वित्तीय प्रबंधन में व्यावसायिक वित्त (Business Finance) से अभिप्राय किसी व्यावसायिक उपक्रम की स्थापना, दैनिक परिचालन, आधुनिकीकरण, विस्तार और विविधीकरण के लिए आवश्यक मौद्रिक कोषों एवं साख सुविधाओं की व्यवस्था तथा उनके मितव्ययी उपयोग से है। वित्त को प्रायः "व्यवसाय का जीवन-रक्त और स्नायु तंत्र" कहा जाता है; क्योंकि नदिया जिले के एक छोटे हथकरघा उद्योग से लेकर दुर्गापुर के विशाल इस्पात संयंत्र तक—कोई भी उपक्रम समयोचित एवं पर्याप्त तरलता के बिना कच्चा माल नहीं खरीद सकता, श्रमिकों का वेतन नहीं चुका सकता और न ही सरकारी करों का भुगतान कर सकता है।
व्यावसायिक वित्त की आवश्यकताओं को मुख्य रूप से दो कार्यात्मक धाराओं में विभाजित किया जाता है:
- स्थायी पूँजी की आवश्यकताएँ (Fixed Capital Requirements): स्थायी, टिकाऊ एवं दीर्घकालिक संपत्तियों जैसे कि औद्योगिक भूमि, कारखाना भवन, भारी मशीनरी, संयंत्र, उपकरण, पेटेंट एवं सॉफ्टवेयर इन्फ्रास्ट्रक्चर के अधिग्रहण के लिए आवश्यक दीर्घकालिक पूंजी। यह पूंजी व्यवसाय के संपूर्ण जीवनकाल में स्थायी रूप से बंधी रहती है और व्यवसाय को बंद किए बिना इसे वापस नहीं निकाला जा सकता।
- कार्यशील पूँजी की आवश्यकताएँ (Working Capital Requirements): व्यवसाय के दैनिक आवर्ती परिचालन चक्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए आवश्यक अल्पकालिक तरल पूंजी। यह चालू परिसंपत्तियों में निवेश को बनाए रखती है जैसे कच्चे माल का स्टॉक, निर्माणाधीन माल (WIP), तैयार माल, व्यापारिक देनदार (प्राप्य बिल), तथा मजदूरी, किराया, बिजली बिल व ढुलाई व्यय चुकाने हेतु न्यूनतम नकद शेष।
| तुलना का आधार | स्थायी पूँजी (Fixed Capital) | कार्यशील पूँजी (Working Capital) |
|---|---|---|
| मूल उद्देश्य | दीर्घकालिक उत्पादक संपत्तियों का अर्जन और स्थायी उत्पादन क्षमता का सृजन। | दैनिक परिचालन चक्र का निर्वहन और चालू संपत्तियों का निरंतर आवर्तन। |
| निवेश की समयावधि | दीर्घकालिक अवधि (> 5 से 25+ वर्ष); लगभग स्थायी निवेश। | अल्पकालिक अवधि (< 1 वर्ष या एक परिचालन चक्र की अवधि)। |
| तरलता एवं प्रतिवर्तीता | अत्यंत न्यून तरलता; भारी नुकसान उठाए बिना इसे वापस नहीं लिया जा सकता। | उच्च तरलता; नकद से कच्चा माल, फिर स्टॉक, फिर देनदार और पुनः नकद में परिवर्तित। |
| प्रमुख वित्त स्रोत | समता अंश, पूर्वाधिकार अंश, ऋणपत्र (डिबेंचर), संचित लाभ, वित्तीय संस्थानों के सावधि ऋण। | वाणिज्यिक बैंक ऋण (कैश क्रेडिट, ओवरड्राफ्ट), व्यापारिक साख, फैक्टरिंग, वाणिज्यिक पत्र (CP)। |
| निर्धारक तत्व | 1. उद्योग की प्रकृति: भारी विनिर्माण इकाइयों में विशाल स्थायी पूंजी बनाम व्यापारिक प्रतिष्ठानों में अल्प पूंजी। 2. परिचालन का पैमाना: बड़े पैमाने के स्वचालित संयंत्रों में अधिक स्थायी पूंजी आवश्यक। 3. उत्पादन तकनीक: पूंजी-प्रधान तकनीक में श्रम-प्रधान तकनीक की तुलना में अधिक स्थायी पूंजी लगती है। 4. विस्तार एवं विविधीकरण: नई उत्पाद श्रृंखला जोड़ने पर अतिरिक्त पूंजी की आवश्यकता होती है। | 1. परिचालन चक्र की लंबाई: लंबे विनिर्माण चक्र में अधिक कार्यशील पूंजी अवरुद्ध रहती है। 2. साख नीति: ग्राहकों को उदार उधारी देने से देनदारों की राशि बढ़ जाती है। 3. मौसमी प्रभाव: त्योहारी सीजन (उदा. बंगाल में दुर्गा पूजा) में अतिरिक्त कार्यशील पूंजी चाहिए। 4. कच्चे माल की सुलभता: आपूर्ति में अनिश्चितता होने पर बड़ा बफर स्टॉक रखना पड़ता है। |
वित्तीय प्रबंधक उपलब्ध पूंजी स्रोतों को तीन विशिष्ट आधारों पर वर्गीकृत करते हैं:
- 1. समयावधि के आधार पर वर्गीकरण (Classification on Basis of Period):
- दीर्घकालिक स्रोत (> 5 वर्ष): स्थायी संपत्तियों और संयंत्र स्थापना हेतु प्रयुक्त। उदाहरण: समता अंश, पूर्वाधिकार अंश, ऋणपत्र, संचित लाभ, विकास वित्तीय संस्थानों के सावधि ऋण।
- मध्यकालिक स्रोत (1 से 5 वर्ष): मशीनरी आधुनिकीकरण एवं वाहन खरीद हेतु प्रयुक्त। उदाहरण: वाणिज्यिक बैंकों के सावधि ऋण, सार्वजनिक जमा, पट्टा वित्तपोषण।
- अल्पकालिक स्रोत (< 1 वर्ष): दैनिक कार्यशील पूंजी की कमी को पूरा करने हेतु। उदाहरण: व्यापारिक साख, फैक्टरिंग, बैंक ओवरड्राफ्ट, कैश क्रेडिट, वाणिज्यिक पत्र (CP)।
- 2. स्वामित्व के आधार पर वर्गीकरण (Classification on Basis of Ownership):
- स्वामीगत कोष (Owner's Funds): उद्यमियों/अंशधारकों द्वारा प्रदान की गई पूंजी अथवा कंपनी का संचित लाभ। यह स्थायी पूंजी है, इस पर कोई निश्चित लाभांश चुकाने की बाध्यता नहीं होती, संपत्तियों पर कोई बंधक नहीं बनता और यह मताधिकार प्रदान करता है। उदाहरण: समता अंश पूँजी, पूर्वाधिकार अंश पूँजी, संचित लाभ (लाभ का पुनर्निवेश)।
- ऋणगत कोष (Borrowed Funds): बाह्य लेनदारों, बैंकों और जनता से जुटाया गया ऋण। लाभ हो या हानि, निश्चित दर पर अनिवार्य ब्याज चुकाना पड़ता है, संपत्तियों पर बंधक बनता है, परिसमापन में प्राथमिकता होती है, किंतु कोई मताधिकार नहीं मिलता। उदाहरण: ऋणपत्र (डिबेंचर), बैंक ऋण, वित्तीय संस्थान ऋण, सार्वजनिक जमा, व्यापारिक साख।
- 3. उत्पत्ति के आधार पर वर्गीकरण (Classification on Basis of Generation / Origin):
- आंतरिक स्रोत (Internal Sources): व्यवसाय के सामान्य परिचालन के भीतर से ही उत्पन्न कोष। उदाहरण: संचित लाभ (Retained Earnings), मूल्यह्रास संचिति कोष (Depreciation Reserves)।
- बाह्य स्रोत (External Sources): व्यवसाय के बाहर के निवेशकों, बैंकों, वित्तीय संस्थानों और जनता से जुटाई गई पूंजी। उदाहरण: नए अंश या ऋणपत्र जारी करना, बैंक ऋण, सार्वजनिक जमा, फैक्टरिंग।