प्रथम पद (माँ की गोदी और अंचल का सुख):
"मैं सबसे छोटी होऊँ / तेरी गोदी में सोऊँ / तेरा अंचल पकड़-पकड़ कर / फिरूँ सदा माँ! तेरे साथ / कभी न छोड़ूँ तेरा हाथ!"
व्याख्या: नन्हीं बालिका कामना करती है कि हे माँ! मैं घर में सबसे छोटी संतान बनी रहूँ ताकि मुझे सदैव तेरी ममतामयी गोदी में सोने का सुख मिले। मैं तेरा आंचल पकड़कर दिन-रात तेरे पीछे-पीछे घूमती रहूँ और कभी भी तेरा हाथ न छोड़ूँ।
द्वितीय पद (बड़ा बनाकर छलने का आरोप):
"बड़ा बना कर पहले हमको / तू पीछे छलती है मात! / हाथ पकड़ फिर सदा हमारे / साथ नहीं फिरती दिन-रात! / अपने कर से खिला, धुला मुख / धूल पोंछ, सज्जित कर गात / थमा खिलौने, नहीं सुनाती / हमें सुखद परियों की बात!"
व्याख्या: बालिका माँ पर मीठा उलाहना देती है कि तू हमें पाल-पोसकर पहले बड़ा कर देती है और फिर हमारे साथ छल करती है! जब हम बड़े हो जाते हैं, तो तू दिन-रात हमारा हाथ पकड़कर हमारे साथ नहीं घूमती। तू अपने हाथों (कर) से हमें खाना नहीं खिलाती, मुँह नहीं धोती और न ही हमारा श्रृंगार करती है। तू हमें खिलौने थमाकर बहला देती है और पहले की तरह परियों की मीठी कहानियाँ नहीं सुनाती!
तृतीय पद (निष्कपट और निर्भय बचपन की चाह):
"ऐसी बड़ी न होऊँ मैं / तेरा स्नेह न खोऊँ मैं / तेरे अंचल की छाया में / छिपी रहूँ निष्काम, निर्भय / कहूँ—दिखा दे चंद्रोदय!"
व्याख्या: बालिका दृढ़ता से कहती है कि मुझे ऐसा 'बड़ा' बनना बिल्कुल स्वीकार नहीं है, जिससे मुझे तेरी ममता और अगाध स्नेह से वंचित होना पड़े। मैं तो केवल तेरे आंचल की शीतल छाया में बिना किसी स्वार्थ (निष्काम) और बिना किसी डर (निर्भय) के सदा सुरक्षित छिपी रहना चाहती हूँ और तेरे साथ बैठकर आकाश में सुंदर चंद्रोदय (चाँद का निकलना) देखना चाहती हूँ।