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WBB • कक्षा XI • Economics • अध्याय 10
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

सहसंबंध

सहसंबंध (Correlation) आर्थिक सांख्यिकी के द्विचर विश्लेषण (Bivariate Analysis) का एक अत्यंत मौलिक एवं महत्वपूर्ण परिमाणात्मक साधन है, जिसका उपयोग दो या दो से अधिक परस्पर संबंधित आर्थिक चरों के मध्य पाए जाने वाले संबंध की दिशा एवं घनिष्ठता की मात्रा का वैज्ञानिक अध्ययन तथा मापन करने के लिए किया जाता है। पश्चिम बंगाल उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद (WBCHSE) के कक्षा 11 अर्थशास्त्र पाठ्यक्रम के परिमाणात्मक अर्थशास्त्र एवं सांख्यिकी खंड के अंतर्गत यह अध्याय एकचर विश्लेषण (केंद्रीय प्रवृत्ति एवं अपकिरण के माप) से आधुनिक अर्थमितीय विश्लेषण की ओर प्रस्थान का मुख्य आधार प्रस्तुत करता है। वास्तविक आर्थिक जीवन में कोई भी आर्थिक चर पूर्णतः एकाकी या स्वतंत्र नहीं होता, अपितु विभिन्न चर निरंतर एक-दूसरे से सह-परिवर्तित होते हैं: बाजार में वस्तु की कीमत बदलने पर उसकी मांग प्रभावित होती है, वार्षिक वर्षा की मात्रा पर कृषि उपज निर्भर करती है, परिवार की आय में वृद्धि के साथ उपभोग व्यय बढ़ता है और बैंक की ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव से औद्योगिक निवेश निर्धारित होता है। सहसंबंध विश्लेषण के माध्यम से विद्यार्थी यह जान पाते हैं कि दो चर एक ही दिशा में अग्रसर हैं (धनात्मक सहसंबंध), विपरीत दिशाओं में गमन कर रहे हैं (ऋणात्मक सहसंबंध), अथवा उनके बीच कोई रैखिक संबंध विद्यमान नहीं है (शून्य सहसंबंध)। पाठ्यक्रम में गुणात्मक आरेखीय विधि के रूप में विक्षेप आरेख (Scatter Diagram), परिमाणात्मक प्राचलिक माप के रूप में कार्ल पियर्सन का गुणन-आघूर्ण सहसंबंध गुणांक (r), तथा गुणात्मक या कोटि-आधारित अध्ययन हेतु चार्ल्स स्पीयरमैन का कोटि सहसंबंध गुणांक (R) प्रमाणिक रूप से विवेचित किया गया है। इसके अतिरिक्त, यह अध्याय सहसंबंध तथा कार्य-कारण संबंध (Causation) के बीच के महत्वपूर्ण अंतर को स्पष्ट करते हुए भ्रामक या मिथ्या सहसंबंध (Spurious Correlation) की भ्रांतियों से बचने का वैज्ञानिक मार्गदर्शन प्रदान करता है।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

आधुनिक व्यावहारिक अर्थशास्त्र, वित्तीय बाजार प्रबंधन एवं सरकारी आर्थिक नीतियों के निर्माण में सहसंबंध विश्लेषण प्रारंभिक अन्वेषण तथा आर्थिक पूर्वानुमानों का मेरुदंड माना जाता है। केंद्रीय बैंक एवं आर्थिक योजनाकार विभिन्न समष्टिगत सूचकांकों के सहसंबंध का विश्लेषण करके मौद्रिक एवं राजकोषीय नीतियों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करते हैं। उदाहरणार्थ, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) बेंचमार्क रेपो रेट और वाणिज्यिक बैंकों के ऋण वितरण के सहसंबंध का अध्ययन करके यह सुनिश्चित करता है कि नीतिगत दर कटौती का लाभ उद्योग एवं उपभोक्ताओं तक पहुंच रहा है या नहीं। वित्तीय अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता हैरी मार्कोविट्ज़ का 'आधुनिक पोर्टफोलियो सिद्धांत' (Modern Portfolio Theory) पूर्णतः परिसंपत्तियों के सहसंबंध मैट्रिक्स पर आधारित है: परस्पर ऋणात्मक या शून्य सहसंबंध वाली प्रतिभूतियों में निवेश करके निवेशक न्यूनतम जोखिम पर अधिकतम प्रतिफल प्राप्त कर सकते हैं। इसी प्रकार व्यावसायिक फर्मों में मांग की लोच का आकलन, स्थानापन्न वस्तुओं का परस्पर प्रभाव और विज्ञापन व्यय की सार्थकता परखने के लिए सहसंबंध का ज्ञान अनिवार्य है। उच्च माध्यमिक अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों हेतु सहसंबंध के बीजगणितीय सूत्रों, गणितीय विशेषताओं और परिणामों की व्याख्या में दक्षता हासिल करना भविष्य के रिग्रेशन विश्लेषण, अर्थमिति और डेटा-आधारित आर्थिक अनुसंधान के लिए अपरिहार्य आधारशिला निर्मित करता है।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 सहसंबंध का अर्थ, परिभाषाएं एवं संपू...
2 आरेखीय विधि: विक्षेप आरेख विधि (Sca...
3 कार्ल पियर्सन का गुणन-आघूर्ण सहसंबं...
4 पियर्सन के सहसंबंध गुणांक की मुख्य...
5 स्पीयरमैन का कोटि सहसंबंध गुणांक (S...
6 व्यावहारिक आर्थिक अनुप्रयोग, सीमाएं...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

सहसंबंध का अर्थ, परिभाषाएं एवं संपूर्ण वर्गीकरण

१. सहसंबंध का अर्थ एवं परिभाषा

एकचर सांख्यिकी में हम किसी एक ही चर (जैसे राष्ट्रीय आय, मजदूरी या खाद्यान्न मूल्य) के स्वभाव का अध्ययन करते हैं। परंतु आर्थिक जीवन में चर कभी एकाकी नहीं होते। जब दो चर इस प्रकार संबंधित हों कि एक चर के मान में परिवर्तन होने पर दूसरे चर के मान में भी एक निश्चित या नियमित परिवर्तन परिलक्षित हो, तो दोनों चरों को सहसंबंधित (Correlated) कहा जाता है।

प्रमुख सांख्यिकीविदों द्वारा दी गई परिभाषाएं:

  • क्रॉक्सटन एवं काउडेन (Croxton & Cowden): "जब दो चरों के बीच का संबंध परिमाणात्मक प्रकृति का हो, तो उस संबंध का पता लगाने, उसे मापने और एक संक्षिप्त सूत्र द्वारा व्यक्त करने की सांख्यिकीय विधि को सहसंबंध कहते हैं।"
  • ए. एम. टटल (A. M. Tuttle): "दो या दो से अधिक चरों के सह-विचरण (covariation) का विश्लेषण ही सहसंबंध कहलाता है।"
  • बॉडिंगटन (Boddington): "जब दो या दो से अधिक समंक श्रेणियों के मध्य कोई निश्चित संबंध पाया जाता है, तो यह कहा जाता है कि उनमें सहसंबंध विद्यमान है।"
२. द्विचर समंक (Bivariate Distribution)

एक ही अवलोकन इकाई के दो विभिन्न लक्षणों के एक साथ संकलित समंकों (जैसे किसी व्यक्ति की ऊंचाई एवं भार, वस्तु की कीमत एवं मांग की मात्रा, रासायनिक खाद की मात्रा एवं गेहूं का प्रति हेक्टेयर उत्पादन) को द्विचर समंक कहा जाता है। इसे युग्मित प्रेक्षणों $(x_1, y_1), (x_2, y_2), \dots, (x_n, y_n)$ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

३. सहसंबंध का बहुआयामी वर्गीकरण
वर्गीकरण का आधार सहसंबंध का प्रकार संबंध की प्रकृति ठोस आर्थिक उदाहरण
१. परिवर्तन की दिशा (Direction) धनात्मक सहसंबंध (Positive Correlation) दोनों चर एक ही दिशा में गति करते हैं: एक के बढ़ने पर दूसरा बढ़ता है, अथवा एक के घटने पर दूसरा भी घटता है। कीमत एवं पूर्ति ($P \uparrow, Q_S \uparrow$); आय एवं उपभोग व्यय ($Y \uparrow, C \uparrow$); विज्ञापन व्यय एवं बिक्री आय।
ऋणात्मक सहसंबंध (Negative Correlation) दोनों चर परस्पर विपरीत दिशाओं में गति करते हैं: एक चर के बढ़ने पर दूसरा घटता है, एवं इसके विपरीत। कीमत एवं मांग ($P \uparrow, Q_D \downarrow$); सर्दियों का तापमान एवं ऊनी वस्त्रों की बिक्री; उत्पादन की गति एवं वितरण में लगा समय।
२. परिवर्तन का अनुपात (Ratio of Change) रैखिक सहसंबंध (Linear Correlation) एक चर के परिवर्तन की मात्रा का दूसरे चर के परिवर्तन की मात्रा से अनुपात सदैव स्थिर या अचर रहता है। आरेख पर बिंदु एक सीधी रेखा ($Y = a + bX$) बनाते हैं। कच्चे माल की स्थिर दर पर खरीद (प्रति किलोग्राम ₹50 की दर से कुल लागत में निरंतर समानुपातिक वृद्धि)।
वक्रीय / अरैखिक सहसंबंध (Curvilinear Correlation) परिवर्तन का अनुपात स्थिर नहीं रहता, अपितु विभिन्न स्तरों पर बदलता रहता है। आरेख पर बिंदु एक वक्र का निर्माण करते हैं। परिवर्तनशील अनुपातों का नियम (उत्पादन पहले बढ़ती दर से, फिर घटती दर से बढ़ता है और अंततः घटता है); एंजेल वक्र।
३. चरों की संख्या (Number of Variables) सरल सहसंबंध (Simple Correlation) केवल दो चरों ($X$ एवं $Y$) के पारस्परिक संबंध का अध्ययन। मुद्रा की पूर्ति एवं सामान्य मूल्य स्तर का संबंध।
बहुगुणी सहसंबंध (Multiple Correlation) तीन या तीन से अधिक चरों के संयुक्त पारस्परिक संबंध का एक साथ अध्ययन। फसल की उपज ($Y$) पर वर्षा ($X_1$), उर्वरक ($X_2$) तथा उन्नत बीज ($X_3$) का संयुक्त प्रभाव।
आंशिक सहसंबंध (Partial Correlation) अन्य संबंधित चरों के प्रभाव को स्थिर रखते हुए किन्हीं दो विशिष्ट चरों के संबंध का अध्ययन। उर्वरक की मात्रा ($X_2$) को स्थिर मानकर केवल वर्षा ($X_1$) और उपज ($Y$) का संबंध जांचना।
४. सहसंबंध बनाम कार्य-कारण संबंध (Correlation vs. Causation)
बोर्ड परीक्षा हेतु परम आवश्यक चेतावनी: सहसंबंध कभी भी कार्य-कारण का प्रमाण नहीं होता!
दो चरों के बीच उच्च सहसंबंध का अर्थ यह कदापि नहीं है कि एक चर कारण है और दूसरा उसका परिणाम। उच्च सहसंबंध निम्नलिखित चार कारणों से हो सकता है:
  1. प्रत्यक्ष कार्य-कारण: $X$ वास्तव में $Y$ का कारण है (उदा. अत्यधिक मुद्रा निर्गमन से मुद्रास्फीति उत्पन्न होना)।
  2. पारस्परिक प्रभाव: दोनों चर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं (उदा. बाजार में मूल्य एवं मांग का संतुलन, अथवा आय एवं निवेश का चक्रीय संबंध)।
  3. उभयनिष्ठ बाह्य चर का प्रभाव (Lurking Variable): कोई तीसरा अप्रत्यक्ष चर दोनों को प्रभावित कर रहा हो (उदा. भीषण गर्मी के कारण आइसक्रीम की बिक्री और सनस्ट्रोक के मरीजों की संख्या दोनों का बढ़ना)।
  4. भ्रामक या मिथ्या सहसंबंध (Spurious / Nonsense Correlation): पूरी तरह असंबंधित दो समंकों का दीर्घकाल में संयोगवश एक साथ बढ़ना (उदा. भारत में शिक्षकों के वेतन में वृद्धि तथा इंग्लैंड में शराब की खपत में वृद्धि)। यह आर्थिक दृष्टि से सर्वथा अर्थहीन है।

आरेखीय विधि: विक्षेप आरेख विधि (Scatter Diagram Method)

१. विक्षेप आरेख की संकल्पना एवं निर्माण विधि

सहसंबंध का अध्ययन करने की सबसे सरल, प्राथमिक एवं अ-गणितीय विधि विक्षेप आरेख (Scatter Diagram) है। इसमें बिना किसी जटिल गणना के केवल आंखों से देखकर दो चरों के पारस्परिक संबंध की दिशा और प्रकृति का तुरंत अनुमान लगाया जा सकता है।

निर्माण के क्रमबद्ध चरण:

  1. स्वतंत्र चर को क्षैतिज अक्ष ($X$-अक्ष) पर तथा आश्रित या संबंधित चर को ऊर्ध्वाधर अक्ष ($Y$-अक्ष) पर अंकित किया जाता है।
  2. दोनों अक्षों पर समंकों के विस्तार के अनुसार उपयुक्त एवं समानुपातिक पैमाना चुना जाता है।
  3. समंकों के प्रत्येक युग्म $(x_i, y_i)$ को ग्राफ पेपर पर एक बिंदु ($\bullet$) द्वारा दर्शाया जाता है।
  4. अंकित बिंदुओं का यह समूह ही विक्षेप आरेख कहलाता है। बिंदुओं के फैलाव, झुकाव और बनावट से सहसंबंध की मात्रा ज्ञात की जाती है।
२. विक्षेप आरेख के विभिन्न प्रतिरूप एवं उनका निर्वचन
आरेख का स्वरूप बिंदुओं की स्थिति एवं फैलाव सहसंबंध की प्रकृति गुणांक का मान ($r$)
पूर्ण धनात्मक सहसंबंध सभी बिंदु नीचे-बाएं कोने से ऊपर-दाएं कोने की ओर जाने वाली एक ही सीधी रेखा पर स्थित होते हैं। पूर्ण प्रत्यक्ष संबंध $$r = +1$$
उच्च स्तरीय धनात्मक सहसंबंध बिंदु एक सीधी रेखा पर तो नहीं होते, परंतु ऊपर-दाएं उठती हुई एक संकरी पट्टी में घने रूप से केंद्रित रहते हैं। प्रबल प्रत्यक्ष संबंध $$+0.75 \le r < +1$$
निम्न स्तरीय धनात्मक सहसंबंध बिंदुओं का सामान्य झुकाव ऊपर की ओर होता है, परंतु वे अत्यधिक बिखरे और फैले हुए होते हैं। दुर्बल प्रत्यक्ष संबंध $$0 < r < +0.25$$
पूर्ण ऋणात्मक सहसंबंध सभी बिंदु ऊपर-बाएं कोने से नीचे-दाएं कोने की ओर गिरने वाली एक ही सीधी रेखा पर स्थित होते हैं। पूर्ण विपरीत संबंध $$r = -1$$
उच्च स्तरीय ऋणात्मक सहसंबंध बिंदु ऊपर-बाएं से नीचे-दाएं की ओर झुकती हुई एक संकरी पट्टी में सघनता से स्थित होते हैं। प्रबल विपरीत संबंध $$-1 < r \le -0.75$$
सहसंबंध की अनुपस्थिति (शून्य सहसंबंध) बिंदु किसी निश्चित दिशा में केंद्रित न होकर पूरे आरेख पर गोल बादल या अव्यवस्थित रूप से बिखरे रहते हैं। रैखिक संबंध का अभाव $$r = 0$$
वक्रीय सहसंबंध बिंदु एक स्पष्ट वक्र (जैसे उल्टे U-आकार के परवलय) का अनुसरण करते हैं। मजबूत कार्यात्मक संबंध होने पर भी रैखिक गुणांक शून्य रहता है। अरैखिक संबंध $$r \approx 0 \text{ (रैखिक)}$$
३. विक्षेप आरेख के गुण एवं सीमाएं
  • गुण:
    • अत्यंत सरल एवं बोधगम्य विधि; बिना गणितीय ज्ञान के भी सामान्य व्यक्ति समझ सकता है।
    • संबंध रैखिक है अथवा वक्रीय, तथा धनात्मक है या ऋणात्मक—यह एक दृष्टि में स्पष्ट हो जाता है।
    • असामान्य या चरम मानों (Extreme Outliers) की तुरंत पहचान हो जाती है।
  • सीमाएं:
    • यह केवल एक गुणात्मक चित्र प्रस्तुत करता है; सहसंबंध का कोई निश्चित संख्यात्मक मान नहीं दे पाता।
    • व्यक्तिपरक व्याख्या: अलग-अलग व्यक्ति बिंदुओं के फैलाव को देखकर अलग-अलग अनुमान लगा सकते हैं।
    • दो से अधिक चरों के जटिल संबंधों का विश्लेषण इससे संभव नहीं है।

कार्ल पियर्सन का गुणन-आघूर्ण सहसंबंध गुणांक (Karl Pearson's r)

१. सैद्धांतिक आधार एवं गणितीय परिभाषा

ब्रिटिश जीवसांख्यिकीविद् कार्ल पियर्सन ने 1896 में दो परिमाणात्मक चरों के मध्य रैखिक सहसंबंध को मापने के लिए सबसे प्रमाणिक एवं वैज्ञानिक गणितीय विधि का प्रतिपादन किया, जिसे गुणन-आघूर्ण सहसंबंध गुणांक (Product-Moment Correlation Coefficient) या संक्षेप में $r$ कहा जाता है।

पियर्सन के अनुसार, $r$ दो चरों के सह-प्रसरण (Covariance) तथा उनके व्यक्तिगत मानक विचलनों (Standard Deviations) के गुणनफल का अनुपात है:

$$r = \frac{\text{Cov}(X, Y)}{\sigma_X \cdot \sigma_Y}$$

जहां:

  • $\text{Cov}(X, Y) = \frac{1}{N}\sum (X - \bar{X})(Y - \bar{Y}) = \frac{\sum xy}{N}$ (जहां $x = X - \bar{X}$ तथा $y = Y - \bar{Y}$)
  • $\sigma_X = \sqrt{\frac{1}{N}\sum (X - \bar{X})^2} = \sqrt{\frac{\sum x^2}{N}}$
  • $\sigma_Y = \sqrt{\frac{1}{N}\sum (Y - \bar{Y})^2} = \sqrt{\frac{\sum y^2}{N}}$

इन मानों को अनुपात में रखने पर $N$ निरस्त हो जाता है और व्यावहारिक सूत्र प्राप्त होता है:

$$r = \frac{\sum (X - \bar{X})(Y - \bar{Y})}{\sqrt{\sum (X - \bar{X})^2} \cdot \sqrt{\sum (Y - \bar{Y})^2}} = \frac{\sum xy}{\sqrt{\sum x^2 \cdot \sum y^2}}$$
२. बोर्ड परीक्षा हेतु गणना की विभिन्न विधियां
विधि का नाम उपयुक्तता की स्थिति बीजगणितीय सूत्र
प्रत्यक्ष विधि (Direct Method) जब वास्तविक समांतर माध्य $\bar{X}$ एवं $\bar{Y}$ दोनों पूर्ण संख्याएं हों (दशमलव रहित)। $$r = \frac{\sum xy}{\sqrt{\sum x^2 \cdot \sum y^2}}$$
जहां $x = X - \bar{X},\, y = Y - \bar{Y}$
लघु / कल्पित माध्य विधि (Short-cut Method) जब वास्तविक माध्य दशमलव या भिन्न में आएं; इससे जटिल दशमलव गणनाओं से बचा जा सकता है। $$r = \frac{N\sum d_x d_y - (\sum d_x)(\sum d_y)}{\sqrt{N\sum d_x^2 - (\sum d_x)^2} \cdot \sqrt{N\sum d_y^2 - (\sum d_y)^2}}$$
जहां $d_x = X - A_x,\, d_y = Y - A_y$ ($A_x, A_y$ कल्पित माध्य हैं)।
पद-विचलन विधि (Step-Deviation Method) जब विचलनों में कोई उभयनिष्ठ समापवर्तक ($c_x, c_y$) हो, जिससे संख्याएं अत्यंत छोटी हो जाती हैं। $$r = \frac{N\sum u v - (\sum u)(\sum v)}{\sqrt{N\sum u^2 - (\sum u)^2} \cdot \sqrt{N\sum v^2 - (\sum v)^2}}$$
जहां $u = \frac{X - A_x}{c_x},\, v = \frac{Y - A_y}{c_y}$ ($c_x, c_y$ वर्ग पैमाना हैं)।
३. गणना संबंधी अनिवार्य सावधानियां
स्वर्ण नियम:
  • प्रत्यक्ष विधि में माध्य से विचलनों का बीजगणितीय योग सदैव शून्य होना चाहिए: $\sum x = 0$ तथा $\sum y = 0$। यदि यह शून्य नहीं आ रहा है, तो माध्य की गणना में त्रुटि है!
  • लघु विधि में $(\sum d_x)^2$ और $\sum d_x^2$ के अंतर को सदैव स्पष्ट रखें। पहला सभी विचलनों के योग का वर्ग है, जबकि दूसरा प्रत्येक विचलन के वर्ग का योग है।
  • हर में वर्गमूल के भीतर का मान कभी ऋणात्मक नहीं हो सकता।

पियर्सन के सहसंबंध गुणांक की मुख्य विशेषताएं एवं निर्वचन

१. कार्ल पियर्सन के गुणांक r की पांच मौलिक विशेषताएं

उच्च माध्यमिक परीक्षा में सहसंबंध की विशेषताओं पर आधारित सैद्धांतिक एवं संख्यात्मक प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं:

विशेषता १: मान सदैव -१ तथा +१ की सीमाओं में परिबद्ध

सहसंबंध गुणांक का संख्यात्मक मान $-1$ से कम अथवा $+1$ से अधिक कभी नहीं हो सकता:

$$-1 \le r \le +1 \quad \text{अथवा} \quad |r| \le 1$$

गणितीय औचित्य: यह गुणधर्म कॉशी-श्वार्ज़ असमिका (Cauchy-Schwarz Inequality) से सिद्ध होता है: $[\sum (x-\bar{x})(y-\bar{y})]^2 \le [\sum (x-\bar{x})^2][\sum (y-\bar{y})^2]$, जिससे $r^2 \le 1$ प्राप्त होता है। यदि परीक्षा में आपका उत्तर $r = 1.25$ या $r = -1.40$ आता है, तो निश्चित रूप से गणना में त्रुटि हुई है।

विशेषता २: मूल बिंदु एवं पैमाने के परिवर्तन से स्वतंत्रता

सहसंबंध गुणांक का मान मूल बिंदु में परिवर्तन (संख्या जोड़ने या घटाने) तथा पैमाने में परिवर्तन (संख्या से गुणा या भाग करने) से पूर्णतः अप्रभावित रहता है।

यदि $U = \frac{X - a}{h}$ तथा $V = \frac{Y - b}{k}$ हो, तो:

$$r_{UV} = \left( \frac{h \cdot k}{|h \cdot k|} \right) r_{XY}$$
  • यदि $h$ और $k$ के चिह्न समान हों (दोनों धनात्मक या दोनों ऋणात्मक), तो $r_{UV} = r_{XY}$ रहता है।
  • यदि $h$ और $k$ के चिह्न विपरीत हों (एक धनात्मक और एक ऋणात्मक), तो सहसंबंध का चिह्न उलट जाता है: $r_{UV} = -r_{XY}$।
विशेषता ३: शुद्ध इकाई-रहित माप (Pure Dimensionless Number)

$r$ सह-प्रसरण तथा मानक विचलनों के गुणनफल का अनुपात है। अंश और हर की भौतिक इकाइयां (जैसे रुपया, किलोग्राम, मीटर) आपस में कट जाती हैं। शुद्ध संख्या होने के कारण भिन्न-भिन्न इकाइयों में मापे गए चरों के संबंधों की भी प्रत्यक्ष तुलना की जा सकती है।

विशेषता ४: चरों में सममित (Symmetric)

सहसंबंध चरों के स्थान परिवर्तन के प्रति सममित होता है: $r_{XY} = r_{YX}$। कीमत एवं मांग का सहसंबंध तथा मांग एवं कीमत का सहसंबंध पूर्णतः एक ही होता है।

विशेषता ५: केवल रैखिक संबंध का सूचक ($r = 0$ पूर्ण स्वतंत्रता नहीं)

$r = 0$ केवल यह दर्शाता है कि चरों के बीच कोई रैखिक संबंध नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं है कि दोनों चर पूर्णतः स्वतंत्र हैं; उनके बीच एक सुदृढ़ वक्रीय या परवलयिक संबंध (उदा. $Y = X^2$) हो सकता है।

२. सहसंबंध के मान का गुणात्मक निर्वचन पैमाना
गुणांक की सीमा ($r$) सहसंबंध की कोटि / स्तर आर्थिक तात्पर्य
$$r = +1$$पूर्ण धनात्मक सहसंबंधदोनों चर एक ही दिशा में पूर्णतः समानुपातिक बदलते हैं।
$$+0.75 \le r < +1$$उच्च स्तरीय धनात्मक सहसंबंधअत्यंत घनिष्ठ प्रत्यक्ष संबंध (उदा. आय और उपभोग)।
$$+0.25 \le r < +0.75$$मध्यम स्तरीय धनात्मक सहसंबंधसार्थक प्रत्यक्ष संबंध।
$$0 < r < +0.25$$निम्न स्तरीय धनात्मक सहसंबंधअत्यंत क्षीण प्रत्यक्ष संबंध।
$$r = 0$$सहसंबंध अनुपस्थित / शून्यरैखिक संबंध का पूर्ण अभाव।
$$-0.25 < r < 0$$निम्न स्तरीय ऋणात्मक सहसंबंधदुर्बल विपरीत संबंध।
$$-0.75 < r \le -0.25$$मध्यम स्तरीय ऋणात्मक सहसंबंधपर्याप्त विपरीत संबंध (उदा. कीमत एवं मांग)।
$$-1 < r \le -0.75$$उच्च स्तरीय ऋणात्मक सहसंबंधअत्यंत दृढ़ विपरीत संबंध।
$$r = -1$$पूर्ण ऋणात्मक सहसंबंधविपरीत दिशा में पूर्णतः समानुपातिक परिवर्तन।
३. संभाव्य विभ्रम (Probable Error - PE) एवं प्रमाप विभ्रम (SE)

न्यादर्श से प्राप्त सहसंबंध गुणांक की प्रामाणिकता तथा समग्र में उसके अस्तित्व की पुष्टि हेतु संभाव्य विभ्रम ($PE_r$) का प्रयोग किया जाता है:

$$PE_r = 0.6745 \times \frac{1 - r^2}{\sqrt{N}} \qquad \text{तथा} \qquad SE_r = \frac{1 - r^2}{\sqrt{N}}$$

निर्णय की कसौटियां:

  • यदि $r < PE_r$ हो, तो सहसंबंध नगण्य या सारहीन माना जाता है।
  • यदि $r > 6 \times PE_r$ हो, तो सहसंबंध निश्चित रूप से महत्वपूर्ण (Highly Significant) माना जाता है।

स्पीयरमैन का कोटि सहसंबंध गुणांक (Spearman's Rank Correlation)

१. कोटि सहसंबंध की आवश्यकता एवं पृष्ठभूमि

अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र में अनेक महत्वपूर्ण चर ऐसे होते हैं जिन्हें संख्यात्मक पैमानों पर सीधे नहीं मापा जा सकता (जैसे बुद्धिमत्ता, सुंदरता, ईमानदारी, नेतृत्व क्षमता, उपभोक्ता वरीयता आदि)। परंतु किसी प्रतियोगिता या सर्वेक्षण में व्यक्तियों को उनकी योग्यता के आधार पर क्रमानुसार (१, २, ३...) रैंक या कोटि दी जा सकती है।

1904 में ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक चार्ल्स एडवर्ड स्पीयरमैन ने ऐसी कोटियों के मध्य संबंध मापने हेतु कोटि सहसंबंध गुणांक (Rank Correlation Coefficient) का प्रतिपादन किया, जिसे $R$ या $\rho$ द्वारा व्यक्त किया जाता है। यह एक अप्राचलिक (non-parametric) माप है।

२. स्थिति १: जब कोटियां भिन्न हों (कोई टाई न हो)

जब प्रत्येक समंक की कोटि अलग और अद्वितीय हो, तो सूत्र निम्नवत है:

$$R = 1 - \frac{6 \sum D^2}{N(N^2 - 1)}$$

जहां:

  • $D = R_1 - R_2$ दोनों श्रेणियों में एक ही इकाई की कोटियों का अंतर है।
  • $\sum D^2$ कोटि अंतरों के वर्गों का योग है।
  • $N$ कुल युग्मों या प्रतिभागियों की संख्या है।
स्वचालित जांच नियम:
कोटि अंतरों का बीजगणितीय योग सदैव शून्य होना चाहिए: $$\sum D = \sum (R_1 - R_2) \equiv 0$$ यदि $\sum D \neq 0$ आता है, तो कोटि आबंटन या घटाव में निश्चित रूप से गलती हुई है!
३. स्थिति २: जब कोटियां समान या टाई हों (Tied Ranks)

जब किसी श्रेणी में दो या दो से अधिक मान समान हों, तो उन्हें औसत कोटि नियम (Average Rank Rule) द्वारा रैंक दी जाती है। जैसे, यदि दो मान समान होकर ३रे और ४थे स्थान पर आते हैं, तो दोनों को $\frac{3+4}{2} = 3.5$ रैंक दी जाएगी। अगला मान सीधे ५वें स्थान पर आएगा।

समान कोटियों के कारण प्रत्येक समान मानों के समूह के लिए $\frac{m(m^2-1)}{12}$ का संशोधन पद $\sum D^2$ में जोड़ा जाता है (जहां $m$ उस मान की पुनरावृत्ति संख्या है):

$$R = 1 - \frac{6 \left[ \sum D^2 + \sum \frac{m_i(m_i^2 - 1)}{12} \right]}{N(N^2 - 1)}$$

यदि कोई संख्या २ बार दोहराई गई है ($m=2$), तो संशोधन पद $\frac{2(4-1)}{12} = 0.5$ होगा।

४. तुलनात्मक समीक्षा: कार्ल पियर्सन बनाम स्पीयरमैन
तुलना का बिंदु कार्ल पियर्सन का गुणांक ($r$) स्पीयरमैन का कोटि गुणांक ($R$)
समंकों की प्रकृतिसंख्यात्मक परिमाणात्मक समंक (रुपया, किलोग्राम, मीटर)।गुणात्मक लक्षण अथवा क्रमसूचक कोटियां।
समग्र का बंटनद्विचर प्रसामान्य बंटन (Bivariate Normal) की पूर्वधारणा।बंटन-मुक्त अप्राचलिक माप (Distribution-free)।
चरम मानों का प्रभावअत्यधिक संवेदनशील; चरम मानों से विकृत हो जाता है।चरम मानों से अप्रभावित, क्योंकि मानों को कोटियों में बदला जाता है।
संबंध का प्रकारकेवल रैखिक संबंध को मापता है।किसी भी एकदिष्ट (Monotonic) संबंध को माप सकता है।

व्यावहारिक आर्थिक अनुप्रयोग, सीमाएं एवं मिथ्या सहसंबंध

१. व्यावहारिक अर्थशास्त्र में सहसंबंध के वास्तविक उपयोग

सहसंबंध का उपयोग आर्थिक विश्लेषण के प्रत्येक क्षेत्र में व्यापक रूप से होता है:

  • मांग का नियम एवं लोच: कीमत एवं मांग के बीच ऋणात्मक सहसंबंध ($r < 0$) यह प्रमाणित करता है कि वस्तु सामान्य है। यदि यह धनात्मक हो तो गिफिन या प्रतिष्ठासूचक वस्तु की पहचान होती है।
  • कीन्स का उपभोग फलन: जॉन मेनार्ड कीन्स के अनुसार प्रयोज्य आय बढ़ने पर उपभोग बढ़ता है। भारतीय समष्टिगत आंकड़ों में आय और उपभोग के बीच $r > +0.90$ का प्रबल धनात्मक सहसंबंध पाया जाता है।
  • फिलिप्स वक्र (Phillips Curve): बेरोजगारी की दर तथा मुद्रास्फीति के मध्य ऐतिहासिक ऋणात्मक सहसंबंध केंद्रीय बैंकों को रोजगार एवं मुद्रास्फीति के मध्य संतुलन स्थापित करने में मार्गदर्शन देता है।
  • पोर्टफोलियो विविधीकरण: वित्तीय अर्थशास्त्र में विभिन्न प्रतिभूतियों के बीच ऋणात्मक या शून्य सहसंबंध होने पर उन्हें मिलाकर निवेश करने से कुल जोखिम न्यूनतम हो जाता है।
२. सहसंबंध की सीमाएं एवं भ्रामक सहसंबंध की भ्रांतियां
  1. मिथ्या या भ्रामक सहसंबंध (Spurious Correlation): दो पूर्णतः स्वतंत्र समंकों में समय के साथ केवल दीर्घकालिक वृद्धि होने से उच्च सहसंबंध दिख सकता है (उदा. देश में मोबाइल फोन की बिक्री और साक्षरता दर दोनों का स्वतंत्र रूप से बढ़ना)।
  2. गौण चर का प्रभाव (Confounding Factor): गर्मियों में तैराकी के दौरान डूबने की घटनाओं और शीतल पेय की बिक्री में धनात्मक सहसंबंध दिखता है। इसका वास्तविक कारण अत्यधिक गर्मी (तीसरा चर) है।
  3. अरैखिक संबंध की अनदेखी: कर की दरों और कुल कर राजस्व (लाफर वक्र) के बीच स्पष्ट संबंध होते हुए भी संपूर्ण समंकों पर रैखिक सहसंबंध $r = 0$ आ सकता है।
  4. समंक विस्तार का संकुचन: किसी सीमित वर्ग के आंकड़ों का ही अध्ययन करने पर वास्तविक सहसंबंध दब सकता है।
३. सहसंबंध विधि चयन का निर्णय ढांचा

समस्या के समाधान हेतु उपयुक्त विधि का चयन निम्न प्रकार करें:

  • परिमाणात्मक संख्यात्मक समंक एवं रैखिक संबंध? $\rightarrow$ कार्ल पियर्सन की प्रत्यक्ष या लघु विधि ($r$)।
  • गुणात्मक लक्षण (सुंदरता, ईमानदारी, प्रतियोगिता रैंकिंग) या कोटियां? $\rightarrow$ स्पीयरमैन का कोटि सहसंबंध ($R$)।
  • प्रारंभिक आरेखीय निरीक्षण अथवा अरैखिक रुझान परखना? $\rightarrow$ विक्षेप आरेख (Scatter Diagram)।

प्रमुख आर्थिक सूत्र, व्यावसायिक सिद्धांत एवं मानक

कार्ल पियर्सन के सहसंबंध गुणांक के सूत्र
स्पीयरमैन के कोटि सहसंबंध के सूत्र
संभाव्य विभ्रम एवं सार्थकता की कसौटी

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
विस्तृत समाधान / उत्तर:
चरण १: समांतर माध्य ज्ञात करना ($ar{X}$ एवं $ar{Y}$)
युग्मों की संख्या ($N$) = ५।
$$\sum X = २५ + ২৭ + ३० + ३२ + ३६ = १५० \implies ar{X} = rac{१५०}{५} = ३०$$ $$\sum Y = २० + २४ + २५ + ২৭ + २९ = १२५ \implies ar{Y} = rac{१२५}{५} = २५$$ दोनों माध्य पूर्ण संख्याएं हैं, अतः प्रत्यक्ष विधि का उपयोग सर्वोत्तम है।

चरण २: गणना सारणी का निर्माण
जोड़ा $X$ $x = X - ३०$ $x^2$ $Y$ $y = Y - २५$ $y^2$ $xy$
१२५-५२५२०-५२५२५
२২৭-३९२४-११३
३३०००২৫०००
४३२+२४২৭+२४४
५३६+६३६२९+४१६२४
योग $\sum X = १५०$ $\sum x = ०$ $\sum x^2 = ৭৪$ $\sum Y = ১২৫$ $\sum y = ०$ $\sum y^2 = ৪৬$ $\sum xy = ৫৬$
चरण ३: सूत्र में मान रखना $$r = rac{\sum xy}{\sqrt{\sum x^2 \cdot \sum y^2}} = rac{৫৬}{\sqrt{৭৪ \cdot ৪৬}} = rac{৫৬}{\sqrt{३४०४}} = rac{৫৬}{৫৮.३४৪} pprox +०.९५९৮$$
आर्थिक एवं सांख्यिकीय निर्वचन:
सहसंबंध गुणांक का मान +०.९६ है, जो पति और पत्नी की आयु के मध्य अत्यंत उच्च स्तरीय धनात्मक रैखिक सहसंबंध को प्रदर्शित करता है।
उदाहरण 2
विस्तृत समाधान / उत्तर:
चरण १: कल्पित माध्य मानना ($A_x, A_y$)
माना $A_x = १४$ तथा $A_y = ३०$। कुल युग्म $N = ६$।

चरण २: लघु विधि सारणी
क्रमांक $X$ $d_x = X - १४$ $d_x^2$ $Y$ $d_y = Y - ३०$ $d_y^2$ $d_x d_y$
११०-४१६४०+१०१००-४०
२१२-२४३८+८६४-१६
३१४००३२+२४०
४१६+२४२८-२४-४
५१८+४१६२५-५२५-२०
६२०+६३६२०-१०१००-६०
योग - $\sum d_x = ६$ $\sum d_x^2 = ৭৬$ - $\sum d_y = ३$ $\sum d_y^2 = २९७$ $\sum d_x d_y = -१४०$
चरण ३: सूत्र में मान प्रतिस्थापन $$r = rac{N\sum d_x d_y - (\sum d_x)(\sum d_y)}{\sqrt{N\sum d_x^2 - (\sum d_x)^2} \cdot \sqrt{N\sum d_y^2 - (\sum d_y)^2}}$$ $$r = rac{६(-१४०) - (६)(३)}{\sqrt{६(৭৬) - (६)^२} \cdot \sqrt{६(२९७) - (३)^२}} = rac{-८४० - १८}{\sqrt{४५६ - ३६} \cdot \sqrt{१७८२ - ९}}$$ $$r = rac{-८৫৮}{\sqrt{४२०} \cdot \sqrt{१७७३}} = rac{-८৫৮}{२०.४९४ imes ४२.१०७} = rac{-८৫৮}{८६२.९४} pprox -०.९९४३$$
निर्वचन:
सहसंबंध गुणांक -०.९९ प्राप्त हुआ है, जो कीमत और मांग के बीच लगभग पूर्ण ऋणात्मक सहसंबंध को सिद्ध करता है और मांग के नियम की पूर्ण पुष्टि करता है।
उदाहरण 3
विस्तृत समाधान / उत्तर:
चरण १: कल्पित माध्य एवं वर्ग पैमाना चुनना
$X$ हेतु: $A_x = ३००, c_x = १०० \implies u = rac{X - ३००}{१००}$
$Y$ हेतु: $A_y = ४५, c_y = ५ \implies v = rac{Y - ४५}{५}$
युग्मों की संख्या $N = ५$।

चरण २: पद-विचलन सारणी
इकाई $X$ $u$ $u^2$ $Y$ $v$ $v^2$ $uv$
११००-२४२०-৫२५१०
२२००-११३५-२४२
३३००००४५०००
४४००+১१५०+১११
५৫০০+२४৭০+৫२५१०
योग - $\sum u = ०$ $\sum u^2 = १०$ - $\sum v = -১$ $\sum v^2 = ৫৫$ $\sum uv = ২৩$
चरण ३: सूत्र द्वारा मान ज्ञात करना $$r = rac{५(२३) - (०)(-১)}{\sqrt{५(१०) - (०)^२} \cdot \sqrt{५(৫৫) - (-১)^२}} = rac{११५}{\sqrt{৫০} \cdot \sqrt{२७४}} = rac{११५}{७.০৭১ imes १६.৫৫३} pprox +०.९८२५$$
निर्वचन:
पैमाने से स्वतंत्र होने के कारण $r_{XY} = r_{uv} = \mathbf{+०.९८}$। उत्पादन वृद्धि लाभ को अत्यधिक प्रबल रूप से बढ़ाती है।
उदाहरण 4
विस्तृत समाधान / उत्तर:
चरण १: समंकों का स्वरूप
निर्णायकों द्वारा सीधे रैंक ($R_1$ एवं $R_2$) दी गई है और कोई रैंक दोहराई नहीं गई है ($N = ৮$)।

चरण २: कोटि अंतर सारणी
प्रतिभागी निर्णायक अ ($R_1$) निर्णायक ब ($R_2$) $D = R_1 - R_2$ $D^2$
१৫৬-১१
२२१+১१
३৮৫+३९
४१२-১१
५৪৪००
৬৬৭-১१
৭३৮-৫२५
৮৭३+४१६
योग - - $\sum D = ०$ (सत्यापित) $\sum D^2 = ৫৪$
चरण ३: सूत्र में मान रखना $$R = 1 - rac{6 \sum D^2}{N(N^2 - 1)} = 1 - rac{६ imes ৫৪}{৮(৮^२ - ১)} = 1 - rac{३২৪}{৮(६३)} = 1 - rac{३২৪}{৫০৪} = 1 - ०.६४२९ = +०.३५७१$$
निर्वचन:
कोटि सहसंबंध गुणांक +०.३६ है, जो दोनों निर्णायकों के मध्य मध्यम स्तरीय धनात्मक सहमति को व्यक्त करता है।
उदाहरण 5
विस्तृत समाधान / उत्तर:
चरण १: औसत कोटि नियम से रैंक निर्धारण
अर्थशास्त्र ($X$): ৮০ (१ली), ৭৫ (२री), ৬৮ (३री), ৬४ एवं ৬४ (४थी व ५वीं संयुक्त), ৫০ (६वीं)।
६४ की टाई रैंक = $ rac{४+५}{२} = ४.५$ (यहां $m_1 = २$)।

सांख्यिकी ($Y$): ৫२ (१ली), ৪৮ (२री), ৪০ एवं ৪০ (३री व ४थी संयुक्त), ৩৫ (५वीं), ৩০ (६वीं)।
৪০ की टाई रैंक = $ rac{३+४}{२} = ३.५$ (यहां $m_2 = २$)।

चरण २: कोटि अंतर सारणी
छात्र अर्थशास्त्र ($X$) रैंक $R_1$ सांख्यिकी ($Y$) रैंक $R_2$ $D = R_1 - R_2$ $D^2$
१৬৮३৪০३.৫-०.५०.२५
२৬४४.৫৪০३.৫+১.०१.००
३৭৫२৪৮२.००.००.००
४৫০৬৩০৬.००.००.००
५৬४४.৫৩৫५.०-०.५०.२५
६৮০१৫२१.००.००.००
योग - - - - $\sum D = ०$ $\sum D^2 = १.५०$
चरण ३: संशोधन पद एवं सूत्र प्रयोग $X$ हेतु संशोधन ($m_1 = २$): $ rac{२(४-১)}{১২} = ०.५$
$Y$ हेतु संशोधन ($m_2 = २$): $ rac{२(४-১)}{১২} = ०.५$
संशोधित योग = $१.५० + ०.५ + ०.५ = २.५०$ $$R = 1 - rac{६(२.५०)}{६(३६ - ১)} = 1 - rac{१५}{२१०} = 1 - ०.०७१४ = +०.९२८६ pprox +०.९३$$
निर्वचन:
कोटि सहसंबंध +०.९३ प्राप्त हुआ है, जो यह दर्शाता है कि अर्थशास्त्र में दक्ष छात्र सांख्यिकी में भी अत्यंत उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं।
उदाहरण 6
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भाग (क): चरों के रूपांतरण का प्रभाव
दिया गया है: $$U = - rac{१}{५}X + २० \implies h = -५$$ $$V = rac{१}{१०}Y + ५ \implies k = +१०$$ चूंकि $h$ और $k$ के चिह्न विपरीत हैं ($h \cdot k = -৫০ < ०$), अतः सहसंबंध का चिह्न परिवर्तित हो जाएगा: $$r_{UV} = -r_{XY} = -(+०.८०) = -०.८०$$
भाग (ख): संभाव्य विभ्रम एवं सार्थकता परीक्षण
$r = ०.८० \implies r^2 = ०.६४$, तथा $N = ६४ \implies \sqrt{N} = ৮$।

१. प्रमाप विभ्रम ($SE_r$): $$SE_r = rac{१ - r^२}{\sqrt{N}} = rac{१ - ०.६४}{৮} = rac{०.३६}{৮} = ०.०४५$$
२. संभाव्य विभ्रम ($PE_r$): $$PE_r = ०.६७४५ imes SE_r = ०.६७४५ imes ०.०४५ pprox ०.०३०३५$$
३. सार्थकता की जांच: $$६ imes PE_r = ६ imes ०.०३०३५ = ०.१८२१$$ चूंकि $r = ०.८० > ६ imes PE_r$ ($०.८० > ०.১৮२१$), अतः प्राप्त सहसंबंध समग्र में अत्यधिक सार्थक (Highly Significant) एवं विश्वसनीय है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

लघु विधि में $(\sum d_x)^2$ और $\sum d_x^2$ को समान मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

$\sum d_x^2$ प्रत्येक व्यक्तिगत विचलन के वर्ग का योग है, जबकि $(\sum d_x)^2$ सभी विचलनों के कुल योग का वर्ग है। ये दोनों मान सर्वथा भिन्न होते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

r = 0 आने पर यह निष्कर्ष निकाल लेना कि दोनों चरों में कोई संबंध ही नहीं है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

r = 0 केवल रैखिक संबंध के अभाव को बताता है। दोनों चरों के बीच प्रबल वक्रीय संबंध (जैसे $Y = X^2$) होने पर भी रैखिक सहसंबंध शून्य हो सकता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

स्पीयरमैन विधि में टाई रैंक होने पर भी साधारण सूत्र का प्रयोग कर देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

टाई होने पर औसत रैंक देना अनिवार्य है तथा प्रत्येक समान मानों के समूह हेतु $\frac{m(m^2-1)}{12}$ संशोधन पद जोड़कर संशोधित सूत्र ही प्रयोग करना चाहिए।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

r WBCHSE कक्षा 11 • परिमाणात्मक अर्थशास्त्र: सहसंबंध का संपूर्ण विश्लेषण विक्षेप आरेख, कार्ल पियर्सन का सहसंबंध गुणांक (r) एवं स्पीयरमैन का कोटि सहसंबंध (R) १. विक्षेप आरेख एवं सहसंबंध के प्रकार (Scatter Diagrams) पूर्ण धनात्मक (r = +1) पूर्ण ऋणात्मक (r = -1) रैखिक सहसंबंध अनुपस्थित (r = 0) वक्रीय संबंध (r = 0) प्रमुख विशेषताएं: • मूल बिंदु एवं पैमाने के परिवर्तन से स्वतंत्र (Origin & Scale Invariant) • शुद्ध इकाई-रहित माप; सदैव -1 ≤ r ≤ +1 की सीमाओं में परिबद्ध • चरों में सममित: r(X,Y) = r(Y,X) २. कार्ल पियर्सन का सहसंबंध गुणांक (Karl Pearson's r) सह-प्रसरण एवं मानक विचलनों का अनुपात: r = Cov(X,Y) / (σx · σy) = Σ(x-x̄)(y-ȳ) / √[Σ(x-x̄)² · Σ(y-ȳ)²] सहसंबंध की मात्रा का पैमाना [-1 से +1]: -1.0 पूर्ण ऋणात्मक (-1.0) -0.5 मध्यम ऋणात्मक (-0.5) 0.0 शून्य सहसंबंध (0.0) +0.5 मध्यम धनात्मक (+0.5) +1.0 पूर्ण धनात्मक (+1.0) Direct: r = Σxy / √(Σx²·Σy²) Short-Cut: Assumed Mean dx, dy ३. स्पीयरमैन का कोटि सहसंबंध एवं आर्थिक अनुप्रयोग (Spearman's Rank Correlation) भिन्न कोटियों हेतु: R = 1 - [6·ΣD² / N(N²-1)] समान/टाई कोटियों हेतु: R = 1 - 6·[ΣD² + Σ(m³-m)/12] / N(N²-1) जाँच कसौटी: कोटि अंतरों का योग सदैव शून्य होता है (ΣD ≡ 0) आर्थिक अनुप्रयोग एवं चेतावनी: • गुणात्मक चरों (योग्यता, बुद्धिमत्ता, ईमानदारी) के अध्ययन हेतु स्पीयरमैन विधि उपयुक्त • कीमत एवं मांग में ऋणात्मक संबंध (r < 0) तथा आय एवं उपभोग में धनात्मक संबंध (r > 0) सावधानी: सहसंबंध कभी भी कार्य-कारण का प्रमाण नहीं होता (Correlation ≠ Causation) TargetExams Academic Series • WBCHSE Quantitative Statistics • Bivariate Data & Correlation Analysis

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
१. सहसंबंध आर्थिक सांख्यिकी का एक द्विचर उपकरण है, जो दो या दो से अधिक चरों के पारस्परिक संबंध की दिशा एवं घनिष्ठता की मात्रा को मापता है।
मुख्य बिंदु 2
२. सहसंबंध के प्रकार: दिशा के आधार पर धनात्मक एवं ऋणात्मक; अनुपात के आधार पर रैखिक एवं वक्रीय; चरों की संख्या के आधार पर सरल, बहुगुणी एवं आंशिक।
मुख्य बिंदु 3
३. सहसंबंध कभी कार्य-कारण का प्रमाण नहीं होता। उच्च सहसंबंध प्रत्यक्ष कारण, द्विमार्गी प्रभाव, किसी तीसरे चर अथवा मात्र संयोग (मिथ्या सहसंबंध) से हो सकता है।
मुख्य बिंदु 4
४. विक्षेप आरेख द्विचर समंकों का प्राथमिक आरेखीय रूप है; यह कोई संख्यात्मक मान नहीं देता, किंतु संबंध की दिशा, फैलाव और वक्रता स्पष्ट करता है।
मुख्य बिंदु 5
५. कार्ल पियर्सन का गुणन-आघूर्ण सहसंबंध गुणांक (r) सह-प्रसरण एवं मानक विचलनों के गुणनफल का अनुपात है: r = Cov(X, Y) / (σx · σy)।
मुख्य बिंदु 6
६. पियर्सन का r सदैव -१ से +१ के मध्य परिबद्ध रहता है (-१ ≤ r ≤ +१)। +१ पूर्ण धनात्मक, -१ पूर्ण ऋणात्मक और ० रैखिक संबंध का अभाव दर्शाता है।
मुख्य बिंदु 7
७. पियर्सन का r मूल बिंदु एवं पैमाने के परिवर्तन से स्वतंत्र रहता है, परंतु विपरीत चिह्न से r का बीजगणितीय चिह्न बदल जाता है। यह शुद्ध इकाई-रहित माप है।
मुख्य बिंदु 8
८. स्पीयरमैन का कोटि सहसंबंध गुणांक (R) गुणात्मक विशेषताओं एवं योग्यता रैंकिंग में प्रयुक्त होता है: R = 1 - [6ΣD² / N(N² - 1)]।
मुख्य बिंदु 9
९. टाई कोटियों की दशा में औसत रैंक दी जाती है तथा प्रत्येक समान मानों के समूह हेतु m(m² - 1)/12 संशोधन पद जोड़ा जाता है।
मुख्य बिंदु 10
१०. संभाव्य विभ्रम द्वारा सार्थकता का परीक्षण होता है: यदि r > 6 × PE_r हो, तो सहसंबंध समग्र में निश्चित रूप से सार्थक होता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

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