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WBB • कक्षा 7 • Geography & Environment (আমাদের পৃথিবী) • अध्याय 4
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

स्थलरूप

पश्चिम बंगाल मध्य शिक्षा बोर्ड (WBBSE) कक्षा 7 के "हमारी पृथ्वी" (Our Earth) पाठ्यक्रम का चतुर्थ अध्याय "स्थलरूप" (Landforms)। इस अध्याय में धरातल को आकार देने वाले अंतर्जात एवं बहिर्जात बल, तीन प्रमुख स्थलरूपों—पर्वत (वलित, भ्रंशोत्थ, ज्वालामुखी एवं अवशिष्ट पर्वत), पठार (अंतरापर्वतीय पठार, तिब्बत का पठार या विश्व की छत, दक्कन ट्रैप लावा पठार एवं महाद्वीपीय शील्ड) तथा मैदान (जलोढ़ मैदान, बाढ़कृत मैदान, लोएस मैदान एवं पेनीप्लेन) की उत्पत्ति, वर्गीकरण, वैज्ञानिक लक्षण तथा मानव जीवन, कृषि, उद्योग एवं परिवहन पर उनके प्रभाव का सांगोपांग विवेचन किया गया है।

क्या आपने कभी सोचा है?

क्या आप जानते हैं कि तिब्बत का पठार इतना विशाल और ऊँचा है (औसत ऊँचाई 4,500 मीटर से अधिक) कि इसे दुनिया भर में "विश्व की छत" कहा जाता है? या यह कि भारत के दक्कन के पठार की सीढ़ीनुमा ढलानों को स्वीडिश भाषा के शब्द "ट्रैप" (सीढ़ी) से क्यों जाना जाता है? आइए इस अध्याय में पृथ्वी के इन अद्भुत रहस्यों को उजागर करें!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

पृथ्वी की सतह कहीं भी एक जैसी समतल नहीं है। कहीं गगनचुंबी हिमाच्छादित पर्वत हैं, कहीं टेबल के समान सपाट पठार, तो कहीं अत्यंत उपजाऊ समतल मैदान। यह जानना कि ये स्थलरूप कैसे बनते हैं और वे मानव बस्तियों, कृषि, खनिज संपदा और परिवहन को कैसे निर्धारित करते हैं—भूगोल का मूल आधार है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • पृथ्वी की आंतरिक संरचना (भूपर्पटी, मेंटल, क्रोड) तथा प्रमुख शैल प्रकारों की प्राथमिक जानकारी।
  • सौर ऊर्जा, अपक्षय एवं गुरुत्वाकर्षण बल के आधारभूत नियमों की सामान्य समझ।
  • विवर्तनिक प्लेटों के संचलन (अभिसारी व अपसारी सीमा) की प्रारंभिक अवधारणा।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • अंतर्जात एवं बहिर्जात भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के मध्य मूलभूत अंतर स्पष्ट करना।
  • वलित, भ्रंशोत्थ, ज्वालामुखी एवं अवशिष्ट पर्वतों की उत्पत्ति का तुलनात्मक विश्लेषण करना।
  • तिब्बत के पठार ("विश्व की छत") तथा दक्कन ट्रैप लावा संरचना के लक्षणों को समझना।
  • जलोढ़ निक्षेपित मैदानों एवं वातोढ़ लोएस मैदानों की रचना व कृषि उपयोगिता की व्याख्या करना।
  • मानव जीवन पर पर्वत, पठार और मैदान के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का समग्र मूल्यांकन करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. स्थलरूप निर्माणकारी प्रक्रियाएँ:...
2 2. पर्वत: उत्पत्ति, वर्गीकरण एवं प्...
3 3. पठार: विशेषताएँ, वर्गीकरण एवं वै...
4 4. मैदान: उत्पत्ति, प्रकार एवं वैश्...
5 5. मानव जीवन पर स्थलरूपों का प्रभाव...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. स्थलरूप निर्माणकारी प्रक्रियाएँ: अंतर्जात एवं बहिर्जात बल

पृथ्वी का धरातल सर्वत्र एकसमान या स्थिर नहीं है। कहीं ऊँचे शिखर हैं, कहीं ऊँचे-सपाट पठार और कहीं दूर-दूर तक फैले समतल मैदान। धरातल के इस विविध स्वरूप को स्थलरूप (Landform) कहते हैं। ये स्थलरूप मुख्य रूप से दो विरोधी प्राकृतिक बलों के संघर्ष से बनते हैं: अंतर्जात बल (Endogenic Forces) और बहिर्जात बल (Exogenic Forces)।

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अंतर्जात प्रक्रियाएँ (Endogenic Processes) एवं विवर्तनिकी

पृथ्वी के आंतरिक भाग में उपस्थित रेडियोधर्मी तत्वों के विखंडन और अत्यधिक भू-गर्भीय ऊष्मा के कारण दुर्बलता मंडल (Asthenosphere) में संवहन धाराएँ उत्पन्न होती हैं। ये आंतरिक बल विवर्तनिक प्लेटों को गतिमान करते हैं:

  • दीर्घकालिक मंद संचलन (Slow Movements): करोड़ों वर्षों में मंद गति से होते हैं। इसमें पर्वत निर्माणकारी हलचल (Orogenic Movement) क्षैतिज संपीड़न बल द्वारा अवसादों को मोड़कर वलित पर्वत बनाती है, जबकि महादेश जनक हलचल (Epeirogenic Movement) लंबवत रूप से महाद्वीपों का उत्थान या धंसाव करती है।
  • आकस्मिक हलचल (Sudden Movements): कुछ ही सेकंड या मिनटों में भारी तबाही और तीव्र भू-आकृतिक परिवर्तन लाते हैं; जैसे भूकंप (Earthquakes) एवं ज्वालामुखी उद्गार (Volcanism)।
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बहिर्जात प्रक्रियाएँ (Exogenic Processes) एवं समतलन

सौर ऊर्जा एवं गुरुत्वाकर्षण बल से संचालित होकर धरातल के ऊपर सक्रिय रहने वाले प्राकृतिक कारक—नदियाँ, पवन, हिमनद, समुद्री तरंगें तथा अपक्षय (Weathering)—उठे हुए भागों को काट-छाँटकर नीचा करते हैं (अपरदन / निम्नीकरण - Degradation) तथा कटे हुए मलबे को निचले गड्ढों में भरकर समतल करते हैं (निक्षेपण / अधिवृद्धि - Aggradation)। इन दोनों की सम्मिलित प्रक्रिया को समतलन या क्रमबद्धता (Gradation) कहते हैं।

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तुंगतामिति वर्गीकरण (Hypsometric Classification)

समुद्र तल से ऊँचाई, ढाल और उच्चावच के आधार पर स्थलरूपों को तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:

  • पर्वत (Mountain): समुद्र तल से 900 या 1,000 मीटर से अधिक ऊँचा, तीव्र ढाल और नुकीले शिखरों वाला विशाल शैल समूह। (300 से 900 मीटर की ऊँचाई वाली भूमियों को सामान्यतः पहाड़ या पहाड़ी कहा जाता है)।
  • पठार (Plateau): समुद्र तल से प्रायः 300 से 900 मीटर ऊँचा, सपाट एवं विस्तृत शीर्ष और खड़े किनारों वाला स्थलरूप—जिसे टेबल लैंड भी कहते हैं।
  • मैदान (Plain): समुद्र तल से 300 मीटर से कम ऊँचाई पर स्थित प्रायः समतल अथवा मंद तरंगित विस्तृत भूभाग।
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प्लेट विवर्तनिकी एवं स्थलरूपों का विकास

जब दो विवर्तनिक प्लेटें आमने-सामने टकराती हैं (अभिसारी प्लेट सीमा), तो उनके बीच का मलबा संपीडित होकर विशाल वलित पर्वत बन जाता है। जब प्लेटें एक-दूसरे से विपरीत दिशा में खिंचती हैं (अपसारी प्लेट सीमा), तो तनाव बल से भ्रंश और भ्रंश घाटियाँ बनती हैं।

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परीक्षक टिप एवं मुख्य निष्कर्ष

याद रखें: अंतर्जात बल प्राथमिक स्थलरूप (पर्वत व पठार) बनाकर विषमता पैदा करते हैं, जबकि बहिर्जात बल अपरदन व निक्षेपण द्वारा द्वितीयक स्थलरूप (मैदान) बनाकर धरातल को समतल करने का सतत प्रयास करते हैं।

2. पर्वत: उत्पत्ति, वर्गीकरण एवं प्रमुख विशेषताएँ

पर्वत धरातल के सबसे प्रभावशाली और विहंगम दृश्य हैं। उत्पत्ति की भू-वैज्ञानिक प्रक्रिया और शैल संरचना के आधार पर पर्वतों को चार मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: वलित पर्वत, भ्रंशोत्थ पर्वत, ज्वालामुखी पर्वत और अवशिष्ट पर्वत।

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वलित पर्वत (Fold Mountains): संपीड़न एवं मोड़दार शृंखलाएँ

जब दो विवर्तनिक प्लेटों के आमने-सामने खिसकने से टेथिस जैसे भूसन्नतियों (Geosynclines) में जमा अवसादी शैल स्तरों पर भारी क्षैतिज संपीड़न बल लगता है, तो वे परतें मुड़कर लहरदार वलनों (Folds) में बदल जाती हैं। वलन के उठे हुए भाग को अपनति (Anticline) और धंसे हुए निचले भाग को अभिनति (Syncline) कहते हैं।

  • नवीन वलित पर्वत (Young Fold Mountains): टर्शियरी युग में (लगभग 6-7 करोड़ वर्ष पूर्व) बने। इनके शिखर अत्यंत ऊँचे, नुकीले व बर्फ से ढके हैं तथा विवर्तनिक रूप से सक्रिय हैं। उदाहरण: एशिया का हिमालय, यूरोप का ऐल्प्स, उत्तरी अमेरिका का रॉकीज़, और दक्षिण अमेरिका का एण्डीज।
  • प्राचीन वलित पर्वत (Old Fold Mountains): पेलियोज़ोइक या प्री-कैम्ब्रियन युग में (25 से 50 करोड़ वर्ष पूर्व) बने। करोड़ों वर्षों के लगातार अपरदन से इनके शिखर गोल हो चुके हैं और ऊँचाई घट गई है। उदाहरण: भारत की अरावली पर्वतमाला (विश्व की प्राचीनतम पर्वत शृंखलाओं में से एक), उत्तरी अमेरिका के एपलेशियन और रूस के यूराल पर्वत।
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भ्रंशोत्थ पर्वत एवं भ्रंश घाटी (Block Mountains & Rift Valleys)

जब भू-संचलन के तनाव मूलक खिंचाव से भूपर्पटी की कठोर चट्टानों में दरारें या भ्रंश (Faults) पड़ जाते हैं, और दो समानांतर भ्रंशों के बीच का भूभाग ऊपर उठ जाता है (या किनारे के भाग नीचे धंस जाते हैं), तो सपाट शीर्ष और खड़े ढाल वाले पर्वत का निर्माण होता है। इसे भ्रंशोत्थ पर्वत या हॉर्स्ट (Horst / Block Mountain) कहते हैं।

इसके विपरीत, जब दो समानांतर भ्रंशों के बीच का मध्यवर्ती भाग नीचे धंसकर एक लंबी, संकरी और गहरी घाटी बनाता है, तो उसे भ्रंश घाटी या ग्रेबेन (Rift Valley / Graben) कहा जाता है।

  • प्रसिद्ध उदाहरण: जर्मनी का ब्लैक फॉरेस्ट एवं फ्रांस का वोजेज पर्वत भ्रंशोत्थ पर्वत हैं और उनके बीच से बहने वाली राइन नदी की घाटी एक भ्रंश घाटी है। भारत में सतपुड़ा और विंध्याचल पर्वतों के मध्य से बहने वाली नर्मदा नदी की घाटी एक आदर्श भ्रंश घाटी है।
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ज्वालामुखी पर्वत या संचयन पर्वत (Volcanic Mountains)

पृथ्वी के गर्भ में अत्यधिक ताप व दाब से पिघला हुआ मैग्मा जब भूपर्पटी के कमजोर छिद्र या नली द्वारा तीव्र विस्फोट के साथ बाहर निकलता है, तो तप्त लावा, राख, अंगारे और धूल क्रेटर (ज्वालामुख) के चारों ओर शंकु के आकार में परतों के रूप में जमा होते जाते हैं। इससे शंकु आकार के ज्वालामुखी या संचयन पर्वत बनते हैं।

  • सक्रिय ज्वालामुखी: इटली का विसुवियस और माउंट एटना, भारत के अंडमान का बैरन द्वीप।
  • प्रसुप्त ज्वालामुखी: जापान का सुप्रसिद्ध बर्फ से ढका माउंट फ़्यूज़ियामा (Mt. Fuji)।
  • मृत ज्वालामुखी: अफ्रीका का सर्वोच्च शिखर माउंट किलिमंजारो और म्यांमार का माउंट पोपा।
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अवशिष्ट पर्वत (Residual / Relict Mountains)

सूर्यताप, वर्षा, वायु और बहते जल के निरंतर अपरदन के कारण जब किसी प्राचीन पर्वत या पठार की कोमल चट्टानें कट-कट कर बह जाती हैं, किंतु कठोर चट्टानें नष्ट न होकर एकाकी टीलों के रूप में खड़ी रह जाती हैं, तो उन्हें अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountain) कहा जाता है। उदाहरण: राजस्थान की अरावली, झारखंड की पारसनाथ पहाड़ी और ओडिशा-तमिलनाडु की नीलगिरि पहाड़ियाँ।

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पर्वतों का पर्यावरणीय एवं आर्थिक महत्व

पर्वत मानसूनी हवाओं को रोककर पर्वतीय वर्षा कराते हैं, बारहमासी नदियों (गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु) के उद्गम स्थल हैं, जलविद्युत उत्पादन का उत्तम स्रोत हैं, इमारती लकड़ी व औषधीय वनस्पतियों के भंडार हैं तथा दार्जिलिंग, शिमला व मनाली जैसे पर्यटन केंद्रों के माध्यम से आजीविका प्रदान करते हैं।

3. पठार: विशेषताएँ, वर्गीकरण एवं वैश्विक वितरण

समुद्र तल से 300 से 900 मीटर की ऊँचाई पर स्थित वह विस्तृत भूभाग, जिसका ऊपरी सिरा विस्तृत एवं लगभग सपाट हो तथा किनारे खड़े ढाल वाले हों, पठार (Plateau) कहलाता है। इसकी आकृति डाइनिंग टेबल जैसी होने के कारण भूगोल में इसे टेबल लैंड (Tableland) भी कहा जाता है।

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पठारों की प्रमुख पहचान व विशेषताएँ

  • सपाट शीर्ष व खड़े किनारे: पर्वतों के विपरीत पठारों पर कोई नुकीली चोटी नहीं होती, बल्कि इनका शीर्ष भाग टेबल की तरह फैला हुआ होता है, जबकि किनारे कगारों (Escarpments) के रूप में सीधे नीचे उतरते हैं।
  • मनोरम जलप्रपात: पठारों से नीचे उतरते समय नदियाँ जब खड़े कगारों से गिरती हैं, तो विशाल जलप्रपातों की रचना होती है; जैसे छोटा नागपुर पठार के हुंडरू, जोन्हा व दसम जलप्रपात तथा कर्नाटक का जोग प्रपात।
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अंतरापर्वतीय पठार (Intermontane Plateau) एवं "विश्व की छत"

जो पठार चारों ओर से ऊँचे-ऊँचे वलित पर्वतों से घिरे होते हैं, उन्हें अंतरापर्वतीय पठार कहते हैं। प्लेटों के टकराने पर पर्वतों के साथ-साथ बीच का भूखंड भी अत्यंत ऊँचा उठ जाता है।

  • तिब्बत का पठार (Tibetan Plateau): दक्षिण में हिमालय और उत्तर में कुनलुन पर्वत शृंखलाओं के मध्य स्थित है। 25 लाख वर्ग किमी में फैला और समुद्र तल से 4,500 मीटर से भी अधिक औसत ऊँचाई रखने वाला यह विश्व का सबसे ऊँचा और विशाल पठार है। अपनी इस अप्रतिम ऊँचाई के कारण इसे "विश्व की छत" (Roof of the World) कहा जाता है।
  • अन्य उदाहरण: तुर्की का अनातोलिया पठार, ईरान का पठार तथा दक्षिण अमेरिकी एण्डीज का बोलीविया का पठार।
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लावा पठार एवं दक्कन ट्रैप (Lava Plateau & Deccan Trap)

जब मैग्मा बिना किसी भयंकर विस्फोट के भूपर्पटी की दरारों से शांत रूप में बाहर आकर विस्तृत भूभाग पर तरल रूप में फैल जाता है, तो क्षारीय बेसाल्ट लावा की परतें जमकर एक सपाट पठार बनाती हैं।

भारत का दक्कन का पठार (Deccan Plateau) 5 लाख वर्ग किमी से अधिक क्षेत्र में फैला एक आदर्श लावा पठार है। क्रिटेशियस युग में (लगभग 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व) दरारी उद्गार से निकले लावे के क्रमिक ठंडा होने से इसकी संरचना सीढ़ीनुमा बन गई है। इसे दक्कन ट्रैप (Deccan Trap) कहा जाता है (स्वीडिश शब्द 'Trappa' का अर्थ है सीढ़ी के पायदान)। बेसाल्ट चट्टानों के टूटने से यहाँ उपजाऊ काली रेगुर मिट्टी बनी है, जो कपास की खेती के लिए विश्व विख्यात है।

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महाद्वीपीय पठार (शील्ड) एवं गिरिपद पठार (Piedmont Plateaus)

  • महाद्वीपीय पठार या प्राचीन शील्ड: प्राचीन प्री-कैम्ब्रियन आग्नेय शैलों के बने वे विशाल स्थिर भूखंड, जो बिना मोड़े सीधे समुद्र से ऊपर उठे हैं; जैसे—कनाडियन शील्ड, अरब का पठार, और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया का पठार।
  • गिरिपद पठार (Piedmont Plateau): जो पठार पर्वतों की तलहटी (पाद देश) में स्थित होते हैं, जिनके एक तरफ पर्वत और दूसरी तरफ मैदान या समुद्र होता है; जैसे—संयुक्त राज्य अमेरिका का पीडमोंट पठार और दक्षिण अमेरिका का पेटागोनिया पठार।
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खनिज भंडार के रूप में पठारों का आर्थिक महत्व

प्राचीन आग्नेय और कायांतरित चट्टानों से निर्मित होने के कारण पठारों को "खनिजों का अजायबघर या भंडारगृह" (Storehouse of Minerals) कहा जाता है। भारत के छोटा नागपुर पठार में देश का अधिकांश कोयला (झरिया, रानीगंज), लौह अयस्क (सिंहभूम), बॉक्साइट और अभ्रक पाया जाता है, जिसके कारण इसे "भारत का रूर" (Ruhr of India) कहा जाता है।

4. मैदान: उत्पत्ति, प्रकार एवं वैश्विक महत्व

समुद्र तल से 300 मीटर से कम ऊँचाई पर स्थित प्रायः सपाट, समतल अथवा मंद ढाल वाले विशाल भूभाग को मैदान (Plain) कहते हैं। पृथ्वी की स्थलीय सतह का आधा से अधिक भाग मैदानों से घिरा है और विश्व की अधिकांश आबादी इन्हीं मैदानों में निवास करती है।

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जलोढ़ निक्षेपित मैदान (Alluvial Depositional Plains)

नदियों द्वारा पर्वतों से काटकर लाई गई बारीक गाद, बालू, सिल्ट और मिट्टी हजारों वर्षों तक निचले गर्तों में परत-दर-परत जमा होने से अत्यंत उर्वर जलोढ़ मैदान बनते हैं:

  • बाढ़ का मैदान (Floodplain): वर्षा ऋतु में जब नदी का जल तटों को तोड़कर फैलता है, तो महीन कांप मिट्टी बिछ जाने से बाढ़कृत मैदान बनते हैं।
  • डेल्टा मैदान (Delta Plain): मुहाने पर नदी का वेग कम होने से ग्रीक अक्षर डेल्टा ($\Delta$) के आकार में गाद जमा होने से डेल्टा मैदान बनता है; जैसे—गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा (विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा)।
  • प्रमुख वैश्विक जलोढ़ बेसिन: भारत का गंगा-सिंधु-ब्रह्मपुत्र मैदान, चीन का ह्वांगहो व यांग्त्सीक्यांग मैदान, मिस्र का नील नदी मैदान और अमेरिका का मिसिसिपी-मिसौरी मैदान।
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लोएस मैदान (Loess Plains): पवन-वाहित रेत का उपहार

मरुस्थलीय क्षेत्रों से तेज आँधियाँ महीन पीले क्वार्ट्ज और फेल्डस्पार धूल कणों को उड़ाकर सैकड़ों किलोमीटर दूर ले जाती हैं और किसी नम घास के मैदान में परत-दर-परत बिछा देती हैं। इस प्रकार बने बारीक पीली मिट्टी के मैदान को लोएस मैदान (Loess Plain) कहते हैं (जर्मन शब्द 'Loess' का अर्थ है भुरभुरी मिट्टी)।

वैश्विक उदाहरण: मध्य एशिया के गोबी मरुस्थल से उड़कर आई पीली धूल चीन के उत्तरी भाग में ह्वांगहो नदी बेसिन में लोएस पठार व मैदान बनाती है। इस पीली मिट्टी के जल में घुलने के कारण ही ह्वांगहो नदी का रंग पीला दिखता है, जिसे 'पीली नदी' (Yellow River) भी कहा जाता है।

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तटीय मैदान (Coastal Plains)

समुद्र के तटीय किनारों पर समुद्री तरंगों के निक्षेपण अथवा तटीय भूभाग के उत्थान से तटीय मैदान बनते हैं। भारत के प्रायद्वीप के दोनों ओर उपजाऊ पूर्वी तटीय मैदान (महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी के डेल्टा) और संकरा पश्चिमी तटीय मैदान (कोंकण व मालाबार तट) फैले हैं।

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अपरदनात्मक मैदान एवं पेनीप्लेन (Peneplain & Monadnock)

करोड़ों वर्षों तक वायु, वर्षा और नदियों के सतत अपरदन से जब कोई उच्च पर्वत या पठार घिस-घिसकर लगभग समतल मैदान का रूप ले लेता है, तो उसे भूगोलाकार विलियम मॉरिस डेविस ने पेनीप्लेन या संप्राय मैदान (Peneplain) नाम दिया। इस मैदान पर कठोर चट्टानों के जो एकाकी टीले बचे रह जाते हैं, उन्हें मोनाडनॉक (Monadnock) कहा जाता है।

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मैदान: मानव सभ्यता के पालने (Cradles of Civilization)

विश्व की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताएँ—सिंधु घाटी सभ्यता (सिंधु नदी), मेसोपोटामिया की सभ्यता (दजला-फ़रात), मिस्र की सभ्यता (नील नदी), और चीनी सभ्यता (ह्वांगहो नदी)—मैदानों में ही फली-फूलीं। समतल भूमि पर खेती, नहरें, सड़कें व रेलमार्ग बनाना सुगम होता है, जिससे कोलकाता, ढाका, दिल्ली, टोक्यो और न्यूयॉर्क जैसे विशाल महानगर मैदानों में ही बसे हैं।

5. मानव जीवन पर स्थलरूपों का प्रभाव एवं आर्थिक अनुकूलन

भू-आकृतिक संरचना मानव जीवन, व्यवसाय, आवास और संस्कृति को गहराई से नियंत्रित करती है। पर्वत, पठार और मैदान में मनुष्य किस प्रकार प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करता है, इसका वैज्ञानिक विश्लेषण नीचे प्रस्तुत है।

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पर्वतीय जीवन: चुनौतियाँ एवं अनुकूलन

  • सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming): तीव्र ढालों पर मिट्टी और पानी बह जाने से रोकने के लिए पहाड़ों को काटकर सीढ़ी के आकार के खेत बनाए जाते हैं, जिनमें धान, मक्का और सब्जियाँ उगाई जाती हैं। ढालू भूमि पानी जमा नहीं होने देती, जो चाय (दार्जिलिंग, असम) और फलों के बागानों (सेब, संतरा) के लिए आदर्श है।
  • ऋतु प्रवास (Transhumance): गद्दी, बकरवाल और भूटिया जैसी जनजातियाँ ग्रीष्म ऋतु में पहाड़ों के ऊपरी मर्गों (घास के मैदानों) में पशु चराने जाती हैं और शीत ऋतु में बर्फबारी होने पर नीचे घाटियों में उतर आती हैं। इसे ऋतु प्रवास कहते हैं।
  • प्राकृतिक आपदाएँ: भूस्खलन (Landslide), बादल फटना (Cloudburst) और भूकंप पर्वतीय जीवन की निरंतर चुनौतियाँ हैं।
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पठारी जीवन: खनिज संपदा एवं भारी उद्योग

  • औद्योगिक केंद्र: कोयला, लोहा और अन्य धातुओं की प्रचुरता के कारण जमशेदपुर, भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर जैसे बड़े इस्पात नगर पठारी भागों में विकसित हुए हैं।
  • शुष्क कृषि: पठारों की लाल व लेटराइट मिट्टी कम उपजाऊ होती है, किंतु दक्कन की बेसाल्ट लावा जनित काली मिट्टी में कपास, ज्वार, बाजरा और तिलहन की शानदार फसल होती है। पठारी नदियों के प्रपातों से भारी मात्रा में जलविद्युत बनाई जाती है।
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मैदानी जीवन: शस्य श्यामला अन्न भंडार एवं मेगा-सिटीज

  • विश्व का अन्न भंडार: उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी और मीठे भूजल की सुलभता के कारण यहाँ वर्ष में 2-3 फसलें (गेहूँ, चावल, गन्ना, जूट) उगाई जाती हैं।
  • सुगम परिवहन एवं घनत्व: समतल धरातल पर राष्ट्रीय राजमार्ग, चौड़ी रेलवे लाइनें, नहरें और हवाई अड्डे बनाना अत्यंत सस्ता व सुलभ होता है। यही कारण है कि मैदान दुनिया के सबसे घने बसे हुए क्षेत्र हैं।
  • पर्यावरणीय संकट: अत्यधिक जनसंख्या दबाव के कारण मैदानों में नदी प्रदूषण, भूजल स्तर का गिरना और वायु प्रदूषण गंभीर समस्या बन चुके हैं।
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तीनों प्रमुख स्थलरूपों का तुलनात्मक मैट्रिक्स

भौगोलिक मापदंडपर्वत (Mountain)पठार (Plateau)मैदान (Plain)
समुद्र तल से ऊँचाई900–1,000 मीटर से अधिक300 से 900 मीटर300 मीटर से कम
शीर्ष भागनुकीली चोटियाँ, तीव्र ढालसपाट टेबल लैंड, खड़े कगारसमतल या मंद तरंगित
मुख्य उत्पत्तिप्लेटों का संपीड़न, संचयनदरारी लावा उद्गार, उत्थाननदी-पवन द्वारा तलछट निक्षेप
प्रमुख आर्थिक आधारपर्यटन, वनोपज, सीढ़ीदार कृषिखनन, भारी धातु उद्योगसघन कृषि, व्यापार, उद्योग
जनसंख्या घनत्वअत्यंत विरलमध्यमसर्वाधिक सघन
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सतत विकास एवं संरक्षण दृष्टिकोण

पर्वतों पर अंधाधुंध कटाई रोककर वृक्षारोपण करना, पठारों पर वैज्ञानिक ढंग से खनन कर खदानों को पुनः हरा-भरा करना, तथा मैदानों में नदियों को औद्योगिक कचरे व प्लास्टिक से मुक्त रखना ही भावी पीढ़ियों के लिए इस प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रख सकता है।

महत्वपूर्ण भौगोलिक अवधारणाएँ, नियम एवं निर्देशांक

स्थलरूपों का तुंगतामिति वर्गीकरण (Hypsometry)
ऊँचाई मापदंड: पर्वत > 900 मी | पठार 300–900 मी | मैदान < 300 मी
समुद्र तल (MSL) से औसत ऊँचाई के आधार पर स्थलरूपों का सर्वमान्य वर्गीकरण।
वलित पर्वत निर्माण प्रक्रिया (Orogeny)
संपीड़न बल: प्लेट 1 → [अवसादी परतों में वलन] ← प्लेट 2 ⇒ वलित पर्वत
क्षैतिज दबाव से अपनति (शिखर) और अभिनति (घाटी) का निर्माण।
भ्रंशोत्थ पर्वत एवं भ्रंश घाटी यांत्रिकी
तनाव बल व भ्रंश: हॉर्स्ट (भ्रंशोत्थ पर्वत) — ग्रेबेन (भ्रंश घाटी)
समानांतर भ्रंशों के मध्यवर्ती भूभाग का ऊपर उठना या नीचे धंसना (उदा. सतपुड़ा व नर्मदा)।
दक्कन ट्रैप की सीढ़ीनुमा संरचना
व्युत्पत्ति: स्वीडिश शब्द "Trappa" (सीढ़ी) + बेसाल्ट लावा की परतें
दरारी उद्गार से निकले लावे के क्रमिक जमाव से सीढ़ीनुमा पठार व काली मिट्टी का निर्माण।
जलोढ़ मैदान एवं तलछट समतलन
समतलन: नदी प्रवाह + गाद/सिल्ट निक्षेपण ⇒ उर्वर जलोढ़ मैदान
हजारों वर्षों में नदियों द्वारा जमा किए गए बारीक मलबे से बाढ़ व डेल्टा मैदान।
वातोढ़ लोएस मैदान एवं पीली मिट्टी
पवन परिवहन: गोबी मरुस्थल की धूल + आँधियाँ ⇒ ह्वांगहो लोएस बेसिन
हवा द्वारा उड़ाई गई बारीक क्वार्ट्ज पीली धूल का सुदूर क्षेत्रों में निक्षेपण।

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
संकल्पनात्मक अनुप्रयोग 1: हिमालय को "नवीन वलित पर्वत" क्यों कहा जाता है और इसकी ऊँचाई आज भी क्यों बढ़ रही है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
भू-वैज्ञानिक विश्लेषण:
1) निर्माण काल: भू-वैज्ञानिक कालक्रम में हिमालय का निर्माण आज से मात्र 6-7 करोड़ वर्ष पूर्व टर्शियरी युग में हुआ था, जो पृथ्वी की 4.5 अरब वर्ष की आयु की तुलना में अत्यंत नया है।
2) सक्रिय विवर्तनिकी: भारतीय प्लेट (Indian Plate) प्रति वर्ष लगभग 4 से 5 सेमी की दर से यूरेशियन प्लेट के नीचे उत्तर की ओर खिसक रही है। इस निरंतर क्षैतिज संपीड़न के कारण प्राचीन टेथिस सागर के अवसादों से निर्मित हिमालय की चोटियों (जैसे माउंट एवरेस्ट ~8848.86 मी) की ऊँचाई में प्रति वर्ष कुछ मिलीमीटर की वृद्धि जारी है।
उदाहरण 2
संकल्पनात्मक अनुप्रयोग 2: कई पर्वतों से भी ऊँचा होने के बावजूद तिब्बत के पठार को पर्वत न कहकर "पठार" क्यों कहा जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
आकृतिक मापदंड:
1) शिखर की संरचना: पर्वत की अनिवार्य शर्त यह है कि उसका शीर्ष नुकीला, चोटीदार और ढाल अत्यंत खड़े होने चाहिए।
2) टेबल लैंड स्वरूप: तिब्बत के पठार की औसत ऊँचाई 4,500 मीटर से अधिक होने पर भी इसका ऊपरी भाग नुकीला न होकर 25 लाख वर्ग किमी में फैला हुआ समतल अथवा मंद तरंगित है, जिसके केवल किनारे खड़े कगारों के रूप में उतरते हैं। इस टेबल जैसी समतल स्थलाकृति के कारण इसे पर्वत नहीं, बल्कि अंतरापर्वतीय पठार ("विश्व की छत") कहा जाता है।
उदाहरण 3
संकल्पनात्मक अनुप्रयोग 3: भारत के छोटा नागपुर पठार को "भारत का रूर" (Ruhr of India) क्यों कहा जाता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
औद्योगिक व खनिज तुलना:
जर्मनी की राइन नदी की सहायक 'रूर' नदी की घाटी अपने उच्च कोटि के कोयले व लौह अयस्क और भारी इस्पात उद्योगों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। ठीक उसी प्रकार भारत के छोटा नागपुर पठार में देश का सर्वाधिक उत्तम कोकिंग कोयला (झरिया, रानीगंज, बोकारो), उच्च कोटि का लौह अयस्क (सिंहभूम), बॉक्साइट और अभ्रक पाया जाता है, जो जमशेदपुर व दुर्गापुर जैसे बड़े इस्पात कारखानों का आधार है। इसी साम्यता के कारण छोटा नागपुर को "भारत का रूर" कहा जाता है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भ्रम: प्रत्येक ऊँचा स्थान पर्वत होता है और अत्यधिक ऊँचाई पर कोई पठार या मैदान नहीं हो सकता।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वैज्ञानिक तथ्य: केवल ऊँचाई नहीं, बल्कि शीर्ष का आकार व ढाल निर्णायक होते हैं। तिब्बत 4,500 मी पर भी सपाट शीर्ष के कारण पठार है, जबकि 1,000 मी की नुकीली ढालू चोटी पर्वत है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भ्रम: अरावली पर्वत शृंखला सदैव से ही एक नीची अवशिष्ट पहाड़ी रही है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वैज्ञानिक तथ्य: अरावली लगभग 50 करोड़ वर्ष पूर्व एक विशाल वलित पर्वत शृंखला थी। करोड़ों वर्षों तक धूप, वर्षा और वायु द्वारा अपरदन होने से आज यह एक घिसी-पिटी अवशिष्ट पर्वत शृंखला में बदल गई है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

भ्रम: दक्कन ट्रैप किसी ज्वालामुखी विस्फोट से बना एक विशाल पर्वत है।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वैज्ञानिक तथ्य: दक्कन ट्रैप कोई पर्वत नहीं, बल्कि एक विशाल लावा पठार है जो शांत दरारी उद्गार से निकले बेसाल्ट लावे के परतों में जमने और सीढ़ीनुमा ढाल बनने से निर्मित हुआ है।

4-क्वाड्रेंट भौगोलिक मॉडल: प्रमुख स्थलरूप एवं प्रक्रियाएँ

स्थलरूपों का वर्गीकरण एवं भू-आकृतिक संरचना 1. आंतरिक एवं बाह्य बल अंतर्जात विवर्तनिकी बनाम बहिर्जात अपरदन अंतर्जात बल (भूकंप, ज्वालामुखी, पटल विरूपण) बहिर्जात बल (नदी, पवन, हिमनद) 2. पर्वतों के प्रकार एवं उत्पत्ति वलित पर्वत, भ्रंशोत्थ पर्वत एवं ज्वालामुखी पर्वत वलित पर्वत (हिमालय, ऐल्प्स, रॉकीज़) भ्रंशोत्थ पर्वत व भ्रंश घाटी (ब्लैक फॉरेस्ट, नर्मदा) ज्वालामुखी पर्वत (फ़्यूज़ियामा, विसुवियस) 3. पठार एवं टेबल लैंड तिब्बत (विश्व की छत), दक्कन ट्रैप एवं महाद्वीपीय शील्ड अंतरापर्वतीय पठार (तिब्बत > 4500 मी) Step-like 'Trap' लावा पठार / दक्कन ट्रैप (सीढ़ीनुमा स्थलाकृति) 4. मैदान एवं मानव बस्तियाँ जलोढ़ मैदान, बाढ़कृत मैदान एवं लोएस मैदान जलोढ़ मैदान (गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन) सभ्यता का पालना एवं उपजाऊ अन्न भंडार

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
स्थलरूपों की उत्पत्ति अंतर्जात बलों (पटल विरूपण, भूकंप) द्वारा उत्थान तथा बहिर्जात बलों (नदी, पवन, हिमनद) द्वारा समतलन के संतुलन से होती है।
मुख्य बिंदु 2
तुंगतामिति मापदंड: पर्वत > 900 मी (नुकीला शिखर), पठार 300–900 मी (सपाट टेबल लैंड), और मैदान < 300 मी (समतल धरातल)।
मुख्य बिंदु 3
वलित पर्वत क्षैतिज संपीड़न बल द्वारा अवसादी परतों के मुड़ने से बनते हैं (हिमालय, ऐल्प्स, रॉकीज़, एण्डीज)।
मुख्य बिंदु 4
भ्रंशोत्थ पर्वत (हॉर्स्ट) और भ्रंश घाटियाँ (ग्रेबेन) तनाव बल व समानांतर भ्रंशों से बनते हैं (ब्लैक फॉरेस्ट व राइन घाटी, सतपुड़ा व नर्मदा घाटी)।
मुख्य बिंदु 5
ज्वालामुखी पर्वत लावा व राख के शंकुनुमा संचयन से बनते हैं (फ़्यूज़ियामा, विसुवियस, किलिमंजारो)।
मुख्य बिंदु 6
तिब्बत का पठार (> 4,500 मी) विश्व का सबसे ऊँचा अंतरापर्वतीय पठार है जिसे "विश्व की छत" कहते हैं; दक्कन का पठार सीढ़ीनुमा लावा पठार (दक्कन ट्रैप) है।
मुख्य बिंदु 7
खनिजों की प्रचुरता के कारण पठारों को "खनिज भंडार" तथा छोटा नागपुर को "भारत का रूर" कहा जाता है।
मुख्य बिंदु 8
जलोढ़ व लोएस मैदान अपनी अत्यंत उपजाऊ मिट्टी, सुगम परिवहन और प्रचुर जल के कारण "सभ्यता के पालने" और विश्व के सबसे घने बसे क्षेत्र हैं।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
1. अंतर्जात बल एवं बहिर्जात बल में दो मुख्य अंतर लिखिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: 1) अंतर्जात बल पृथ्वी के आंतरिक भाग से उत्पन्न होते हैं (जैसे भूकंप, प्लेट संचलन) और धरातल पर प्राथमिक विषमताएँ (पर्वत, पठार) पैदा करते हैं। 2) बहिर्जात बल सूर्य व गुरुत्वाकर्षण से धरातल के ऊपर कार्य करते हैं (जैसे नदियाँ, पवन) और अपरदन व निक्षेपण द्वारा सतह को समतल करते हैं।
एक बल धरातल को नीचे से उठाता है, दूसरा ऊपर से घिसकर समतल करता है।
2
2. नवीन वलित पर्वत और प्राचीन वलित पर्वत में दो अंतर उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: नवीन वलित पर्वत टर्शियरी युग में बने, अत्यंत ऊँचे, नुकीले शिखरों वाले और विवर्तनिक रूप से सक्रिय हैं (उदा. हिमालय)। प्राचीन वलित पर्वत करोड़ों वर्ष पूर्व बने, निरंतर अपरदन से घिसकर गोल शिखरों वाले व कम ऊँचे हो चुके हैं (उदा. अरावली)।
आयु, शिखर की बनावट और वर्तमान ऊँचाई का अंतर सोचें।
3
3. भ्रंश घाटी (Graben) कैसे बनती है? भारत का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: तनाव मूलक भू-संचलन के कारण जब चट्टानों में समानांतर भ्रंश पड़ जाते हैं और दोनों भ्रंशों के बीच का मध्यवर्ती भूखंड नीचे धंस जाता है, तो भ्रंश घाटी बनती है। भारत में विंध्याचल और सतपुड़ा के बीच बहने वाली नर्मदा नदी की घाटी एक आदर्श भ्रंश घाटी है।
समानांतर भ्रंशों के बीच के भूभाग के धंसने की कल्पना करें।
4
4. चीन के ह्वांगहो नदी बेसिन में लोएस मैदान की रचना कैसे हुई?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मध्य एशिया के गोबी मरुस्थल से तेज आँधियों द्वारा उड़ाई गई अत्यधिक बारीक पीली क्वार्ट्ज धूल जब सैकड़ों किलोमीटर दूर उत्तरी चीन के ह्वांगहो बेसिन में आकर युगों तक बिछती रही, तो उससे प्रसिद्ध लोएस मैदान बना।
गोबी मरुस्थल से हवा द्वारा उड़कर आई पीली धूल पर विचार करें।
5
5. पर्वतीय ढालों पर सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming) क्यों की जाती है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: पहाड़ों के खड़े ढालों पर मिट्टी और पानी तेजी से नीचे बह जाते हैं। सीढ़ी के समान क्षैतिज समतल खेत बनाकर पानी और उपजाऊ मिट्टी को रोका जाता है, जिससे भू-अपरदन रुकता है और धान, मक्का आदि फसलें उगाई जा सकती हैं।
तीव्र ढाल पर मिट्टी के कटाव को रोकने की युक्ति।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
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