अर्थशास्त्र एवं वाणिज्य में सभी आर्थिक गतिविधियाँ मुख्य रूप से वस्तुओं (Goods) और सेवाओं (Services) में विभाजित होती हैं। वस्तुएँ वे भौतिक, दृश्यमान एवं स्पर्शनीय उत्पाद हैं जिन्हें देखा, छुआ, संचित और हस्तांतरित किया जा सकता है (जैसे कार, मोबाइल फोन या अनाज की बोरी)। इसके विपरीत, सेवाएँ वे अमूर्त आर्थिक क्रियाएँ, लाभ या संतुष्टियाँ हैं जो बिक्री हेतु प्रस्तुत की जाती हैं और जिनसे उपभोक्ताओं की आवश्यकताएँ पूरी होती हैं, किंतु किसी भौतिक वस्तु का स्वामित्व हस्तांतरित नहीं होता।
व्यावसायिक दृष्टिकोण से सेवाओं को तीन प्रमुख वर्गों में बाँटा जाता है:
- व्यावसायिक सेवाएँ (Business Services): वे विशिष्ट सेवाएँ जिनका उपयोग वाणिज्यिक उपक्रम अपने दैनिक परिचालन, उत्पादन एवं वितरण को सुगम बनाने हेतु करते हैं। जैसे: बैंकिंग, बीमा, परिवहन, भंडारण और संचार।
- सामाजिक सेवाएँ (Social Services): समाज के वंचित वर्गों के उत्थान एवं सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु स्वैच्छिक व गैर-लाभकारी रूप से प्रदान की जाने वाली सेवाएँ। जैसे: निःशुल्क शिक्षा, स्वास्थ्य शिविर एवं बाल कल्याण कार्य।
- व्यक्तिगत सेवाएँ (Personal Services): विभिन्न उपभोक्ताओं की व्यक्तिगत रुचियों और प्राथमिकताओं के अनुसार पृथक रूप से प्रदान की जाने वाली सेवाएँ। जैसे: पर्यटन, रेस्तरां में भोजन, ब्यूटी पार्लर या मनोरंजन सेवाएँ।
भौतिक वस्तुओं से सेवाओं की भिन्नता को स्पष्ट करने हेतु आधुनिक प्रबंधन शास्त्र में '5 I's' का सिद्धांत प्रयुक्त होता है:
सेवाएँ शुद्ध रूप से अनुभवजन्य होती हैं और उनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं होता; क्रय से पूर्व उन्हें देखा, छुआ, चखा या सूंघा नहीं जा सकता। एक डॉक्टर का परामर्श या वकील की कानूनी सलाह अनुभव की जा सकती है, स्पर्श नहीं। अतः उपभोक्ता का विश्वास जीतने हेतु सेवा प्रदाता सुसज्जित कार्यालयों या आधिकारिक प्रमाणपत्रों जैसे भौतिक प्रतीकों का सहारा लेते हैं।
कारखानों में मशीनों द्वारा बनी वस्तुएँ पूर्णतः एक समान (मानकीकृत) होती हैं, किंतु सेवाओं में ऐसी एकरूपता संभव नहीं है। सेवाएँ मनुष्यों द्वारा दी जाती हैं, इसलिए व्यक्ति-दर-व्यक्ति, स्थान-दर-स्थान और एक ही व्यक्ति की मानसिक व शारीरिक स्थिति के अनुसार सेवा की गुणवत्ता में निरंतर भिन्नता पाई जाती है।
वस्तुओं का उत्पादन और उपभोग अलग-अलग समय और स्थान पर हो सकता है (जैसे पुणे में बनी कार छह महीने बाद कोलकाता में उपयोग हो)। इसके विपरीत सेवाओं का उत्पादन और उपभोग एक साथ होता है। सेवा प्रदाता को उसकी सेवा से अलग नहीं किया जा सकता; यदि सर्जन उपस्थित नहीं है तो शल्यक्रिया संभव नहीं है, और यदि शिक्षक उपस्थित नहीं है तो कक्षा शिक्षण असंभव है।
सेवाओं का कोई भौतिक शेल्फ-लाइफ नहीं होता और उन्हें गोदाम में भविष्य के लिए संचित नहीं किया जा सकता। अप्रयुक्त सेवा क्षमता सदैव के लिए नष्ट हो जाती है। यदि 180 सीटों वाले विमान में 30 सीटें खाली रह जाएँ, तो उन 30 सीटों की आय अर्जन क्षमता विमान के उड़ान भरते ही हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है; उसे भविष्य में कभी नहीं बेचा जा सकता।
सेवा की सुपुर्दगी में उपभोक्ता की प्रत्यक्ष और सक्रिय भागीदारी अनिवार्य होती है। कारखाने में माल बनते समय उपभोक्ता का होना जरूरी नहीं है, किंतु बाल कटवाते समय या एटीएम से पैसे निकालते समय उपभोक्ता की प्रत्यक्ष उपस्थिति और सहभागिता आवश्यक है।