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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 7 • Social Science • अध्याय 2
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

नए राजा और साम्राज्य (New Kings and Kingdoms)

झारखण्ड शैक्षणिक परिषद् (JAC) कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान (इतिहास: हमारा अतीत-II) का द्वितीय अध्याय "नए राजा और उनके राज्य" (New Kings and Kingdoms) सातवीं से बारहवीं शताब्दी के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में नए क्षेत्रीय राजवंशों के अभ्युदय, शासन व्यवस्था तथा सांस्कृतिक उपलब्धियों का प्रामाणिक अध्ययन है। इसमें सामंतों से राजा बनने की प्रक्रिया (राष्ट्रकूट दंतिदुर्ग का हिरण्य-गर्भ अनुष्ठान), कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष (गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट व पाल), महमूद गजनवी और मुहम्मद गोरी के आक्रमण, पृथ्वीराज चौहान तृतीय, तथा चोल साम्राज्य के भव्य मंदिरों, विश्वप्रसिद्ध कांस्य मूर्तिकला (नटराज) व उत्तरमेरूर अभिलेखीय लोकतांत्रिक प्रशासन का संपूर्ण शिक्षण शामिल है।

👑 क्या आपने कभी सोचा है?

🏛️ जब राजा का बेटा ही राजा बनता था, तब मध्यकाल में साधारण जमींदारों और सामंतों ने ब्राह्मण पुरोहितों से सोने की विशाल गाय (हिरण्य-गर्भ) बनवाकर उसके पेट में प्रवेश करके खुद को नया क्षत्रिय राजा कैसे घोषित कर दिया?

⚔️ उत्तर भारत का एक अकेला शहर "कन्नौज" ऐसा क्या खास था कि उसके ऊपर कब्जा करने के लिए भारत के तीन सबसे शक्तिशाली साम्राज्य (गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट और पाल) 200 सालों तक एक-दूसरे का खून बहाते रहे?

🪙 आज से एक हजार साल पहले चोल राजाओं के पास ऐसी कौन सी जादुई तकनीक थी जिससे उन्होंने पिघले हुए मोम और कांसे से भगवान शिव "नटराज" की ऐसी अद्भुत मूर्तियाँ ढालीं जो आज दुनिया के सबसे बड़े संग्रहालयों की शान हैं?

🗳️ तमिलनाडु के उत्तरमेरूर गाँव के एक पुराने पत्थर के मंदिर पर खुदी लिखावट यह कैसे साबित करती है कि आज से 1100 साल पहले भी भारत के गाँवों में मिट्टी के घड़े में पर्चियां डालकर निष्पक्ष चुनाव (वोटिंग) कराए जाते थे?

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

सातवीं से बारहवीं सदी का यह कालखंड भारत के वर्तमान भाषाई राज्यों, क्षेत्रीय पहचानों और भव्य स्थापत्य की जननी है। इसी दौर में तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर, सोमनाथ का इतिहास, तराइन के निर्णायक युद्ध और चोल साम्राज्य की शक्तिशाली नौसेना अस्तित्व में आई जिसने समुद्र पार इंडोनेशिया और मलेशिया तक भारतीय संस्कृति का परचम लहराया। इस अध्याय को समझकर विद्यार्थी यह जान पाएंगे कि राजनीतिक सत्ता केवल जन्म से नहीं, बल्कि सैन्य संगठन, लोक-कल्याणकारी सिंचाई प्रबंधन, कर व्यवस्था और जन-स्वीकार्यता से कैसे स्थापित और संचालित होती थी।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • मौर्य और गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद भारत में विकेंद्रीकृत शासन व्यवस्था का ज्ञान।
  • चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) की पारंपारिक संकल्पना।
  • सामंतवाद: राजा और उसके अधीनस्थ जागीरदारों के संबंध।
  • दक्षिण भारत की प्रमुख नदियां (विशेषकर कावेरी नदी घाटी) की भौगोलिक समझ।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • सातवीं शताब्दी के बाद सामंतों के उदय, उनकी स्वायत्तता तथा राष्ट्रकूट शासक दंतिदुर्ग के "हिरण्य-गर्भ" अनुष्ठान का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • कन्नौज पर आधिपत्य के लिए हुए "त्रिपक्षीय संघर्ष" (गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट और पाल) के रणनीतिक व आर्थिक कारणों को स्पष्ट कर सकेंगे।
  • प्रशस्तियों (Prashastis) और ताम्रपत्र भूमि अनुदानों की प्रामाणिकता की समीक्षा कर सकेंगे और कल्हण की राजतरंगिणी की निष्पक्षता का मूल्यांकन कर सकेंगे।
  • सुल्तान महमूद गजनवी, अल-बिरूनी की "किताब-उल-हिंद" तथा पृथ्वीराज चौहान एवं मुहम्मद गोरी के तराइन युद्धों (1191 व 1192 ई.) के परिणामों को समझ सकेंगे।
  • चोल वंश (विजयालय, राजराज प्रथम, राजेंद्र प्रथम) के साम्राज्य विस्तार तथा उनकी अजेय नौसेना की भूमिका को रेखांकित कर सकेंगे।
  • तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर, लुप्त मोम तकनीक (Lost-wax method) द्वारा निर्मित चोल कांस्य मूर्तियों की कलात्मक उत्कृष्टता की व्याख्या कर सकेंगे।
  • चोल कालीन स्थानीय स्वशासन—उर, नाडू, सभा तथा उत्तरमेरूर अभिलेख की चुनाव प्रणाली—का आलोचनात्मक विवरण प्रस्तुत कर सकेंगे।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. नए राजवंशों का उदय: सामंत से महा...
2 2. राज्यों में प्रशासन, 400 प्रकार...
3 3. धन और वर्चस्व के लिए युद्ध: त्रि...
4 4. चोल साम्राज्य: प्रशासन, भव्य मंद...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. नए राजवंशों का उदय: सामंत से महाराजाधिराज तक

सातवीं सदी आते-आते उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में बड़े भूस्वामी और योद्धा सरदार अस्तित्व में आ चुके थे। तत्कालीन राजा उन्हें अपने सामंत (Samantas / अधीनस्थ) के रूप में मान्यता देते थे:

  • सामंतों के दायित्व: वे राजा के लिए उपहार लाते थे, राजदरबार में हाजिरी लगाते थे और युद्ध के समय राजा को सैन्य सहायता प्रदान करते थे।
  • महा-सामंत का उदय: जब इन सामंतों ने अपार शक्ति और धन अर्जित कर लिया, तो उन्होंने स्वयं को महा-सामंत या महा-मंडलेश्वर (पूरे क्षेत्र का महान स्वामी) घोषित कर दिया और कभी-कभी अपने मूल राजाओं की अधीनता त्यागकर स्वयं स्वतंत्र राजा बन बैठे।
दंतिदुर्ग और हिरण्य-गर्भ अनुष्ठान

दक्कन के राष्ट्रकूट प्रारंभ में कर्नाटक के चालुक्य राजाओं के सामंत थे। 8वीं सदी के मध्य में राष्ट्रकूट प्रधान दंतिदुर्ग (Dantidurga) ने अपने चालुक्य स्वामी को युद्ध में परास्त कर दिया। क्षत्रिय न होते हुए भी क्षत्रिय का दर्जा पाने के लिए उसने ब्राह्मणों की सहायता से "हिरण्य-गर्भ" (शाब्दिक अर्थ: सोने का गर्भ) नामक धार्मिक अनुष्ठान कराया, जिससे यह माना गया कि उसका क्षत्रिय के रूप में पुनर्जन्म हो गया है।

शस्त्र उठाने वाले ब्राह्मण शासक

कुछ अन्य परिवारों के लोगों ने अपनी सैन्य कुशलता से नए राज्य स्थापित किए। उदाहरणार्थ कदंब मयूरशर्मन (कर्नाटक) और गुर्जर-प्रतिहार हरिश्चंद्र (राजस्थान) जन्म से ब्राह्मण थे, किंतु उन्होंने अपना पारंपारिक धार्मिक पेशा त्यागकर हथियार उठा लिए और सफलतापूर्वक अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित किए।

2. राज्यों में प्रशासन, 400 प्रकार के कर एवं प्रशस्तियाँ

इन नए राजाओं ने स्वयं को शक्तिशाली दिखाने के लिए महाराजाधिराज (राजाओं के राजा) और त्रिभुवन-चक्रवर्ती (तीन भुवनों का स्वामी) जैसी भारी-भरकम उपाधियाँ धारण कीं, यद्यपि वे अपने सामंतों, किसानों, व्यापारियों और ब्राह्मणों के साथ सत्ता की साझेदारी करते थे।

चोल अभिलेखों में 400 कर: "वेत्ति" और "कदमाई"

तमिलनाडु में शासन करने वाले चोल वंश के अभिलेखों में विभिन्न प्रकार के करों के लिए 400 से अधिक शब्द मिलते हैं:

  • वेत्ति (Vetti): यह सबसे अधिक उल्लेखित कर था, जो नकद धन के रूप में नहीं, बल्कि बेगार (जबरन बिना मजदूरी कराए जाने वाले श्रम) के रूप में वसूला जाता था।
  • कदमाई (Kadamai): यह उपज पर लिया जाने वाला भू-राजस्व (लगान) था।
  • इसके अतिरिक्त मकान पर छप्पर डालने पर कर, ताड़ के पेड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ी के उपयोग पर कर, तथा पारिवारिक संपत्ति के उत्तराधिकार पर भी कर वसूले जाते थे।
प्रशस्तियाँ और कल्हण की अनूठी निष्पक्षता (Rajatarangini):

प्रशस्ति एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ "प्रशंसा" है। दरबारी ब्राह्मण राजा की वीरता, युद्ध विजयों और दानशीलता की प्रशंसा में प्रशस्तियाँ लिखते थे (उदा. ग्वालियर से मिली प्रतिहार राजा नागभट्ट की प्रशस्ति)। राजा इन ब्राह्मणों को पुरस्कृत करने के लिए भूमि दान देते थे जिसका ब्यौरा ताम्रपत्रों (Copper Plates) पर राजकीय मुहर लगाकर दर्ज किया जाता था।

कल्हण का ऐतिहासिक अपवाद: 12वीं सदी में कश्मीरी कवि कल्हण ने कश्मीर के राजाओं का इतिहास "राजतरंगिणी" नामक संस्कृत काव्य में लिखा। कल्हण ने अन्य दरबारी कवियों की तरह केवल झूठी चापलूसी नहीं की, बल्कि विभिन्न अभिलेखों, दस्तावेजों और प्रत्यक्ष साक्ष्यों की जांच करके शासकों और उनकी गलत नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा (Critical Analysis) की, जो मध्यकाल में अत्यंत दुर्लभ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण था।

3. धन और वर्चस्व के लिए युद्ध: त्रिपक्षीय संघर्ष एवं गजनवी-गोरी

(A) कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष (Tripartite Struggle):

उत्तर भारत में गंगा घाटी में स्थित कन्नौज (Kannauj) शहर अत्यंत उपजाऊ और व्यापारिक दृष्टि से रणनीतिक केंद्र था। इस पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए तीन बड़े राजवंश 200 से अधिक वर्षों तक आपस में लड़ते रहे:

गुर्जर-प्रतिहार (पश्चिम भारत) ⚔️ राष्ट्रकूट (दक्कन) ⚔️ पाल वंश (बंगाल व बिहार)

चूंकि इस लंबी लड़ाई में तीन प्रमुख पक्ष शामिल थे, इसलिए इतिहासकारों ने इसे "त्रिपक्षीय संघर्ष" का नाम दिया। इस निरंतर युद्ध ने तीनों ही राजवंशों को आर्थिक और सैन्य रूप से खोखला कर दिया।

(B) सुल्तान महमूद गजनवी और अल-बिरूनी:

अफगानिस्तान के गजनी का शासक महमूद गजनवी (997-1030 ई.) धन लूटने के उद्देश्य से भारत पर प्रतिवर्ष आक्रमण करता था। उसका मुख्य निशाना भारत के धनी और संपन्न मंदिर थे, जिनमें 1025 ईस्वी में गुजरात का प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर प्रमुख था। उसने लूटे गए धन से गजनी को एक वैभवशाली राजधानी बनाया।

महमूद अपने साथ प्रसिद्ध अरबी विद्वान अल-बिरूनी (Al-Biruni) को भारत लाया। अल-बिरूनी ने भारतीय संस्कृत विद्वानों से संपर्क कर भारत के धर्म, विज्ञान, गणित और समाज पर एक ऐतिहासिक अरबी ग्रंथ "किताब-उल-हिंद" (Kitab al-Hind) लिखा।

(C) चाहमान (चौहान) और तराइन का निर्णायक युद्ध:

दिल्ली और अजमेर के आसपास शासन करने वाले चौहानों में सबसे प्रसिद्ध राजा पृथ्वीराज तृतीय (पृथ्वीराज चौहान, 1168-1192 ई.) थे:

  • तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.): पृथ्वीराज चौहान ने अफगान आक्रांता सुल्तान मुहम्मद गोरी को बुरी तरह पराजित किया।
  • तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.): ठीक एक वर्ष बाद मुहम्मद गोरी ने पूर्ण तैयारी के साथ पुनः आक्रमण किया और पृथ्वीराज चौहान पराजित हुए, जिसके बाद भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।

4. चोल साम्राज्य: प्रशासन, भव्य मंदिर एवं कांस्य मूर्तिकला

दक्षिण भारत में कावेरी नदी के उपजाऊ डेल्टा में चोल वंश ने एक अत्यंत सुदृढ़ और समृद्ध साम्राज्य की स्थापना की:

साम्राज्य का अभ्युदय एवं राजेंद्र प्रथम की नौसेना:

9वीं सदी के मध्य में उरैयूर के चोल सरदार विजयालय (Vijayalaya) ने मुत्तरैयार शासकों को हराकर तंजावुर (Thanjavur) पर अधिकार कर लिया। चोल वंश के सबसे प्रतापी राजा राजराज प्रथम (985 ई.) और उनके पुत्र राजेंद्र प्रथम थे। राजेंद्र प्रथम ने गंगा घाटी, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया, मलेशिया) के सुमात्रा तक सफल जल अभियान किए और इसके लिए एक अद्वितीय शक्तिशाली नौसेना (Navy) विकसित की।

भव्य मंदिर और विश्वप्रसिद्ध कांस्य मूर्तियाँ (Chola Bronzes):

राजराज और राजेंद्र द्वारा बनवाए गए तंजावुर का बृहदेश्वर (राजराजेश्वर) मंदिर तथा गंगईकोंडचोलपुरम के मंदिर स्थापत्य और मूर्तिकला के अद्वितीय चमत्कार हैं। चोल मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं थे, बल्कि वे आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के केंद्र थे, जिनके चारों ओर शिल्पकार, नर्तक, संगीतकार और रसोइए बसते थे।

लुप्त मोम तकनीक (Lost-Wax Technique): चोल कांस्य प्रतिमाएं संसार की सबसे उत्कृष्ट कलाकृतियों में गिनी जाती हैं। इनमें भगवान शिव के तांडव स्वरूप "नटराज" की कांस्य मूर्ति विश्वप्रसिद्ध है। इसे बनाने के लिए पहले मोम की मूर्ति बनाई जाती थी, उस पर चिकनी मिट्टी का लेप लगाकर सुखाया जाता था, फिर गर्म करके मोम को एक छेद से पिघलाकर निकाल दिया जाता था और खाली सांचे में पिघला हुआ कांसा भर दिया जाता था।
चोल स्थानीय प्रशासन एवं उत्तरमेरूर अभिलेख (Democratic Roots):
  • उर (Ur): साधारण किसानों की बस्तियों को उर कहा जाता था।
  • नाडु (Nadu): ग्रामों के समूह को नाडु कहते थे जो न्याय और कर वसूली करते थे।
  • सभा (Sabha): ब्राह्मण भूस्वामियों की एक शक्तिशाली सभा थी जो गांवों का प्रशासन चलाती थी।
  • उत्तरमेरूर अभिलेख (तमिलनाडु): इसमें सभा के गठन का विस्तृत नियम मिलता है। विभिन्न समितियों (उद्यान, तालाब, वित्त समिति) के सदस्यों का चयन करने के लिए योग्य उम्मीदवारों के नाम ताड़पत्र की छोटी पर्चियों पर लिखकर एक मिट्टी के बर्तन में डाल दिए जाते थे, और किसी छोटे बालक से एक-एक पर्ची निकलवाई जाती थी।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

त्रिपक्षीय संघर्ष के तीन पक्ष
गुर्जर-प्रतिहार + राष्ट्रकूट + पाल वंश
कन्नौज पर नियंत्रण हेतु 200 वर्षीय युद्ध
चोल प्रमुख कर
वेत्ति (जबरन श्रम/बेगार) | कदमाई (भू-राजस्व लगान)
400 से अधिक प्रकार के कर
तराइन का प्रथम युद्ध
1191 ई. (पृथ्वीराज चौहान की विजय)
मुहम्मद गोरी पराजित
तराइन का द्वितीय युद्ध
1192 ई. (मुहम्मद गोरी की विजय)
दिल्ली सल्तनत की नींव
चोल प्रशासनिक पदानुक्रम
उर (गाँव) → नाडु (ग्राम समूह) → मंडलम (प्रांत)
उत्तरमेरूर अभिलेखीय विकेंद्रीकृत व्यवस्था

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
Q1 (अवधारणा - सामंत से राजा): सामंत कौन थे? राष्ट्रकूट प्रधान दंतिदुर्ग ने स्वयं को स्वतंत्र राजा के रूप में कैसे स्थापित किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. सामंत: सातवीं शताब्दी के बाद बड़े भूस्वामी और युद्ध सरदारों को राजा अपने अधीनस्थ (सामंत) के रूप में मान्यता देते थे। वे राजा को उपहार देते थे और सैन्य मदद पहुँचाते थे।
2. दंतिदुर्ग की स्वतंत्र सत्ता: राष्ट्रकूट प्रारंभ में कर्नाटक के चालुक्य राजाओं के सामंत थे। 8वीं सदी के मध्य में राष्ट्रकूट प्रमुख दंतिदुर्ग ने चालुक्यों की अधीनता को खारिज कर अपने स्वामी को युद्ध में हरा दिया। जन्म से क्षत्रिय न होने के कारण उसने ब्राह्मणों के सहयोग से "हिरण्य-गर्भ" (सोने का गर्भ) नामक प्रसिद्ध महायज्ञ किया, जिससे यह धार्मिक मान्यता प्राप्त हुई कि उसका क्षत्रिय के रूप में नया जन्म हो गया है।

उदाहरण 2
Q2 (ऐतिहासिक कारण): "त्रिपक्षीय संघर्ष" (Tripartite Struggle) क्या था? इसमें कौन-कौन से तीन राजवंश शामिल थे और वे किस शहर के लिए लड़ रहे थे?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. लक्ष्य शहर: यह संघर्ष उत्तर भारत में गंगा के उपजाऊ मैदान में स्थित रणनीतिक शहर कन्नौज (Kannauj) पर आधिपत्य जमाने के लिए हुआ था। जो कन्नौज पर शासन करता, उसका पूरे उत्तर भारत के व्यापार और संसाधनों पर नियंत्रण हो जाता था।
2. तीन राजवंश:
- पश्चिम भारत के गुर्जर-प्रतिहार
- दक्कन के राष्ट्रकूट
- बंगाल व बिहार के पाल वंश
चूंकि तीन शक्तिशाली राजवंश सदियों तक इस एक शहर के लिए संघर्ष करते रहे, इसलिए इतिहास में इसे "त्रिपक्षीय संघर्ष" कहा जाता है।

उदाहरण 3
Q3 (तुलनात्मक आलोचना): कल्हण द्वारा रचित "राजतरंगिणी" अन्य पारंपारिक प्रशस्तियों से किस प्रकार भिन्न और अनूठी थी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. सामान्य प्रशस्तियाँ: दरबारी ब्राह्मणों द्वारा राजाओं से भूमि और धन प्राप्त करने के उद्देश्य से लिखी जाती थीं। इनमें राजाओं की केवल प्रशंसा, पराक्रम और बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बातें होती थीं, जिनमें ऐतिहासिक निष्पक्षता का अभाव होता था।
2. कल्हण की राजतरंगिणी: 12वीं सदी में कल्हण ने कश्मीर के राजाओं का इतिहास लिखा। उसने केवल प्रशंसा नहीं की, बल्कि पुराने शिलालेखों, सिक्कों, राजवंशीय वंशावलियों और प्रत्यक्षदर्शियों के साक्ष्यों का परीक्षण किया। उसने राजाओं की कमजोरियों, कुप्रशासन और गलत नीतियों की कटु आलोचनात्मक समीक्षा की, जो मध्यकाल में अत्यंत निष्पक्ष और वैज्ञानिक ऐतिहासिक लेखन का उदाहरण है।

उदाहरण 4
Q4 (कला व तकनीक): चोल कांस्य मूर्तियों को बनाने के लिए प्रयुक्त "लुप्त मोम तकनीक" (Lost-Wax Technique) की कार्यप्रणाली स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
चोल मूर्तिकार संसार की सबसे उत्कृष्ट कांस्य प्रतिमाएं (जैसे नटराज) बनाने के लिए लुप्त मोम तकनीक का प्रयोग करते थे:
1. सबसे पहले मधुमक्खी के मोम (Wax) की एक हूबहू मूर्ति बनाई जाती थी।
2. उस मोम की मूर्ति पर गीली चिकनी मिट्टी की मोटी परत पोतकर उसे धूप में सुखाया जाता था।
3. मिट्टी सूखने के बाद मूर्ति को आग में गर्म किया जाता था, जिससे अंदर का सारा मोम पिघलकर नीचे बने एक बारीक छेद से बाहर बह जाता था और मिट्टी का खोखला सांचा बचता था।
4. उसी छेद से पिघला हुआ तरल कांसा (तांबा + टिन की मिश्रधातु) सांचे के अंदर भर दिया जाता था।
5. धातु के ठंडा होकर जम जाने पर ऊपर की मिट्टी को सावधानी से तोड़कर हटा दिया जाता था और चमकाकर अद्भुत प्रतिमा तैयार की जाती थी।

उदाहरण 5
Q5 (उच्च स्तरीय चिंतन - लोकतांत्रिक प्रशासन): तमिलनाडु के उत्तरमेरूर अभिलेख के अनुसार चोल साम्राज्य की "सभा" के सदस्यों का चुनाव किस प्रकार होता था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
उत्तरमेरूर (कांचीपुरम, तमिलनाडु) के 10वीं सदी के अभिलेख से स्पष्ट होता है कि चोल काल में अत्यधिक पारदर्शी व लोकतांत्रिक व्यवस्था थी:
1. उम्मीदवार की योग्यता: व्यक्ति के पास स्वयं की कर-योग्य भूमि होनी चाहिए, अपना मकान होना चाहिए, आयु 35 से 70 वर्ष के बीच होनी चाहिए, और वेदों का ज्ञान व प्रशासनिक ईमानदारी होनी चाहिए।
2. लॉटरी (घड़ा) पद्धति: विभिन्न वार्डों और समितियों (उद्यान, तालाब, मंदिर, वित्त) के योग्य उम्मीदवारों के नाम ताड़पत्र की छोटी पर्चियों पर लिखे जाते थे।
3. इन सभी पर्चियों को एक मिट्टी के बर्तन में डालकर अच्छी तरह मिलाया जाता था, और किसी निष्पक्ष छोटे बच्चे से एक-एक करके पर्ची निकलवाई जाती थी। जिसका नाम निकलता, वह उस समिति का सदस्य चुन लिया जाता था।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

चोल कर "वेत्ति" (Vetti) को नकद लगान या सिक्कों का कर समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

वेत्ति कर नकद नहीं लिया जाता था, बल्कि यह अनिवार्य बेगार (जबरन बिना पारिश्रमिक के कराया जाने वाला शारीरिक श्रम) के रूप में वसूला जाता था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

प्रशस्तियों को 100% निर्विवाद और वास्तविक ऐतिहासिक तथ्य मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

प्रशस्तियाँ दरबारी कवियों द्वारा राजा को खुश करने और पुरस्कार पाने के लिए लिखी जाती थीं, इसलिए उनमें अतिशयोक्ति होती थी। इतिहासकार अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों से उनका मिलान करके ही सच स्वीकार करते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

तराइन के प्रथम और द्वितीय युद्ध के परिणामों को आपस में मिला देना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

याद रखें: 1191 ई. के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान विजयी हुए थे और गोरी भागा था; जबकि 1192 ई. के द्वितीय युद्ध में मुहम्मद गोरी जीता था और पृथ्वीराज पराजित हुए थे।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

नए राजवंशों का राजनीतिक व प्रशासनिक प्रवाह (700-1200 ई.)
सामंतों का उत्थान व हिरण्य-गर्भ ➔ कन्नौज त्रिपक्षीय संघर्ष ➔ गजनवी लूट व तराइन युद्ध ➔ चोल नौसेना व नटराज कांस्य ➔ उत्तरमेरूर चुनाव (उर, नाडु, सभा)

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
सातवीं सदी के बाद सामंतों ने अपनी शक्ति बढ़ाकर महा-सामंत की उपाधियाँ लीं और स्वतंत्र राजवंश स्थापित किए।
मुख्य बिंदु 2
दंतिदुर्ग ने राष्ट्रकूट वंश की स्वतंत्र नींव रखी और हिरण्य-गर्भ अनुष्ठान द्वारा क्षत्रिय दर्जा प्राप्त किया।
मुख्य बिंदु 3
मयूरशर्मन (कदंब) और हरिश्चंद्र (गुर्जर-प्रतिहार) जैसे ब्राह्मणों ने शस्त्र उठाकर सफल राज्य बनाए।
मुख्य बिंदु 4
चोल अभिलेखों में 400 प्रकार के करों का उल्लेख है जिनमें वेत्ति (जबरन श्रम) और कदमाई (भू-राजस्व) प्रमुख थे।
मुख्य बिंदु 5
प्रशस्तियाँ राजाओं की प्रशंसा में लिखी जाती थीं, जबकि कल्हण की राजतरंगिणी आलोचनात्मक इतिहास दृष्टि का अनुपम उदाहरण है।
मुख्य बिंदु 6
कन्नौज पर वर्चस्व के लिए गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट और पाल वंशों के बीच 200 वर्षों तक त्रिपक्षीय संघर्ष चला।
मुख्य बिंदु 7
महमूद गजनवी ने सोमनाथ सहित भारत के धनी मंदिरों को लूटा; उसके साथ आए अल-बिरूनी ने "किताब-उल-हिंद" की रचना की।
मुख्य बिंदु 8
पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने 1191 ई. में गोरी को हराया, किंतु 1192 ई. में तराइन के दूसरे युद्ध में पराजित हुए।
मुख्य बिंदु 9
विजयालय द्वारा स्थापित चोल साम्राज्य को राजराज प्रथम और राजेंद्र प्रथम ने अजेय नौसेना द्वारा दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैलाया।
मुख्य बिंदु 10
चोल काल में लुप्त मोम तकनीक से नटराज जैसी कांस्य प्रतिमाएं बनीं, और उत्तरमेरूर अभिलेख के अनुसार सभा का चुनाव लॉटरी पद्धति से होता था।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
हिरण्य-गर्भ (Hiranya-garbha) अनुष्ठान का क्या अर्थ था और इसे किसने कराया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: हिरण्य-गर्भ का शाब्दिक अर्थ "सोने का गर्भ" है। यह एक धार्मिक अनुष्ठान था जिसे राष्ट्रकूट शासक दंतिदुर्ग ने कराया था ताकि जन्म से क्षत्रिय न होने पर भी क्षत्रिय का वैध दर्जा प्राप्त किया जा सके।
2
कन्नौज के त्रिपक्षीय संघर्ष में कौन से तीन राजवंश शामिल थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: कन्नौज के त्रिपक्षीय संघर्ष में 1. गुर्जर-प्रतिहार, 2. राष्ट्रकूट, और 3. पाल वंश शामिल थे।
3
चोल अभिलेखों में वर्णित "वेत्ति" (Vetti) और "कदमाई" (Kadamai) कर में क्या अंतर है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: वेत्ति कर नकद न होकर बेगार (जबरन बिना पारिश्रमिक के श्रम) के रूप में लिया जाता था, जबकि कदमाई जमीन की उपज पर लिया जाने वाला सामान्य भू-राजस्व लगान था।
4
तराइन के प्रथम और द्वितीय युद्ध किनके बीच और कब लड़े गए थे?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: तराइन के युद्ध चाहमान राजा पृथ्वीराज तृतीय और अफगान शासक मुहम्मद गोरी के बीच लड़े गए थे। 1191 ई. के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज जीते और 1192 ई. के द्वितीय युद्ध में गोरी विजयी हुआ।
5
उत्तरमेरूर अभिलेख किस राज्य में स्थित है और यह किस बात की जानकारी देता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: उत्तरमेरूर अभिलेख तमिलनाडु में स्थित है। यह चोल कालीन स्थानीय स्वशासन की "सभा" और उसकी विभिन्न समितियों के सदस्यों के निष्पक्ष चुनाव (लॉटरी पर्ची पद्धति) की विस्तृत जानकारी देता है।
अध्याय का अध्ययन पूर्ण हुआ?
अभ्यास के लिए तैयार?

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कक्षा 7 Social Science के सभी अध्याय

अध्याय 1: हज़ार वर्षों के दौरान हुए परिवर्तनों की पड़ताल (Tracing Changes Through a Thousand Years) अध्याय 2: नए राजा और साम्राज्य (New Kings and Kingdoms) अध्याय 3: दिल्ली के सुल्तान (The Delhi Sultans) अध्याय 4: मुगल साम्राज्य (The Mughal Empire) अध्याय 5: शासक और इमारतें (Rulers and Buildings) अध्याय 6: नगर, व्यापारी और शिल्पकार (Towns, Traders and Craftspersons) अध्याय 7: जनजातियां, खानाबदोश और एक जगह बसे हुए समुदाय (Tribes, Nomads and Settled Communities) अध्याय 8: ईश्वर से अनुराग (Devotional Paths to the Divine) अध्याय 9: क्षेत्रीय संस्कृतियों का निर्माण (The Making of Regional Cultures) अध्याय 10: अठारहवीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन (Eighteenth-Century Political Formations) अध्याय 11: पर्यावरण (Environment) अध्याय 12: हमारी पृथ्वी के अंदर (Inside Our Earth) अध्याय 13: हमारी बदलती पृथ्वी (Our Changing Earth) अध्याय 14: वायु (Air) अध्याय 15: जल (Water) अध्याय 16: मानव-पर्यावरण अंतःक्रिया: उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र (Human-Environment Interactions: The Tropical and the Subtropical Region) अध्याय 17: रेगिस्तान में जीवन (Life in the Deserts) अध्याय 18: समानता (On Equality) (On Equality) अध्याय 19: स्वास्थ्य में सरकार की भूमिका (Role of the Government in Health) अध्याय 20: राज्य शासन कैसे काम करता है (How the State Government Works) अध्याय 21: लड़के और लड़कियों के रूप में बड़ा होना (Growing Up as Boys and Girls) अध्याय 22: औरतों ने बदली दुनिया (Women Change the World) अध्याय 23: संचार माध्यमों को समझना (Understanding Media) अध्याय 24: हमारे आस-पास के बाज़ार (Markets Around Us) अध्याय 25: बाज़ार में एक कमीज़ (A Shirt in the Market) अध्याय 26: समानता के लिए संघर्ष (Struggles for Equality)

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