कमीज की यात्रा खेत में कपास के पौधे (Cotton Bolls) से शुरू होती है। आंध्र प्रदेश के कुर्नूल जिले की एक छोटी किसान स्वप्ना की कहानी भारतीय सीमांत किसानों के संकट को उजागर करती है।
ऋण का जाल एवं अनिवार्य औने-पौने दाम पर बिक्री
- कर्ज की मजबूरी : कपास की खेती में बीज, खाद और महंगे कीटनाशकों के लिए भारी लागत लगती है। स्वप्ना ने फसल उगाने के लिए गांव के स्थानीय साहूकार/व्यापारी से ₹2,500 का कर्ज लिया।
- कठोर शर्त : व्यापारी ने एक शर्त रखी कि स्वप्ना अपनी सारी कपास कुर्नूल की खुली मंडी में न ले जाकर केवल उसी व्यापारी को बेचेगी।
- शोषण : चार महीने की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद जब कपास के डोडे खिले और स्वप्ना कपास लेकर व्यापारी के पास पहुँची, तो व्यापारी ने मंडी भाव (₹2,200 प्रति क्विंटल) से बहुत कम मात्र ₹1,500 प्रति क्विंटल का भाव लगाया।
- शुद्ध कमाई : ₹2,500 का पुराना कर्ज और ब्याज काटने के बाद स्वप्ना के हाथ में मात्र ₹3,000 नकद बचे, जो चार महीने के काम के बदले एक दिहाड़ी मजदूर की मजदूरी से भी कम थी।