A. ग्रीष्म ऋतु का ताप (जेठ की दुपहरी):
जब सूर्य अंगारे बरसाता है, धरती तवे की भांति जलती है और लू के थपेड़े चलते हैं, तब किसान अपने पसीने की बूंदों से भूमि को सींचकर आगामी फसल हेतु खेत तैयार करता है।
B. वर्षा ऋतु का जल-प्रलय:
घनघोर बादलों की गड़गड़ाहट और निरंतर मूसलाधार बारिश के बीच घुटनों तक भरे कीचड़ में खड़े होकर वह धान की रोपाई करता है। उसे न तो बिजली गिरने का भय होता है और न ही भीगने की चिंता।
C. शीत ऋतु का पाला (पूस की रात):
जब ओस की बूंदें बर्फ बन जाती हैं और हड्डियां कांप उठती हैं, तब भी किसान रात के सन्नाटे में खेतों की रखवाली करता है और ठंडे पानी से फसलों की सिंचाई करता है।