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ICSE • कक्षा 8 • Hindi • अध्याय 9
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

किसान

आईसीएसई कक्षा 8 हिन्दी पाठ्यचर्या के अंतर्गत "किसान" भारतीय ग्रामीण जीवन की धड़कन, कोटि-कोटि जनों के भरण-पोषणकर्ता तथा धरती के सच्चे साधक "अन्नदाता किसान" के कठोर श्रम, त्याग, सादगी और अटूट कर्मठता को समर्पित एक अत्यंत मार्मिक, ओजस्वी एवं प्रेरणादायी कविता है। जेठ की झुलसा देने वाली दोपहरी हो, सावन-भादों की मूसलाधार वर्षा हो या पूस की ठिठुरती हुई बर्फीली रातें—किसान बिना किसी शिकायत के अपने हल-बैल लेकर खेतों में पसीना बहाता है। वह स्वयं रूखी-सूखी रोटी खाकर और फटे-पुराने वस्त्र पहनकर भी समूचे संसार के लिए अन्न का विपुल भंडार उत्पन्न करता है। कवि ने किसान को केवल एक श्रमिक नहीं, बल्कि धरती का सच्चा तपस्वी और विधाता का जीवंत रूप माना है जो बंजर मिट्टी में भी हरी-भरी फसलें उगाकर जीवन का अमृत भर देता है। इस कविता का मूल स्वर श्रम का गौरव (Dignity of Labour), प्रकृति के साथ तादात्म्य तथा समाज में कृषकों के प्रति कृतज्ञता और आदर की भावना जाग्रत करना है। प्रस्तुत अध्ययन सामग्री में कविता का पद्यांशवार भावार्थ, काव्य-सौंदर्य, अलंकार योजना तथा परीक्षा-उपयोगी प्रश्नोत्तरों का सांगोपांग विवेचन प्रस्तुत है।

जब कड़ाके की ठंड में पूरी दुनिया रजाई में सो रही होती है, तब रात के दो बजे नंगे पैर बर्फीले पानी में कौन खड़ा रहता है?

सोचिए, हम जो गरमा-गरम भोजन प्रतिदिन अपनी थाली में पाते हैं—चाहे वह बासमती चावल हो, गेहूं की रोटियां हों या ताजी हरी सब्जियां—वे किसी फैक्ट्री या सुपरमार्केट की मशीनों से नहीं निकलतीं! उनके पीछे छिपा होता है एक ऐसे तपस्वी का पसीना, जिसके पैरों में बिवाइयां फटी होती हैं, जिसके तन पर आधा वस्त्र होता है और जो कभी मौसम के आगे हार नहीं मानता। जेठ की 48 डिग्री धूप में जब पंछी भी घोंसलों में छिप जाते हैं, तब वह तपती बालू पर हल चला रहा होता है; पूस की कंपकंपाती रात में जब हड्डियां कांपने लगती हैं, तब वह रात भर नहर के पानी से गेहूं के खेतों की सिंचाई कर रहा होता है! यह तपस्वी कोई और नहीं—हमारा अन्नदाता किसान है! राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था: "करता न जो यह कर्म तो क्या अन्न मिलता देश को?" आइए, धरती के इस सच्चे भगवान की अमर साधना को नमन करें।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

यह कविता विद्यार्थियों में श्रम की महत्ता, अन्न के प्रत्येक दाने का आदर, किसानों के प्रति संवेदनशीलता और कृतज्ञता तथा ग्रामीण भारत की आर्थिक व सामाजिक धरातल की गहरी समझ विकसित करती है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • भारतीय ऋतुओं (ग्रीष्म, वर्षा, शीत) का सामान्य ज्ञान।
  • कृषि-कार्य (हल चलाना, बुवाई, सिंचाई, कटाई) से परिचय।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • कविता के विभिन्न पद्यांशों के अंतर्निहित भावार्थ और केंद्रीय संदेश को समझना।
  • किसान के कठोर जीवन-संघर्ष और त्याग के प्रति सहानुभूति व आदर भाव विकसित करना।
  • काव्यगत भाषा-शैली, बिम्ब-विधान, अनुप्रास व रूपक अलंकारों को पहचानना।
  • अन्न की बर्बादी रोकने और किसानों के कल्याण हेतु नागरिक दायित्वों का बोध होना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. ऋतु-चक्र में किसान की कठोर साधना
2 2. त्याग, परोपकार एवं काव्य-सौंदर्य

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. ऋतु-चक्र में किसान की कठोर साधना

श्रम-साधना
A. ग्रीष्म ऋतु का ताप (जेठ की दुपहरी):

जब सूर्य अंगारे बरसाता है, धरती तवे की भांति जलती है और लू के थपेड़े चलते हैं, तब किसान अपने पसीने की बूंदों से भूमि को सींचकर आगामी फसल हेतु खेत तैयार करता है।

B. वर्षा ऋतु का जल-प्रलय:

घनघोर बादलों की गड़गड़ाहट और निरंतर मूसलाधार बारिश के बीच घुटनों तक भरे कीचड़ में खड़े होकर वह धान की रोपाई करता है। उसे न तो बिजली गिरने का भय होता है और न ही भीगने की चिंता।

C. शीत ऋतु का पाला (पूस की रात):

जब ओस की बूंदें बर्फ बन जाती हैं और हड्डियां कांप उठती हैं, तब भी किसान रात के सन्नाटे में खेतों की रखवाली करता है और ठंडे पानी से फसलों की सिंचाई करता है।

2. त्याग, परोपकार एवं काव्य-सौंदर्य

काव्य-सौंदर्य
A. सच्चा त्याग और सादगी:
  • किसान दूसरों को मिष्ठान्न और अन्न प्रदान करता है, किंतु स्वयं रूखा-सूखा खाकर संतुष्ट रहता है।
  • वह संसार को वस्त्र और समृद्धि देता है, किंतु स्वयं फटे वस्त्रों में जीवन व्यतीत करता है।
B. शिल्पगत विशेषताएं:
  • रस: शांत एवं करुण रस का मणिकांचन संयोग; साथ ही श्रम के प्रति वीर रस का उत्साह।
  • अलंकार: अनुप्रास (वर्णों की सुंदर आवृत्ति), रूपक एवं मानवीकरण अलंकार।
  • भाषा: सरल, प्रवाहपूर्ण एवं ओजस्वी तत्सम-तद्भव युक्त खड़ी बोली हिन्दी।

महत्वपूर्ण काव्य-सिद्धांत, भावार्थ एवं व्याकरण सूत्र

भारतीय कृषि-दर्शन
"जय जवान, जय किसान" ⇔ सीमा पर जवान और खेत में किसान ही राष्ट्र की रीढ़ हैं।
लाल बहादुर शास्त्री का अमर राष्ट्र-संदेश।

हिन्दी: किसान की ऋतुवार श्रम-साधना एवं त्याग

कविता: किसान — अन्नदाता की अनवरत साधना एवं त्याग ऋतु-चक्र में अनवरत कर्मठता • जेठ की धूप: 45°C ताप में धरती पर हल चलाना • वर्षा की झड़ी: कीचड़ में खड़े रहकर धान की रोपाई • पूस का पाला: ठिठुरती रातों में नंगे पैर खेतों की सिंचाई • निःस्वार्थ सेवा: समूचे संसार के लिए अन्न का सृजन धरती का सच्चा साधक और तपस्वी त्याग, संतोष एवं मानवीय मूल्य • दूसरों को अमृत तुल्य अन्न, स्वयं रूखी-सूखी रोटी • विश्व को समृद्धि, स्वयं अभावग्रस्त सादा जीवन • प्रकृति के साथ आत्मीय व गहरा नाता विद्यार्थियों हेतु संदेश: • अन्न के एक-एक दाने का आदर करें (अपव्यय न करें) • श्रम की गरिमा (Dignity of Labour) को पहचानें जय जवान, जय किसान • अन्नदाता का श्रम ही राष्ट्र की जीवन-रेखा है

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
किसान भारतीय समाज का सच्चा अन्नदाता और श्रम का अद्वितीय प्रतीक है।
मुख्य बिंदु 2
वह जेठ की भीषण गर्मी में भी तवे की तरह तपती धरती पर हल चलाता है।
मुख्य बिंदु 3
वर्षा ऋतु में मूसलाधार बारिश के बीच कीचड़ में खड़े होकर धान की रोपाई करता है।
मुख्य बिंदु 4
पूस की हाड़ कंपाने वाली ठंड में रात-रात भर जागकर फसलों की सिंचाई करता है।
मुख्य बिंदु 5
किसान दूसरों के लिए अन्न उपजाता है, किंतु स्वयं रूखा-सूखा खाकर संतुष्ट रहता है।
मुख्य बिंदु 6
वह मिट्टी को अपने पसीने से सींचकर सोने जैसी पीली फसलें पैदा करता है।
मुख्य बिंदु 7
कवि ने किसान को एक ऋषि और तपस्वी की संज्ञा दी है।
मुख्य बिंदु 8
कविता में सरल खड़ी बोली, अनुप्रास अलंकार और सजीव बिम्ब-विधान है।
मुख्य बिंदु 9
यह पाठ हमें अन्न का आदर करने और भोजन बर्बाद न करने की सीख देता है।
मुख्य बिंदु 10
किसानों के कल्याण और सम्मान के बिना किसी भी राष्ट्र की उन्नति असंभव है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
कवि ने किसान को "अन्नदाता" और "तपस्वी" क्यों कहा है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

• अन्नदाता: किसान अपने कठोर परिश्रम से खेत में हल चलाकर, बीज बोकर और फसलों की रक्षा करके समूचे संसार के कोटि-कोटि प्राणियों के लिए अन्न का सृजन करता है। यदि किसान खेती न करे, तो दुनिया भुखमरी का शिकार हो जाएगी, अतः वह साक्षात अन्नदाता है।
• तपस्वी: एक संन्यासी की तरह किसान भी सुख-सुविधाओं, ऐशो-आराम और नींद का त्याग करता है। वह सर्दी, गर्मी और वर्षा की भीषण मार को बिना विचलित हुए सहन करता है। उसका संपूर्ण जीवन दूसरों के कल्याण हेतु एक मौन यज्ञ (साधना) है, इसलिए कवि ने उसे सच्चा तपस्वी कहा है।


वह पूरे विश्व को अन्न प्रदान करता है और संन्यासी की भांति सभी कष्ट सहकर दूसरों की सेवा करता है।
2
जेठ की दोपहरी और पूस की रात में किसान की दिनचर्या का वर्णन कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

• जेठ की दोपहरी: जब सूर्य आग के गोले बरसाता है, लू के भयानक थपेड़े चलते हैं और धरती जलती हुई भट्टी बन जाती है, तब भी किसान बिना किसी छांव के नंगे पैर खेतों में हल जोतता है और पसीने से लथपथ होकर मिट्टी को उर्वर बनाता है।
• पूस की रात: जब कड़ाके की ठंडी हवाएं चलती हैं, पाला पड़ता है और सामान्य मनुष्य रजाई में दुबका रहता है, तब किसान खुले आकाश के नीचे ठिठुरते हुए खेतों की रखवाली करता है और बर्फीले पानी से फसलों की सिंचाई करता है।


जेठ में भीषण लू में हल चलाता है; पूस की ठिठुरती रात में पानी से सिंचाई और फसलों की रखवाली करता है।
3
"किसान का जीवन त्याग और परोपकार की साक्षात प्रतिमूर्ति है।" स्पष्ट कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: किसान संसार को स्वादिष्ट अन्न, गेहूं, चावल, फल और कपास (वस्त्र) प्रदान करता है। समूचा संसार उसके उपजाए अन्न से हृष्ट-पुष्ट होता है, किंतु विडंबना यह है कि किसान स्वयं अक्सर फटे-पुराने वस्त्रों में रहता है, झोंपड़ी में रात गुजारता है और रूखी-सूखी रोटी व नमक खाकर ही संतुष्ट रहता है। वह अपने लिए कम और दूसरों के लिए अधिक जीता है, अतः उसका जीवन परोपकार और त्याग का सर्वोच्च उदाहरण है।
वह सबको अन्न और वस्त्र देता है, पर स्वयं रूखा-सूखा खाकर अभावों में सादा जीवन जीता है।
4
कविता में प्रयुक्त भाषा-शैली और अलंकारों की क्या विशेषताएं हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
  1. भाषा: कविता की भाषा अत्यंत सहज, सरस, भावानुकूल और प्रवाहमयी खड़ी बोली हिन्दी है, जिसमें तत्सम व तद्भव शब्दों का सुंदर सम्मिश्रण है।
    2. रस: इसमें मुख्य रूप से शांत एवं करुण रस का भाव है तथा किसान के श्रम के प्रति आदर का उत्साह झलकता है।
    3. अलंकार: अनुप्रास अलंकार (वर्णों की सुंदर आवृत्ति), रूपक तथा सजीव प्राकृतिक मानवीकरण का प्रयोग हुआ है।
    4. बिम्ब-विधान: खेतों में पसीना बहाते किसान, तपती धूप और ठिठुरती रातों के अत्यंत सजीव दृश्य-बिम्ब उकेरे गए हैं।

खड़ी बोली हिन्दी, शांत व करुण रस, अनुप्रास व रूपक अलंकार तथा सजीव बिम्ब-विधान।
5
पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने कौन सा अमर नारा दिया था और उसका क्या महत्व है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने "जय जवान, जय किसान" का अमर नारा दिया था। इसका महत्व यह है कि देश की बाह्य सीमाओं की रक्षा करने वाला सैनिक (जवान) और देशवासियों की भूख मिटाने वाला कृषक (किसान)—ये दोनों ही राष्ट्र की वास्तविक रीढ़ और संप्रभुता के आधार स्तंभ हैं।


"जय जवान, जय किसान"; सीमा पर जवान और खेत में किसान दोनों देश के रक्षक हैं।
6
इस कविता से विद्यार्थियों को अपने दैनिक जीवन में क्या सीख लेनी चाहिए?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
  1. अन्न का सम्मान: हमें अपनी थाली में कभी भी भोजन व्यर्थ (बर्बाद) नहीं फेंकना चाहिए, क्योंकि अन्न के एक-एक दाने के पीछे किसान का अनथक पसीना और महीनों की तपस्या होती है।
    2. श्रम की प्रतिष्ठा (Dignity of Labour): समाज में शारीरिक श्रम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के प्रति आदर और कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए।

भोजन कभी बर्बाद न करें और शारीरिक श्रम का आदर करें।
7
निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए: (क) कृषक, (ख) वसुधा, (ग) पावक।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

• (क) कृषक: किसान, हलधर, खेतीहर, अन्नदाता।
• (ख) वसुधा: पृथ्वी, धरती, भूमि, धरा।
• (ग) पावक: अग्नि, आग, अनल, हुताशन।


कृषक = किसान/हलधर; वसुधा = धरती/पृथ्वी; पावक = अग्नि/आग।
8
"पसीना बहाना" और "मिट्टी का सोना बनाना" मुहावरों के अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:

• पसीना बहाना (कठिन परिश्रम करना): किसान दिन-रात खेतों में पसीना बहाकर देश का पेट भरता है।
• मिट्टी का सोना बनाना (कठोर परिश्रम से बंजर भूमि को भी अत्यंत उपजाऊ व मूल्यवान बनाना): मेहनती किसान ने अपने श्रम से ऊसर जमीन में भी भरपूर फसलें उगाकर मिट्टी को सोना बना दिया।


पसीना बहाना = कठिन परिश्रम करना; मिट्टी का सोना बनाना = कठोर श्रम से मूल्यवान उपज प्राप्त करना।
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