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ICSE • कक्षा 8 • Hindi • अध्याय 8
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

शकुंतला देवी

आईसीएसई कक्षा 8 हिन्दी पाठ्यचर्या के अंतर्गत "शकुंतला देवी" विश्वविख्यात भारतीय गणितीय प्रतिभा तथा "मानव कंप्यूटर" (Human Computer) के नाम से सुप्रसिद्ध शकुंतला देवी (1929–2013) के असाधारण जीवन, अद्‍भुत गणना-सामर्थ्य और नारी गौरव पर आधारित एक अत्यंत प्रेरणादायी जीवनी-परक अध्याय है। बंगलुरु के एक साधारण रूढ़िवादी परिवार में जन्मी शकुंतला देवी के पास कोई औपचारिक स्कूली शिक्षा या विश्वविद्यालयी डिग्री नहीं थी; उनके पिता एक सर्कस कलाकार थे। मात्र तीन वर्ष की आयु में ताश के पत्तों के खेल में उनके पिता ने देखा कि उनकी नन्ही बालिका जटिल गणितीय संख्याओं और गणनाओं को पलक झपकतें ही मानसिक रूप से हल कर देती है। छह वर्ष की आयु में उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय के विद्वानों के समक्ष अत्यंत जटिल अंकगणितीय समस्याओं को हल करके सबको स्तब्ध कर दिया। 18 जून 1980 को लंदन के इंपीरियल कॉलेज में उन्होंने 13 अंकों की दो यादृच्छिक संख्याओं का गुणनफल (7,686,369,774,870 x 2,465,099,745,779) मात्र 28 सेकंड में शुद्ध रूप से मानसिक गणना करके निकाल दिया, जिसके लिए उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ। प्रस्तुत अध्ययन सामग्री में शकुंतला देवी के बाल्यकाल, वैश्विक उपलब्धियों, गणित के प्रति उनके दृष्टिकोण तथा परीक्षा-उपयोगी अभ्यास प्रश्नोत्तरों का सांगोपांग विवेचन किया गया है।

बिना कागज, बिना कलम और बिना किसी कैलकुलेटर के एक भारतीय महिला ने 13 अंकों के गुणनफल को मात्र 28 सेकंड में हल करके सुपरकंप्यूटर को कैसे हरा दिया था?

18 जून 1980 का दिन था। लंदन के इंपीरियल कॉलेज के कंप्यूटर विज्ञान विभाग में सन्नाटा पसरा हुआ था। दुनिया का तत्कालीन सबसे आधुनिक कंप्यूटर एक विशालकाय स्क्रीन पर 13 अंकों की दो भयंकर जटिल संख्याओं को प्रदर्शित कर रहा था। उस कंप्यूटर के सामने खड़ी थीं पारंपरिक भारतीय साड़ी पहने एक भारतीय महिला—शकुंतला देवी! उन्हें चुनौती दी गई थी कि वे इन दोनों 13-अंकीय संख्याओं का आपस में गुणा करके 26 अंकों का सटीक उत्तर निकालें। प्रोफेसरों ने स्टॉपवॉच शुरू की। शकुंतला देवी ने पलकें झपकाईं, मन ही मन संख्याओं का नृत्य देखा, और मात्र 28 सेकंड के भीतर 26 अंकों का उत्तर बोल दिया: 18,947,668,177,995,426,462,773,730! कंप्यूटर को उस उत्तर को सत्यापित करने में शकुंतला देवी से अधिक समय लग गया! विश्व मीडिया चिल्ला उठा: "THE HUMAN COMPUTER!" एक ऐसी महिला जिसने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा, वह दुनिया की सबसे तेज गणितीय प्रतिभा कैसे बन गई? आइए, इस गौरवशाली भारतीय विदुषी की कहानी जानें।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

यह पाठ विद्यार्थियों में गणित के प्रति भय को दूर कर उसमें रुचि जाग्रत करता है, आत्मबल और निरंतर अभ्यास का महत्व सिखाता है तथा नारी-सशक्तिकरण और भारतीय प्रतिभा के वैश्विक गौरव का बोध कराता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • अंकगणित एवं संख्याओं की प्रारंभिक समझ।
  • जीवनी विधा की मूल विशेषताओं का ज्ञान।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • शकुंतला देवी के असाधारण गणितीय कौशल एवं जीवन-संघर्ष को समझना।
  • गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज उनकी ऐतिहासिक उपलब्धि का विश्लेषण करना।
  • गणित को भयमुक्त, रोचक और सहज रूप में देखने का दृष्टिकोण विकसित करना।
  • पाठगत कठिन शब्दावली, उपसर्ग-प्रत्यय एवं व्याकरणिक नियमों में निपुणता प्राप्त करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. बाल्यकाल एवं विलक्षण प्रतिभा का...
2 2. ऐतिहासिक विश्व रिकॉर्ड एवं "मानव...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. बाल्यकाल एवं विलक्षण प्रतिभा का प्रकटीकरण

आरंभिक जीवन
A. जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि:
  • शकुंतला देवी का जन्म 4 नवंबर 1929 को बंगलुरु (कर्नाटक) में एक कन्नड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
  • उनके पिता ने पारिवारिक पुरोहिताई छोड़कर सर्कस में रस्सी पर चलने और करतब दिखाने का काम चुना था।
B. अद्भुत प्रतिभा की पहचान:

जब शकुंतला मात्र तीन वर्ष की थीं, तब ताश खेलते समय उनके पिता ने पाया कि वह बालिका सभी पत्तों के क्रम और संख्याओं को तुरंत याद कर लेती है और जटिल जोड़-घटाव मौखिक रूप से कर देती है। उनके पिता ने सर्कस छोड़ दिया और शकुंतला के गणितीय कौशलों के सार्वजनिक प्रदर्शन आयोजित करने लगे। मात्र छह वर्ष की आयु में उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय के गणितज्ञों को चकित कर दिया।

2. ऐतिहासिक विश्व रिकॉर्ड एवं "मानव कंप्यूटर" उपाधि

वैश्विक कीर्तिमान
18 जून 1980 का ऐतिहासिक दिन (लंदन):

लंदन के इंपीरियल कॉलेज में कंप्यूटर द्वारा चुनी गई 13 अंकों की दो संख्याओं:

$$\mathbf{7,686,369,774,870 \times 2,465,099,745,779}$$

का गुणनफल शकुंतला देवी ने बिना किसी कागज-कलम के केवल अपने मस्तिष्क में हल करके मात्र 28 सेकंड में शुद्ध रूप से बता दिया:

$$\mathbf{= 18,947,668,177,995,426,462,773,730}$$
  • इस अविश्वसनीय कारनामे के लिए उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (1982) में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किया गया और उन्हें विश्व भर में "द ह्यूमन कंप्यूटर" (The Human Computer) की उपाधि मिली।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

शकुंतला देवी विश्व कीर्तिमान (1980)
$$13\text{ Digits} \times 13\text{ Digits} = 26\text{ Digits Result in } \mathbf{28\text{ Seconds!}}$$
इंपीरियल कॉलेज लंदन में स्थापित अद्वितीय विश्व कीर्तिमान।

हिन्दी: शकुंतला देवी का जीवन-वृत्त एवं गणितीय कीर्तिमान

शकुंतला देवी: "मानव कंप्यूटर" एवं गणितीय प्रतिभा का विश्व कीर्तिमान आरंभिक जीवन एवं विलक्षण क्षमता • जन्म: 4 नवंबर 1929 (बंगलुरु) • कोई औपचारिक स्कूली/कॉलेज शिक्षा नहीं • 3 वर्ष की आयु में ताश पत्तों की गणना • 6 वर्ष की आयु में मैसूर विश्वविद्यालय में प्रदर्शन • किसी भी ऐतिहासिक तारीख का दिन सेकंडों में बताना • अद्भुत मानसिक एकाग्रता एवं स्मृति शक्ति गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड एवं वैश्विक सम्मान • 18 जून 1980: इंपीरियल कॉलेज लंदन • 13 अंक × 13 अंक का गुणनफल: मात्र 28 सेकंड! • 201-अंकीय संख्या का 23वां मूल: 50 सेकंड में उपाधि: "द ह्यूमन कंप्यूटर" • गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (1982) • गणित को सरल व रोचक बनाने वाली लेखिका मानसिक क्षमता की कोई सीमा नहीं • लगन और निरंतर अभ्यास से असंभव भी संभव बनता है

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
शकुंतला देवी भारत की विश्वविख्यात गणितज्ञ थीं जिन्हें "मानव कंप्यूटर" कहा जाता है।
मुख्य बिंदु 2
उनका जन्म 4 नवंबर 1929 को बंगलुरु के एक साधारण परिवार में हुआ था।
मुख्य बिंदु 3
उनके पास कोई औपचारिक स्कूली शिक्षा नहीं थी; उनकी प्रतिभा ईश्वरप्रदत्त और स्व-अभ्यास से पोषित थी।
मुख्य बिंदु 4
मात्र तीन वर्ष की आयु में उन्होंने जटिल संख्याओं की मानसिक गणना करना आरंभ कर दिया था।
मुख्य बिंदु 5
छह वर्ष की आयु में उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय के विद्वानों के समक्ष अपनी प्रतिभा सिद्ध की।
मुख्य बिंदु 6
18 जून 1980 को लंदन में 13 अंकों की दो संख्याओं का गुणनफल मात्र 28 सेकंड में निकाल दिया।
मुख्य बिंदु 7
इस अद्वितीय उपलब्धि के लिए उनका नाम 1982 के गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ।
मुख्य बिंदु 8
वे किसी भी वर्ष की तारीख का दिन (वार) पलक झपकतें ही बता देती थीं।
मुख्य बिंदु 9
उन्होंने बच्चों के लिए गणित को सरल और रुचिकर बनाने वाली कई उपयोगी पुस्तकें लिखीं।
मुख्य बिंदु 10
उनका जीवन नारी-शक्ति, आत्मविश्वास और भारतीय बौद्धिक गौरव की अमर गाथा है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
शकुंतला देवी कौन थीं और उन्हें विश्व भर में किस उपाधि से जाना जाता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

• परिचय: शकुंतला देवी (1929–2013) भारत की एक असाधारण और विलक्षण गणितीय प्रतिभा (विदुषी) थीं, जो अत्यंत जटिल, विशालकाय संख्याओं की गणनाएं बिना किसी कैलकुलेटर या कागज-कलम के केवल अपने मस्तिष्क में पलक झपकतें ही हल कर देती थीं।
• उपाधि: उनके इस चमत्कारिक मानसिक गणना-सामर्थ्य के कारण समूचे विश्व में उन्हें "द ह्यूमन कंप्यूटर" (The Human Computer / मानव कंप्यूटर) की उपाधि से विभूषित किया गया।


भारत की अद्वितीय गणितीय प्रतिभा; उपाधि: "द ह्यूमन कंप्यूटर" (मानव कंप्यूटर)।
2
शकुंतला देवी ने गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपना नाम किस कारनामे के लिए दर्ज कराया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

• ऐतिहासिक कारनामा (18 जून 1980):
लंदन के प्रतिष्ठित इंपीरियल कॉलेज के कंप्यूटर विभाग में शकुंतला देवी को कंप्यूटर द्वारा यादृच्छिक (रैंडम) रूप से चुनी गई 13 अंकों की दो विशाल संख्याओं ($7,686,369,774,870 \times 2,465,099,745,779$) का आपस में गुणा करने की चुनौती दी गई।
उन्होंने बिना किसी कागज या उपकरण के केवल मानसिक गणना द्वारा मात्र 28 सेकंड में इसका सटीक 26-अंकीय गुणनफल बोलकर सुना दिया।
इस अभूतपूर्व बौद्धिक चमत्कार हेतु वर्ष 1982 के गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित किया गया।


18 जून 1980 को लंदन में 13 अंकों की दो संख्याओं का गुणनफल मात्र 28 सेकंड में शुद्ध रूप से निकाला।
3
शकुंतला देवी की अद्भुत प्रतिभा का पता उनके पिता को कब और कैसे चला?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

जब शकुंतला देवी मात्र तीन वर्ष की थीं, तब उनके पिता (जो एक सर्कस कलाकार थे) उनके साथ ताश के पत्तों का खेल खेल रहे थे। उनके पिता ने यह देखकर विस्मय प्रकट किया कि वह नन्ही बालिका ताश के सारे पत्तों के क्रम और संख्याओं को तुरंत कंठस्थ कर लेती है और खेल में हर बार अपने पिता को हरा देती है। जब पिता ने उनसे गणितीय प्रश्न पूछे, तो उन्होंने तुरंत सटीक उत्तर दे दिए। यहीं से उनकी अद्भुत प्रतिभा का उद्घाटन हुआ।


तीन वर्ष की आयु में ताश के खेल के दौरान पिता ने उनकी विलक्षण स्मरण व गणना शक्ति को पहचाना।
4
क्या शकुंतला देवी ने किसी विश्वविद्यालय से गणित की उच्च शिक्षा प्राप्त की थी? उनका प्रारंभिक जीवन कैसा था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

• शिक्षा: नहीं, शकुंतला देवी ने किसी भी विद्यालय या विश्वविद्यालय से कोई औपचारिक औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। अत्यंत निर्धन पारिवारिक स्थिति के कारण वे कभी नियमित स्कूल भी नहीं जा सकीं। उनकी यह विलक्षण गणितीय प्रतिभा पूर्णतः प्राकृतिक तथा निरंतर स्व-अभ्यास की देन थी।
• प्रारंभिक जीवन: उनका बाल्यकाल अत्यंत संघर्षपूर्ण और अभावों में बीता। उनके पिता उन्हें लेकर विभिन्न शहरों, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में उनकी प्रतिभा का प्रदर्शन करते थे, जिससे परिवार का भरण-पोषण होता था।


उन्हें कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी; वे स्कूल भी नहीं जा सकी थीं। उनका बाल्यकाल अभावों में बीता।
5
शकुंतला देवी किसी भी ऐतिहासिक तारीख का क्या रहस्य तुरंत बता देती थीं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

शकुंतला देवी के समक्ष यदि पिछली कई शताब्दियों या भविष्य की किसी भी तारीख (दिन, महीना और वर्ष) का उल्लेख किया जाता (जैसे 15 अगस्त 1947 या 26 जनवरी 1950), तो वे मात्र एक सेकंड के भीतर उस दिन कौन सा वार (सोमवार, मंगलवार आदि) था, उसकी सटीक मानसिक गणना करके बता देती थीं।


वे किसी भी तारीख का दिन (वार) मात्र एक सेकंड में मानसिक गणना करके बता देती थीं।
6
शकुंतला देवी ने गणित के क्षेत्र में विद्यार्थियों के लिए क्या योगदान दिया?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: शकुंतला देवी का दृढ़ विश्वास था कि गणित कोई नीरस या डरावना विषय नहीं है, बल्कि यह एक अत्यंत सुंदर और मनोरंजक खेल है। उन्होंने विद्यार्थियों के मन से गणित के भय (Math Phobia) को दूर करने हेतु कई अत्यंत लोकप्रिय पुस्तकें लिखीं, जिनमें *"फन विद नंबर्स"* (Fun with Numbers), *"पजल्स टू पजिल यू"* तथा *"एस्ट्रोलॉजी फॉर यू"* अत्यंत प्रसिद्ध हैं।
गणित का भय दूर करने हेतु लोकप्रिय पुस्तकें लिखीं (जैसे Fun with Numbers, Puzzles to Puzzle You)।
7
शकुंतला देवी के जीवन से आज के विद्यार्थियों को क्या प्रेरणा मिलती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

शकुंतला देवी का जीवन यह सिद्ध करता है कि प्रतिभा औपचारिक डिग्रियों या सुख-सुविधाओं की मोहताज नहीं होती। यदि मनुष्य में अटूट लगन, एकाग्रता और निरंतर अभ्यास का संकल्प हो, तो अभावों और गरीबी में भी विश्व-विजेता बना जा सकता है। उन्होंने एक भारतीय महिला के रूप में वैश्विक मंच पर देश का मस्तक गर्व से ऊंचा किया।


लगन, एकाग्रता और निरंतर अभ्यास से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है; प्रतिभा डिग्रियों की मोहताज नहीं।
8
निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए: (क) जटिल, (ख) औपचारिक, (ग) प्रत्यक्ष।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

• (क) जटिल: सरल / सहज
• (ख) औपचारिक: अनौपचारिक
• (ग) प्रत्यक्ष: अप्रत्यक्ष / परोक्ष।


जटिल x सरल; औपचारिक x अनौपचारिक; प्रत्यक्ष x अप्रत्यक्ष।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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