मध्यकालीन नगर विभिन्न कार्यों के आधार पर विकसित हुए:
(A) प्रशासनिक केंद्र - उदाहरण: तंजावुर (Thanjavur):
चोलों की राजधानी तंजावुर कावेरी नदी के किनारे स्थित एक प्रमुख प्रशासनिक नगर था:
- यहाँ का प्रसिद्ध राजराजेश्वर मंदिर वास्तुकार कुंजरमल्लन राजराज पेरुंथच्चन द्वारा निर्मित था, जिसका नाम मंदिर की दीवार पर गर्व से उत्कीर्ण है।
- नगर में अनेक सुंदर मंडप थे जहां राजा अपना दरबार लगाते थे और अधीनस्थ अधिकारियों को आदेश जारी करते थे। नगर में सैनिकों की छावनियां थीं।
- बाजारों में अनाज, मसाले, कपड़े और आभूषणों की भारी चहल-पहल थी। निकटस्थ उरैयूर के सालिय (Saliya) बुनकर मंदिर उत्सव के लिए झंडे और राजाओं के लिए महीन रेशमी व सूती वस्त्र तैयार करते थे।
(B) मंदिर नगर और तीर्थस्थल:
मंदिर प्रायः अर्थव्यवस्था और समाज के केंद्र थे। राजा और धनी भक्त मंदिरों को भूमि और धन दान देते थे। मंदिर के कर्ताधर्ता इस धन को व्यापार और साहूकारी (ऋण देने) में लगाते थे। धीरे-धीरे मंदिर के आसपास पुरोहित, मालाकार, रसोइए, संगीतकार, नर्तक और व्यापारी बसते गए, जिससे मंदिर नगरों (Temple Towns) का जन्म हुआ:
- प्रमुख मंदिर नगर: मध्य प्रदेश में भिलसा (विदिशा), गुजरात में सोमनाथ, तमिलनाडु में कांचीपुरम व मदुरै, तथा आंध्र प्रदेश में तिरुपति।
- तीर्थस्थल: राजस्थान में अजमेर 12वीं सदी में चौहानों की राजधानी था और बाद में मुगलों का सूबा मुख्यालय बना। यहाँ 12वीं सदी के विश्वविख्यात सूफी संत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है जो सभी धर्मों के श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। अजमेर के पास ही प्रसिद्ध पुष्कर सरोवर है।
छोटे नगरों का संजाल (मंडपिका व हट्ट):
8वीं सदी के बाद बड़े गांवों से छोटे नगर उभरे। इनमें प्रायः एक मंडपिका (मंडी) होती थी जहां आसपास के गांव वाले अपनी उपज बेचने आते थे। इसके अलावा दुकानें और गलियां होती थीं जिन्हें हट्ट (हाट) कहा जाता था। स्थानीय सामंत या जमींदार इन व्यापारियों और शिल्पकारों से कर वसूलते थे।