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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 7 • Social Science • अध्याय 6
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

नगर, व्यापारी और शिल्पकार (Towns, Traders and Craftspersons)

कक्षा 7 इतिहास का यह अध्याय "नगर, व्यापारी और शिल्पीजन" (Towns, Traders and Craftspersons) मध्यकालीन भारत के जीवंत शहरी केंद्रों, व्यापारिक मार्गों और शिल्प उद्योग का विस्तृत चित्र प्रस्तुत करता है। इस अध्याय में प्रशासनिक नगर (तंजावुर), मंदिर व तीर्थ नगर (कांचीपुरम, अजमेर), मंडपिका व हट्ट (हाट-बाजार), व्यापारिक संघ (मणिग्रामम व नानादेशी), बीदर के प्रसिद्ध बिदरी शिल्प, तथा तीन ऐतिहासिक नगरों—हम्पी की स्थापत्य व महानवमी डिब्बा, सूरत का मक्का द्वार व अंतरराष्ट्रीय हुंडी प्रणाली, तथा मसूलीपट्टनम के बंदरगाह का प्रामाणिक व परीक्षा-उपयोगी विश्लेषण शामिल है।

🪙 क्या आपने कभी सोचा है?

📜 क्या आप जानते हैं कि आधुनिक एटीएम कार्ड और ऑनलाइन बैंकिंग से सैकड़ों साल पहले भारत के सूरत शहर से जारी एक कागज की पर्ची (हुंडी) मिस्र के काहिरा और यूरोप के बेल्जियम में भी बिना किसी सवाल के नकद पैसों में बदल दी जाती थी?

मध्यकाल में भारत दुनिया के व्यापार और शिल्प का सबसे बड़ा केंद्र था! हम्पी में पत्थरों को बिना किसी सीमेंट के केवल एक-दूसरे में फंसाकर (Interlocking) ऐसी अभेद्य दीवारें बनाई गईं जिन्हें तोपें भी नहीं गिरा सकीं। वहीं बीदर के कारीगर तांबे पर चांदी के ऐसे बारीक तार जड़ते थे कि दुनिया दंग रह जाती थी। आइए जानें कि कैसे भारत के मसालों और सूती वस्त्रों ने पूरी दुनिया के व्यापारियों को हिंदुस्तान खींच लाया!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

यह अध्याय हमें समझाता है कि आधुनिक भारत के बड़े वाणिज्यिक और सांस्कृतिक शहर (जैसे सूरत, अजमेर, कांचीपुरम) कैसे विकसित हुए। व्यापारियों की गिल्ड व्यवस्था और हुंडी (Hundi) प्रणाली आधुनिक बैंकिंग, क्रेडिट और साख पत्र (Letter of Credit) के ऐतिहासिक पूर्वज हैं। साथ ही यह भारत के पारंपरिक हथकरघा और हस्तशिल्प की वैश्विक प्रतिष्ठा की जड़ों को उजागर करता है।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • चोल, विजयनगर और मुगल साम्राज्यों की सामान्य भौगोलिक जानकारी।
  • आयात, निर्यात, मुद्रा और कर (Taxes) की बुनियादी संकल्पनाएं।
  • भारतीय उपमहाद्वीप के तटीय बंदरगाहों (पश्चिम तट व पूर्व तट) की अवस्थिति।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • प्रशासनिक नगर, मंदिर नगर और वाणिज्यिक नगरों के उद्भव व कार्यों को समझना।
  • तंजावुर की प्रशासनिक व सांस्कृतिक संरचना और सालिय बुनकरों की भूमिका का विश्लेषण करना।
  • मणिग्रामम और नानादेशी जैसे दक्षिण भारतीय व्यापारिक संघों (Guilds) के महत्व को स्पष्ट करना।
  • बीदर के बिदरी शिल्प और पांचाल/विश्वकर्मा समुदाय के योगदान का परीक्षण करना।
  • हम्पी की इंटरलॉकिंग वास्तुकला तथा "महानवमी डिब्बा" की ऐतिहासिक महत्ता सीखना।
  • सूरत की हुंडी (Hundi) प्रणाली, जरी उद्योग तथा पश्चिमी व्यापार के प्रवेश द्वार के रूप में भूमिका का मूल्यांकन करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. नगरों के प्रकार: प्रशासनिक केंद्...
2 2. बड़े और छोटे व्यापारी: गिल्ड (सं...
3 3. नगरों में शिल्प: बिदरी कला और वि...
4 4. ऐतिहासिक नगर केस स्टडी: हम्पी, स...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. नगरों के प्रकार: प्रशासनिक केंद्र, मंदिर नगर एवं तीर्थस्थल

मध्यकालीन नगर विभिन्न कार्यों के आधार पर विकसित हुए:

(A) प्रशासनिक केंद्र - उदाहरण: तंजावुर (Thanjavur):

चोलों की राजधानी तंजावुर कावेरी नदी के किनारे स्थित एक प्रमुख प्रशासनिक नगर था:

  • यहाँ का प्रसिद्ध राजराजेश्वर मंदिर वास्तुकार कुंजरमल्लन राजराज पेरुंथच्चन द्वारा निर्मित था, जिसका नाम मंदिर की दीवार पर गर्व से उत्कीर्ण है।
  • नगर में अनेक सुंदर मंडप थे जहां राजा अपना दरबार लगाते थे और अधीनस्थ अधिकारियों को आदेश जारी करते थे। नगर में सैनिकों की छावनियां थीं।
  • बाजारों में अनाज, मसाले, कपड़े और आभूषणों की भारी चहल-पहल थी। निकटस्थ उरैयूर के सालिय (Saliya) बुनकर मंदिर उत्सव के लिए झंडे और राजाओं के लिए महीन रेशमी व सूती वस्त्र तैयार करते थे।
(B) मंदिर नगर और तीर्थस्थल:

मंदिर प्रायः अर्थव्यवस्था और समाज के केंद्र थे। राजा और धनी भक्त मंदिरों को भूमि और धन दान देते थे। मंदिर के कर्ताधर्ता इस धन को व्यापार और साहूकारी (ऋण देने) में लगाते थे। धीरे-धीरे मंदिर के आसपास पुरोहित, मालाकार, रसोइए, संगीतकार, नर्तक और व्यापारी बसते गए, जिससे मंदिर नगरों (Temple Towns) का जन्म हुआ:

  • प्रमुख मंदिर नगर: मध्य प्रदेश में भिलसा (विदिशा), गुजरात में सोमनाथ, तमिलनाडु में कांचीपुरम व मदुरै, तथा आंध्र प्रदेश में तिरुपति।
  • तीर्थस्थल: राजस्थान में अजमेर 12वीं सदी में चौहानों की राजधानी था और बाद में मुगलों का सूबा मुख्यालय बना। यहाँ 12वीं सदी के विश्वविख्यात सूफी संत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है जो सभी धर्मों के श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। अजमेर के पास ही प्रसिद्ध पुष्कर सरोवर है।
छोटे नगरों का संजाल (मंडपिका व हट्ट):

8वीं सदी के बाद बड़े गांवों से छोटे नगर उभरे। इनमें प्रायः एक मंडपिका (मंडी) होती थी जहां आसपास के गांव वाले अपनी उपज बेचने आते थे। इसके अलावा दुकानें और गलियां होती थीं जिन्हें हट्ट (हाट) कहा जाता था। स्थानीय सामंत या जमींदार इन व्यापारियों और शिल्पकारों से कर वसूलते थे।

2. बड़े और छोटे व्यापारी: गिल्ड (संघ) एवं वैश्विक व्यापार

मध्यकाल में व्यापारी बंजारों की तरह कारवां बनाकर यात्रा करते थे क्योंकि उन्हें जंगलों और लुटेरों के क्षेत्रों से गुजरना पड़ता था:

व्यापारिक संघ (Guilds):

अपने व्यापारिक हितों की सुरक्षा के लिए व्यापारियों ने संघ (गिल्ड) बनाए। दक्षिण भारत में 8वीं सदी के बाद सबसे प्रसिद्ध गिल्ड मणिग्रामम (Manigramam) और नानादेशी (Nanadesi) थे। ये गिल्ड दक्षिण भारत के भीतर, तथा श्रीलंका, दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया, मलेशिया) और चीन के साथ बड़े पैमाने पर व्यापार करते थे।

प्रमुख व्यापारिक समुदाय:
  • चेट्टियार और मारवाड़ी ओसवाल: जो आगे चलकर देश के सबसे बड़े व्यापारी और साहूकार बने।
  • गुजराती व्यापारी (हिंदू बनिया व मुस्लिम बोहरा): लाल सागर, फारस की खाड़ी, पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के बंदरगाहों पर भारतीय कपड़े और मसालों का निर्यात करते थे और बदले में सोना, हाथीदांत, टिन और रेशम लाते थे।
भारतीय मसालों की वैश्विक धूम: उष्णकटिबंधीय जलवायु में उगने वाले भारतीय मसाले—काली मिर्च, दालचीनी, जायफल और सोंठ—यूरोपीय व्यंजनों के अनिवार्य अंग बन गए। भारतीय बारीक सूती कपड़े की असाधारण मांग ने ही अंततः पुर्तगालियों, डचों, फ्रांसीसियों और अंग्रेजों को भारत की ओर आकर्षित किया।

3. नगरों में शिल्प: बिदरी कला और विश्वकर्मा समुदाय

बीदर का प्रसिद्ध "बिदरी" शिल्प (Bidri Ware):

कर्नाटक के बीदर के शिल्पकार तांबे और चांदी में जड़ाऊ काम के लिए इतने प्रसिद्ध थे कि इस अनूठी धातु कला का नाम ही "बिदरी" पड़ गया। इसमें जस्ते और तांबे की मिश्रधातु पर चांदी के बारीक तारों से सुंदर डिजाइन जड़े जाते थे और फिर उसे विशेष मिट्टी से गहरा काला रंग दिया जाता था, जिससे चांदी की चमक अद्भुत रूप से निखरती थी।

पांचाल या विश्वकर्मा समुदाय:

पांचाल अथवा विश्वकर्मा समुदाय में सुनार, कसेरे (कांसा बनाने वाले), लोहार, बढ़ई और राजमिस्त्री शामिल थे। यह समुदाय मंदिरों के निर्माण के लिए अनिवार्य था। वे राजमहलों, बड़े भवनों, तालाबों और जलाशयों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

वस्त्र बुनकर (Salilyar & Kaikkolar):

सालियार और कैक्कोलार जैसे बुनकर समुदाय अत्यंत समृद्ध हो गए थे। वे अपने लाभ का एक बड़ा हिस्सा स्थानीय मंदिरों को दान देते थे। कपड़ा निर्माण में कपास को साफ करना, कातना और रंगना स्वतंत्र और विशिष्ट शिल्प बन गए थे।

4. ऐतिहासिक नगर केस स्टडी: हम्पी, सूरत और मसूलीपट्टनम

नगर भौगोलिक व वास्तुशिल्प विशेषता वाणिज्यिक व ऐतिहासिक महत्व
हम्पी (Hampi)
विजयनगर साम्राज्य
कृष्णा-तुंगभद्रा घाटी (कर्नाटक) में स्थित। दीवारों के निर्माण में गारे या चूने का बिल्कुल प्रयोग नहीं किया गया, बल्कि शिलाखंडों को इंटरलॉकिंग (Interlocking - खांचेदार फंसाव) तकनीक से आपस में जोड़ा गया। 15वीं-16वीं सदी में वाणिज्य और संस्कृति का केंद्र। विट्ठल मंदिर व विरुपाक्ष मंदिर। यहाँ का महानवमी डिब्बा प्रसिद्ध था जहाँ राजा दशहरा उत्सव पर सामंतों की भेंट लेता था। 1565 में तालिकोटा के युद्ध में दक्कनी सुल्तानों द्वारा विजयनगर का विनाश हुआ।
सूरत (Surat)
पश्चिम का प्रवेश द्वार
गुजरात में ताप्ती नदी पर स्थित। यह पश्चिमी एशिया के साथ व्यापार का मुख्य केंद्र तथा मक्का जाने वाले हज यात्रियों का मुख्य प्रस्थान बंदरगाह "बाबुल मक्का" (मक्का का द्वार) था। सूरत के सूती वस्त्र सुनहरी जरी (Zari) के काम के लिए विश्वप्रसिद्ध थे। हुंडी (Hundi) प्रणाली: सूरत के महाजनों/साहूकारों द्वारा जारी हुंडियों की साख मिस्र के काहिरा, इराक के बसरा और बेल्जियम के एंटवर्प तक स्वीकार की जाती थी।
मसूलीपट्टनम (Masulipatnam)
मछलीपट्टनम बंदरगाह
आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के डेल्टा पर स्थित। एक अत्यंत सक्रिय और व्यस्त बंदरगाह जहां का किला हॉलैंड (डच) के व्यापारियों ने बनवाया था। गोलकुंडा के कुतुब शाही शासकों ने व्यापार पर राज्य का एकाधिकार रखा ताकि व्यापार विदेशी कंपनियों के हाथ में न चला जाए। बाद में डच और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा हुई। 1686-87 में औरंगजेब द्वारा गोलकुंडा के विलय के बाद इसका व्यापार मंदा पड़ गया।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

हम्पी की निर्माण तकनीक
शिलाखंड + खांचेदार इंटरलॉकिंग (शून्य गारा/चूना)
विजयनगर साम्राज्य की अभेद्य किलेबंदी
हुंडी (Hundi) का वित्तीय सूत्र
साहूकार की साख पर्ची = अंतरराष्ट्रीय नकद विनिमय
काहिरा, बसरा व एंटवर्प में मान्य
दक्षिण भारतीय प्रमुख गिल्ड
मणिग्रामम + नानादेशी
चीन व दक्षिण-पूर्व एशिया तक व्यापार
बिदरी शिल्प का संयोजन
तांबा + जस्ता मिश्रधातु + चांदी के तार की जड़ावट
बीदर (कर्नाटक) की प्रसिद्ध कला
तालिकोटा का युद्ध
1565 ई. (दक्कनी सुल्तान बनाम विजयनगर)
हम्पी का पतन व विनाश

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
Q1 (आधुनिक वित्तीय तुलना): मध्यकालीन "हुंडी" (Hundi) क्या थी? यह आधुनिक बैंकिंग के किस साधन के समान थी और इसकी साख कहाँ-कहाँ स्वीकार की जाती थी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. हुंडी की परिभाषा: हुंडी एक ऐसा वित्तीय दस्तावेज या साख पत्र (Credit Note) होता था, जिसमें एक व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति को एक निश्चित धनराशि देने का लिखित वचन दर्ज होता था। व्यापारी यात्रा में नकदी ले जाने के बजाय किसी नगर के साहूकार (सर्राफ) के पास धन जमा कर हुंडी ले लेते थे, और गंतव्य नगर में जाकर वहां के साहूकार को हुंडी दिखाकर तुरंत नकदी प्राप्त कर लेते थे।
2. आधुनिक तुलना: यह आज के बैंक ड्राफ्ट (Demand Draft), चेक अथवा ट्रेवलर्स चेक के समान कार्य करती थी।
3. अंतरराष्ट्रीय साख: सूरत के सर्राफों द्वारा जारी की गई हुंडियों की इतनी मजबूत विश्वसनीयता थी कि वे भारत के बाहर मिस्र के काहिरा (Cairo), इराक के बसरा (Basra) और बेल्जियम के प्रसिद्ध यूरोपीय बाजार एंटवर्प (Antwerp) तक में बिना किसी अड़चन के स्वीकार की जाती थीं।

उदाहरण 2
Q2 (वास्तुकला तकनीक): हम्पी (विजयनगर) के नगर प्राचीरों (किले की दीवारों) के निर्माण की अनूठी विशेषता क्या थी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. शून्य गारे का प्रयोग: हम्पी के नगर प्राचीरों और किलेबंदी के निर्माण में चूने, गारे या किसी भी प्रकार के सीमेंटिंग मसाले का बिल्कुल प्रयोग नहीं किया गया था।
2. इंटरलॉकिंग तकनीक (Interlocking Method): शिल्पकारों ने पत्थरों और विशाल शिलाखंडों को इस प्रकार तराशा था कि उनके किनारों पर खांचे और उभार बने थे। एक पत्थर का उभार दूसरे पत्थर के खांचे में पूरी तरह फिट (Interlock) हो जाता था।
3. परिणाम: इस अद्भुत ज्यामितीय संयोजन के कारण दीवारें इतनी सुदृढ़ और लचीली थीं कि वे सदियों तक भूकंप, तोपों के गोलों और प्राकृतिक आपदाओं को सहने के बाद भी नहीं गिरीं।

उदाहरण 3
Q3 (व्यापारिक संगठन): मध्यकाल में दक्षिण भारत के व्यापारियों को "गिल्ड" (संघ) बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? दो प्रमुख गिल्डों के नाम लिखिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. गिल्ड बनाने की आवश्यकता: मध्यकाल में व्यापारियों को जंगलों, पहाड़ों और कई अलग-अलग राजाओं के राज्यों से होकर लंबी दूरी की यात्राएं करनी पड़ती थीं। लुटेरों और डाकुओं के हमलों से सुरक्षा, वस्तुओं के मानकीकरण, कीमतों के निर्धारण और राज्य के साथ करों पर मोलभाव करने के लिए व्यापारी मिलकर कारवां बनाते थे और व्यापारिक संघ (गिल्ड) का गठन करते थे।
2. दो प्रमुख गिल्ड:
- मणिग्रामम (Manigramam)
- नानादेशी (Nanadesi)
ये दोनों गिल्ड पूरे प्रायद्वीपीय भारत, श्रीलंका, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के साथ करोड़ों रुपयों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार करते थे।

उदाहरण 4
Q4 (शिल्प व धातु विज्ञान): कर्नाटक के बीदर में विकसित "बिदरी" (Bidri) शिल्प की निर्माण प्रक्रिया को समझाइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. मूल धातु: बीदर के शिल्पकार सबसे पहले जस्ता (Zinc) और तांबा (Copper) के मिश्रण से बर्तन, सुराही, हुक्का या डिब्बे की ढलाई करते थे।
2. नक्काशी व जड़ावट: उस धातु की सतह पर छेनी से अत्यंत बारीक और जटिल फूल-पत्तियों के खांचे उकेरे जाते थे। इसके बाद उन खांचों में शुद्ध चांदी (Silver) के पतले तार या पत्तर ठोक-ठोक कर जड़ दिए जाते थे।
3. रंगाई व चमक: अंत में वस्तु पर बीदर के पुराने किले की विशेष अमोनियम लवण वाली मिट्टी का लेप लगाया जाता था, जिससे आधार धातु पूरी तरह गहरी काली हो जाती थी जबकि चांदी के सफेद तार जगमगा उठते थे। इस मनमोहक कंट्रास्ट को बिदरी शिल्प कहा जाता है।

उदाहरण 5
Q5 (उपनिवेशवाद की जड़ें): यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों (पुर्तगाली, डच, अंग्रेज) को भारत के बाजारों की ओर किन वस्तुओं ने सर्वाधिक आकर्षित किया? इसका भारतीय बुनकरों पर क्या प्रभाव पड़ा?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. आकर्षक वस्तुएं: भारत के गर्म मसालों (विशेष रूप से काली मिर्च, लौंग, दालचीनी) और भारत के विश्वप्रसिद्ध बारीक सूती और रेशमी कपड़ों (जैसे कैलिको, मलमल, जरी) की यूरोप में भारी मांग थी। यूरोपीय व्यापारी इन वस्तुओं को सस्ते में खरीदकर यूरोप में भारी मुनाफे पर बेचते थे।
2. बुनकरों पर प्रभाव: आरंभ में भारतीय बुनकरों को भारी काम मिला। किंतु धीरे-धीरे यूरोपीय कंपनियों ने "पेशगी व्यवस्था" (Advance System / ददनी प्रथा) लागू की, जिसके तहत बुनकरों को पहले से बयाना देकर अपनी शर्तों पर कपड़ा बुनने के लिए बाध्य किया गया। इससे बुनकरों की स्वतंत्रता समाप्त हो गई और वे यूरोपीय एजेंटों (गुमाश्तों) के आर्थिक गुलाम बनकर रह गए।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

हुंडी को केवल एक स्थानीय साधारण पत्र या रसीद समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

हुंडी एक अंतरराष्ट्रीय साख पत्र (Credit Note) था, जिसकी प्रामाणिकता और वित्तीय स्वीकार्यता मिस्र के काहिरा और बेल्जियम के एंटवर्प तक मानी जाती थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

हम्पी की मजबूत दीवारों को सीमेंट या चूने के गारे से बना हुआ मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

हम्पी की किलेबंदी में किसी गारे या चूने का प्रयोग नहीं हुआ था; यह पूरी तरह पत्थरों की खांचेदार इंटरलॉकिंग (Interlocking) तकनीक पर आधारित थी।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

सूरत को केवल एक वस्त्र निर्माण केंद्र समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

सूरत वस्त्र और सुनहरी जरी के साथ-साथ पश्चिमी एशिया से व्यापार का मुख्य बंदरगाह तथा मक्का जाने वाले हज यात्रियों का प्रमुख प्रस्थान द्वार ("बाबुल मक्का") था।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

मध्यकालीन भारतीय नगरीय व व्यापारिक संजाल
तंजावुर (प्रशासन + मंदिर) ➔ मंडपिका (मंडी) व हट्ट ➔ गिल्ड (मणिग्रामम व नानादेशी) ➔ बीदर का बिदरी शिल्प ➔ हम्पी, सूरत (हुंडी) व मसूलीपट्टनम

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
मध्यकाल में नगरों को प्रशासनिक नगर, मंदिर नगर, तीर्थस्थल और व्यापारिक बंदरगाहों के रूप में वर्गीकृत किया गया।
मुख्य बिंदु 2
तंजावुर चोलों का प्रशासनिक नगर था जहाँ कुंजरमल्लन द्वारा निर्मित राजराजेश्वर मंदिर और सालिय बुनकर प्रसिद्ध थे।
मुख्य बिंदु 3
मंदिरों के आसपास दान, व्यापार और तीर्थयात्रियों के कारण मंदिर नगर (जैसे विदिशा, सोमनाथ, कांचीपुरम) विकसित हुए।
मुख्य बिंदु 4
अजमेर 12वीं सदी में चौहानों की राजधानी था और ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह व पुष्कर सरोवर का तीर्थ केंद्र बना।
मुख्य बिंदु 5
दक्षिण भारत में व्यापारियों ने अपने हितों की रक्षा हेतु "मणिग्रामम" और "नानादेशी" जैसे शक्तिशाली गिल्ड (संघ) बनाए।
मुख्य बिंदु 6
बीदर के शिल्पकार तांबे व जस्ते पर चांदी के जड़ाऊ काम के लिए विख्यात थे, जिसे "बिदरी" कहा गया।
मुख्य बिंदु 7
पांचाल या विश्वकर्मा समुदाय (लोहार, सुनार, बढ़ई, राजमिस्त्री) मंदिर व भवन निर्माण के आधारस्तंभ थे।
मुख्य बिंदु 8
हम्पी में पत्थरों को बिना गारे के खांचेदार इंटरलॉकिंग तकनीक से जोड़ा गया था; यहाँ का महानवमी डिब्बा सांस्कृतिक केंद्र था।
मुख्य बिंदु 9
सूरत को मक्का का प्रवेश द्वार (बाबुल मक्का) कहा जाता था; यहाँ की हुंडी (Hundi) मिस्र और बेल्जियम तक मान्य थी।
मुख्य बिंदु 10
मसूलीपट्टनम कृष्णा डेल्टा पर स्थित गोलकुंडा का प्रमुख बंदरगाह था जहां डच और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार किया।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
तंजावुर के राजराजेश्वर मंदिर के मुख्य वास्तुकार का क्या नाम था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: तंजावुर के राजराजेश्वर मंदिर के वास्तुकार का नाम कुंजरमल्लन राजराज पेरुंथच्चन था, जिसका नाम मंदिर की दीवार पर खुदा हुआ है।
2
दक्षिण भारत के दो सर्वाधिक प्रसिद्ध व्यापारिक संघों (गिल्ड्स) के नाम बताइए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: दक्षिण भारत के दो सर्वाधिक प्रसिद्ध व्यापारिक संघ "मणिग्रामम" (Manigramam) और "नानादेशी" (Nanadesi) थे।
3
कर्नाटक के बीदर में विकसित "बिदरी" शिल्प में किन धातुओं का प्रयोग किया जाता था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: बिदरी शिल्प में तांबे और जस्ते की मिश्रधातु पर शुद्ध चांदी (Silver) के तारों और पत्तरों की सुंदर नक्काशीदार जड़ावट की जाती थी।
4
सूरत से जारी होने वाली "हुंडी" (Hundi) किन-किन विदेशी शहरों में स्वीकार की जाती थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: सूरत के साहूकारों की हुंडी मिस्र के काहिरा (Cairo), इराक के बसरा (Basra) और बेल्जियम के एंटवर्प (Antwerp) तक के अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नकद रूप में स्वीकार की जाती थी।
5
हम्पी किस प्रसिद्ध साम्राज्य की राजधानी थी और 1565 में किस युद्ध में इसका पतन हुआ?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: हम्पी महान विजयनगर साम्राज्य की राजधानी थी। 1565 ईस्वी में "तालिकोटा के युद्ध" (राक्षसी-तांगड़ी) में दक्कनी सुल्तानों की संयुक्त सेना ने विजयनगर को पराजित कर हम्पी को नष्ट कर दिया।
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