दिल्ली पहली बार 12वीं सदी में तोमर राजपूतों के अधीन एक साम्राज्य की राजधानी बनी। तोमरों को अजमेर के चौहानों (चाहमान) ने परास्त किया। तोमरों और चौहानों के शासनकाल में ही दिल्ली एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक केंद्र बना, जहाँ धनी जैन व्यापारी रहते थे और उन्होंने अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण कराया। यहाँ "देहलीवाल" नाम से प्रसिद्ध सिक्के ढाले जाते थे जो दूर-दूर तक प्रचलन में थे।
तवारीख (इतिहास) के लेखक एवं उनकी सीमाएं:
सल्तनत काल के इतिहास की जानकारी का सबसे बड़ा लिखित स्रोत तवारीख (एकवचन: तारीख) है, जो सुल्तानों की प्रशासनिक भाषा फारसी (Persian) में लिखी गई थी:
- तवारीख के लेखक सचिव, प्रशासक, कवि और दरबारी जैसे सुशिक्षित व्यक्ति होते थे, जो घटनाओं का विवरण लिखते थे और शासकों को सुशासन की सलाह देते थे।
- तवारीख की सीमाएं: ये लेखक मुख्य रूप से दिल्ली जैसे बड़े शहरों में रहते थे, गांवों के जीवन से अनजान थे। वे सुल्तानों से भारी पुरस्कार और जागीरें पाने की आशा में उनका इतिहास लिखते थे, तथा वे "जन्मसिद्ध अधिकार" और "लिंगभेद" पर आधारित आदर्श समाज व्यवस्था बनाए रखने के पक्षधर थे।
"राजा सैनिकों के बिना नहीं जी सकता ➔ सैनिक वेतन के बिना नहीं जी सकते ➔ वेतन किसानों से एकत्र राजस्व से आता है ➔ किसान राजस्व तभी चुका सकते हैं जब वे समृद्ध और प्रसन्न हों ➔ और यह तभी संभव है जब राजा न्याय और ईमानदार प्रशासन को बढ़ावा दे।"
रजिया सुल्तान (1236-1240 ई.):
1236 ईस्वी में सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश की बेटी रजिया दिल्ली की गद्दी पर बैठी। उस समय के इतिहासकार मिन्हाज-उस-सिराज ने स्वीकार किया कि वह अपने सभी भाइयों से अधिक योग्य और सक्षम थी, किंतु वह एक रानी को शासक के रूप में स्वीकार नहीं कर पा रहा था। दरबारी अमीर भी एक स्वतंत्र महिला के शासन से नाराज थे, जिसके कारण 1240 ई. में उसे सिंहासन से हटा दिया गया।