लड़का या लड़की होना केवल जैविक पहचान नहीं है; बचपन से ही हमारा समाज हमें सिखाता है कि लड़कों को कैसा आचरण करना चाहिए और लड़कियों को कैसा। खिलौनों के चयन (लड़कों को कारें व बंदूकें, लड़कियों को गुड़िया व रसोई के बर्तन) से ही भविष्य की लैंगिक भूमिकाएं तय कर दी जाती हैं।
1920 के दशक में समोआ द्वीप का अध्ययन (Margaret Mead Study)
प्रशांत महासागर के दक्षिण में स्थित समोआ द्वीप समाज पर किए गए मानवशास्त्रीय अनुसंधान ने आधुनिक दुनिया को चौंका दिया:
- स्कूल न जाना : समोआई बच्चे आधुनिक स्कूल नहीं जाते थे। वे समाज के बड़े लोगों से घर और द्वीप की व्यावहारिक कलाएं (जैसे मछली पकड़ना, नारियल के पेड़ लगाना) सीखते थे।
- बच्चों की देखभाल : जैसे ही बच्चा चलना सीख जाता, माँ उसकी देखभाल छोड़ देती थी। 5 वर्ष से बड़े बच्चे (लड़के व लड़कियां दोनों) छोटे बच्चों की देखभाल करते थे।
- लड़कों का कार्य : लगभग 9 वर्ष की आयु में लड़के बाहरी कामों में बड़े लड़कों के साथ शामिल हो जाते थे—मछली पकड़ना और नारियल लगाना।
- लड़कियों की स्वतंत्रता : 14 वर्ष की आयु तक लड़कियां घर के काम करती थीं, परंतु 14 वर्ष की होने के बाद वे लड़कों की तरह पूरी तरह स्वतंत्र हो जाती थीं—वे समुद्र में मछली पकड़ने जाती थीं और बागानों में काम करती थीं।
- रसोई का कार्य लड़कों द्वारा : समोआ में अधिकांश खाना पकाने का काम विशेष 'कुकिंग हाउस' (Cooking Houses) में लड़कों द्वारा किया जाता था, और लड़कियां केवल उनकी तैयारी में सहायता करती थीं!