Follow Us
Select Medium / माध्यम चुनें:
Eng (English) Hindi (हिन्दी)
JAC • Class 7 • Social Science • Ch 21
Estimated Time: 45 Mins
Study Progress: In Progress

Growing Up as Boys and Girls

इस अध्याय में हम समाज में लड़के और लड़कियों के सामाजीकरण की प्रक्रिया, लैंगिक रूढ़िवादिता (Gender Stereotypes), 1920 के दशक के समोआ द्वीप तथा 1960 के दशक के मध्य प्रदेश के तुलनात्मक समाजशास्त्रीय अध्ययन, महिलाओं के अवैतनिक घरेलू श्रम के अमूल्यन (Devaluing Domestic Work), दोहरे बोझ (Double Burden) तथा समानता स्थापित करने हेतु सरकारी नीतियों (आंगनवाड़ी व क्रेच योजना) का गहन विश्लेषण करेंगे।

क्या सुबह 5 बजे से रात 11 बजे तक बिना रुके काम करने वाली माँ सचमुच 'कुछ काम नहीं करती'?

जब एक बच्चा कहता है कि "मेरी माँ नौकरी नहीं करती, वह सिर्फ घरेलू महिला (Housewife) है", तो वह समाज की उस गहरी मानसिकता को दोहरा रहा होता है जो महिलाओं के खाना पकाने, सफाई करने और बच्चों की देखभाल जैसे अथक शारीरिक श्रम को कोई आर्थिक या सामाजिक मूल्य नहीं देती। आखिर समाज में यह लैंगिक भेद कैसे गढ़ा जाता है? क्या प्रशांत महासागर के समोआ द्वीप में भी लड़के खाना बनाने से दूर रहते थे? आइए इस अध्याय में पड़ताल करें।

Why This Chapter Matters

यह अध्याय विद्यार्थियों को जेंडर (Gender) और जैविक लिंग (Sex) के अंतर को समझने, महिलाओं के घरेलू व देखभाल श्रम का सम्मान करने, रूढ़िवादी धारणाओं को चुनौती देने तथा समाज व परिवार में लैंगिक समानता की व्यावहारिक समझ विकसित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

Before You Begin (Prerequisites)

  • समानता और भेदभाव की बुनियादी अवधारणाओं की समझ।
  • परिवार, समाज और सामाजीकरण की सामान्य जानकारी।
  • संविधान में उल्लिखित गैर-भेदभाव के सिद्धांतों का ज्ञान।

What You Will Learn (Core Objectives)

  • सामाजीकरण (Socialisation) की प्रक्रिया और समाज द्वारा लड़के व लड़कियों को दी जाने वाली भिन्न भूमिकाओं को समझना।
  • 1920 के दशक में समोआ द्वीप के बच्चों के पालन-पोषण और वहाँ लड़कों द्वारा कुकिंग हाउस में खाना बनाने की अनूठी संस्कृति का विश्लेषण करना।
  • 1960 के दशक में मध्य प्रदेश में लड़कों और लड़कियों के स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों के उपयोग में अंतर को स्पष्ट करना।
  • महिलाओं के घरेलू कार्य के अमूल्यन (Devaluing Care-work) और दोहरे बोझ (Double Burden) के आर्थिक व सामाजिक कारणों को पहचानना।
  • लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए राज्य द्वारा स्थापित आंगनवाड़ियों, क्रेच (शिशुगृह) प्रावधानों तथा कानूनी सुधारों का मूल्यांकन करना।

Chapter Roadmap & Progression

1 1. सामाजीकरण एवं समोआ द्वीप में बच्...
2 2. 1960 के दशक में मध्य प्रदेश में...
3 3. घरेलू कार्य का अमूल्यन एवं दोहरा...
4 4. महिलाओं का काम और शासन द्वारा सम...

Complete Concept Guide (100% Curriculum Coverage)

1. सामाजीकरण एवं समोआ द्वीप में बच्चों का पालन-पोषण (Socialisation & Samoa in 1920s)

लड़का या लड़की होना केवल जैविक पहचान नहीं है; बचपन से ही हमारा समाज हमें सिखाता है कि लड़कों को कैसा आचरण करना चाहिए और लड़कियों को कैसा। खिलौनों के चयन (लड़कों को कारें व बंदूकें, लड़कियों को गुड़िया व रसोई के बर्तन) से ही भविष्य की लैंगिक भूमिकाएं तय कर दी जाती हैं।

1920 के दशक में समोआ द्वीप का अध्ययन (Margaret Mead Study)

प्रशांत महासागर के दक्षिण में स्थित समोआ द्वीप समाज पर किए गए मानवशास्त्रीय अनुसंधान ने आधुनिक दुनिया को चौंका दिया:

  • स्कूल न जाना : समोआई बच्चे आधुनिक स्कूल नहीं जाते थे। वे समाज के बड़े लोगों से घर और द्वीप की व्यावहारिक कलाएं (जैसे मछली पकड़ना, नारियल के पेड़ लगाना) सीखते थे।
  • बच्चों की देखभाल : जैसे ही बच्चा चलना सीख जाता, माँ उसकी देखभाल छोड़ देती थी। 5 वर्ष से बड़े बच्चे (लड़के व लड़कियां दोनों) छोटे बच्चों की देखभाल करते थे।
  • लड़कों का कार्य : लगभग 9 वर्ष की आयु में लड़के बाहरी कामों में बड़े लड़कों के साथ शामिल हो जाते थे—मछली पकड़ना और नारियल लगाना।
  • लड़कियों की स्वतंत्रता : 14 वर्ष की आयु तक लड़कियां घर के काम करती थीं, परंतु 14 वर्ष की होने के बाद वे लड़कों की तरह पूरी तरह स्वतंत्र हो जाती थीं—वे समुद्र में मछली पकड़ने जाती थीं और बागानों में काम करती थीं।
  • रसोई का कार्य लड़कों द्वारा : समोआ में अधिकांश खाना पकाने का काम विशेष 'कुकिंग हाउस' (Cooking Houses) में लड़कों द्वारा किया जाता था, और लड़कियां केवल उनकी तैयारी में सहायता करती थीं!

2. 1960 के दशक में मध्य प्रदेश में लड़कों और लड़कियों का स्कूल (Growing up in MP in 1960s)

भारत के मध्य प्रदेश राज्य के एक छोटे शहर में 1960 के दशक में लड़कों और लड़कियों के बड़े होने के अनुभवों का अध्ययन समाज की गहरी लैंगिक खाई को उजागर करता है।

लड़कियों का स्कूल एवं सार्वजनिक आचरण
  • कक्षा 6 से लड़कियों का स्कूल लड़कों से पूरी तरह अलग हो जाता था।
  • लड़कियों के स्कूल के बीच में एक सुरक्षित आंगन (Courtyard) होता था जहाँ वे बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटकर सुरक्षित वातावरण में खेलती थीं।
  • छुट्टी होने पर लड़कियां संकरी गलियों में सीधे समूह बनाकर चुपचाप चलती थीं। उनके मन में हमेशा यह डर रहता था कि कोई उन्हें छेड़ेगा या उन पर हमला करेगा। उनके लिए सड़क केवल घर पहुँचने का एक सीधा साधन थी।
लड़कों का स्कूल एवं सड़क का उपयोग
  • लड़कों के स्कूल में कोई बंद आंगन नहीं था; उनका खेल का मैदान स्कूल से लगा एक खुला विशाल मैदान था।
  • छुट्टी के समय लड़के सड़कों पर खड़े होकर गपशप करते, समय बिताते, साइकिल चलाते और करतब दिखाते थे।
  • लड़कों के लिए सड़क खेलने, खड़े होने और मौज-मस्ती करने की एक खुली सार्वजनिक जगह थी।

3. घरेलू कार्य का अमूल्यन एवं दोहरा बोझ (Devaluing Domestic Work & Double Burden)

समाज में एक अत्यंत पूर्वाग्रहपूर्ण धारणा प्रचलित है कि घर का काम 'वास्तविक काम' नहीं है। हरमीत के परिवार की कहानी इसका जीवंत उदाहरण है, जहाँ जसप्रीत (माँ) दिन-रात काम करती हैं, फिर भी परिवार कहता है कि "मम्मी तो कोई काम ही नहीं करतीं!"

घरेलू कार्य के अदृश्य पहलू वास्तविक प्रकृति सामाजिक भ्रम / पूर्वाग्रह
भारी शारीरिक श्रम पानी ढोना, लकड़ी लाना, झुककर झाड़ू-पोछा करना, कपड़े धोना, भारी वजन उठाना। माना जाता है कि यह 'आसान' काम है और केवल पुरुषों का दफ्तरी काम थकाने वाला है।
समय लेने वाला (Time-consuming) सुबह 5 बजे से रात 11 बजे तक (15-16 घंटे बिना रुके निरंतर कार्य)। माना जाता है कि घरेलू महिलाओं के पास दिनभर 'फुरसत' ही फुरसत है।
देखभाल श्रम (Care-giving) बच्चों, बुजुर्गों और बीमारों की भावनात्मक व शारीरिक तीमारदारी। इसे महिलाओं का 'स्वाभाविक कर्तव्य' मानकर इसका कोई मौद्रिक मूल्य नहीं दिया जाता।

काम का दोहरा बोझ (Double Burden)

जब महिलाएं बाहर जाकर नौकरी या मजदूरी करती हैं, तब भी घर का सारा काम (खाना बनाना, सफाई, बच्चों की देखभाल) उन्हीं को करना पड़ता है। इसे काम का दोहरा बोझ कहा जाता है। सर्वेक्षणों के अनुसार, भारत में महिलाएं पुरुषों की तुलना में हर हफ्ते औसतन 10 से 15 घंटे अधिक काम करती हैं, लेकिन उनका अधिकांश काम अवैतनिक (Unpaid) होता है।

4. महिलाओं का काम और शासन द्वारा समानता के उपाय (Women’s Work & Government Initiatives)

भारतीय संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि स्त्री या पुरुष होने के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। अतः घरेलू काम और बाल-देखभाल का बोझ केवल महिलाओं पर पड़ना संविधान के समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है।

समानता हेतु सरकारी नीतियां एवं कानून

  • आंगनवाड़ी एवं बालवाड़ियों की स्थापना : सरकार ने गांवों और कस्बों में हजारों आंगनवाड़ियां खोली हैं ताकि छोटे बच्चों को पोषण और प्रारंभिक देखभाल मिल सके।
  • अनिवार्य क्रेच (शिशुगृह) कानून : कानून के अनुसार, जिस किसी कारखाने या संस्था में 30 से अधिक महिला कर्मचारी काम करती हैं, वहाँ बाल-देखभाल केंद्र (Crèche) खोलना अनिवार्य है।
  • बालिकाओं की शिक्षा में सुधार : शिशुगृह होने से कामकाजी महिलाओं को नौकरी करने में आसानी होती है और घर की बड़ी बच्चियों को छोटे भाई-बहनों को संभालने के लिए स्कूल छोड़ना नहीं पड़ता।
  • समान पारिश्रमिक अधिनियम (Equal Remuneration Act) : समान कार्य के लिए पुरुष और महिला को समान वेतन देना विधिक रूप से अनिवार्य किया गया है।

Key Historical Terms, Chronology & Administrative Principles

लैंगिक सामाजीकरण समीकरण (Gender Socialisation)
जैविक लिंग (Sex - जैविक भिन्नता) ≠ जेंडर (Gender - समाज द्वारा गढ़ी गई रूढ़िवादी भूमिकाएं)
समोआ द्वीप का उदाहरण सिद्ध करता है कि खाना पकाना या बच्चों की देखभाल प्राकृतिक रूप से केवल महिलाओं का काम नहीं है।
काम का दोहरा बोझ सूत्र (Double Burden of Labour)
दोहरा बोझ = वैतनिक बाह्य कार्य (Paid Work) + अवैतनिक घरेलू एवं देखभाल श्रम (Unpaid Care-work)
कामकाजी महिलाएं घर और बाहर दोनों जगह काम करती हैं, परंतु समाज घरेलू काम को अनदेखा करता है।
घरेलू श्रम समय-मूल्य असंतुलन (Domestic Labour Time Gap)
महिला साप्ताहिक कुल श्रम घंटे (घरेलू + बाह्य) >> पुरुष साप्ताहिक श्रम घंटे | पारिश्रमिक = नगण्य
राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण (NSSO) के अनुसार महिलाएं प्रति सप्ताह 40+ घंटे अवैतनिक श्रम करती हैं।
क्रेच (Crèche) अनिवार्य विधिक मानक
महिला कर्मचारियों की संख्या > 30 ➔ कार्यस्थल पर अनिवार्य निःशुल्क शिशुगृह (Crèche) सुविधा
मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत महिलाओं को काम जारी रखने और बच्चियों को स्कूल जाने में सहायक प्रावधान।
समोआई कुकिंग हाउस मॉडल
कुकिंग हाउस = लड़कों द्वारा मुख्य भोजन पकाना + लड़कियों द्वारा सहायक तैयारी
प्रशांत महासागरीय समोआ द्वीप (1920) की अद्वितीय लैंगिक समरसता का प्रमाण।

Conceptual Solved Examples & Case Studies

Example 1
समोआ द्वीप (1920 के दशक) में बच्चों के बड़े होने की प्रक्रिया भारतीय समाज से किस प्रकार भिन्न थी?
Step-by-Step Solution:

1920 के दशक में समोआ द्वीप का अध्ययन दर्शाता है कि लड़के और लड़कियों की भूमिकाएं सार्वभौमिक या प्राकृतिक नहीं हैं:

  • स्वतंत्रता : 14 वर्ष की आयु के बाद समोआई लड़कियां पूर्ण स्वतंत्र हो जाती थीं; वे लड़कों की तरह मछली पकड़ने और बागानों में काम करने जाती थीं।
  • भोजन पकाने का काम : आधुनिक समाज में खाना बनाना केवल महिलाओं का काम माना जाता है, परंतु समोआ में अधिकांश खाना विशेष कुकिंग हाउसों में लड़कों द्वारा बनाया जाता था।
  • देखभाल की जिम्मेदारी : 5 वर्ष से बड़े लड़के और लड़कियां दोनों मिलकर छोटे बच्चों की देखभाल करते थे।
Example 2
घरेलू काम का 'अमूल्यन' (Devaluation of Housework) क्या है? समाज महिलाओं के काम को कम महत्व क्यों देता है?
Step-by-Step Solution:

1. अर्थ : जब किसी व्यक्ति द्वारा किए गए कठिन परिश्रम, समय और ऊर्जा को कोई मान्यता, सम्मान या आर्थिक मूल्य नहीं दिया जाता, तो उसे अमूल्यन कहते हैं।

2. कम महत्व देने के कारण :

  • पैसे से न जुड़ा होना : बाजार केवल उसी काम को महत्व देता है जिसके बदले प्रत्यक्ष वेतन या नकद लाभ मिलता है। चूंकि घरेलू काम के लिए कोई वेतन नहीं मिलता, समाज उसे 'काम' ही नहीं मानता।
  • प्राकृतिक मान लेना : समाज यह मान लेता है कि घर संभालना, बच्चों का लालन-पालन और बुजुर्गों की सेवा करना महिलाओं की 'स्वाभाविक जैविक जिम्मेदारी' है, जिसके लिए किसी विशेष कौशल या पारिश्रमिक की आवश्यकता नहीं है।
Example 3
1960 के दशक में मध्य प्रदेश में लड़कों और लड़कियों के लिए सड़कों और सार्वजनिक स्थलों के उपयोग में क्या अंतर था?
Step-by-Step Solution:

यह अध्ययन दर्शाता है कि सार्वजनिक स्थान भी लैंगिक दृष्टि से तटस्थ नहीं होते:

  • लड़कों के लिए सड़क : लड़के सड़क को खेलने, गपशप करने, साइकिल से नए-नए करतब दिखाने और समय बिताने की एक खुली, आजाद जगह मानते थे जहाँ उन्हें किसी प्रकार का भय नहीं था।
  • लड़कियों के लिए सड़क : लड़कियां सड़क पर कभी खड़ी नहीं होती थीं; वे हमेशा समूहों में सिर झुकाए सीधे अपने घर की ओर तेजी से चलती थीं। उनके मन में हमेशा यह डर बना रहता था कि कोई उन्हें छेड़ेगा, फब्तियां कसेगा या हमला कर देगा। उनके लिए सड़क केवल घर पहुँचने का एक माध्यम थी।
Example 4
महिलाओं पर 'काम का दोहरा बोझ' (Double Burden) क्या है? यह उनकी प्रगति को कैसे बाधित करता है?
Step-by-Step Solution:

1. अर्थ : जब एक महिला को घर के बाहर जाकर आजीविका के लिए नौकरी या मजदूरी करनी पड़ती है, और फिर घर लौटने के बाद बिना किसी सहयोग के झाड़ू-पोछा, खाना पकाना, बर्तन धोना और बच्चों की देखभाल भी अकेले करनी पड़ती है, तो इसे 'दोहरा बोझ' कहते हैं।

2. प्रभाव :

  • अत्यधिक शारीरिक और मानसिक थकान के कारण महिलाओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • उन्हें आराम, मनोरंजन, उच्च शिक्षा या करियर में आगे बढ़ने के लिए समय नहीं मिलता।
  • परिवार और कार्यस्थल के बीच संतुलन बनाना उनके लिए एक अंतहीन तनाव बन जाता है।
Example 5
सरकार द्वारा कार्यस्थलों पर 'शिशुगृह' (Crèche) अनिवार्य करने से महिलाओं और बालिकाओं के जीवन पर क्या सकारात्मक प्रभाव पड़ता है?
Step-by-Step Solution:

30 से अधिक महिला कर्मचारियों वाले संस्थानों में शिशुगृह (क्रेच) की अनिवार्य व्यवस्था के निम्नलिखित दूरगामी लाभ हैं:

  • माताओं के लिए रोजगार सुरक्षा : कामकाजी माताओं को छोटे बच्चों के कारण अपनी नौकरी या आजीविका छोड़ने पर मजबूर नहीं होना पड़ता।
  • बालिकाओं की शिक्षा सुरक्षा : गरीब परिवारों में माँ के काम पर जाने के बाद बड़ी लड़कियों को स्कूल छोड़कर छोटे भाई-बहनों को संभालना पड़ता था। क्रेच होने से बच्चियां नियमित स्कूल जा पाती हैं।
  • लैंगिक समानता को बढ़ावा : यह व्यवस्था यह संदेश देती है कि बच्चों की देखभाल केवल महिलाओं की निजी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज और राज्य का भी सामूहिक उत्तरदायित्व है।

Common Misconceptions & Examiner Traps

Common Misconception

यह मान लेना कि घरेलू महिला (Housewife) शारीरिक रूप से पुरुषों से कम मेहनत करती है।

Scientific Reality & Correction

घरेलू काम में पानी ढोना, भारी वजन उठाना, झुककर झाड़ू लगाना और चूल्हे की गर्मी में घंटों खड़े रहना शामिल है; समय के हिसाब से महिलाएं पुरुषों से कई घंटे अधिक शारीरिक श्रम करती हैं।

Common Misconception

यह समझना कि खाना बनाना और बच्चों की देखभाल करना प्रकृति ने केवल महिलाओं के डीएनए में लिखा है।

Scientific Reality & Correction

समोआ द्वीप का मानवशास्त्रीय अध्ययन सिद्ध करता है कि भोजन पकाना और बच्चों की देखभाल समाज द्वारा सिखाई गई सांस्कृतिक भूमिकाएं हैं, कोई प्राकृतिक या अपरिवर्तनीय नियम नहीं।

Common Misconception

घरेलू काम और देखभाल को केवल परिवार का निजी आंतरिक मामला मानना।

Scientific Reality & Correction

संविधान के अनुसार समानता एक मौलिक अधिकार है; अतः जब तक घरेलू काम और देखभाल के बोझ का न्यायसंगत पुनर्वितरण नहीं होगा और सरकार क्रेच जैसी सुविधाएं नहीं देगी, वास्तविक लैंगिक समानता हासिल नहीं हो सकती।

Visual Learning & Conceptual Map

लड़के और लड़कियों के रूप में बड़ा होना : लैंगिक सामाजीकरण एवं समानता 1. समोआ द्वीप (1920) • 14 वर्ष बाद लड़कियां पूर्ण स्वतंत्र • मछली पकड़ना व बागान कार्य • 'कुकिंग हाउस' में लड़के रसोइए भूमिकाएं समाज तय करता है 2. घरेलू श्रम का अमूल्यन • जसप्रीत की कहानी : अदृश्य श्रम • सुबह 5 से रात 11 बजे तक काम • काम का दोहरा बोझ (Double Burden) अवैतनिक श्रम = मूल्यहीनता 3. समानता हेतु सरकारी पहल • 30+ महिलाओं पर अनिवार्य क्रेच • आंगनवाड़ी पोषण व बाल-देखभाल • बालिकाओं की स्कूल में निरंतरता समान कार्य ➔ समान वेतन समानता की मंजिल : घरेलू श्रम की पहचान + कार्यस्थल पर क्रेच + रूढ़िवादिता का अंत "देखभाल केवल महिलाओं की निजी नियति नहीं, बल्कि समतामूलक समाज की सामूहिक नींव है।"

Chapter Summary & 10 Key Takeaways

Takeaway 1
लड़का या लड़की होना केवल जैविक नहीं, बल्कि समाज द्वारा तय की जाने वाली भूमिकाओं और सामाजीकरण का परिणाम है।
Takeaway 2
बचपन से ही खिलौनों (कारों बनाम गुड़ियों) के माध्यम से बच्चों के मन में भविष्य की भिन्न लैंगिक भूमिकाएं भर दी जाती हैं।
Takeaway 3
1920 के दशक में प्रशांत महासागर के समोआ द्वीप में 14 वर्ष की लड़कियां पूरी तरह स्वतंत्र होकर मछली पकड़ती थीं और बागानों में काम करती थीं।
Takeaway 4
समोआ द्वीप में अधिकांश खाना पकाने का कार्य विशेष कुकिंग हाउसों में लड़कों द्वारा किया जाता था।
Takeaway 5
1960 के दशक में मध्य प्रदेश में लड़कों के लिए सड़क खेलने की जगह थी, जबकि लड़कियां छेड़े जाने के डर से समूह बनाकर सीधे घर जाती थीं।
Takeaway 6
समाज महिलाओं के घरेलू काम और देखभाल श्रम को शारीरिक या उत्पादक काम नहीं मानता, बल्कि स्वाभाविक कर्तव्य मानकर अमूल्यित करता है।
Takeaway 7
घर और बाहर दोनों जगह काम करने वाली महिलाओं पर "काम का दोहरा बोझ" (Double Burden) पड़ता है।
Takeaway 8
भारतीय महिलाएं पुरुषों की तुलना में प्रति सप्ताह कई घंटे अधिक काम करती हैं, परंतु उनका अधिकांश काम अवैतनिक (Unpaid) होता है।
Takeaway 9
समानता स्थापित करने के लिए सरकार ने 30 से अधिक महिला कर्मियों वाले संस्थानों में अनिवार्य शिशुगृह (क्रेच) का कानून बनाया है।
Takeaway 10
आंगनवाड़ी और क्रेच सुविधाओं से कामकाजी माताओं को राहत मिलती है और घर की बड़ी लड़कियों को स्कूल छोड़ने पर मजबूर नहीं होना पड़ता।

Check Your Understanding (Diagnostic Practice Questions)

Diagnostic questions testing core conceptual clarity. Answers are hidden initially — solve each problem first, then click to reveal the step-by-step verified solution.

1
1920 के दशक में समोआ द्वीप में अधिकांश खाना पकाने का काम किसके द्वारा किया जाता था?
Reveal Answer & Explanation
Answer: लड़कों द्वारा (विशेष कुकिंग हाउसों में)।
समोआ द्वीप पर लड़के विशेष कुकिंग हाउस में भोजन पकाते थे और लड़कियां केवल उनकी तैयारी में मदद करती थीं।
2
महिलाओं पर 'काम का दोहरा बोझ' (Double Burden) का क्या अर्थ है?
Reveal Answer & Explanation
Answer: घर के बाहर नौकरी/मजदूरी करना और साथ ही घर के सारे अवैतनिक कामकाज व देखभाल का दायित्व अकेले संभालना।
जब कामकाजी महिला बाहर भी काम करती है और घर आकर भी बिना किसी सहायता के पूरा घरेलू कार्य करती है, तो इसे दोहरा बोझ कहते हैं।
3
किसी संस्था या कारखाने में कितनी महिला कर्मचारी होने पर वहाँ 'शिशुगृह' (Crèche) खोलना कानूनी रूप से अनिवार्य है?
Reveal Answer & Explanation
Answer: 30 से अधिक महिला कर्मचारी होने पर।
भारतीय श्रम कानून के अनुसार जिस प्रतिष्ठान में 30 से अधिक महिलाएं कार्यरत हैं, वहाँ अनिवार्य रूप से शिशुगृह (क्रेच) की सुविधा होनी चाहिए।
4
1960 के दशक में मध्य प्रदेश में लड़कों और लड़कियों के स्कूलों में क्या मुख्य संरचनात्मक अंतर था?
Reveal Answer & Explanation
Answer: लड़कियों के स्कूल में चारों तरफ से बंद सुरक्षित केंद्रीय आंगन था, जबकि लड़कों के स्कूल में खुला बड़ा खेल का मैदान था।
लड़कियों को बाहरी दुनिया की नजरों से दूर बंद आंगन में सुरक्षित रखा जाता था, जबकि लड़कों के लिए खुला मैदान उपलब्ध था।
5
समाज महिलाओं के घरेलू काम को 'वास्तविक काम' क्यों नहीं मानता?
Reveal Answer & Explanation
Answer: क्योंकि इसके लिए कोई प्रत्यक्ष वेतन या नकद पारिश्रमिक नहीं मिलता और इसे महिलाओं का स्वाभाविक कर्तव्य मान लिया जाता है।
बाजार केवल पैसे कमाने वाले काम को मान्यता देता है, इसलिए महिलाओं के दिन-रात के शारीरिक देखभाल श्रम का अमूल्यन कर दिया जाता है।
Finished Studying This Chapter?
READY TO PRACTICE?

Timed CBT Practice Tests (Exam Simulator)

Put your concepts to the test with official curriculum-aligned Foundation and Advanced practice tests. Get instant accuracy scores, time metrics, and step-by-step verified explanations.