प्रथम पद (एकता और श्रम का सामर्थ्य):
"साथी हाथ बढ़ाना / एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना / साथी हाथ बढ़ाना। / हम मेहनतवालों ने जब भी मिलकर कदम बढ़ाया / सागर ने रस्ता छोड़ा, परबत ने सीस झुकाया / फ़ौलादी हैं सीने अपने, फ़ौलादी हैं बाँहें / हम चाहें तो चट्टानों में पैदा कर दें राहें..."
व्याख्या: कवि देशवासियों और श्रमिकों से परस्पर सहयोग का आह्वान करते हैं। यदि कोई अकेला व्यक्ति भारी कार्य करेगा तो वह शीघ्र थक जाएगा, इसलिए मिलकर बोझ उठाना चाहिए। जब-जब श्रमजीवियों ने संगठित होकर कदम बढ़ाया है, तब-तब समुद्र ने भी उनके लिए मार्ग छोड़ दिया और दुर्गम पर्वतों ने भी उनके आगे अपना मस्तक झुका दिया। हमारे सीने और भुजाएँ फौलाद (लोहे) के समान मजबूत हैं; यदि हम संकल्प कर लें तो कठोर चट्टानों को काटकर भी नई राहें निकाल सकते हैं।
द्वितीय पद (श्रम की गरिमा और साझी मंजिल):
"मेहनत अपने लेख की रेखा, मेहनत से क्या डरना / कल गैरों की खातिर की, आज अपनी खातिर करना / अपना दुख भी एक है साथी, अपना सुख भी एक / अपनी मंज़िल सच की मंज़िल, अपना रस्ता नेक..."
व्याख्या: कवि कहते हैं कि मेहनत तो हमारे भाग्य की रेखा है, फिर उससे भयभीत क्यों होना? गुलामी के दिनों में हमने विदेशी हुक्मरानों (गैरों/अंग्रेजों) के लिए खून-पसीना बहाया, अब स्वतंत्र भारत में हमें अपने देश की उन्नति के लिए परिश्रम करना है। सभी मेहनत करने वालों का सुख-दुख साझा है। हमारी मंजिल सच्चाई की मंजिल है और हमारा रास्ता भलाई (नेक) का रास्ता है।
तृतीय पद (संगठन और एकता के चमत्कारिक दृष्टांत):
"एक से एक मिले तो क़तरा बन जाता है दरिया / एक से एक मिले तो ज़र्रा बन जाता है सेहरा / एक से एक मिले तो राई बन सकती है परबत / एक से एक मिले तो इंसाँ बस में कर ले क़िस्मत / साथी हाथ बढ़ाना।"
व्याख्या: कवि संगठन की अपार शक्ति को चार सुंदर दृष्टांतों से स्पष्ट करते हैं:
- जल की एक-एक बूँद (क़तरा) मिलकर विशाल नदी (दरिया) बन जाती है।
- रेत का एक-एक बारीक कण (ज़र्रा) मिलकर विस्तृत रेगिस्तान (सेहरा) बन जाता है।
- सरसों का छोटा सा दाना (राई) एकत्र होकर विशाल पर्वत का रूप ले सकता है।
- ठीक इसी प्रकार, यदि इंसान (मनुष्य) एक-दूसरे से मिल जाएँ और एकजुट हो जाएँ, तो वे अपनी तकदीर को भी अपने वश में कर सकते हैं।