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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 7 • Social Science • अध्याय 8
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

ईश्वर से अनुराग (Devotional Paths to the Divine)

कक्षा 7 इतिहास का यह अध्याय "ईश्वर से अनुराग" (Devotional Paths to the Divine) 7वीं से 17वीं सदी के मध्य भारतीय उपमहाद्वीप में उभरी भक्ति और सूफी परंपराओं की महान आध्यात्मिक व सामाजिक क्रांति का संपूर्ण शैक्षणिक विवरण प्रस्तुत करता है। इस अध्याय में दक्षिण भारत के नयनार (शैव) और अलवार (वैष्णव) संतों, शंकराचार्य के अद्वैतवाद, रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैतवाद, बसवण्ण के वीरशैव आंदोलन, महाराष्ट्र के वारकरी संतों (ज्ञानेश्वर, तुकाराम), चिश्ती सूफी सिलसिले (ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती, निजामुद्दीन औलिया), कबीर के क्रांतिकारी दोहों तथा गुरु नानक देव जी की लंगर व नाम-दान-स्नान शिक्षाओं का गहन, तर्कसंगत व परीक्षा-उन्मुख विश्लेषण शामिल है।

🕊️ क्या आपने कभी सोचा है?

✨ जब समाज जाति, छुआछूत और कठिन कर्मकांडों की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब जुलाहे कबीर और चर्मकार रविदास की वाणी के सामने बड़े-बड़े राजा-महाराजा क्यों नतमस्तक हो गए?

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन कोई साधारण धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह सामाजिक क्रांति थी! संतों ने संस्कृत के जटिल श्लोकों को छोड़कर जनता की अपनी बोलियों—कन्नड़, तमिल, मराठी, ब्रज, अवधी और पंजाबी में ईश्वर के प्रति शुद्ध प्रेम का संदेश दिया। गुरु नानक देव जी ने ऊंच-नीच मिटाने के लिए "लंगर" की प्रथा चलाई जहाँ राजा और रंक एक ही पंगत में बैठकर भोजन करते थे। आइए जानें कि कैसे प्रेम, सहिष्णुता और मानवता की इस लहर ने पूरे भारत को एक सूत्र में पिरो दिया!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

यह अध्याय आधुनिक भारतीय समाज की धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक समानता और साझी संस्कृति (गंगा-जमुनी तहजीब) की ऐतिहासिक नींव को स्पष्ट करता है। कबीर, तुलसी, मीरा, गुरु नानक और सूफी संतों की शिक्षाएं आज भी हमारे नैतिक मूल्यों, संगीत (कव्वाली, भजन, कीर्तन) और मानवीय बंधुत्व का मार्गदर्शन करती हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • वैदिक धर्म, उपनिषद तथा भगवद्गीता के बुनियादी विचार।
  • जाति व्यवस्था और सामाजिक स्तरीकरण की प्रारंभिक जानकारी।
  • भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न भाषाई क्षेत्रों (तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब) का मानचित्र ज्ञान।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • नयनार (शैव) और अलवार (वैष्णव) संतों के भक्ति साहित्य (तेवरम व दिव्य प्रबंधम) को समझना।
  • शंकराचार्य के अद्वैतवाद (Advaita) और रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैतवाद (Vishishtadvaita) के दार्शनिक भेद का विश्लेषण करना।
  • बसवण्ण के वीरशैव आंदोलन और उनके वचन (Vachanas) साहित्य के सामाजिक संदेश को जानना।
  • महाराष्ट्र के वारकरी संतों तथा पंढरपुर के विट्ठल संप्रदाय की शिक्षाओं का मूल्यांकन करना।
  • चिश्ती सूफी परंपरा, खानकाह, समा और सर्वधर्म समन्वय में उनकी भूमिका को स्पष्ट करना।
  • कबीर की निर्गुण भक्ति तथा गुरु नानक देव जी के नाम-जपना, कीरत-करना और वंड-छकना के सिद्धांतों को सीखना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. दक्षिण भारत के भक्ति आंदोलन: नयन...
2 2. बसवण्ण का वीरशैव आंदोलन एवं महार...
3 3. इस्लाम और सूफी मत: चिश्ती सिलसिल...
4 4. कबीर एवं गुरु नानक देव जी की क्र...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. दक्षिण भारत के भक्ति आंदोलन: नयनार, अलवार एवं दार्शनिक मत

7वीं से 9वीं सदी के बीच दक्षिण भारत में नए धार्मिक आंदोलनों का नेतृत्व दो संत समूहों ने किया:

(A) नयनार संत (भगवान शिव के भक्त)

कुल 63 नयनार संत थे, जो कुम्हार, "अछूत" कामगार, किसान, शिकारी, सैनिक और ब्राह्मण जैसी सभी जातियों से थे। इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध अप्पार, संबंदर, सुंदरार और मणिक्कवाचकार थे। इनके गीतों के दो प्रसिद्ध संकलन "तेवरम" (Tevaram) और "तिरुवाचकम" हैं।

(B) अलवार संत (भगवान विष्णु के भक्त)

कुल 12 अलवार संत थे जो विभिन्न पृष्ठभूमि से आए थे। इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध पेरियालवार, उनकी सुपुत्री आंडाल (Andal), तोंडरडिपोडी अलवार और नम्मालवार थे। इनके भक्ति गीतों का महान संकलन "दिव्य प्रबंधम" (Divya Prabandham) कहलाता है, जिसे तमिल वेद का दर्जा दिया गया।

दर्शन और भक्ति: अद्वैत बनाम विशिष्टाद्वैत
  • शंकराचार्य (8वीं सदी, केरल): उन्होंने अद्वैतवाद (Advaita) का प्रतिपादन किया, जिसका अर्थ है कि जीवात्मा और परमात्मा (परम सत्य/ब्रह्म) दोनों एक ही हैं। उन्होंने संसार को माया (मिथ्या) बताया और ज्ञान मार्ग द्वारा मोक्ष पर बल दिया।
  • रामानुजाचार्य (11वीं सदी, तमिलनाडु): उन्होंने विशिष्टाद्वैतवाद (Vishishtadvaita) का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार आत्मा परमात्मा से जुड़ने के बाद भी अपनी अलग सत्ता बनाए रखती है। उन्होंने भगवान विष्णु के प्रति प्रपत्ति (अनन्य भक्ति व समर्पण) को मोक्ष का सर्वोत्तम साधन बताया।

2. बसवण्ण का वीरशैव आंदोलन एवं महाराष्ट्र के वारकरी संत

बसवण्ण का वीरशैव आंदोलन (12वीं सदी, कर्नाटक):

तमिल भक्ति आंदोलन और मंदिर पूजा की प्रतिक्रिया में बसवण्ण, अल्लम प्रभु और अक्कमहादेवी ने वीरशैव (लिंगायत) आंदोलन शुरू किया:

  • उन्होंने सभी मानवों की समानता के पक्ष में और जाति व स्त्री के प्रति भेदभाव के विरुद्ध जोरदार आवाज उठाई।
  • वे सभी प्रकार के ब्राह्मणवादी कर्मकांडों और मूर्तिपूजा के कट्टर विरोधी थे। उनके विचार कन्नड़ भाषा में लिखे गए संक्षिप्त वचनों (Vachanas) में संकलित हैं।
महाराष्ट्र के संत (13वीं से 17वीं सदी):

महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन का केंद्र पंढरपुर का विट्ठल मंदिर (भगवान विष्णु का रूप) था:

  • प्रमुख संत: ज्ञानेश्वर (ज्ञानेश्वरी के रचयिता), नामदेव, एकनाथ, और तुकाराम (प्रसिद्ध अभंगों के रचयिता)। साथ ही सखूबाई जैसी महिलाएं और चोखामेला का परिवार (जिन्हें अछूत महार जाति का माना जाता था)।
  • मानवतावादी दृष्टिकोण: इन संतों ने कर्मकांडों, संन्यास और घर-बार छोड़ने का विरोध किया। उन्होंने कहा कि असली भक्ति अपने परिवार के साथ रहकर, ईमानदारी से रोजी-रोटी कमाते हुए "दीन-दुखियों और पीड़ितों की सेवा करना" है। प्रसिद्ध गुजराती संत नरसी मेहता ने लिखा: "वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाणे रे।"
नाथपंथी, सिद्ध और योगी:

इन्होंने समाज के रूढ़िवादी नियमों और बनावटीपन की निंदा की। उन्होंने संसार का त्याग कर परम सत्य (निराकार ब्रह्म) के चिंतन पर बल दिया। इसके लिए उन्होंने योगासन, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से मन और शरीर को कठोर अनुशासन में ढालने की शिक्षा दी। ये समूह साधारण व निम्न मानी जाने वाली जातियों में अत्यंत लोकप्रिय हुए।

3. इस्लाम और सूफी मत: चिश्ती सिलसिला, खानकाह एवं समा

सूफी मुस्लिम रहस्यवादी संत थे। उन्होंने धर्म के बाहरी आडंबरों को नकारते हुए ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम, भक्ति और सभी इंसानों के प्रति दया व करुणा पर बल दिया:

  • पीर और मुरीद: सूफी गुरु को पीर (शेख) और शिष्य को मुरीद कहा जाता था।
  • खानकाह (Hospice): सूफी संत खानकाहों (मठों/आश्रमों) में रहते थे जहां राजा, सामंत और आम जनता सभी मिलकर रूहानी चर्चाएं करते थे और आशीर्वाद प्राप्त करते थे।
  • सिलसिला और समा: सूफियों की विभिन्न आध्यात्मिक परंपराओं को सिलसिला कहा गया। वे ईश्वर के ध्यान में लीन होने के लिए "समा" (संगीत और कव्वाली) तथा "जिक्र" (ईश्वर के नाम का जाप) का प्रयोग करते थे।
भारत का महान "चिश्ती सिलसिला": यह सिलसिला भारत में सबसे प्रभावशाली रहा। इसमें महान संतों की श्रृंखला थी: अजमेर के ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती, दिल्ली के कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, पंजाब के बाबा फरीद, दिल्ली के ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया, तथा गुलबर्गा के बंदानवाज गेसूदराज। इनकी दरगाहें सभी धर्मों के लोगों के लिए श्रद्धा का केंद्र बनीं।

4. कबीर एवं गुरु नानक देव जी की क्रांतिकारी शिक्षाएं

(A) संत कबीर (15वीं-16वीं सदी)

कबीर का पालन-पोषण बनारस के एक मुस्लिम जुलाहा (बुनकर) परिवार में हुआ। उनकी साखियां और पद अत्यंत ओजस्वी और सीधी लोकभाषा में हैं जो बीजक, गुरु ग्रंथ साहिब और कबीर ग्रंथावली में संगृहीत हैं।

  • उन्होंने हिंदू और इस्लाम दोनों के बाह्य आडंबरों, मूर्तिपूजा, नमाज, रोजा, तीर्थयात्रा और जातिप्रथा की तीखी आलोचना की।
  • वे निर्गुण भक्ति (निराकार ईश्वर) के उपासक थे। उनका कहना था कि ईश्वर किसी मंदिर या मस्जिद में नहीं, बल्कि मनुष्य के हृदय में बसता है और उसे केवल सत्य व प्रेम से पाया जा सकता है।
(B) बाबा गुरु नानक (1469-1539 ई.)

तलवंडी (ननकाना साहिब, पाकिस्तान) में जन्मे गुरु नानक ने करतारपुर (डेरा बाबा नानक) में एक केंद्र स्थापित किया:

  • लंगर और धर्मसाल: जाति-पांति के भेदभाव के बिना सभी के लिए एक साझी रसोई "लंगर" तथा उपासना स्थल "धर्मसाल" (गुरुद्वारा) की स्थापना की।
  • त्रिसूत्रीय उपदेश: 1. नाम-जपना (सच्चे नाम का स्मरण), 2. कीरत-करना (ईमानदारी से परिश्रम करना), और 3. वंड-छकना (दूसरों के साथ बांटकर खाना)।
  • खालसा पंथ: गुरु नानक के बाद गुरु अंगद ने उनकी वाणी को गुरुमुखी में संकलित किया। 1699 में दसवें गुरु गोबिंद सिंह ने "खालसा पंथ" की स्थापना कर सिख समुदाय को एक सशक्त सामाजिक-राजनीतिक शक्ति में बदल दिया।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

अद्वैतवाद सूत्र
आत्मा = परमात्मा (ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या)
शंकराचार्य (8वीं सदी)
विशिष्टाद्वैतवाद सूत्र
आत्मा + परमात्मा (विष्णु के प्रति प्रपत्ति/समर्पण)
रामानुजाचार्य (11वीं सदी)
गुरु नानक देव जी की त्रयी
नाम-जपना + कीरत-करना + वंड-छकना
सिख धर्म की आधारशिला
तमिल भक्ति ग्रंथ
तेवरम (शैव / नयनार) + दिव्य प्रबंधम (वैष्णव / अलवार)
तमिल साहित्य के अमूल्य रत्न
खालसा पंथ की स्थापना
1699 ई. (गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा आनंदपुर साहिब में)
सिख धर्म का सैन्य व सामाजिक संगठन

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
Q1 (दार्शनिक तुलना): शंकराचार्य के "अद्वैतवाद" (Advaita) और रामानुजाचार्य के "विशिष्टाद्वैतवाद" (Vishishtadvaita) में क्या मुख्य अंतर है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. शंकराचार्य का अद्वैतवाद (8वीं सदी):
- इसके अनुसार केवल "ब्रह्म" (परमात्मा) ही एकमात्र सत्य है और यह दृश्यमान संसार एक माया (मिथ्या/भ्रम) है।
- जीवात्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है, दोनों एक ही हैं। मोक्ष पाने का साधन ज्ञान प्राप्त करना है।
2. रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैतवाद (11वीं सदी):
- इसके अनुसार ईश्वर (विष्णु) सर्वशक्तिमान और व्यक्तिगत सत्ता हैं।
- जब जीवात्मा परमात्मा से एकाकार भी हो जाती है, तब भी वह अपनी स्वतंत्र सत्ता और विशिष्ट पहचान बनाए रखती है। मोक्ष पाने का सर्वोत्तम मार्ग ज्ञान के बजाय भगवान विष्णु के प्रति अनन्य प्रेम, भक्ति और आत्मसमर्पण (प्रपत्ति) है।

उदाहरण 2
Q2 (सामाजिक सुधार): बसवण्ण के वीरशैव आंदोलन ने तत्कालीन समाज की किन बुराइयों का कड़ा विरोध किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
12वीं सदी में कर्नाटक में बसवण्ण, अल्लम प्रभु और अक्कमहादेवी द्वारा चलाए गए वीरशैव आंदोलन ने निम्नलिखित बुराइयों पर प्रहार किया:
1. जाति व्यवस्था का विरोध: उन्होंने ब्राह्मणवादी व्यवस्था द्वारा थोपी गई ऊंच-नीच और छुआछूत की धारणा को सिरे से खारिज किया और सभी मनुष्यों की समानता की घोषणा की।
2. नारी समानता: तत्कालीन समाज में स्त्रियों के साथ होने वाले भेदभाव और अमानवीय व्यवहार का पुरजोर विरोध किया और उन्हें आध्यात्मिक साधना में पुरुषों के समान अधिकार दिए।
3. कर्मकांड व मूर्तिपूजा का खंडन: उन्होंने मंदिरों में होने वाले महंगे व दिखावटी कर्मकांडों, पशु बलि और मूर्तिपूजा का विरोध कर आंतरिक पवित्रता और सदाचार पर बल दिया।

उदाहरण 3
Q3 (आध्यात्मिक संस्कृति): सूफी मत में "खानकाह" (Khanqah) और "समा" (Sama) का क्या महत्व था? भारत में चिश्ती सिलसिले की लोकप्रियता का क्या कारण था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. खानकाह: यह सूफी संतों का आश्रम या विश्राम गृह होता था, जहाँ सूफी पीर अपने शिष्यों (मुरीदों) के साथ रहते थे। यहाँ समाज के हर वर्ग—राजा, अमीर से लेकर निर्धन किसान तक—बिना किसी रोक-टोक के आते थे और आध्यात्मिक चर्चा करते थे।
2. समा: सूफी साधना में ईश्वर के ध्यान में डूबने के लिए भक्ति संगीत, काव्य पाठ और कव्वाली के आयोजन को "समा" कहा जाता था।
3. चिश्ती सिलसिले की लोकप्रियता: अजमेर के ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती और दिल्ली के निजामुद्दीन औलिया जैसे संतों ने सादगीपूर्ण जीवन जिया, स्थानीय भाषा में बात की, तथा सभी धर्मों के लोगों को बिना भेदभाव के गले लगाया। उनके मानवतावादी दृष्टिकोण ने चिश्ती सिलसिले को जन-जन का प्रिय बना दिया।

उदाहरण 4
Q4 (क्रांतिकारी दृष्टिकोण): कबीर की भक्ति धारा को "निर्गुण भक्ति" क्यों कहा जाता है? उन्होंने तत्कालीन धार्मिक आडंबरों की आलोचना किस प्रकार की?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. निर्गुण भक्ति: कबीर किसी मूर्ति, अवतार, रूप या रंग वाले ईश्वर के स्थान पर एक निराकार, सर्वव्यापी और अमूर्त परम सत्य (राम/अल्लाह) की उपासना पर बल देते थे, इसलिए उनकी धारा को निर्गुण भक्ति कहा जाता है।
2. धार्मिक आडंबरों की आलोचना:
- उन्होंने हिंदुओं की मूर्तिपूजा और तीर्थयात्रा पर व्यंग्य करते हुए कहा: "पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजौं पहार।"
- उन्होंने मुसलमानों के दिखावटी नमाज और अजान पर कहा कि क्या खुदा बहरा है जो लाउडस्पीकर या ऊंची आवाज में चिल्लाना पड़े?
- कबीर ने कहा कि सच्चा धर्म केवल मन की पवित्रता, सत्य, प्रेम और प्राणी मात्र के प्रति करुणा में है।

उदाहरण 5
Q5 (समतामूलक संस्थाएं): बाबा गुरु नानक देव जी द्वारा स्थापित "लंगर" और "धर्मसाल" की संस्थाओं ने भारतीय समाज में समानता लाने में क्या भूमिका निभाई?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. लंगर (साझा भोजनालय): गुरु नानक देव जी ने अनिवार्य नियम बनाया कि जो भी श्रद्धालु गुरु से मिलने आए, वह पहले लंगर में भोजन करे। लंगर में ब्राह्मण हो या तथाकथित अछूत, धनी हो या निर्धन, सभी एक ही पंगत (पंक्ति) में फर्श पर बैठकर एक जैसा भोजन करते थे। इसने जातिवाद और छुआछूत की सदियों पुरानी दीवार को एक झटके में तोड़ दिया।
2. धर्मसाल (गुरुद्वारा): यह उपासना और सत्संग का ऐसा पवित्र स्थान था जहां किसी भी धर्म, जाति या लिंग का व्यक्ति बिना किसी रोक-टोक के प्रवेश कर सकता था और सामूहिक रूप से ईश्वर का नाम जप सकता था।
3. परिणाम: इन दोनों संस्थाओं ने समाज में बंधुत्व, गरिमा और समता की ऐसी मजबूत नींव रखी जो आज भी सिख धर्म का मुख्य गौरव है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

नयनार और अलवार संतों को एक ही संप्रदाय का मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

याद रखें: नयनार संत भगवान शिव के भक्त थे (शैव, कुल 63), जबकि अलवार संत भगवान विष्णु के भक्त थे (वैष्णव, कुल 12)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

शंकराचार्य और रामानुजाचार्य के दार्शनिक सिद्धांतों को आपस में बदल देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

शंकराचार्य ने "अद्वैतवाद" (आत्मा व परमात्मा एक हैं) का प्रतिपादन किया, जबकि रामानुजाचार्य ने "विशिष्टाद्वैतवाद" (परमात्मा से जुड़कर भी आत्मा की अलग सत्ता) का सिद्धांत दिया।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

कबीर के "राम" को अयोध्या के ऐतिहासिक दशरथ पुत्र राम के रूप में देखना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

कबीर के राम निर्गुण, निराकार, सर्वव्यापी और परम सत्य का नाम हैं; वे किसी मानवरूपी अवतार या मूर्ति के उपासक नहीं थे।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

मध्यकालीन भक्ति व सूफी आंदोलन की प्रमुख धाराएं
दक्षिण भारत (नयनार व अलवार) ➔ अद्वैत व विशिष्टाद्वैत दर्शन ➔ वीरशैव (बसवण्ण) व वारकरी संत ➔ सूफी मत (चिश्ती सिलसिला व खानकाह) ➔ कबीर व गुरु नानक (लंगर व नाम-जपना)

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
7वीं से 9वीं सदी के बीच दक्षिण भारत में नयनार (63 शैव संत) और अलवार (12 वैष्णव संत) ने भक्ति आंदोलन की नींव रखी।
मुख्य बिंदु 2
नयनारों के गीतों का संकलन "तेवरम" तथा अलवारों के गीतों का संग्रह "दिव्य प्रबंधम" कहलाता है।
मुख्य बिंदु 3
शंकराचार्य ने 8वीं सदी में अद्वैतवाद (आत्मा-परमात्मा की एकता) तथा रामानुजाचार्य ने 11वीं सदी में विशिष्टाद्वैतवाद का प्रतिपादन किया।
मुख्य बिंदु 4
12वीं सदी में कर्नाटक में बसवण्ण ने वीरशैव आंदोलन चलाया जिसने जातिप्रथा, मूर्तिपूजा और नारी असमानता का विरोध किया।
मुख्य बिंदु 5
महाराष्ट्र में पंढरपुर के विट्ठल मंदिर के इर्द-गिर्द ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम जैसे वारकरी संतों ने मानवतावादी भक्ति का प्रचार किया।
मुख्य बिंदु 6
नाथपंथियों, सिद्धों और योगियों ने संसार त्यागकर योगासन और प्राणायाम द्वारा निराकार सत्य के साक्षात्कार पर बल दिया।
मुख्य बिंदु 7
सूफी संत खानकाहों में रहते थे और प्रेम व करुणा पर बल देते थे; भारत में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का चिश्ती सिलसिला सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ।
मुख्य बिंदु 8
संत कबीर ने बनारस में निर्गुण निराकार ईश्वर का संदेश दिया और हिंदू-मुस्लिम बाह्य पाखंडों पर तीखा प्रहार किया।
मुख्य बिंदु 9
गुरु नानक देव जी ने करतारपुर में "लंगर" और "धर्मसाल" की स्थापना की तथा नाम-जपना, कीरत-करना व वंड-छकना की शिक्षा दी।
मुख्य बिंदु 10
गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699 में आनंदपुर साहिब में "खालसा पंथ" की स्थापना कर सिख समुदाय को सुदृढ़ किया।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
दक्षिण भारत में शिव भक्तों और विष्णु भक्तों को क्रमशः किस नाम से जाना जाता था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: दक्षिण भारत में भगवान शिव के भक्त संतों को "नयनार" (Nayanars) और भगवान विष्णु के भक्त संतों को "अलवार" (Alvars) कहा जाता था।
2
शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित दर्शन का क्या नाम था और उनका जन्म किस राज्य में हुआ था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित दर्शन का नाम "अद्वैतवाद" (Advaita) था और उनका जन्म 8वीं शताब्दी में केरल में हुआ था।
3
महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन का मुख्य केंद्र कौन-सा मंदिर था और वहाँ किस देवता की पूजा होती थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन का मुख्य केंद्र "पंढरपुर का विट्ठल मंदिर" था, जहाँ भगवान विष्णु के स्वरूप विट्ठल की पूजा की जाती थी।
4
अजमेर में किस विश्वविख्यात सूफी संत की प्रसिद्ध दरगाह स्थित है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अजमेर में चिश्ती सिलसिले के महान सूफी संत "ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती" (गरीब नवाज) की पवित्र दरगाह स्थित है।
5
बाबा गुरु नानक देव जी द्वारा दिए गए तीन प्रमुख जीवन सिद्धांत कौन-से हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: बाबा गुरु नानक देव जी के तीन प्रमुख सिद्धांत हैं: 1. नाम-जपना (ईश्वर का स्मरण), 2. कीरत-करना (ईमानदारी से परिश्रम), और 3. वंड-छकना (जरूरतमंदों के साथ बांटकर खाना)।
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