मुख्य बिंदु 10
संगीत भाषा और सीमाओं से परे मानवता को एकता के सूत्र में पिरोने वाली शक्ति है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
भारतीय वाद्ययंत्रों को मुख्य रूप से किन चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है? प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
  1. तत वाद्य (तार वाले वाद्य): जिनमें तारों के कंपन से स्वर निकलते हैं (उदा. सितार, वीणा)।
    2. सुषिर वाद्य (फूंक वाद्य): जो वायु के प्रवाह से बजाए जाते हैं (उदा. बांसुरी, शहनाई)।
    3. अवनद्ध वाद्य (चर्म वाद्य): जो चमड़े से मढ़े होते हैं और ताल के लिए प्रयुक्त होते हैं (उदा. तबला, ढोलक)।
    4. घन वाद्य (धातु वाद्य): जो ठोस धातु या काष्ठ के बने होते हैं (उदा. मंजीरा, जलतरंग)।

तत (सितार), सुषिर (बांसुरी), अवनद्ध (तबला), घन (मंजीरा)।
2
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का शहनाई के क्षेत्र में क्या अद्वितीय योगदान है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां से पूर्व शहनाई को केवल मांगलिक अवसरों, शादी-विवाहों तथा मंदिरों के द्वारों तक सीमित एक साधारण लोकवाद्य माना जाता था। बिस्मिल्लाह खां ने अपनी अपार साधना, रागदारी ज्ञान और नाद-सौंदर्य के बल पर शहनाई को प्रतिष्ठित कॉन्सर्ट हॉलों और विश्व मंचों पर शास्त्रीय वाद्य का सर्वोच्च दर्जा दिलाया। उनके इस अमूल्य योगदान हेतु उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान "भारत रत्न" से विभूषित किया गया।


शहनाई को शादी-ब्याह के लोकवाद्य से उठाकर विश्व शास्त्रीय संगीत के मंच पर प्रतिष्ठित किया; भारत रत्न प्राप्तकर्ता।
3
तत वाद्य और सुषिर वाद्य में क्या मूलभूत अंतर है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

• तत वाद्य: इनमें ध्वनि की उत्पत्ति धातु या तांत के खिंचे हुए तारों में कंपन उत्पन्न करके की जाती है (मिजराब, कमानी या उंगलियों द्वारा), जैसे सितार और सारंगी।
• सुषिर वाद्य: इनमें ध्वनि मुख की फूंक द्वारा खोखली नली के भीतर वायु-स्तम्भ के दोलन से उत्पन्न होती है, तथा छिद्रों को उंगलियों से बंद व खोलकर स्वर-परिवर्तन किया जाता है, जैसे बांसुरी और शहनाई।


तत वाद्य तारों के कंपन से बजते हैं; सुषिर वाद्य फूंक और वायु-स्तम्भ से बजते हैं।
4
जलतरंग किस वर्ग का वाद्य है और यह किस प्रकार बजाया जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

• वर्ग: जलतरंग घन वाद्य (धातु/काष्ठ/मिट्टी के ठोस वाद्य) की श्रेणी में आता है।
• वादन विधि: इसमें चीनी मिट्टी के कई कटोरों को एक अर्धवृत्ताकार क्रम में सजाया जाता है और प्रत्येक कटोरे में अलग-अलग स्तर तक पानी भरा जाता है। दो पतली लकड़ियों (डंडियों) से कटोरों के किनारों पर कोमल आघात करने से अत्यंत सुरीली और जलतरंगीय ध्वनि उत्पन्न होती है।


घन वाद्य वर्ग; पानी से भरे चीनी मिट्टी के कटोरों पर तीलियों के आघात से बजता है।
5
संगीत को "नाद-ब्रह्म" क्यों कहा गया है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: भारतीय दर्शन में ध्वनि (नाद) को परमात्मा (ब्रह्म) का साक्षात स्वरूप माना गया है। संगीत केवल कानों को अच्छा लगने वाला मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह मन की चंचलता को शांत कर अंतरात्मा को परमतत्व से जोड़ने वाला एक पवित्र आध्यात्मिक मार्ग (साधना) है, इसलिए इसे "नाद-ब्रह्म" कहा गया है।
ध्वनि को परमात्मा का रूप माना गया है; संगीत आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाली साधना है।
6
निम्नलिखित वाद्ययंत्रों को उनके सही वर्ग में सुमेलित कीजिए: (क) सारंगी, (ख) पखावज, (ग) शंख, (घ) खड़ताल।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

• (क) सारंगी: तत वाद्य (तार वाला वाद्य)
• (ख) पखावज: अवनद्ध वाद्य (चमड़े से मढ़ा ताल वाद्य)
• (ग) शंख: सुषिर वाद्य (फूंक से बजने वाला वाद्य)
• (घ) खड़ताल: घन वाद्य (धातु/काष्ठ का ठोस वाद्य)।


सारंगी = तत, पखावज = अवनद्ध, शंख = सुषिर, खड़ताल = घन।
7
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया किस वाद्य के लिए विश्वविख्यात हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

पंडित हरिप्रसाद चौरसिया विश्व के मूर्धन्य बांसुरी (वेणु) वादक हैं। उन्होंने अपनी अलौकिक वादन-शैली से बांसुरी के सुरों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई ऊंचाइयां प्रदान कीं।


बांसुरी वादन।
8
वाद्ययंत्रों को "संगीत के साथी" क्यों कहा गया है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: वाद्ययंत्र गायक के सुर में सुर मिलाकर उसके गायन को परिपूर्णता प्रदान करते हैं। वे एकाकी मनुष्य के अकेलेपन को दूर करते हैं, सुख में उमंग भरते हैं और दुख में सांत्वना देते हैं। बिना किसी शब्द के वे हृदय की अव्यक्त भावनाओं को अभिव्यक्त करने की अद्भुत क्षमता रखते हैं, इसलिए वे मानव के सच्चे "संगीत के साथी" हैं।
गायन को पूर्णता देते हैं और बिना शब्दों के हृदय के भावों को सुरमयी अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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