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WBB • कक्षा XI • Business Studies • अध्याय 8
अनुमानित समय: 180 minutes
प्रगति: अध्ययनरत

लघु व्यवसाय एवं उद्यमिता

भारत जैसी श्रम-बहुल और विकासशील अर्थव्यवस्था में लघु व्यवसाय जमीनी स्तर पर औद्योगीकरण, धन के न्यायसंगत वितरण तथा व्यापक रोजगार सृजन का सबसे सशक्त आधार स्तंभ है। शहरी औद्योगिक संकुलों से लेकर सुदूर ग्रामीण अंचलों तक फैले सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs) एक ओर बड़े पूंजी-प्रधान निगमों और दूसरी ओर कृषि पर निर्भर आजीविकाओं के बीच संतुलनकारी सेतु का कार्य करते हैं। पश्चिम बंगाल उच्चतर माध्यमिक शिक्षा परिषद (WBCHSE) कक्षा 11 व्यवसाय अध्ययन पाठ्यक्रम का आठवां अध्याय: 'लघु व्यवसाय एवं उद्यमिता' (Small Business and Entrepreneurship) लघु उद्योग क्षेत्र के संरचनात्मक, विधिक एवं प्रबंधकीय आयामों का एक संपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस अध्याय में लघु उद्यम की परिभाषा के ऐतिहासिक विकास, विशेषकर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 (MSMED Act) तथा 1 जुलाई, 2020 से प्रभावी ऐतिहासिक समग्र मापदंड (संयंत्र व मशीनरी में निवेश तथा वार्षिक टर्नओवर, जिसमें से निर्यात आय को पूर्णतः छूट दी गई है) का विशद अध्ययन किया गया है। विद्यार्थी रोजगार सृजन, संतुलित क्षेत्रीय विकास, स्थानीय संसाधनों व पारिवारिक बचतों के गतिशीलता, तथा राष्ट्रीय निर्यात में लघु उद्यमों की महत्वपूर्ण भूमिका का मूल्यांकन करते हैं। साथ ही पश्चिम बंगाल की समृद्ध कुटीर व शिल्प धरोहर जैसे शांतिपुर का हथकरघा, बांकुड़ा का टेराकोटा व डोकरा शिल्प, तथा हावड़ा के फाउंड्री व लाइट इंजीनियरिंग क्लस्टर के व्यावहारिक महत्व को समझते हैं। अध्याय में पूंजी संकट, विपणन बाधाओं, कच्चे माल की कमी तथा औद्योगिक रुग्णता के कारणों की पड़ताल के साथ-साथ जिला उद्योग केंद्र (DIC) की एकल खिड़की प्रणाली, राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (NSIC), सिडबी (SIDBI), प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY), PMEGP पूंजी सब्सिडी, MSME समाधान के तहत विलंबित भुगतानों पर सांविधिक चक्रवृद्ध ब्याज, तथा बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR व GI Tag) की विस्तृत विवेचना की गई है।

क्या आपने कभी सोचा है?

क्या आपने कभी सोचा है कि शांतिपुर का एक हथकरघा बुनकर या हावड़ा की एक फाउंड्री बहुराष्ट्रीय कंपनियों से कैसे प्रतिस्पर्धा करती है? जानिए सरकारी सब्सिडी, जिला उद्योग केंद्र और मुद्रा योजना की वास्तविक ताकत।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

भारत एवं पश्चिम बंगाल जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में केवल विशाल पूंजी-सघन उद्योगों के माध्यम से प्रतिवर्ष लाखों युवाओं को आजीविका प्रदान करना असंभव है। लघु उद्योग अपेक्षाकृत अत्यंत कम पूंजी निवेश पर प्रति व्यक्ति अधिकतम रोजगार के अवसर पैदा करते हैं और स्थानीय कारीगरों की पारंपरिक प्रतिभा का सदुपयोग करते हैं। वाणिज्य के विद्यार्थियों, भावी उद्यमियों, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स एवं बैंकिंग सलाहकारों के लिए लघु व्यवसाय की नीतियों को समझना अपरिहार्य है। यह स्पष्ट करता है कि पूर्व बर्धमान की एक चावल-भूसी तेल प्रसंस्करण इकाई अथवा हावड़ा की एक इंजीनियरिंग वर्कशॉप बिना किसी अचल संपत्ति की जमानत के मुद्रा (MUDRA) व CGTMSE के तहत ऋण कैसे प्राप्त कर सकती है, PMEGP योजना से 35% तक का सरकारी पूंजी अनुदान कैसे ले सकती है, MSMED अधिनियम की धारा 16 के तहत बड़े कॉर्पोरेट खरीदारों द्वारा 45 दिन से अधिक भुगतान लटकाने पर RBI बैंक दर का तीन गुना चक्रवृद्ध ब्याज कैसे वसूल सकती है, तथा बालूचरी साड़ी अथवा बांकुड़ा के टेराकोटा के भौगोलिक उपदर्शन (GI Tag) व ZED गुणवत्ता प्रमाणन के माध्यम से वैश्विक बाजार में अपनी प्रतिष्ठा कैसे स्थापित कर सकती है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • व्यावसायिक संगठन के स्वरूपों (एकल स्वामित्व, साझेदारी, संयुक्त पूंजी कंपनी) की आधारभूत समझ।
  • निवेश, टर्नओवर, पूंजी तथा लाभ-हानि की सामान्य संकल्पना।
  • औद्योगिक नीति तथा सरकारी सहायता की मूलभूत जानकारी।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • लघु व्यवसाय की परिभाषा देना तथा जुलाई 2020 के संशोधित MSMED अधिनियम के समग्र मापदंडों से उद्यमों का वर्गीकरण करना।
  • रोजगार सृजन, क्षेत्रीय संतुलन तथा निर्यात संवर्धन में लघु उद्योगों की भूमिका का विश्लेषण करना।
  • लघु उद्योग क्षेत्र में रुग्णता के आंतरिक व बाह्य कारणों तथा चेतावनी संकेतों की पहचान करना।
  • जिला उद्योग केंद्र (DIC), NSIC, SIDBI, KVIC तथा मुद्रा योजना की संस्थागत सहायता का मूल्यांकन करना।
  • MSME समाधान एवं धारा 16 के प्रावधानों का उपयोग कर विलंबित भुगतानों पर दंडात्मक ब्याज की गणना करना।
  • उद्यमी और प्रबंधक में अंतर स्पष्ट करना तथा भौगोलिक उपदर्शन (GI Tag) के वाणिज्यिक व विधिक महत्व को समझना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 मॉड्यूल 1: लघु व्यवसाय की अवधारणा,...
2 मॉड्यूल 2: भारत एवं पश्चिम बंगाल मे...
3 मॉड्यूल 3: लघु व्यवसाय की समस्याएं,...
4 मॉड्यूल 4: संस्थागत सहायता तंत्र एव...
5 मॉड्यूल 5: उद्यमिता विकास एवं स्टार...
6 मॉड्यूल 6: समकालीन प्रतिमान: डिजिटल...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

मॉड्यूल 1: लघु व्यवसाय की अवधारणा, प्रकृति एवं MSME वर्गीकरण

1.1 लघु व्यवसाय का अर्थ एवं मूलभूत प्रकृति

औद्योगिक अर्थशास्त्र में लघु व्यवसाय (Small Business) से अभिप्राय एक ऐसे स्वतंत्र स्वामित्व एवं संचालन वाले उद्यम से है, जिसकी विनियोजित पूंजी अपेक्षाकृत सीमित होती है, परिचालन का भौगोलिक दायरा स्थानीय अथवा क्षेत्रीय होता है, कार्यरत श्रमिकों की संख्या सीमित होती है तथा उत्पादन प्रक्रिया मुख्यतः श्रम-प्रधान होती है। वैधानिक दृष्टि से यह एकल स्वामित्व, साझेदारी अथवा प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के रूप में गठित हो सकता है; किंतु इसका मूल स्वरूप इसके व्यक्तिगत प्रबंधन, त्वरित निर्णयों तथा स्थानीय बाजार की मांग से सीधे जुड़ाव में निहित होता है।

लघु व्यवसाय मुख्य रूप से दो श्रेणियों में संचालित होते हैं:

  • आधुनिक लघु उद्योग (Modern SSIs / MSMEs): आधुनिक विद्युत शक्ति, परिष्कृत मशीनरी तथा मानकीकृत उत्पादन विधियों का उपयोग कर ऑटोमोबाइल कलपुर्जे, प्लास्टिक उत्पाद, रसायन, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ तथा इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण करने वाले उपक्रम।
  • पारंपरिक, ग्रामीण एवं कुटीर उद्योग (Cottage & Village Industries): वंशानुगत कला एवं हुनर पर आधारित पारिवारिक इकाइयां, जो स्थानीय कच्चे माल तथा साधारण हस्तचालित उपकरणों से उत्पाद बनाती हैं। जैसे हथकरघा बुनाई, रेशम कीट पालन, मिट्टी के बर्तन, टेराकोटा शिल्प, पीतल-कांसा शिल्प, जूट उत्पाद तथा डोकरा धातु कला।
1.2 परिभाषा का ऐतिहासिक विकास एवं 2020 का संशोधित समग्र मापदंड

पूर्व में लघु उद्योगों की परिभाषा केवल संयंत्र एवं मशीनरी में निवेश की सीमा पर आधारित थी। वर्ष 2006 में भारतीय संसद ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 (MSMED Act, 2006) पारित किया, जिसमें विनिर्माण एवं सेवा उद्यमों के लिए अलग-अलग सीमाएं निर्धारित थीं।

कालांतर में विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की सीमाओं के धुंधले होने के कारण भारत सरकार ने 1 जुलाई, 2020 से एक ऐतिहासिक व युगांतरकारी संशोधन लागू किया। इस सुधार ने विनिर्माण व सेवा के कृत्रिम भेद को समाप्त कर दिया और दोनों के लिए एक समान समग्र मापदंड (Composite Criteria) प्रस्तुत किया, जो संयंत्र व मशीनरी/उपकरण में निवेश तथा वार्षिक टर्नओवर (Annual Turnover) दोनों के संयुक्त आधार पर निर्धारित होता है।

MSME का संशोधित समग्र वर्गीकरण (1 जुलाई, 2020 से प्रभावी)
उद्यम की श्रेणीसंयंत्र एवं मशीनरी / उपकरण में निवेश की अधिकतम सीमावार्षिक टर्नओवर (Turnover) की अधिकतम सीमा
सूक्ष्म उद्यम (Micro Enterprise)₹1 करोड़ (≤ ₹10 मिलियन) से अधिक नहीं₹5 करोड़ (≤ ₹50 मिलियन) से अधिक नहीं
लघु उद्यम (Small Enterprise)₹10 करोड़ (≤ ₹100 मिलियन) से अधिक नहीं₹50 करोड़ (≤ ₹500 मिलियन) से अधिक नहीं
मध्यम उद्यम (Medium Enterprise)₹50 करोड़ (≤ ₹500 मिलियन) से अधिक नहीं₹250 करोड़ (≤ ₹2,500 मिलियन) से अधिक नहीं
निर्यात आय को छूट देने का स्वर्णिम वैधानिक नियम: संशोधित वर्गीकरण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि टर्नओवर की गणना करते समय वस्तुओं अथवा सेवाओं के निर्यात से प्राप्त आय को पूर्णतः बाहर रखा जाता है। अर्थात् यदि कोई लघु इकाई करोड़ों रुपये का निर्यात करती है, तो उस निर्यात टर्नओवर के कारण उसकी लघु उद्योग की श्रेणी, सरकारी रियायतें अथवा प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र के लाभ समाप्त नहीं होंगे।
1.3 ग्रामीण एवं कुटीर उद्योगों की विशिष्ट विशेषताएं
  • पारिवारिक श्रम की प्रधानता: बाहरी वेतनभोगी श्रमिकों के स्थान पर परिवार के सभी सदस्य (महिलाएं, युवा एवं वृद्ध) मिलजुलकर कार्य करते हैं।
  • अल्प पूंजी निवेश: भारी स्वचालित मशीनों की आवश्यकता नहीं होती; साधारण हस्तचालित औजारों से बहुत कम खर्च में उत्पादन होता है।
  • स्थानीय कच्चा माल एवं पारंपरिक कला: स्थानीय रूप से उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों (मिट्टी, जूट, शहतूत रेशम, बांस, पीतल) का उपयोग कर पीढ़ी-दर-पीढ़ी सीखी गई पारंपरिक कला का प्रयोग किया जाता है।
  • स्थानीय बाजार व मेलों में बिक्री: ग्रामीण हाटों, मेलों एवं सरकारी हस्तशिल्प केंद्रों (उदा. तंतुजा, मंजूषा, विश्व बांग्ला) के माध्यम से बिक्री की जाती है।

मॉड्यूल 2: भारत एवं पश्चिम बंगाल में लघु उद्योगों की सामाजिक-आर्थिक भूमिका

2.1 भारतीय अर्थव्यवस्था में वृहद आर्थिक योगदान

लघु उद्योग कोई पिछड़ा हुआ क्षेत्र नहीं है, अपितु भारतीय अर्थव्यवस्था का वास्तविक विकास इंजन है। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में इसका योगदान:

  • दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता: कृषि के पश्चात भारत में सर्वाधिक रोजगार MSME क्षेत्र ही उपलब्ध कराता है। वर्तमान में इस क्षेत्र में 11 करोड़ से अधिक (110 मिलियन) लोग कार्यरत हैं।
  • सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान: भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 30% तथा कुल औद्योगिक विनिर्माण उत्पादन का लगभग 45% लघु उद्योगों से प्राप्त होता है।
  • निर्यात व्यापार में हिस्सेदारी: भारत के कुल राष्ट्रीय निर्यात का 40% से 45% भाग MSME क्षेत्र से आता है। रत्न एवं आभूषण, परिधान, चमड़े के सामान, इंजीनियरिंग कलपुर्जे तथा प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में इनका वर्चस्व है।
2.2 रणनीतिक सामाजिक-आर्थिक लाभ
  1. श्रम-प्रधान उत्पादन एवं कम पूंजी लागत: बड़े इस्पात या पेट्रोकेमिकल संयंत्र में एक रोजगार सृजित करने के लिए जितनी भारी पूंजी लगती है, लघु उद्योग में उसके एक छोटे हिस्से में ही नया रोजगार पैदा हो जाता है। श्रम-बहुल देश के लिए यह सर्वोत्तम है।
  2. संतुलित क्षेत्रीय आर्थिक विकास: लघु उद्योग बिना बड़े बुनियादी ढांचे के भी जिला व ग्रामीण स्तर पर स्थापित हो सकते हैं। यह औद्योगीकरण का विकेंद्रीकरण करता है और ग्रामीणों को रोजगार की तलाश में महानगरों की झुग्गियों में जाने से रोकता है।
  3. धन एवं आय का समान वितरण: बड़े कॉर्पोरेट्स में लाभ कुछ परिवारों या शेयरधारकों तक सीमित रहता है। लघु उद्योग देश भर में लाखों स्वतंत्र उद्यमी तैयार कर राष्ट्रीय आय का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करता है।
  4. स्थानीय बचतों एवं पारंपरिक शिल्पों की गतिशीलता: ग्रामीण परिवारों की छोटी बचतों तथा पारंपरिक कारीगरों के सुप्त कौशल को सीधे उत्पादक कार्यों में लगाता है।
  5. लचीलापन एवं उपभोक्ता अनुकूलन: भारी स्वचालित मशीनों की तुलना में लघु इकाइयां बाजार के बदलते फैशन और ग्राहकों की रुचि के अनुसार तुरंत नए डिजाइन व उत्पाद तैयार कर सकती हैं।
2.3 पश्चिम बंगाल का लघु उद्योग परिदृश्य एवं प्रमुख क्लस्टर

पश्चिम बंगाल ऐतिहासिक रूप से भारत के अग्रणी लघु व कुटीर उद्योग वाले राज्यों में से एक है। राज्य के प्रमुख औद्योगिक क्लस्टर निम्न हैं:

जिला एवं क्षेत्रप्रमुख उद्योग एवं हस्तशिल्पसामाजिक-आर्थिक महत्व
हावड़ा औद्योगिक क्षेत्रढलाई उद्योग (Foundry), लेथ मशीन, लाइट इंजीनियरिंग"पूर्व का शेफ़ील्ड" (Sheffield of the East); भारतीय रेल, कृषि पंपों एवं भारी उद्योगों के लिए कलपुर्जे बनाता है।
नदिया (शांतिपुर एवं फुलिया)हाथ से बुनी सूती व जैकार्ड तांत साड़ियांविश्वविख्यात हथकरघा वस्त्र; लाखों कुशल बुनकर परिवारों की आजीविका का एकमात्र सहारा।
बांकुड़ा (बिष्णुपुर एवं पांचमुड़ा)टेराकोटा मिट्टी का घोड़ा, बालूचरी सिल्क साड़ी, डोकरा धातु शिल्पवैश्विक स्तर पर GI Tag प्राप्त कलाकृतियां, जो गैर-कृषि ग्रामीण आजीविका का मुख्य साधन हैं।
मुर्शिदाबाद एवं मालदारेशम कीट पालन, तसर सिल्क बुनाई, आम प्रसंस्करणपारंपरिक शुद्ध रेशम उत्पादन तथा कृषि आधारित खाद्य प्रसंस्करण उद्योग।
बानतला (कोलकाता लेदर कॉम्प्लेक्स)चमड़े के जूते, बैग, जैकेट एवं औद्योगिक सुरक्षात्मक दस्तानेयूरोप व अमेरिका में भारी मात्रा में चमड़े के सामान निर्यात कर विदेशी मुद्रा अर्जित करता है।

मॉड्यूल 3: लघु व्यवसाय की समस्याएं, बाधाएं एवं औद्योगिक रुग्णता

3.1 लघु उद्यमों के समक्ष प्रमुख समस्याएं

अपार क्षमताओं के उपरांत भी भारत के लघु उद्योग गंभीर संरचनात्मक कठिनाइयों से जूझते हैं:

  • 1. कार्यशील पूंजी एवं बैंक साख का अभाव: बैंकों द्वारा अचल संपत्ति की जमानत (Collateral Security) मांगे जाने पर लघु उद्यमी असमर्थ हो जाते हैं। विवश होकर वे स्थानीय साहूकारों से 24% से 36% के भारी ब्याज पर ऋण लेते हैं। इसके अतिरिक्त बड़े खरीदारों द्वारा बिलों का भुगतान महीनों लटकाने से पूंजी फंस जाती है।
  • 2. गुणवत्तापूर्ण कच्चे माल की अनुपलब्धता: सीमित पूंजी के कारण लघु इकाइयां थोक में कच्चा माल नहीं खरीद पातीं। वे स्थानीय बिचौलियों पर निर्भर रहती हैं, जिससे उन्हें महंगा और घटिया कच्चा माल मिलता है।
  • 3. अप्रशिक्षित प्रबंधन एवं 'वन-मैन शो': अधिकांश लघु व्यवसाय एकल स्वामी द्वारा चलाए जाते हैं। वही व्यक्ति उत्पादन, बिक्री, लेखांकन व श्रम नियंत्रण संभालता है, जिससे विशेषज्ञता का अभाव रहता है।
  • 4. पुरानी तकनीक एवं निम्न उत्पादकता: महंगी CNC या स्वचालित मशीनें न खरीद पाने के कारण पुरानी मशीनों पर काम चलाना पड़ता है, जिससे खराबी अधिक होती है और माल की फिनिशिंग कमजोर रहती है।
  • 5. कमजोर विपणन एवं बिचौलियों द्वारा शोषण: अपने शोरूम या बड़े विज्ञापनों का खर्च न उठा पाने के कारण दलालों और थोक विक्रेताओं को औने-पौने दामों पर माल बेचना पड़ता है। लाभ का बड़ा भाग बिचौलिए हड़प लेते हैं।
  • 6. विधिक अनुपालन एवं सरकारी जटिलताएं: प्रदूषण नियंत्रण, नगर निगम लाइसेंस व विभिन्न कर औपचारिकताओं को पूरा करने में उद्यमियों का काफी समय व धन नष्ट होता है।
3.2 लघु उद्योगों में रुग्णता (Industrial Sickness in MSMEs)

एक लघु इकाई को तब रुग्ण इकाई (Sick Unit) माना जाता है, जब वह लगातार घाटे में चलती है, संचित हानियों के कारण उसकी अपनी पूंजी (Net Worth) समाप्त हो जाती है और वह बैंक ऋण व लेनदारों के देय भुगतान चुकाने में असमर्थ हो जाती है।

रुग्णता के कारण:

  • आंतरिक कारण (प्रबंधन के नियंत्रण में): गलत परियोजना का चयन, दोषपूर्ण संयंत्र लेआउट, व्यापारिक कोषों का निजी कार्यों में दुरुपयोग, अकुशल श्रमिक व हड़तालें, तथा गुणवत्ता में गिरावट।
  • बाह्य कारण (प्रबंधन के नियंत्रण से बाहर): बाजार में मंदी व मांग की कमी, बिजली कटौती व बुनियादी ढांचे का अभाव, कच्चे माल की कीमतों में भारी उछाल, तथा सरकारी या बड़े निजी खरीदारों द्वारा महीनों तक भुगतान न करना।
रुग्णता के प्रारंभिक चेतावनी संकेत: बिक्री (Turnover) में निरंतर गिरावट; PF, ESI व GST जैसे वैधानिक बकायों का जमा न होना; बैंक चेकों का बार-बार बाउंस होना; गोदाम में न बिके माल का ढेर लगना; तथा बैंक ओवरड्राफ्ट सीमा का लगातार समाप्त रहना।

मॉड्यूल 4: संस्थागत सहायता तंत्र एवं सरकारी संवर्धन योजनाएं

4.1 केंद्रीय संस्थागत सहायता तंत्र

लघु उद्योगों की समस्याओं के समाधान हेतु केंद्र व राज्य सरकारों ने एक मजबूत संस्थागत ढांचा विकसित किया है:

संस्थान का नामस्थापना एवं स्वरूपप्रमुख कार्य एवं भूमिका
जिला उद्योग केंद्र (DIC / जिला उद्योग केंद्र)मई 1978 में प्रारंभ; देश के प्रत्येक जिला मुख्यालय में स्थित।जिला स्तर पर एकल खिड़की (Single-Window) के रूप में कार्य करता है। उद्यम पंजीकरण, परियोजना रिपोर्ट (DPR) की जांच, सरकारी सब्सिडी की संस्तुति, बैंकों से ऋण लिंकेज तथा औद्योगिक क्षेत्रों में भूमि/शेड आवंटन में सहायता करता है।
राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (NSIC)1955 में भारत सरकार द्वारा स्थापित केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम।आसान किश्तों पर किराया-क्रय (Hire-Purchase) पद्धति से मशीनरी उपलब्ध कराता है; नियंत्रित दरों पर कच्चा माल वितरित करता है; तथा एकल बिंदु पंजीकरण (SPRS) द्वारा सरकारी निविदाओं में बयाना राशि (EMD) से छूट दिलाता है।
लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI)1990 में स्थापित शीर्ष वित्तीय संस्थान।MSME वित्तपोषण का समन्वय करता है; प्रत्यक्ष सावधि ऋण देता है तथा वाणिज्यिक बैंकों व राज्य वित्तीय निगमों (उदा. WBFC) को पुनर्वित्त प्रदान करता है।
खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC)1956 में गठित संविधिक निकाय।ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि रोजगार व खादी उत्पादन को बढ़ावा देता है; तथा PMEGP योजना की राष्ट्रीय नोडल कार्यान्वयन एजेंसी है।
4.2 प्रमुख सरकारी संवर्धन योजनाएं
  • उद्यम पंजीकरण पोर्टल (Udyam Registration): 1 जुलाई, 2020 को प्रारंभ हुआ 100% डिजिटल, कागज-रहित व स्व-घोषणा आधारित पोर्टल। आधार व पैन के माध्यम से सीधे आयकर व GST नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। यह स्थायी पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी करता है, जिससे पूर्व की विभागीय जांच व नवीनीकरण की आवश्यकता समाप्त हो गई है।
  • प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY): सूक्ष्म उद्यमियों को बिना किसी जमानत के ₹10 लाख तक का ऋण प्रदान करने हेतु अप्रैल 2015 में प्रारंभ। ऋण को तीन चरणों में बांटा गया है:
    • शिशु (Shishu): नए उद्यम प्रारंभ करने हेतु ₹50,000 तक का ऋण।
    • किशोर (Kishore): उपकरण व मशीनरी क्रय हेतु ₹50,000 से ₹5 लाख तक का ऋण।
    • तरुण (Tarun): कारोबार के विस्तार व आधुनिकीकरण हेतु ₹5 लाख से ₹10 लाख तक का ऋण।
  • प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP): KVIC व DIC द्वारा संचालित ऋण-संबद्ध पूंजी सब्सिडी योजना। उद्यमी 5% से 10% स्वयं लगाता है तथा सरकार कुल परियोजना लागत का 15% से 35% तक गैर-वापसी योग्य मार्जिन मनी पूंजी अनुदान (Subsidy) देती है (ग्रामीण क्षेत्र व आरक्षित वर्गों हेतु 35%)। शेष 60% से 75% बैंक ऋण होता है।
  • MSME समाधान (विलंबित भुगतान सुरक्षा): MSMED अधिनियम की धारा 15 से 24 के अनुसार खरीदार को माल आपूर्ति के अधिकतम 45 दिनों के भीतर भुगतान करना अनिवार्य है। चूक करने पर खरीदार को RBI बैंक दर के 3 गुना मासिक चक्रवृद्ध ब्याज का भुगतान करना पड़ता है। ऑनलाइन MSME Samadhaan पोर्टल पर सीधे वाद दायर किया जा सकता है।
  • CGTMSE क्रेडिट गारंटी फंड: बैंकों को ₹5 करोड़ तक बिना किसी संपार्श्विक जमानत के ऋण देने पर गारंटी सुरक्षा प्रदान करता है।
4.3 पश्चिम बंगाल सरकार की बांग्लाश्री प्रोत्साहन योजना

पश्चिम बंगाल सरकार का MSME एवं वस्त्र विभाग राज्य में उद्योगों को गति देने हेतु बांग्लाश्री योजना (Banglashree Scheme) संचालित करता है:

  • पूंजी निवेश सब्सिडी: पिछड़े जिलों में स्थायी पूंजी निवेश पर 15% से 25% तक प्रत्यक्ष सरकारी अनुदान।
  • ब्याज सब्सिडी: बैंक ऋण के ब्याज पर लगातार 5 वर्षों तक 2% से 4% प्रतिवर्ष की छूट।
  • विद्युत शुल्क व स्टांप ड्यूटी छूट: औद्योगिक बिजली पर 5 वर्षों तक 100% विद्युत शुल्क छूट तथा औद्योगिक पार्कों में भूमि क्रय पर 100% स्टांप ड्यूटी माफी।
  • कर्मसाथी प्रकल्प: बेरोजगार युवाओं को ₹2 लाख तक कम ब्याज पर स्वरोजगार ऋण व सरकारी अनुदान।

मॉड्यूल 5: उद्यमिता विकास एवं स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र

5.1 उद्यमी एवं उद्यमिता की अवधारणा

उद्यमी (Entrepreneur) शब्द फ्रांसीसी क्रिया 'entreprendre' से निकला है, जिसका अर्थ है "जिम्मेदारी अपने कंधे पर लेना"। अर्थशास्त्र में उद्यमी वह साहसी व्यक्ति है जो बाजार में व्यावसायिक अवसर पहचानता है, उत्पादन के साधनों (भूमि, श्रम, पूंजी) को जुटाता है, वित्तीय व व्यक्तिगत जोखिम उठाता है और एक लाभकारी उपक्रम स्थापित करता है।

  • जोसेफ शुम्पीटर का नवाचार सिद्धांत: शुम्पीटर के अनुसार उद्यमी आर्थिक विकास का मुख्य चालक है, जो "सृजनात्मक विनाश" (Creative Destruction) के माध्यम से पुरानी विधियों को तोड़कर नए उत्पाद, नई तकनीक या नए बाजार का सृजन करता है।
  • फ्रैंक नाइट का जोखिम सिद्धांत: नाइट ने उद्यमी को बाजार की अनिश्चितताओं और गैर-बीमा योग्य जोखिमों को उठाने वाला विशिष्ट कर्ता माना है।
उद्यमी बनाम पेशेवर प्रबंधक
तुलना का आधारउद्यमी (Entrepreneur)पेशेवर प्रबंधक (Professional Manager)
मूल प्रेरणाआत्म-निर्भरता, नए व्यवसाय का सृजन एवं संपत्ति निर्माण।नौकरी की सुरक्षा, पदोन्नति, वेतन तथा कॉर्पोरेट पद।
विधिक स्थितिसंस्थान का वास्तविक स्वामी एवं समता पूंजीधारक।निदेशक मंडल द्वारा नियुक्त वेतनभोगी कर्मचारी।
जोखिम वहनकारोबार के डूबने का समस्त वित्तीय व व्यक्तिगत जोखिम स्वयं उठाता है।व्यक्तिगत पूंजी का कोई जोखिम नहीं; व्यवसाय दिवालिया होने पर भी पूंजी नहीं डूबती।
प्रतिफल का स्वरूपअवशिष्ट लाभ (अनिश्चित; भारी घाटा भी संभव)।निश्चित अनुबंधित वेतन, भत्ते व बोनस।
नवाचार व दिनचर्यानित्य नए विचारों को खोजता है व स्थापित नियम तोड़ता है।स्थापित संगठनात्मक नियमों व दिनचर्या का संचालन करता है।
5.2 उद्यमिता विकास कार्यक्रम (EDP - Entrepreneurship Development Programmes)

EDP एक सुनियोजित प्रशिक्षण प्रक्रिया है जो संभावित व्यक्तियों की पहचान कर उनमें प्रेरणा व व्यावसायिक कौशल का विकास करती है ताकि वे सफल उद्योगपति बन सकें। इसके तीन चरण होते हैं:

  1. प्रशिक्षण-पूर्व चरण (Pre-Training): क्षेत्रीय औद्योगिक संभावनाओं का सर्वेक्षण, प्रचार-प्रसार तथा उच्च उपलब्धि प्रेरणा (McClelland's N-Ach) वाले योग्य अभ्यर्थियों का चयन।
  2. प्रशिक्षण चरण (Training): मनोवैज्ञानिक प्रेरणा, परियोजना चयन, बाजार सर्वेक्षण, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करना, बहीखाता व कारखाना कानूनों का व्यावहारिक ज्ञान देना।
  3. प्रशिक्षण-उपरांत सहायता चरण (Post-Training / Follow-Up): कारखाना चालू होने तक बैंक ऋण, लाइसेंस, भूमि आवंटन व बिजली कनेक्शन में लगातार हाथ पकड़कर संस्थागत सहायता (Hand-holding) देना।
5.3 बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights - IPR)

लघु उद्योगों के ज्ञान संपदा व पारंपरिक शिल्पों की सुरक्षा हेतु IPR अत्यंत आवश्यक है:

  • पेटेंट (Patents): किसी नए, गैर-स्पष्ट एवं औद्योगिक उपयोग वाले तकनीकी आविष्कार हेतु 20 वर्ष के लिए दिया गया वैधानिक एकाधिकार।
  • ट्रेडमार्क (Trademarks): विशिष्ट व्यावसायिक प्रतीक, लोगो या नाम जो किसी उद्यम के उत्पादों को दूसरों से अलग करते हैं (अवधि 10 वर्ष, नवीकरणीय)।
  • कॉपीराइट (Copyrights): मौलिक साहित्यिक, संगीत, कलात्मक कृतियों व सॉफ्टवेयर कोड की सुरक्षा (लेखक का जीवनकाल + 60 वर्ष)।
  • भौगोलिक उपदर्शन (Geographical Indications - GI Tag): किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र के प्राकृतिक गुणों, जलवायु एवं पारंपरिक हुनर से जुड़े उत्पादों को दिया जाने वाला बौद्धिक अधिकार (1999 के अधिनियम के तहत)। पश्चिम बंगाल के प्रसिद्ध GI टैग उत्पाद: दार्जिलिंग चाय (2004 में भारत का पहला GI Tag), जयनगर का मोआ, बर्धमान मिहिदाना एवं सीताभोग, बांकुड़ा का पांचमुड़ा टेराकोटा घोड़ा, बिष्णुपुर की बालूचरी साड़ी, पुरुलिया का छऊ मुखौटा तथा बंगाल का रसगुल्ला।

मॉड्यूल 6: समकालीन प्रतिमान: डिजिटलीकरण, क्लस्टर एवं हरित MSME

6.1 डिजिटल परिवर्तन एवं ई-मार्केटप्लेस

डिजिटल तकनीक के प्रसार ने लघु उद्योगों को बिचौलियों के शोषण से मुक्ति दिलाकर सीधे राष्ट्रीय बाजार से जोड़ दिया है:

  • सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM Portal): एक राष्ट्रीय खरीद पोर्टल, जहां सभी केंद्रीय मंत्रालयों और सार्वजनिक उपक्रमों के लिए अपनी कुल वार्षिक खरीद का कम से कम 25% सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों से खरीदना अनिवार्य किया गया है (जिसमें 3% महिला व 4% SC/ST उद्यमियों हेतु आरक्षित है)।
  • ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC): वाणिज्य मंत्रालय की एक खुली पहल, जो छोटे दुकानदारों और ग्रामीण कारीगरों को बिना भारी कमीशन दिए प्रमुख उपभोक्ता एप्स पर सीधे अपने उत्पाद बेचने का समान अवसर प्रदान करती है।
6.2 औद्योगिक क्लस्टर विकास उपागम (Cluster Development Approach)

औद्योगिक क्लस्टर किसी एक भौगोलिक क्षेत्र में स्थित समरूप अथवा पूरक उत्पाद बनाने वाली अनेक छोटी इकाइयों का एक समूह होता है, जो पारस्परिक सहयोग से काम करती हैं।

क्लस्टर पद्धति के लाभ:

  • साझा सुविधा केंद्र (Common Facility Centres - CFCs): आधुनिक परीक्षण प्रयोगशालाएं, CAD-CAM डिजाइन सेंटर व हीट ट्रीटमेंट प्लांट, जिन्हें कोई अकेली छोटी इकाई नहीं खरीद सकती, वे संयुक्त रूप से उपयोग की जा सकती हैं।
  • थोक खरीद में सामूहिक शक्ति: मुख्य उत्पादक (उदा. सेल से कच्चा लोहा) से सीधे थोक भाव में कच्चा माल खरीदकर दलालों के कमीशन से बचा जा सकता है।
  • सामूहिक ब्रांडिंग व निर्यात: राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में क्लस्टर ब्रांड के तहत साझा भागीदारी।
6.3 हरित MSME एवं 'शून्य दोष शून्य प्रभाव' (ZED) प्रमाणन

"मेक इन इंडिया" पहल के अंतर्गत पर्यावरण-अनुकूल विश्वस्तरीय विनिर्माण को बढ़ावा देने हेतु ZED योजना शुरू की गई है:

  1. शून्य दोष (Zero Defect): उत्पादन के प्रत्येक चरण पर गुणवत्ता नियंत्रण ताकि कोई भी उत्पाद अस्वीकृत या खराब न बने।
  2. शून्य प्रभाव (Zero Effect): अपशिष्ट के पुनर्चक्रण, हरित ऊर्जा व गैर-प्रदूषणकारी तकनीक से पर्यावरण व प्रकृति पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को शून्य करना।

योग्य इकाइयों को ब्रॉन्ज, सिल्वर या गोल्ड ZED सर्टिफिकेट दिया जाता है, जिससे बैंक ऋण में ब्याज की छूट और सरकारी टेंडरों में वरीयता मिलती है।

प्रमुख आर्थिक सूत्र, व्यावसायिक सिद्धांत एवं मानक

MSMED अधिनियम 2020 समग्र वर्गीकरण फलन
$$Category = f(Investment <= I_max AND (Turnover - Exports) <= T_max)$$
विलंबित भुगतान पर सांविधिक चक्रवृद्ध ब्याज (धारा 16)
Penal Rate = 3 * RBI Bank Rate (Compounded Monthly)
PMEGP मार्जिन मनी पूंजी सब्सिडी सूत्र
Government Subsidy = Approved Project Cost * Subsidy Rate (15% to 35%)

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
1 जुलाई, 2020 से प्रभावी संशोधित समग्र मापदंड (Composite Criteria) का उपयोग करते हुए पश्चिम बंगाल के निम्नलिखित तीन कारखानों की विधिक श्रेणी (सूक्ष्म, लघु, मध्यम या गैर-MSME) निर्धारित कीजिए:
1. हावड़ा कास्टिंग्स प्रा. लि.: संयंत्र व मशीनरी में निवेश = ₹8.5 करोड़; वार्षिक घरेलू टर्नओवर = ₹38 करोड़; निर्यात टर्नओवर = ₹16 करोड़।
2. नदिया हैंडलूम बुनकर सहकारी: संयंत्र व मशीनरी में निवेश = ₹75 लाख; वार्षिक घरेलू टर्नओवर = ₹4.2 करोड़; निर्यात टर्नओवर = ₹1.5 करोड़।
3. सिलीगुड़ी एग्रो-प्रोसेसर्स लि.: संयंत्र व मशीनरी में निवेश = ₹14 करोड़; वार्षिक घरेलू टर्नओवर = ₹45 करोड़; निर्यात टर्नओवर = ₹10 करोड़।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
MSMED अधिनियम, 2020 के अनुसार चरणबद्ध विश्लेषण:

वैधानिक नियम: सरकारी अधिसूचना के अनुसार निवेश और टर्नओवर दोनों शर्तों का पालन होना चाहिए। वस्तुओं व सेवाओं के निर्यात से प्राप्त आय को टर्नओवर गणना से पूर्णतः बाहर रखा जाता है।

1. हावड़ा कास्टिंग्स प्रा. लि.:
• निवेश = ₹8.5 करोड़ (लघु उद्योग की सीमा ≤ ₹10 करोड़ के भीतर है)।
• मान्य टर्नओवर = घरेलू टर्नओवर = ₹38 करोड़ (निर्यात का ₹16 करोड़ छोड़ दिया जाएगा; लघु की सीमा ≤ ₹50 करोड़ के भीतर है)।
• निष्कर्ष: यह एक लघु उद्यम (Small Enterprise) है।

2. नदिया हैंडलूम बुनकर सहकारी:
• निवेश = ₹75 लाख = ₹0.75 करोड़ (सूक्ष्म की सीमा ≤ ₹1 करोड़ के भीतर है)।
• मान्य टर्नओवर = घरेलू टर्नओवर = ₹4.2 करोड़ (निर्यात का ₹1.5 करोड़ छोड़ दिया जाएगा; सूक्ष्म की सीमा ≤ ₹5 करोड़ के भीतर है)।
• निष्कर्ष: यह एक सूक्ष्म उद्यम (Micro Enterprise) है।

3. सिलीगुड़ी एग्रो-प्रोसेसर्स लि.:
• निवेश = ₹14 करोड़ (लघु की ₹10 करोड़ सीमा से अधिक, किंतु मध्यम की सीमा ≤ ₹50 करोड़ के भीतर है)।
• मान्य टर्नओवर = घरेलू टर्नओवर = ₹45 करोड़ (मध्यम की सीमा ≤ ₹250 करोड़ के भीतर है)।
• निष्कर्ष: चूंकि निवेश ₹10 करोड़ से अधिक है, अतः यह मध्यम उद्यम (Medium Enterprise) माना जाएगा।
उदाहरण 2
पूर्व बर्धमान की एक ग्रामीण अनुसूचित जाति (SC) महिला उद्यमी प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) के तहत एक राइस ब्रान ऑयल निष्कर्षण इकाई स्थापित करना चाहती हैं। परियोजना का विवरण:
• स्वीकृत कुल परियोजना लागत: ₹20,00,000
• स्थान: ग्रामीण क्षेत्र
• श्रेणी: विशेष श्रेणी (SC महिला, ग्रामीण)
गणना कीजिए: (क) उद्यमी का स्वयं का अंशदान, (ख) सरकारी मार्जिन मनी पूंजी अनुदान (सब्सिडी), (ग) बैंक ऋण का हिस्सा, तथा (घ) 3 वर्ष की लॉक-इन अवधि में इस सब्सिडी की क्या व्यवस्था रहती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
PMEGP दिशानिर्देशों के अनुसार विस्तृत गणना:

भाग (क): उद्यमी का स्वयं का अंशदान (Own Contribution):
PMEGP के अनुसार विशेष श्रेणी के लाभार्थियों (SC/ST/महिला/ग्रामीण) को कुल लागत का केवल 5% स्वयं लगाना होता है (सामान्य हेतु 10%):
$$\text{स्वयं का अंशदान} = 5\% \times ₹20,00,000 = ₹1,00,000$$

भाग (ख): सरकारी मार्जिन मनी पूंजी सब्सिडी:
ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष श्रेणी हेतु सरकारी सब्सिडी दर 35% है:
$$\text{सरकारी सब्सिडी} = 35\% \times ₹20,00,000 = ₹7,00,000$$

भाग (ग): बैंक ऋण का हिस्सा:
बैंक शेष 95% राशि पर समग्र ऋण स्वीकृत करता है:
$$\text{बैंक ऋण} = 95\% \times ₹20,00,000 = ₹19,00,000$$

भाग (घ): लॉक-इन अवधि की व्यवस्था:
₹7 लाख का सरकारी अनुदान उद्यमी को नकद नहीं दिया जाता। यह बैंक में उसके नाम से एक अलग सावधि जमा (TDR) में 3 वर्ष की लॉक-इन अवधि हेतु रखा जाता है, जिस पर कोई ब्याज नहीं लगता। 3 वर्ष तक कारखाना सफलता से चलने के बाद यह ₹7 लाख बैंक ऋण के मूलधन में समायोजित कर माफ कर दिया जाता है।
उदाहरण 3
बांकुड़ा जिले के एक बैंक में तीन छोटे कारीगरों ने ऋण हेतु आवेदन किया है:
1. आवेदक अ: पांचमुड़ा का एक कुम्हार मिट्टी, चाक और रंग खरीदने हेतु ₹45,000 चाहता है।
2. आवेदक ब: बिष्णुपुर का एक पीतल कारीगर विद्युत भट्टी लगाने हेतु ₹3,80,000 चाहता है।
3. आवेदक स: बांकुड़ा की एक गारमेंट इकाई 10 आधुनिक सिलाई मशीनें लगाने हेतु ₹8,50,000 चाहती है।
मुद्रा योजना की किस श्रेणी में किसे कितना ऋण मिलेगा और क्या बैंक इनसे अचल संपत्ति की जमानत मांग सकता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
मुद्रा योजना के अंतर्गत स्पष्ट वर्गीकरण:

1. आवेदक अ (कुम्हार - ₹45,000):
• श्रेणी: मुद्रा शिशु (Shishu)।
• ऋण सीमा: नए छोटे कार्यों हेतु अधिकतम ₹50,000 तक।

2. आवेदक ब (पीतल कारीगर - ₹3,80,000):
• श्रेणी: मुद्रा किशोर (Kishore)।
• ऋण सीमा: मशीनरी व उपकरणों हेतु ₹50,000 से ₹5 लाख तक।

3. आवेदक स (गारमेंट इकाई - ₹8,50,000):
• श्रेणी: मुद्रा तरुण (Tarun)।
• ऋण सीमा: कारोबार विस्तार हेतु ₹5 लाख से ₹10 लाख तक।

जमानत संबंधी विधिक नियम:
RBI और भारत सरकार के स्पष्ट निर्देशों के अनुसार, मुद्रा योजना में ₹10 लाख तक के ऋणों पर बैंक कोई भी अचल संपत्ति की जमानत (Collateral Security) नहीं मांग सकता। यह ऋण NCGTC गारंटी से समर्थित होता है।
उदाहरण 4
हुगली इंजीनियरिंग कंपोनेंट्स नामक एक पंजीकृत सूक्ष्म इकाई ने 1 जून, 2024 को एक बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी को ₹10,00,000 के कलपुर्जे बेचे। अनुबंधित भुगतान अवधि 30 दिन थी। किंतु खरीदार कंपनी ने वैधानिक 45 दिन बीतने के बाद भी भुगतान नहीं किया और पूरे 90 दिन की अतिरिक्त देरी के बाद भुगतान किया। इस दौरान RBI की बैंक दर 6.5% वार्षिक थी।
गणना कीजिए: (क) धारा 16 के तहत लागू दंडात्मक ब्याज दर, तथा (ख) खरीदार को कुल कितना ब्याज चुकाना होगा?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
MSMED अधिनियम, 2006 के अनुसार विधिक एवं गणितीय गणना:

भाग (क): विधिक ब्याज दर का निर्धारण:
MSMED अधिनियम की धारा 16 के अनुसार 45 दिन से अधिक देरी होने पर खरीदार को RBI अधिसूचित बैंक दर के तीन गुना मासिक चक्रवृद्ध ब्याज देना अनिवार्य है:
$$\text{लागू ब्याज दर} = 3 \times \text{RBI बैंक दर} = 3 \times 6.5\% = 19.50\%\text{ वार्षिक}$$

भाग (ख): चक्रवृद्ध ब्याज की गणना:
• मूल राशि ($P$) = ₹10,00,000।
• वार्षिक ब्याज दर ($r$) = 19.5% (मासिक दर $i = 19.5\% / 12 = 1.625\% = 0.01625$)।
• विलंब की अवधि = 90 दिन = 3 माह ($n = 3$)।
3 माह पश्चात देय मिश्रधन:
$$A = P \times (1 + i)^n = 10,00,000 \times (1 + 0.01625)^3$$
$$A = 10,00,000 \times (1.01625)^3 = 10,00,000 \times 1.049539 = ₹10,49,539$$
$$\text{दंडात्मक ब्याज} = A - P = ₹10,49,539 - ₹10,00,000 = ₹49,539$$
निष्कर्ष: खरीदार को ₹10 लाख मूलधन के साथ ₹49,539 का दंडात्मक ब्याज देना होगा। धारा 23 के अनुसार खरीदार इसे आयकर में व्यावसायिक व्यय के रूप में नहीं घटा सकता।
उदाहरण 5
मालदा के एक बेरोजगार स्नातक आम के गूदे के प्रसंस्करण एवं पैकेजिंग की एक सूक्ष्म इकाई स्थापित करना चाहते हैं। वे जिला उद्योग केंद्र (DIC) के महाप्रबंधक से संपर्क करते हैं।
स्पष्ट कीजिए: (क) DIC द्वारा दी जाने वाली एकल खिड़की (Single-Window) सुविधाएं क्या हैं, तथा (ख) कारखाना प्रारंभ करने हेतु DIC विभिन्न विभागों से स्वीकृतियां कैसे समन्वित करता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
संस्थागत प्रक्रिया का विश्लेषण:

भाग (क): DIC द्वारा प्रदत्त एकल खिड़की सुविधाएं:
1. ऑनलाइन उद्यम पंजीकरण (Udyam Registration) में तकनीकी मदद।
2. तकनीकी व आर्थिक रूप से व्यवहार्य विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करने में मार्गदर्शन।
3. पश्चिम बंगाल सरकार की बांग्लाश्री योजना एवं PMEGP के तहत पूंजी सब्सिडी का अनुमोदन।
4. लीड बैंक में प्राथमिकता क्षेत्र ऋण हेतु पत्रावली अग्रसारित करना।
5. मालदा औद्योगिक विकास केंद्र में औद्योगिक भूखंड अथवा निर्मित शेड का आवंटन।

भाग (ख): समन्वित स्वीकृतियों के चरण:
• चरण 1: जिला स्तरीय टास्क फोर्स कमेटी (DLTFC) द्वारा परियोजना की जांच।
• चरण 2: विद्युत वितरण निगम (WBSEDCL) से औद्योगिक बिजली कनेक्शन का समन्वय।
• चरण 3: राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (WBPCB) से स्थापना एवं संचालन की सहमति (Consent to Operate)।
• चरण 4: बैंक ऋण संवितरण तथा सरकारी मार्जिन मनी सब्सिडी का TDR खाते में अंतरण।
उदाहरण 6
बिष्णुपुर की बालूचरी साड़ी बुनकर सहकारी समिति पाती है कि सूरत की एक पावरलूम मिल सिंथेटिक धागों से बनी नकली साड़ियों को कोलकाता के बाजारों में 'शुद्ध बिष्णुपुरी बालूचरी' के नाम से बेच रही है।
विश्लेषण कीजिए: (क) 1999 के GI अधिनियम के तहत बिष्णुपुर के बुनकरों को क्या विधिक एकाधिकार प्राप्त है? तथा (ख) नकली उत्पादकों के विरुद्ध समिति क्या विधिक कार्यवाही कर सकती है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
बौद्धिक संपदा अधिकार एवं विधिक विश्लेषण:

भाग (क): GI Tag का विधिक महत्व:
वस्तुओं के भौगोलिक उपदर्शन अधिनियम, 1999 के तहत किसी विशिष्ट क्षेत्र की कला व गुणवत्ता को विधिक संरक्षण प्राप्त होता है:
1. बिष्णुपुर की बालूचरी साड़ी आधिकारिक GI Tag प्राप्त उत्पाद है। अतः केवल बिष्णुपुर के अधिकृत पारंपरिक बुनकरों को ही 'बालूचरी' नाम से साड़ी बेचने का कानूनी अधिकार है।
2. यह उपभोक्ताओं को असली रेशम, पौराणिक कथाओं (रामायण/महाभारत) के आंचल वाले पारंपरिक डिजाइन व गुणवत्ता का विश्वास दिलाता है।

भाग (ख): नकली उत्पादकों के विरुद्ध उपचार:
• दीवानी वाद एवं रोक: समिति सूरत की मिल व कोलकाता के दुकानदारों के विरुद्ध न्यायालय से बिक्री पर स्थायी रोक (Injunction) तथा हर्जाना मांग सकती है।
• आपराधिक दंड (धारा 39): बिना अधिकार पंजीकृत GI नाम का दुरुपयोग एक गैर-जमानती अपराध है, जिसमें 3 वर्ष तक का कारावास और ₹2 लाख तक का जुर्माना हो सकता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

2006 के पुराने विनिर्माण व सेवा के अलग-अलग निवेश मापदंडों का उल्लेख करना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

1 जुलाई, 2020 से विनिर्माण व सेवा क्षेत्र का भेद समाप्त कर एकीकृत समग्र मापदंड (निवेश + टर्नओवर) लागू कर दिया गया है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

MSME टर्नओवर गणना में निर्यात बिक्री को जोड़ देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

MSMED अधिनियम की धारा 7 के अनुसार निर्यात टर्नओवर को कुल टर्नओवर से पूरी तरह घटाया जाता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) ऋणों में अचल संपत्ति की जमानत को अनिवार्य मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मुद्रा योजना में ₹10 लाख तक के सभी ऋण (शिशु, किशोर, तरुण) पूर्णतः संपार्श्विक-मुक्त (Collateral-Free) होते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

जिला उद्योग केंद्र (DIC) और राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (NSIC) को एक समान संस्था समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

DIC प्रत्येक जिले में स्थित राज्य सरकार की प्रशासनिक एकल खिड़की एजेंसी है; जबकि NSIC केंद्र सरकार का उपक्रम है जो मशीनरी व निविदा सहायता देता है।

MSME पारिस्थितिकी तंत्र: वर्गीकरण, संस्थागत ढाँचा एवं सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

MSME पारिस्थितिकी तंत्र: वर्गीकरण, संस्थागत ढाँचा एवं सामाजिक-आर्थिक प्रभाव WBCHSE कक्षा 11 व्यवसाय अध्ययन • अध्याय 8: लघु व्यवसाय की संरचना WBCHSE • कक्षा 11 व्यवसाय अध्ययन अध्याय 8 MSMED अधिनियम 2020 समग्र मापदंड संयंत्र एवं मशीनरी में निवेश + वार्षिक टर्नओवर μ सूक्ष्म उद्यम (MICRO) निवेश: <= ₹1 करोड़ टर्नओवर: <= ₹5 करोड़ S लघु उद्यम (SMALL) निवेश: <= ₹10 करोड़ टर्नओवर: <= ₹50 करोड़ M मध्यम उद्यम (MEDIUM) निवेश: <= ₹50 करोड़ टर्नओवर: <= ₹250 करोड़ संस्थागत सहायता तंत्र एकल खिड़की प्रणाली एवं साख अवसंरचना DIC (जिला उद्योग केंद्र) जिला स्तर पर एकल खिड़की: पंजीकरण, अनुदान व ऋण लिंकेज Single Window 1978 Udyam Registration NSIC (राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम) किराया-क्रय पर मशीनरी, कच्चा माल व सरकारी निविदाएं Hire-Purchase Govt Tenders SPRS ₹ PMMY (मुद्रा योजना) एवं PMEGP शिशु (₹50 हजार), किशोर (₹5 लाख), तरुण (₹10 लाख) ऋण Shishu <=50k Kishore <=5L Tarun <=10L सामाजिक-आर्थिक महत्व एवं बंगाल के क्लस्टर विकेंद्रीकृत विकास, हस्तशिल्प धरोहर एवं GI टैग श्रम-प्रधान व्यापक रोजगार सृजन 2nd largest employer after agri • High labor absorption संतुलित क्षेत्रीय एवं ग्रामीण आर्थिक विकास Prevents rural migration • Diffuses wealth concentration GI बंगाल क्लस्टर: शांतिपुर, हावड़ा, बांकुड़ा, बिष्णुपुर Handloom: Shantipur, Dhaniakhali, Baluchari Crafts: Bankura Terracotta, Dokra, Howrah Foundry शून्य दोष शून्य प्रभाव (ZED) एवं GeM पोर्टल Zero Defect (Quality) + Zero Effect (Environment) Government e-Marketplace (GeM) & ONDC Integration

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
लघु व्यवसाय विकेंद्रीकृत औद्योगिक विकास एवं ग्रामीण आजीविका की जीवनरेखा है। 1 जुलाई, 2020 के संशोधित MSMED अधिनियम के अनुसार विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्र का भेद समाप्त कर निवेश एवं वार्षिक टर्नओवर के आधार पर एकीकृत समग्र मापदंड तय किए गए हैं: सूक्ष्म या Micro (मशीनरी में निवेश <= ₹1 करोड़ तथा टर्नओवर <= ₹5 करोड़), लघु या Small (निवेश <= ₹10 करोड़ तथा टर्नओवर <= ₹50 करोड़), एवं मध्यम या Medium (निवेश <= ₹50 करोड़ तथा टर्नओवर <= ₹250 करोड़), जिसमें निर्यात आय को टर्नओवर गणना से वैधानिक रूप से बाहर रखा गया है। भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद का 30%, औद्योगिक उत्पादन का 45% तथा कुल राष्ट्रीय निर्यात का 40% से अधिक लघु उद्योगों से प्राप्त होता है। शांतिपुर के सूती हथकरघा वस्त्र, बांकुड़ा का टेराकोटा, तथा हावड़ा का फाउंड्री क्लस्टर पश्चिम बंगाल के प्रमुख औद्योगिक केंद्र हैं। पूंजी संकट, बड़े खरीदारों द्वारा विलंबित भुगतान, कच्चे माल की अनिश्चितता तथा अप्रचलित तकनीक के कारण लघु इकाइयां रुग्णता का शिकार होती हैं। इसके समाधान हेतु 1978 में स्थापित जिला उद्योग केंद्र (DIC) एकल खिड़की के रूप में कार्य करता है; NSIC किराया-क्रय पर मशीनरी उपलब्ध कराता है; मुद्रा योजना (शिशु, किशोर, तरुण) ₹10 लाख तक संपार्श्विक-मुक्त ऋण देती है; तथा PMEGP योजना ग्रामीण क्षेत्रों में 35% तक पूंजी सब्सिडी प्रदान करती है। MSME समाधान पोर्टल पर 45 दिन से अधिक भुगतान लंबित रहने पर RBI बैंक दर के 3 गुना चक्रवृद्ध ब्याज की वैधानिक गारंटी है। इसके साथ ही उद्यमिता विकास कार्यक्रम (EDP), बौद्धिक संपदा अधिकार (पेटेंट, ट्रेडमार्क, GI Tag) तथा ZED गुणवत्ता प्रमाणन लघु उद्यमों को आत्मनिर्भर एवं प्रतिस्पर्धी बनाते हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
जुलाई 2020 के संशोधित MSMED अधिनियम के अंतर्गत सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के समग्र वर्गीकरण को समझाइए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
  1. विनिर्माण एवं सेवा का एकीकरण: 2020 के संशोधन ने विनिर्माण व सेवा इकाइयों के अलग-अलग मापदंडों को समाप्त कर एकीकृत समग्र मापदंड प्रस्तुत किया।
  2. सीमाएं: • सूक्ष्म (Micro): संयंत्र व मशीनरी में निवेश <= ₹1 करोड़ तथा टर्नओवर <= ₹5 करोड़। • लघु (Small): निवेश <= ₹10 करोड़ तथा टर्नओवर <= ₹50 करोड़। • मध्यम (Medium): निवेश <= ₹50 करोड़ तथा टर्नओवर <= ₹250 करोड़।
  3. निर्यात छूट: टर्नओवर की गणना करते समय सभी प्रकार के निर्यात से प्राप्त आय को पूरी तरह बाहर रखा जाता है।

निवेश व टर्नओवर दोनों मापदंडों तथा निर्यात आय की वैधानिक छूट को रेखांकित करें।
2
भारत और पश्चिम बंगाल जैसी श्रम-बहुल अर्थव्यवस्था में लघु उद्योगों के संवर्धन के पक्ष में तीन प्रमुख तर्क दीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
  1. कम पूंजी में व्यापक रोजगार: लघु उद्योग श्रम-प्रधान होते हैं, जिससे बड़े उद्योगों की तुलना में प्रति श्रमिक बहुत कम पूंजी लागत में भारी रोजगार सृजित होता है।
  2. संतुलित क्षेत्रीय विकास: ये बिना बड़े बुनियादी ढांचे के ग्रामीण व अर्ध-शहरी क्षेत्रों में स्थापित हो सकते हैं, जिससे महानगरों की ओर पलायन रुकता है।
  3. आय का समान वितरण एवं कौशल संवर्धन: यह आर्थिक शक्ति के केंद्रीयकरण को रोकता है, लाखों स्वतंत्र उद्यमी बनाता है और स्थानीय कारीगरों की कला को पुनर्जीवित करता है।

रोजगार गुणक, क्षेत्रीय विकेंद्रीकरण तथा धन के न्यायसंगत वितरण पर प्रकाश डालें।
3
जिला उद्योग केंद्र (DIC) क्या हैं? जिला स्तर पर DIC द्वारा निष्पादित तीन प्रमुख कार्य संक्षेप में लिखिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
  1. अवधारणा: जिला स्तर पर लघु व कुटीर उद्योगों को सभी संवर्धन सेवाएं व स्वीकृतियां एक ही छत के नीचे देने हेतु मई 1978 में DIC की स्थापना की गई थी।
  2. प्रमुख कार्य: • पंजीकरण व DPR: उद्यम पंजीकरण में सहायता तथा व्यवहार्य परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करना। • ऋण व सब्सिडी: बैंकों में ऋण आवेदन अग्रसारित करना तथा PMEGP व बांग्लाश्री योजना की सब्सिडी स्वीकृत करना। • भूखंड व स्वीकृतियां: औद्योगिक क्षेत्रों में जमीन/शेड का आवंटन तथा बिजली व प्रदूषण नियंत्रण स्वीकृतियों का समन्वय करना।

एकल खिड़की प्रणाली तथा जिला स्तरीय प्रशासनिक भूमिका को स्पष्ट करें।
4
उद्देश्य, जोखिम और प्रतिफल के आधार पर उद्यमी और पेशेवर प्रबंधक में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
  1. मूल उद्देश्य: उद्यमी का उद्देश्य आत्म-निर्भरता, नए व्यवसाय का सृजन और नवाचार है। प्रबंधक का उद्देश्य पदोन्नति, वेतन तथा नौकरी की सुरक्षा है।
  2. जोखिम वहन: उद्यमी व्यवसाय के डूबने का संपूर्ण वित्तीय व व्यक्तिगत जोखिम उठाता है। प्रबंधक कोई व्यक्तिगत पूंजीगत जोखिम नहीं लेता।
  3. प्रतिफल: उद्यमी को अनिश्चित अवशिष्ट लाभ (घाटा भी संभव) मिलता है। प्रबंधक को निश्चित अनुबंधित वेतन, भत्ते व बोनस मिलते हैं।

स्वामित्व व जोखिम बनाम वेतनभोगी प्रशासनिक उत्तरदायित्व की तुलना करें।
5
भौगोलिक उपदर्शन (GI Tag) क्या है? पश्चिम बंगाल के तीन प्रसिद्ध GI Tag प्राप्त उत्पादों के नाम लिखिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर:
  1. अवधारणा: GI Tag एक बौद्धिक संपदा अधिकार है जो किसी उत्पाद को उसके विशिष्ट भौगोलिक उद्गम तथा वहां की मिट्टी, जलवायु व पारंपरिक कला से उत्पन्न विशेष गुणों हेतु कानूनी एकाधिकार देता है।
  2. महत्व: यह स्थानीय कारीगरों को नकली उत्पादों से बचाता है तथा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रीमियम मूल्य दिलाता है।
  3. पश्चिम बंगाल के GI उत्पाद: दार्जिलिंग चाय (भारत का प्रथम GI टैग), बांकुड़ा का पांचमुड़ा टेराकोटा शिल्प, तथा बिष्णुपुर की बालूचरी साड़ी (अन्य: जयनगर का मोआ, बर्धमान का मिहिदाना)।

भौगोलिक उत्पत्ति, स्थानीय पारंपरिक हुनर तथा प्रामाणिक उदाहरणों पर बल दें।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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