7वीं से 9वीं सदी के बीच दक्षिण भारत में नए धार्मिक आंदोलनों का नेतृत्व दो संत समूहों ने किया:
(A) नयनार संत (भगवान शिव के भक्त)
कुल 63 नयनार संत थे, जो कुम्हार, "अछूत" कामगार, किसान, शिकारी, सैनिक और ब्राह्मण जैसी सभी जातियों से थे। इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध अप्पार, संबंदर, सुंदरार और मणिक्कवाचकार थे। इनके गीतों के दो प्रसिद्ध संकलन "तेवरम" (Tevaram) और "तिरुवाचकम" हैं।
(B) अलवार संत (भगवान विष्णु के भक्त)
कुल 12 अलवार संत थे जो विभिन्न पृष्ठभूमि से आए थे। इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध पेरियालवार, उनकी सुपुत्री आंडाल (Andal), तोंडरडिपोडी अलवार और नम्मालवार थे। इनके भक्ति गीतों का महान संकलन "दिव्य प्रबंधम" (Divya Prabandham) कहलाता है, जिसे तमिल वेद का दर्जा दिया गया।
दर्शन और भक्ति: अद्वैत बनाम विशिष्टाद्वैत
- शंकराचार्य (8वीं सदी, केरल): उन्होंने अद्वैतवाद (Advaita) का प्रतिपादन किया, जिसका अर्थ है कि जीवात्मा और परमात्मा (परम सत्य/ब्रह्म) दोनों एक ही हैं। उन्होंने संसार को माया (मिथ्या) बताया और ज्ञान मार्ग द्वारा मोक्ष पर बल दिया।
- रामानुजाचार्य (11वीं सदी, तमिलनाडु): उन्होंने विशिष्टाद्वैतवाद (Vishishtadvaita) का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार आत्मा परमात्मा से जुड़ने के बाद भी अपनी अलग सत्ता बनाए रखती है। उन्होंने भगवान विष्णु के प्रति प्रपत्ति (अनन्य भक्ति व समर्पण) को मोक्ष का सर्वोत्तम साधन बताया।