प्राचीन काल में ज्यामिति का विकास विभिन्न संस्कृतियों में हुआ:
- मिस्र और बेबीलोनिया: यहाँ ज्यामिति का उपयोग मुख्यतः व्यावहारिक समस्याओं (खेतों का क्षेत्रफल, अन्नागारों का आयतन, पिरामिडों का निर्माण) तक सीमित था। वे बिना किसी औपचारिक उपपत्ति के सूत्रों का उपयोग करते थे।
- प्राचीन भारत (वैदिक काल): शुल्ब सूत्र (ईसा पूर्व 800–500) ज्यामितीय रचनाओं के विशाल भंडार थे। वेदियों के निर्माण में जटिल आकृतियों के समान क्षेत्रफल वाले रूपांतरण (जैसे वर्ग को वृत्त में बदलना) किए जाते थे। 'शुल्ब' का अर्थ 'रस्सी या डोरी' होता है।
- यूनान (ग्रीस): यूनानी गणितज्ञों ने इस बात पर बल दिया कि ज्यामितीय कथन केवल व्यावहारिक प्रेक्षणों पर आधारित नहीं होने चाहिए, बल्कि उन्हें तर्कसंगत उपपत्ति (Deductive Proof) द्वारा सिद्ध किया जाना चाहिए। थेल्स (Thales) पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पहली ज्ञात उपपत्ति दी (कि वृत्त का व्यास वृत्त को दो बराबर भागों में समद्विभाजित करता है)। उनके शिष्य पाइथागोरस और उनके साथियों ने ज्यामिति को दर्शन का रूप दिया।
यूक्लिड ने ठोस (Solid) से प्रारंभ करके तल, रेखा और अंत में बिंदु तक पहुँचने की प्रक्रिया को इस प्रकार परिभाषित किया:
- बिंदु (Point): एक बिंदु वह है जिसका कोई भाग नहीं होता (अर्थात् जिसकी कोई लंबाई, चौड़ाई या मोटाई नहीं होती; विमा = 0)।
- रेखा (Line): एक रेखा चौड़ाई-रहित लंबाई होती है (अर्थात् केवल लंबाई होती है; विमा = 1)।
- रेखा के सिरे: एक रेखा के सिरे बिंदु होते हैं।
- सीधी रेखा: एक सीधी रेखा वह रेखा है जो स्वयं पर बिंदुओं के साथ सपाट रूप से स्थित होती है।
- पृष्ठ (Surface): एक पृष्ठ वह है जिसकी केवल लंबाई और चौड़ाई होती है (विमा = 2)।
- पृष्ठ के किनारे: पृष्ठ के किनारे रेखाएँ होती हैं।
- समतल पृष्ठ (Plane Surface): एक समतल पृष्ठ वह पृष्ठ है जो स्वयं पर सीधी रेखाओं के साथ सपाट रूप से स्थित होता है।
आधुनिक गणितीय दृष्टिकोण: आज के गणितज्ञ "बिंदु", "रेखा" और "समतल" को औपचारिक रूप से अपरिभाषित पद (Undefined Terms) मानते हैं, क्योंकि इनकी किसी भी परिभाषा में अन्य अस्पष्ट शब्दों (जैसे 'चौड़ाई-रहित' या 'भाग') का सहारा लेना पड़ता है।