व्यापार से आशय आर्थिक इकाइयों के मध्य वस्तुओं एवं सेवाओं के पारस्परिक एवं ऐच्छिक विनिमय से है। जब यह क्रय-विक्रय किसी एक ही देश की राजनीतिक एवं भौगोलिक सीमाओं के भीतर रहने वाले नागरिकों के मध्य संपन्न होता है, तो इसे आंतरिक, घरेलू या अंतर-क्षेत्रीय व्यापार (Internal/Domestic Trade) कहते हैं (जैसे: पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र के बीच व्यापार)। इसके विपरीत, जब यह विनिमय दो या दो से अधिक स्वतंत्र एवं संप्रभु राष्ट्रों की सीमाओं के आर-पार होता है, तो इसे अंतर्राष्ट्रीय या विदेशी व्यापार (International/Foreign Trade) कहा जाता है (जैसे: भारत और जर्मनी के बीच व्यापार)।
एडम स्मिथ और डेविड रिकार्डो जैसे प्रतिष्ठित (क्लासिकिकल) अर्थशास्त्रियों का मत था कि घरेलू व्यापार के सामान्य सिद्धांतों द्वारा विदेशी व्यापार की पूर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
- उत्पादन के साधनों की गतिहीनता (Immobility of Factors of Production): एक ही देश के भीतर श्रम और पूंजी आसानी से एक उद्योग अथवा राज्य से दूसरे में चले जाते हैं। परंतु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भाषा, संस्कृति, पासपोर्ट-वीजा नियमों तथा प्रवास कानूनों के कारण श्रम और पूंजी की गतिशीलता अत्यधिक सीमित होती है।
- प्राकृतिक संसाधनों का भौगोलिक वैविध्य: जलवायु, कृषि भूमि, खनिज तेल तथा वन संपदा विश्व के विभिन्न भागों में असमान रूप से वितरित है। खाड़ी देशों में जो खनिज तेल प्रचुर मात्रा में है, वह हर देश में उपलब्ध नहीं हो सकता।
- भिन्न राष्ट्रीय मुद्राएं एवं विनिमय दर प्रणाली: घरेलू व्यापार एक ही राष्ट्रीय मुद्रा (भारतीय रुपया) में चुकता होता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में विदेशी मुद्राओं (अमेरिकी डॉलर, यूरो, पाउंड) की आवश्यकता होती है, जिससे विनिमय दर में उतार-चढ़ाव का जोखिम उत्पन्न होता है।
- संप्रभु वाणिज्यिक एवं व्यापारिक नीतियां: प्रत्येक स्वतंत्र सरकार अपने देश के हितों की रक्षा हेतु सीमा शुल्क (Tariff), आयात कोटा (Quota), विनिमय नियंत्रण और व्यापार प्रतिबंध लगा सकती है, जो घरेलू व्यापार में नहीं होते।
- भिन्न बाजार परिस्थितियां एवं परिवहन लागत: विभिन्न राष्ट्रों के उपभोक्ताओं की रुचियां, माप-तौल की प्रणालियां, कानूनी नियम और पैकेजिंग मानदंड भिन्न होते हैं, तथा सीमा-पार लंबी दूरी के कारण समुद्री एवं हवाई परिवहन लागत काफी अधिक होती है।
स्वीडिश अर्थशास्त्री बर्टिल ओहलिन (Bertil Ohlin) ने पृथक सिद्धांत की शास्त्रीय धारणा का खंडन करते हुए प्रतिपादित किया कि "अंतर्राष्ट्रीय व्यापार वास्तव में अंतर-क्षेत्रीय व्यापार का ही एक विशिष्ट रूप है" (International trade is but a special case of inter-regional trade)। ओहलिन के अनुसार, एक ही देश के विभिन्न क्षेत्रों के बीच भी साधन पूर्णतः गतिशील नहीं होते। सभी व्यापारों का मूल आधार एक ही है—वस्तुओं का प्रवाह कम लागत वाले क्षेत्रों से अधिक लागत वाले क्षेत्रों की ओर होना।
| तुलना का आधार | आंतरिक (घरेलू) व्यापार | अंतर्राष्ट्रीय (विदेशी) व्यापार |
|---|---|---|
| भौगोलिक दायरा | एक ही देश की राजनीतिक सीमाओं के भीतर। | दो या अधिक संप्रभु राष्ट्रों की सीमाओं के आर-पार। |
| साधनों की गतिशीलता | श्रम एवं पूंजी तुलनात्मक रूप से अत्यधिक गतिशील। | कानूनी, भाषाई व वीजा प्रतिबंधों के कारण लगभग गतिहीन। |
| मुद्रा प्रणाली | एक ही राष्ट्रीय विधिक मुद्रा द्वारा लेन-देन। | विभिन्न राष्ट्रीय मुद्राएं; विदेशी विनिमय बाजार अनिवार्य। |
| व्यापारिक प्रतिबंध | व्यापार पूर्णतः स्वतंत्र; कोई आंतरिक सीमा शुल्क नहीं। | प्रशुल्क (Tariff), कोटा तथा अनेक गैर-प्रशुल्क बाधाएं। |
| परिवहन लागत व जोखिम | कम परिवहन लागत तथा न्यूनतम कानूनी जोखिम। | भारी समुद्री/हवाई माल भाड़ा तथा उच्च अंतर्राष्ट्रीय जोखिम। |