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JAC • Class 7 • Social Science • Ch 25
Estimated Time: 45 Mins
Study Progress: In Progress

A Shirt in the Market

इस अध्याय में हम कपास के खेत से लेकर अमेरिका के सुपरमार्केट में बिकने वाली एक कमीज की संपूर्ण यात्रा, कुर्नूल (आंध्र प्रदेश) में स्वप्ना की कपास की खेती, तमिलनाडु के इरोड कपड़ा बाजार में दादन व्यवस्था (Putting-out System), दिल्ली के परिधान निर्यात कारखाने (Garment Export Factory) में मजदूरों की दशा तथा मूल्य श्रृंखला में मुनाफे के घोर असमान वितरण का अर्थशास्त्रीय विश्लेषण करेंगे।

क्या आप जानते हैं कि अमेरिका में ₹1,800 में बिकने वाली कमीज को सिलने वाले भारतीय दर्जी को मात्र ₹30 मिलते हैं?

आंध्र प्रदेश के कुर्नूल में 4 महीने खून-पसीना बहाकर कपास उगाने वाली स्वप्ना को कर्ज के जाल के कारण बाजार भाव से आधी कीमत पर कपास बेचनी पड़ती है। इरोड के बुनकर 14 घंटे करघा चलाकर भी गरीबी में जीते हैं। वहीं न्यूयॉर्क के आलीशान मॉल में उसी सूत से बनी कमीज $26 में बिकती है और विदेशी ब्रांड अकेले ₹600 का शुद्ध मुनाफा जेब में डालता है! इस वैश्विक बाजार श्रृंखला में सबसे अधिक मेहनत करने वाला सबसे कम क्यों कमाता है? आइए समझें।

Why This Chapter Matters

यह अध्याय विद्यार्थियों को आर्थिक न्याय, आपूर्ति श्रृंखला, वैश्विक व्यापार, बिचौलियों द्वारा किए जाने वाले शोषण, श्रम अधिकारों तथा बुनकर सहकारी समितियों (Cooperatives) की आवश्यकता को गहराई से समझाता है। यह उपभोक्तावादी दुनिया में मानवीय श्रम के वास्तविक मूल्य को पहचानने की दृष्टि देता है।

Before You Begin (Prerequisites)

  • कृषि, उद्योग और व्यापार के मध्य संबंधों की सामान्य समझ।
  • कक्षा 6 और 7 के पूर्ववर्ती अध्यायों से बाजार, मजदूरी और ऋण (कर्ज) की अवधारणा।
  • वैश्विक व्यापार और निर्यात (Export) का सामान्य परिचय।

What You Will Learn (Core Objectives)

  • कपास की खेती में लगने वाले समय, रासायनिक खाद/कीटनाशक लागत और साहूकार के ऋण-जाल (Debt Trap) में स्वप्ना के शोषण को समझना।
  • इरोड के कपड़ा बाजार में दादन व्यवस्था (Putting-out System) के गुण-दोषों और बुनकरों की व्यापारी पर पूर्ण निर्भरता का विश्लेषण करना।
  • बुनकर सहकारी संस्थाओं (Weavers’ Cooperatives) की भूमिका और बिचौलियों को हटाने के तंत्र को जानना।
  • दिल्ली की परिधान निर्यात फैक्ट्री में अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों के दबाव, अस्थायी रोजगार और मजदूरों के अल्प वेतन की स्थिति को रेखांकित करना।
  • अमेरिका के डिपार्टमेंटल स्टोर में कमीज की अंतिम कीमत में विभिन्न भागीदारों (किसान, बुनकर, मजदूर, निर्यातक, विदेशी ब्रांड) के लाभ वितरण का तुलनात्मक मूल्यांकन करना।

Chapter Roadmap & Progression

1 1. कुर्नूल में कपास किसान : स्वप्ना...
2 2. इरोड का कपड़ा बाजार एवं दादन व्य...
3 3. दिल्ली की गारमेंट एक्सपोर्ट फैक्...
4 4. अमेरिका में कमीज : किसने कितना क...

Complete Concept Guide (100% Curriculum Coverage)

1. कुर्नूल में कपास किसान : स्वप्ना और कर्ज का फंदा (Cotton Farming in Kurnool)

कमीज की यात्रा खेत में कपास के पौधे (Cotton Bolls) से शुरू होती है। आंध्र प्रदेश के कुर्नूल जिले की एक छोटी किसान स्वप्ना की कहानी भारतीय सीमांत किसानों के संकट को उजागर करती है।

ऋण का जाल एवं अनिवार्य औने-पौने दाम पर बिक्री

  • कर्ज की मजबूरी : कपास की खेती में बीज, खाद और महंगे कीटनाशकों के लिए भारी लागत लगती है। स्वप्ना ने फसल उगाने के लिए गांव के स्थानीय साहूकार/व्यापारी से ₹2,500 का कर्ज लिया।
  • कठोर शर्त : व्यापारी ने एक शर्त रखी कि स्वप्ना अपनी सारी कपास कुर्नूल की खुली मंडी में न ले जाकर केवल उसी व्यापारी को बेचेगी।
  • शोषण : चार महीने की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद जब कपास के डोडे खिले और स्वप्ना कपास लेकर व्यापारी के पास पहुँची, तो व्यापारी ने मंडी भाव (₹2,200 प्रति क्विंटल) से बहुत कम मात्र ₹1,500 प्रति क्विंटल का भाव लगाया।
  • शुद्ध कमाई : ₹2,500 का पुराना कर्ज और ब्याज काटने के बाद स्वप्ना के हाथ में मात्र ₹3,000 नकद बचे, जो चार महीने के काम के बदले एक दिहाड़ी मजदूर की मजदूरी से भी कम थी।

2. इरोड का कपड़ा बाजार एवं दादन व्यवस्था (Erode Market & Putting-out System)

तमिलनाडु में स्थित इरोड (Erode) का कपड़ा बाजार विश्व के सबसे बड़े द्विसाप्ताहिक कपड़ा बाजारों में से एक है। यहाँ व्यापारी और बुनकर 'दादन व्यवस्था' (Putting-out System) के तहत काम करते हैं।

दादन व्यवस्था (घरेलू प्रणाली) बुनकरों को प्रत्यक्ष लाभ बुनकरों का गंभीर नुकसान व शोषण
व्यापारी बुनकरों को सूत (कच्चा माल) देता है और उनसे तैयार कपड़ा खरीदता है। बुनकरों को सूत खरीदने के लिए पूंजी नहीं लगानी पड़ती और तैयार थान बेचने का जोखिम नहीं उठाना पड़ता। • व्यापारी कपड़े का बहुत कम दाम देता है।
• बुनकर करघा खरीदने हेतु ₹20,000 से ₹40,000 का कर्ज लेते हैं।
• परिवार सहित 12-14 घंटे मेहनत कर मुश्किल से ₹3,500 महीना कमा पाते हैं।

बुनकर सहकारी संस्थाएं (Weavers’ Cooperatives)

व्यापारियों के इस एकाधिकार और शोषण से बचने के लिए बुनकर आपस में मिलकर सहकारी समितियां बनाते हैं। वे सूत मिल से सीधे थोक भाव में सूत खरीदते हैं और तैयार कपड़े को सीधे सरकार या बाजार में बेचते हैं। तमिलनाडु में सरकार को-ऑपटेक्स (Co-optex) स्टोरों के जरिए इन सहकारी समितियों से कपड़ा खरीदती है, जिससे बिचौलियों का सफाया होता है।

3. दिल्ली की गारमेंट एक्सपोर्ट फैक्ट्री : मजदूरों का संघर्ष (Garment Export Factory)

इरोड के व्यापारी से सूत और कपड़ा खरीदकर दिल्ली के निकट स्थित इम्पेक्स गारमेंट एक्सपोर्ट फैक्ट्री जैसे कारखानों में कमीजें बनाई जाती हैं। यह फैक्ट्री अमेरिका और यूरोप के बड़े डिपार्टमेंटल स्टोरों और बहुराष्ट्रीय ब्रांडों को तैयार कमीजें निर्यात करती है।

विदेशी खरीदारों की सख्त शर्तें एवं मजदूरों पर दबाव

  • शर्तें : विदेशी खरीदार न्यूनतम संभव कीमत, विश्वस्तरीय सिलाई की गुणवत्ता और निर्धारित तारीख पर डिलीवरी की कड़ी मांग करते हैं। जरा सी खराबी पर पूरा माल रद्द कर दिया जाता है।
  • मजदूरों का शोषण : निर्यातक अपना मुनाफा बचाने के लिए मजदूरों की मजदूरी में भारी कटौती करते हैं। काम अस्थायी (Temporary) होता है; ऑर्डर पूरा होते ही मजदूरों को निकाल दिया जाता है।
  • अत्यधिक काम के घंटे : मजदूरों से 10 से 12 घंटे लगातार काम कराया जाता है। कुशल दर्जी को मात्र ₹3,000 महीना मिलता है; जबकि बटन टांकने, धागे काटने और प्रेस करने वालों को ₹1.50 से ₹3 प्रति पीस दिया जाता है।

4. अमेरिका में कमीज : किसने कितना कमाया? (Who Gets What? Profit Distribution)

दिल्ली के कारखाने से निकली कमीज जब संयुक्त राज्य अमेरिका के चमचमाते शॉपिंग मॉल में पहुँचती है, तो उसे $26 (लगभग ₹1,800) में बेचा जाता है। आइए इस ₹1,800 के बंटवारे का गणित समझें:

भागीदार (Stakeholder) प्राप्त हिस्सा / व्यय शुद्ध लाभ (Profit) एवं सामाजिक स्थिति
1. अमेरिकी ब्रांड (Mall Store) विक्रय मूल्य : ₹1,800 (लागत ₹1,200) ₹600 शुद्ध मुनाफा (प्रति कमीज) — अकूत संपदा
2. भारतीय निर्यातक (Factory) कमीज बेची : ₹350 (लागत ₹230) ₹120 मुनाफा (प्रति कमीज) — समृद्ध उद्योगपति
3. सिलाई मजदूर / दर्जी प्रति कमीज सिलाई मजदूरी मात्र ₹25 से ₹30 — अत्यंत निम्न जीवन स्तर
4. बुनकर एवं किसान (स्वप्ना) कपास व कपड़े का मूल्य मात्र ₹15 से ₹20 — भुखमरी व कर्ज का फंदा

बाजार में असमानता का निष्कर्ष

कमीज के पूरे जीवन चक्र में सबसे अधिक शारीरिक श्रम और जोखिम उठाने वाले दो लोग—कपास उगाने वाली किसान स्वप्ना और कपड़ा बुनने वाला बुनकर—सबसे कम मुनाफा कमाते हैं। दूसरी ओर, बिना कोई शारीरिक श्रम किए केवल ब्रांड और पूंजी लगाने वाले अमेरिकी व्यापारी को सबसे बड़ा मुनाफा मिलता है। यह बाजार व्यवस्था में घोर गैर-बराबरी को प्रमाणित करता है।

Key Historical Terms, Chronology & Administrative Principles

दादन व्यवस्था समीकरण (Putting-Out System Formula)
व्यापारी (सूत आपूर्ति + मूल्य निर्धारण) ➔ बुनकर घरेलू श्रम ➔ तैयार थान ➔ व्यापारी अधिकतम लाभ
इस व्यवस्था में बुनकर कच्चे माल और तैयार माल दोनों के लिए पूरी तरह व्यापारी पर निर्भर रहता है।
कमीज मूल्य वितरण अनुपात (Shirt Profit Breakdown)
अंतिम खुदरा मूल्य (₹1800) = विदेशी ब्रांड लाभ (₹600) + विज्ञापन/स्टोरेज (₹600) + निर्यातक (₹350) + मजदूर (₹30) + किसान (₹20)
मुनाफे का एक-तिहाई हिस्सा सीधे विदेशी ब्रांड को जाता है, जबकि उत्पादक को 2% से भी कम मिलता है।
सहकारी समिति शोषण उन्मूलन सूत्र (Cooperatives Shield)
सामूहिक खरीद (सूत मिल) + प्रत्यक्ष सरकारी बिक्री (Co-optex) = बिचौलियों का अंत + बुनकरों को उचित मजदूरी
तमिलनाडु सरकार की कपड़ा खरीद नीति बुनकरों को आजीविका सुरक्षा प्रदान करती है।
कृषि ऋण जाल समीकरण (Agricultural Debt Trap)
महंगे इनपुट (कीटनाशक/खाद) ➔ साहूकार से ऋण ➔ बाध्यकारी औने-पौने दाम बिक्री ➔ निरंतर गरीबी
कुर्नूल की स्वप्ना जैसे करोड़ों छोटे किसानों की आजीविका का कड़वा यथार्थ।
वैश्विक परिधान आपूर्ति श्रृंखला
खेत (कपास) ➔ मंडी ➔ जिनिंग मिल ➔ कताई मिल ➔ बुनकर (करघा) ➔ गारमेंट फैक्ट्री ➔ विदेशी मॉल
एक कमीज के निर्माण से लेकर बिक्री तक 7 प्रमुख आर्थिक कड़ियां जुड़ी होती हैं।

Conceptual Solved Examples & Case Studies

Example 1
कुर्नूल में स्वप्ना को अपनी कपास स्थानीय व्यापारी को बाजार भाव से कम कीमत पर बेचने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा?
Step-by-Step Solution:

स्वप्ना की विवशता के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:

  • कर्ज का फंदा : फसल की शुरुआत में बीज, खाद और महंगे कीटनाशक खरीदने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। उसने गांव के बड़े व्यापारी से ₹2,500 का कर्ज लिया था।
  • बाध्यकारी शर्त : व्यापारी ने कर्ज देते समय स्वप्ना से यह लिखित/मौखिक वादा ले लिया था कि वह अपनी सारी कपास उसी को बेचेगी, खुली मंडी में नहीं ले जाएगी।
  • आर्थिक व सामाजिक निर्भरता : किसान केवल खेती के लिए ही नहीं बल्कि बीमारी, बच्चों की फीस या अकाल के समय भी इसी साहूकार से कर्ज लेते हैं। यदि स्वप्ना व्यापारी की बात न मानती तो भविष्य में संकट के समय उसे कोई कर्ज नहीं देता। इस निर्भरता के कारण उसे ₹2,200 के स्थान पर मात्र ₹1,500 में कपास बेचनी पड़ी।
Example 2
दादन व्यवस्था (Putting-out System) क्या है? इसमें बुनकरों को क्या नुकसान होता है?
Step-by-Step Solution:

1. अर्थ : दादन व्यवस्था वह प्रणाली है जिसमें व्यापारी बुनकरों को सूत (कच्चा माल) देता है और उन्हें बताता है कि किस प्रकार का कपड़ा तैयार करना है। बुनकर अपने घरों में करघे लगाकर कपड़ा बुनते हैं और तैयार माल व्यापारी को सौंप देते हैं।

2. बुनकरों को होने वाले नुकसान :

  • व्यापारी का एकाधिकार : बुनकरों को यह पता नहीं होता कि उनका कपड़ा किस भाव बिकेगा। व्यापारी उन्हें बहुत कम मजदूरी देता है।
  • पूंजी का जोखिम : करघा लगाने के लिए बुनकर ₹20,000 से ₹40,000 तक का भारी कर्ज लेते हैं जिसका ब्याज उन्हें स्वयं चुकाना पड़ता है।
  • अथक श्रम का कम मूल्य : पूरा परिवार 12 से 14 घंटे करघा चलाता है, फिर भी महीने में मुश्किल से ₹3,500 कमा पाता है, जबकि सारा मुनाफा व्यापारी कमाता है।
Example 3
बुनकर सहकारी समितियां (Weavers’ Cooperatives) दादन व्यवस्था के शोषण को समाप्त करने में कैसे सफल रही हैं?
Step-by-Step Solution:

बुनकर सहकारी समितियां निम्नलिखित तरीकों से बुनकरों की आय और सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं:

  • सामूहिक मोलभाव : बुनकर मिलकर समिति बनाते हैं जिससे वे कताई मिलों से सीधे थोक भाव पर सूत खरीदते हैं और व्यापारी की बिचौलिया भूमिका खत्म हो जाती है।
  • कपड़े की सीधी बिक्री : समिति कपड़े को सीधे बाजार या सरकार को बेचती है, जिससे व्यापारियों द्वारा काटा जाने वाला मोटा कमीशन बच जाता है और बुनकरों को उनके श्रम का पूरा व उचित दाम मिलता है।
  • सरकारी सहायता : जैसे तमिलनाडु में सरकार 'को-ऑपटेक्स' (Co-optex) के माध्यम से सहकारी समितियों से सीधे वर्दी और साड़ियों का कपड़ा खरीदती है, जिससे बुनकरों को साल भर नियमित रोजगार मिलता है।
Example 4
अमेरिका के एक सुपरमार्केट में $26 (₹1,800) में बिकने वाली कमीज के मुनाफे का बंटवारा किस प्रकार होता है? क्या यह न्यायसंगत है?
Step-by-Step Solution:

1. मुनाफे का बंटवारा :

  • विदेशी ब्रांड (सुपरमार्केट) : ₹1,800 की बिक्री पर लगभग ₹600 का शुद्ध मुनाफा कमाता है।
  • भारतीय गारमेंट निर्यातक : प्रति कमीज लगभग ₹120 का मुनाफा कमाता है।
  • सिलाई मजदूर (दर्जी) : एक कमीज सिलने के बदले मात्र ₹25 से ₹30 पाता है।
  • कपास किसान व बुनकर : प्रति कमीज मुश्किल से ₹15 से ₹20 प्राप्त करते हैं।

2. क्या यह न्यायसंगत है? : यह बिल्कुल भी न्यायसंगत नहीं है। 4 महीने धूप में पसीना बहाने वाले किसान और दिन-रात सुई-धागे व करघे पर आंखें फोड़ने वाले मजदूर को जीवन यापन लायक न्यूनतम आय भी नहीं मिलती, जबकि केवल ब्रांडिंग और पूंजी लगाने वाला विदेशी कॉर्पोरेट सबसे बड़ा मुनाफा हड़प लेता है।

Example 5
विदेशी खरीदारों की सख्त शर्तों का भारतीय गारमेंट एक्सपोर्ट फैक्ट्रियों के मजदूरों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
Step-by-Step Solution:

विदेशी खरीदारों (जैसे अमेरिकी ब्रांड्स) के भारी दबाव का खामियाजा अंततः भारतीय मजदूरों को भुगतना पड़ता है:

  • वेतन में भारी कटौती : निर्यातक न्यूनतम लागत पर ऑर्डर पाने के लिए मजदूरों को बहुत कम मजदूरी देते हैं।
  • अस्थायी रोजगार : मजदूरों को स्थायी नौकरी नहीं दी जाती। जब तक विदेशी ऑर्डर रहता है, काम मिलता है; ऑर्डर पूरा होते ही मजदूरों को बिना किसी नोटिस के निकाल दिया जाता है।
  • अमानवीय काम के घंटे : डिलीवरी की सख्त तारीख पूरी करने के लिए मजदूरों से रोजाना 12 से 14 घंटे काम कराया जाता है और ओवरटाइम का उचित भुगतान भी नहीं किया जाता।

Common Misconceptions & Examiner Traps

Common Misconception

यह समझना कि बाजार में जो जितना अधिक शारीरिक श्रम करता है, उसे उतना ही अधिक मुनाफा मिलता है।

Scientific Reality & Correction

कमीज के बाजार का अर्थशास्त्र सिद्ध करता है कि सबसे अधिक शारीरिक श्रम करने वाले किसान और दर्जी को सबसे कम पैसे मिलते हैं, जबकि पूंजी और ब्रांडिंग लगाने वाले व्यापारी व मॉल मालिक सबसे अधिक लाभ कमाते हैं।

Common Misconception

दादन व्यवस्था में बुनकरों को व्यापारी द्वारा दी जाने वाली सहायता को 'परोपकार' समझना।

Scientific Reality & Correction

व्यापारी सूत देकर बुनकरों पर अहसान नहीं करता बल्कि उन्हें बाजार की सही कीमत से अनजान रखकर उनकी मेहनत को बहुत सस्ते दामों पर खरीदकर उनका शोषण करता है।

Common Misconception

यह मानना कि विदेशी बाजारों में भारतीय कपड़े का बिकना केवल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद है।

Scientific Reality & Correction

निर्यात से विदेशी मुद्रा अवश्य आती है, परंतु जब तक कारखानों में मजदूरों के श्रम अधिकारों, न्यूनतम वेतन और काम के घंटों का विधिक संरक्षण नहीं होगा, इस व्यापार का लाभ गरीब कामगारों तक नहीं पहुँचेगा।

Visual Learning & Conceptual Map

बाजार में एक कमीज : कपास के खेत से अमेरिकी सुपरमार्केट तक मूल्य प्रवाह 1. किसान (स्वप्ना) • कुर्नूल में 4 माह श्रम • ₹2,500 का कर्ज फंदा • ₹1500 सस्ता कपास बिका • प्रति कमीज शेयर : ₹15-20 न्यूनतम बचत व कर्ज 2. बुनकर (इरोड) • दादन व्यवस्था (सूत) • करघे पर 12-14 घंटे काम • परिवार सहित मेहनत • मासिक कमाई ₹3,500 व्यापारी पर पूर्ण निर्भरता 3. निर्यातक (दिल्ली) • गारमेंट एक्सपोर्ट फैक्ट्री • दर्जी मजदूरी ₹25-30 • कमीज बिकी ₹350 में • निर्यातक मुनाफा : ₹120 अस्थायी श्रमिक व्यवस्था 4. विदेशी ब्रांड (USA) • विक्रय मूल्य : $26 (₹1,800) • विज्ञापन व स्टोर : ₹600 • भारतीय लागत : ₹350 • शुद्ध मुनाफा : ₹600 / पीस मुनाफे का सबसे बड़ा हिस्सा आर्थिक विषमता : विदेशी ब्रांड (₹600) >> निर्यातक (₹120) >> दर्जी मजदूर (₹30) >> कपास किसान (₹20) "बाजार में सबसे ज्यादा पसीना बहाने वाला सबसे कम कमाता है; समाधान है सहकारी संस्थाएं और न्यायसंगत व्यापार।"

Chapter Summary & 10 Key Takeaways

Takeaway 1
कमीज की यात्रा कपास के खेत (किसान) से शुरू होकर विदेशी सुपरमार्केट के उपभोक्ता तक पहुँचती है।
Takeaway 2
आंध्र प्रदेश के कुर्नूल में छोटी किसान स्वप्ना ने साहूकार के ₹2,500 के कर्ज के कारण अपनी कपास बाजार भाव से कम कीमत पर बेची।
Takeaway 3
तमिलनाडु के इरोड में "दादन व्यवस्था" (Putting-out System) के तहत व्यापारी बुनकरों को सूत देता है और तैयार कपड़ा लेता है।
Takeaway 4
दादन व्यवस्था में बुनकरों को सूत खरीदने के पैसे नहीं लगाने पड़ते, परंतु व्यापारी कपड़े का बहुत कम दाम देकर उनका शोषण करता है।
Takeaway 5
बुनकर अपने परिवारों के साथ 12-14 घंटे करघा चलाकर भी महीने में केवल ₹3,500 कमा पाते हैं।
Takeaway 6
व्यापारियों के शोषण से बचने के लिए बुनकर सहकारी समितियां (जैसे तमिलनाडु की को-ऑपटेक्स) सीधे सरकार को कपड़ा बेचती हैं।
Takeaway 7
दिल्ली के पास परिधान निर्यातक कारखाने (जैसे इम्पेक्स) विदेशी खरीदारों की कड़ी शर्तों को पूरा करने के लिए मजदूरों का शोषण करते हैं।
Takeaway 8
कारखानों में मजदूरों को काम की गारंटी नहीं होती और दर्जी को प्रति कमीज सिलाई का मात्र ₹25 से ₹30 मिलता है।
Takeaway 9
अमेरिका के डिपार्टमेंटल स्टोर में कमीज ₹1,800 ($26) में बिकती है और विदेशी ब्रांड अकेले ₹600 का शुद्ध मुनाफा कमाता है।
Takeaway 10
बाजार व्यवस्था में सबसे अधिक शारीरिक श्रम करने वाले किसान और मजदूर सबसे कम कमाते हैं जबकि बड़े कॉर्पोरेट सबसे अमीर बनते हैं।

Check Your Understanding (Diagnostic Practice Questions)

Diagnostic questions testing core conceptual clarity. Answers are hidden initially — solve each problem first, then click to reveal the step-by-step verified solution.

1
कुर्नूल (आंध्र प्रदेश) में स्वप्ना ने अपनी जमीन पर किस नकदी फसल की खेती की थी?
Reveal Answer & Explanation
Answer: कपास (Cotton) की खेती।
स्वप्ना ने अपनी छोटी जमीन पर कपास उगाई थी, जिसके लिए उसने स्थानीय साहूकार से ₹2,500 का कर्ज लिया था।
2
तमिलनाडु के इरोड कपड़ा बाजार में प्रचलित 'दादन व्यवस्था' (Putting-out System) क्या है?
Reveal Answer & Explanation
Answer: वह व्यवस्था जिसमें व्यापारी बुनकर को सूत (कच्चा माल) देता है और बुना हुआ कपड़ा तैयार कराता है।
इस घरेलू व्यवस्था में व्यापारी कच्चा माल देकर तैयार माल खरीदता है और बुनकरों को उनके श्रम का बहुत कम दाम देता है।
3
दादन व्यवस्था में व्यापारियों के शोषण से बुनकरों की रक्षा करने के लिए किस प्रकार के संगठन बनाए जाते हैं?
Reveal Answer & Explanation
Answer: बुनकर सहकारी समितियां (Weavers’ Cooperatives)।
सहकारी समितियों में बुनकर मिलकर सूत खरीदते हैं और तैयार कपड़ा सीधे बाजार या सरकारी स्टोर्स (को-ऑपटेक्स) को बेचते हैं।
4
अमेरिका के मॉल में ₹1,800 में बिकने वाली कमीज पर सबसे अधिक शुद्ध मुनाफा (लगभग ₹600) कौन कमाता है?
Reveal Answer & Explanation
Answer: विदेशी बहुराष्ट्रीय ब्रांड / सुपरमार्केट व्यापारी।
विदेशी ब्रांड विज्ञापन और शोरूम के दम पर भारी मुनाफा कमाता है, जबकि निर्माण करने वाले भारतीय मजदूरों को बहुत कम हिस्सा मिलता है।
5
दिल्ली की गारमेंट एक्सपोर्ट फैक्ट्री में एक दर्जी को एक कमीज सिलने के बदले लगभग कितनी मजदूरी मिलती है?
Reveal Answer & Explanation
Answer: लगभग ₹25 से ₹30 प्रति कमीज।
निर्यातक कारखानों में दर्जी और सिलाई मजदूरों को प्रति कमीज मात्र ₹25-30 मजदूरी दी जाती है।
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