प्रथम पद (चाँद की पोशाक):
"गोल हैं खूब मगर / आप तिरछे नज़र आते हैं ज़रा / आप पहने हुए हैं कुल आकाश / तारों जड़ा / सिर्फ़ मुँह खोले हुए हैं अपना / गोरा-चिट्टा / गोल-मटोल..."
व्याख्या: बालिका चाँद से कहती है कि यद्यपि आप दिखने में बिल्कुल गोल हैं, फिर भी न जाने क्यों थोड़े तिरछे दिखाई पड़ते हैं। उसने कल्पना की कि संपूर्ण नीला आकाश तारों से जड़ा हुआ चाँद का विशाल वस्त्र (पोशाक) है, जिसे उसने चारों दिशाओं में फैला रखा है। उस नीले, तारों भरे लबादे में से चाँद ने केवल अपना गोरा-चिट्टा, गोल-मटोल चेहरा ही बाहर निकाल रखा है।
द्वितीय पद (विचित्र बीमारी का आरोप):
"अपनी पोशाक को फैलाए हुए चारों सिम्त / आप कुछ तिरछे नज़र आते हैं जाने कैसे / खूब हैं गोकि! / वाह जी वाह! / हमको बुद्धू ही निरा समझा है! / हम समझते ही नहीं जैसे कि / आपको बीमारी है..."
व्याख्या: लड़की कहती है कि आप हमें मूर्ख मत समझिए! हम आपकी चालाकी अच्छी तरह समझते हैं। आपको घटने-बढ़ने की एक असाध्य बीमारी है:
- जब आप घटने लगते हैं, तो घटते ही चले जाते हैं (कृष्ण पक्ष में अमावस्या तक)।
- और जब आप बढ़ने लगते हैं, तो तब तक बढ़ते रहते हैं जब तक कि बिल्कुल गोल न हो जाएँ (शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा तक)।
- आपकी यह बीमारी कभी ठीक होने का नाम ही नहीं लेती (यह मरज़ आपका अच्छा ही नहीं होने को आता)!