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झारखण्ड बोर्ड (JAC) • कक्षा 7 • Social Science • अध्याय 3
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

दिल्ली के सुल्तान (The Delhi Sultans)

कक्षा 7 इतिहास का यह अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय "दिल्ली के सुल्तान" (The Delhi Sultans) 12वीं से 16वीं सदी के उस ऐतिहासिक कालखंड का गहन विश्लेषण करता है, जब दिल्ली एक छोटे व्यापारिक केंद्र से उभरकर एक विशाल उपमहाद्वीपीय साम्राज्य की राजधानी बनी। इस अध्याय में तोमर व चौहान राजपूतों के काल से लेकर मामलूक (गुलाम), खिलजी, तुगलक, सैयद और लोदी वंशों के शासनकाल, गैरिसन शहर से साम्राज्य विस्तार, इक्ता व मुक्ति प्रणाली, रजिया सुल्तान की ऐतिहासिक भूमिका, अलाउद्दीन खिलजी की बाजार नीति तथा मुहम्मद बिन तुगलक की महत्वाकांक्षी प्रशासनिक योजनाओं का प्रामाणिक व परीक्षा-उपयोगी अध्ययन कराया गया है।

🏰 क्या आपने कभी सोचा है?

⚔️ 12वीं सदी से पहले दिल्ली कभी किसी बड़े साम्राज्य की राजधानी नहीं थी — फिर यह पूरे उपमहाद्वीप का हृदय कैसे बन गई?

कल्पना कीजिए उस दौर की जब 1236 ईस्वी में पूरे विश्व में महिलाओं को कोई राजनीतिक अधिकार नहीं थे, तब दिल्ली के तख्त पर एक निडर महिला सुल्तान "रजिया" ने मर्दों की पोशाक पहनकर हुकूमत की! सुल्तानों ने गंगा-यमुना के घने जंगलों को कटवाकर अभेद्य गैरिसन शहरों का निर्माण किया और केवल घोड़ों व हाथियों की सेना के दम पर काबुल से लेकर सुदूर तमिलनाडु के रामेश्वरम तक अपना दबदबा कायम किया।

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

यह अध्याय समझने में मदद करता है कि आधुनिक भारत की राष्ट्रीय राजधानी "दिल्ली" की प्रशासनिक और भौगोलिक महत्ता की नींव कैसे पड़ी। इक्ता व्यवस्था, भू-राजस्व निर्धारण (खराज) और बाजार नियंत्रण के जो सिद्धांत अलाउद्दीन खिलजी और शेरशाह सूरी ने लागू किए, वे आगे चलकर मुगल साम्राज्य और आधुनिक भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के आधार बने।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • सामंत व्यवस्था और 7वीं से 12वीं सदी के क्षेत्रीय राजवंशों की आधारभूत समझ।
  • भारत की भौगोलिक स्थिति तथा गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र का आर्थिक महत्व।
  • मध्यकालीन ऐतिहासिक स्रोतों (तवारीख/इतिहास, शिलालेख, सिक्के व स्थापत्य) का सामान्य ज्ञान।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • दिल्ली को राजधानी बनाने वाले प्रथम शासकों (तोमर व चौहान) एवं देहलीवाल सिक्कों को समझना।
  • दिल्ली सल्तनत के पाँचों प्रमुख राजवंशों के क्रमिक इतिहास व कालक्रम का विश्लेषण करना।
  • तवारीख (Tawarikh) के लेखकों, उनके दृष्टिकोण तथा "न्याय-चक्र" (Circle of Justice) की अवधारणा को जानना।
  • गैरिसन शहर (Garrison Town) की सीमाओं के आंतरिक व बाह्य विस्तार की प्रक्रियाओं का परीक्षण करना।
  • इक्ता (Iqta), मुक्ति/इक्तादार, खराज (Khiraj) और बंदगान (Bandagan) की प्रशासनिक भूमिका का मूल्यांकन करना।
  • अलाउद्दीन खिलजी और मुहम्मद बिन तुगलक के मंगोल आक्रमणों से निपटने के प्रशासनिक तरीकों की तुलना करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. दिल्ली की पृष्ठभूमि, तवारीख के ल...
2 2. गैरिसन शहर से साम्राज्य विस्तार:...
3 3. खिलजी और तुगलक कालीन प्रशासन: इक...
4 4. तुलनात्मक अध्ययन: अलाउद्दीन खिलज...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. दिल्ली की पृष्ठभूमि, तवारीख के लेखक एवं न्याय-चक्र

दिल्ली पहली बार 12वीं सदी में तोमर राजपूतों के अधीन एक साम्राज्य की राजधानी बनी। तोमरों को अजमेर के चौहानों (चाहमान) ने परास्त किया। तोमरों और चौहानों के शासनकाल में ही दिल्ली एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक केंद्र बना, जहाँ धनी जैन व्यापारी रहते थे और उन्होंने अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण कराया। यहाँ "देहलीवाल" नाम से प्रसिद्ध सिक्के ढाले जाते थे जो दूर-दूर तक प्रचलन में थे।

तवारीख (इतिहास) के लेखक एवं उनकी सीमाएं:

सल्तनत काल के इतिहास की जानकारी का सबसे बड़ा लिखित स्रोत तवारीख (एकवचन: तारीख) है, जो सुल्तानों की प्रशासनिक भाषा फारसी (Persian) में लिखी गई थी:

  • तवारीख के लेखक सचिव, प्रशासक, कवि और दरबारी जैसे सुशिक्षित व्यक्ति होते थे, जो घटनाओं का विवरण लिखते थे और शासकों को सुशासन की सलाह देते थे।
  • तवारीख की सीमाएं: ये लेखक मुख्य रूप से दिल्ली जैसे बड़े शहरों में रहते थे, गांवों के जीवन से अनजान थे। वे सुल्तानों से भारी पुरस्कार और जागीरें पाने की आशा में उनका इतिहास लिखते थे, तथा वे "जन्मसिद्ध अधिकार" और "लिंगभेद" पर आधारित आदर्श समाज व्यवस्था बनाए रखने के पक्षधर थे।
न्याय-चक्र (The Circle of Justice): 13वीं सदी के इतिहासकार फख्र-ए-मुदब्बिर ने न्याय-चक्र का अद्भुत सिद्धांत दिया:
"राजा सैनिकों के बिना नहीं जी सकता ➔ सैनिक वेतन के बिना नहीं जी सकते ➔ वेतन किसानों से एकत्र राजस्व से आता है ➔ किसान राजस्व तभी चुका सकते हैं जब वे समृद्ध और प्रसन्न हों ➔ और यह तभी संभव है जब राजा न्याय और ईमानदार प्रशासन को बढ़ावा दे।"
रजिया सुल्तान (1236-1240 ई.):

1236 ईस्वी में सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश की बेटी रजिया दिल्ली की गद्दी पर बैठी। उस समय के इतिहासकार मिन्हाज-उस-सिराज ने स्वीकार किया कि वह अपने सभी भाइयों से अधिक योग्य और सक्षम थी, किंतु वह एक रानी को शासक के रूप में स्वीकार नहीं कर पा रहा था। दरबारी अमीर भी एक स्वतंत्र महिला के शासन से नाराज थे, जिसके कारण 1240 ई. में उसे सिंहासन से हटा दिया गया।

2. गैरिसन शहर से साम्राज्य विस्तार: आंतरिक व बाह्य सीमा

13वीं सदी के आरंभिक वर्षों में दिल्ली के सुल्तानों का शासन केवल गैरिसन शहरों (Garrison Towns) यानी रक्षकों और सैनिकों की छावनियों तक ही सीमित था। वे अपने शहरों के भीतरी प्रदेश (Hinterland) यानी आसपास के उन ग्रामीण इलाकों पर निर्भर थे जो शहरों को वस्तुओं और रसद की आपूर्ति करते थे। सुल्तानों का साम्राज्य विस्तार दो चरणों में संपन्न हुआ:

(A) आंतरिक सीमा का अभियान (दोआब)

गंगा-यमुना के उपजाऊ दोआब के जंगलों को कटवाकर साफ कराया गया और शिकारी-संग्राहकों व चरवाहों को खदेड़ दिया गया। वह जमीन किसानों को दी गई ताकि कृषि को बढ़ावा मिले और राजस्व बढ़े। व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय व्यापार की निगरानी के लिए नए किले और गैरिसन शहर स्थापित किए गए।

(B) बाह्य सीमा का अभियान (दक्षिण भारत)

सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में दिल्ली की सेनाओं ने सुदूर दक्षिण भारत पर आक्रमण शुरू किए, जिनका नेतृत्व उसके सेनापति मलिक काफूर ने किया। ये सैन्य अभियान मुहम्मद बिन तुगलक के समय अपनी चरम सीमा पर पहुँचे। इन अभियानों में सेना ने अपार हाथी, घोड़े, सोना और गुलाम युद्ध लूट के रूप में हासिल किए।

मस्जिद और किबला (इस्लामी स्थापत्य):

सुल्तानों ने कई शहरों में मस्जिदें बनवाईं जिससे मुसलमानों में एक समुदाय से जुड़े होने का भाव उत्पन्न हुआ:

  • मस्जिद-ए-जामी: वह प्रमुख मस्जिद जहाँ सारे मुसलमान इकट्ठा होकर शुक्रवार की सामूहिक नमाज पढ़ते हैं।
  • खुतबा: शुक्रवार की नमाज के समय पेश इमाम द्वारा दिया जाने वाला धार्मिक और राजनीतिक उपदेश, जिसमें वर्तमान सुल्तान के नाम की घोषणा की जाती थी।
  • किबला (Qibla): नमाज के दौरान मक्का की ओर मुंह करके खड़े होने की दिशा। भारत में मक्का पश्चिम दिशा में पड़ता है, अतः नमाज की दिशा को किबला कहा जाता है।

3. खिलजी और तुगलक कालीन प्रशासन: इक्ता, मुक्ति एवं बंदगान

बंदगान (सैन्य गुलाम):

इल्तुतमिश जैसे आरंभिक तुर्क सुल्तान सामंतों और रईसों के स्थान पर सैन्य सेवा हेतु खरीदे गए अपने विशेष गुलामों पर अधिक विश्वास करते थे, जिन्हें फारसी में बंदगान (Bandagan) कहा जाता था। चूंकि वे पूर्णतः अपने सुल्तान की कृपा पर आश्रित थे, इसलिए सुल्तान उन पर आंख मूंदकर भरोसा कर सकता था। खिलजी और तुगलक शासकों ने भी बंदगान और निम्न वर्ग के लोगों को ऊंचे राजनीतिक पदों पर बैठाया।

इक्ता (Iqta) और मुक्ति (Muqti):

साम्राज्य के विभिन्न आकार के इलाकों को सैन्य अधिकारियों को जागीर के रूप में सौंपा जाता था, जिसे इक्ता कहा जाता था और उस क्षेत्र के धारक को इक्तादार या मुक्ति कहा जाता था:

  • मुक्ति के कर्तव्य: अपने क्षेत्र में कानून व व्यवस्था बनाए रखना, सैन्य अभियानों का नेतृत्व करना, और अपने इक्ता से भू-राजस्व वसूलना।
  • वेतन: मुक्ति उसी वसूले गए राजस्व से अपना खर्च और अपने सैनिकों का वेतन चुकाते थे।
  • नियंत्रण के कठोर नियम: मुक्ति का पद वंशानुगत नहीं होता था। उन्हें थोड़े-थोड़े समय बाद एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में स्थानांतरित किया जाता था। सुल्तान द्वारा लेखाकार (Accountants) नियुक्त किए जाते थे जो यह जांचते थे कि मुक्ति केवल राज्य द्वारा निर्धारित कर ही वसूल रहा है और तय संख्या में सैनिक रख रहा है।
सल्तनत काल के तीन प्रमुख कर:
  1. खराज (Kharaj): कृषि उपज पर लगने वाला कर, जो किसान की कुल उपज का लगभग 50 प्रतिशत होता था।
  2. मवेशियों पर कर: दुधारू पशुओं और झुंडों पर लिया जाने वाला कर।
  3. घरों पर कर: रिहायशी मकानों पर लगने वाला कर।

4. तुलनात्मक अध्ययन: अलाउद्दीन खिलजी बनाम मुहम्मद बिन तुगलक

13वीं सदी के अंत और 14वीं सदी के आरंभ में चंगेज खान के नेतृत्व में ट्रांसऑक्सियाना (मध्य एशिया) से मंगोलों ने दिल्ली पर भयंकर आक्रमण किए। दोनों सुल्तानों ने मंगोल चुनौती का सामना अलग-अलग प्रशासनिक रणनीतियों से किया:

मापदंड सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक
रणनीति का स्वरूप रक्षात्मक (Defensive): उसने दिल्ली की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी और हमलों को सफलतापूर्वक विफल किया। आक्रामक (Offensive): उसने मंगोल सेना को हराने के बाद ट्रांसऑक्सियाना पर आक्रमण (खुरासान अभियान) की योजना बनाई।
सैनिक गैरिसन अपने सैनिकों के लिए "सीरी" (Siri) नामक एक सर्वथा नया गैरिसन शहर बनवाया। नया शहर नहीं बनवाया, बल्कि दिल्ली के पुराने शहर (देहली-ए-कुहना) से जनता को दौलताबाद भेजकर सैनिकों की छावनी बना दिया।
सैनिक वेतन व मूल्य नियंत्रण सैनिकों को नकद वेतन दिया। व्यापारी कीमतें न बढ़ाएं, इसलिए उसने दिल्ली में दैनिक वस्तुओं, अनाज, कपड़े और मवेशियों की कीमतों पर सख्त नियंत्रण लागू किया और उल्लंघन पर कठोर दंड दिया। सैनिकों को नकद वेतन दिया, किंतु कीमतों पर नियंत्रण रखने के बजाय "सांकेतिक मुद्रा" (Token Currency) चलाई जो सस्ते पीतल व तांबे की धातु से बनी थी। लोगों ने जाली सिक्के ढाल लिए जिससे भारी आर्थिक संकट आया।
योजनाओं का परिणाम इतिहासकार उसकी प्रशासनिक व मूल्य नियंत्रण नीतियों की अत्यधिक प्रशंसा करते हैं क्योंकि सेना सस्ती दरों पर संतुष्ट रही और मंगोल आक्रमण रुके। उसकी योजनाएं पूर्णतः विफल रहीं: कश्मीर अभियान में सेना नष्ट हुई, सांकेतिक मुद्रा वापस लेनी पड़ी, और दौलताबाद से जनता को पुनः दिल्ली लौटना पड़ा जिससे व्यापक असंतोष फैला।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शब्दावली, कालक्रम एवं प्रशासनिक व्यवस्था

दिल्ली सल्तनत के 5 राजवंश
गुलाम (1206) → खिलजी (1290) → तुगलक (1320) → सैयद (1414) → लोदी (1451-1526)
कुल 320 वर्षों का शासन काल
न्याय-चक्र का केंद्र
प्रसन्न किसान ➔ नियमित राजस्व ➔ वेतनभोगी सेना ➔ सुरक्षित राज्य
फख्र-ए-मुदब्बिर का राजनीतिक दर्शन
खराज (Kharaj) की दर
कृषि उपज का 50% (आधा भाग)
अलाउद्दीन खिलजी द्वारा कठोरता से लागू
सल्तनत की प्रशासनिक त्रयी
इक्ता (भू-क्षेत्र) ➔ मुक्ति/इक्तादार (प्रशासक) ➔ खराज (राजस्व)
अहस्तांतरणीय एवं गैर-वंशानुगत पद
पानीपत का प्रथम युद्ध
1526 ई. (बाबर बनाम इब्राहिम लोदी)
दिल्ली सल्तनत का अंत व मुगल साम्राज्य का उदय

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
Q1 (अवधारणात्मक व्याख्या): "गैरिसन शहर" (Garrison Town) और "भीतरी प्रदेश" (Hinterland) में क्या अंतर है? आरंभिक सुल्तानों के लिए इन पर नियंत्रण रखना क्यों कठिन था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. गैरिसन शहर: यह किलेबंद बसावट होती थी जहाँ सैनिकों और रक्षकों की टुकड़ियाँ हथियारों के साथ तैनात रहती थीं।
2. भीतरी प्रदेश (Hinterland): किसी शहर या बंदरगाह के आसपास का वह ग्रामीण भूभाग जो शहर को भोजन, कच्चा माल और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की आपूर्ति करता है।
3. नियंत्रण की कठिनाई: आरंभ में सुल्तानों का नियंत्रण केवल गैरिसन किलों के भीतर था, भीतरी ग्रामीण इलाकों पर उनका सीधा शासन नहीं था। अत: उन्हें आवश्यक रसद और कर के लिए व्यापार, लूटमार या स्थानीय सामंतों पर निर्भर रहना पड़ता था। दूरस्थ बंगाल और सिंध जैसे गैरिसन शहरों से खराब मौसम और बगावत के कारण दिल्ली का संपर्क टूट जाता था।

उदाहरण 2
Q2 (ऐतिहासिक विश्लेषण - लैंगिक पूर्वाग्रह): मिन्हाज-उस-सिराज ने रजिया सुल्तान की योग्यता स्वीकार करते हुए भी उसके शासन का विरोध क्यों किया? तत्कालीन समाज में महिला शासक को लेकर क्या दृष्टिकोण था?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. मिन्हाज-उस-सिराज का दृष्टिकोण: इतिहासकार मिन्हाज ने लिखा कि रजिया अपने सभी भाइयों की तुलना में कहीं अधिक योग्य, पराक्रमी और बुद्धिमान थी। किंतु उसका मानना था कि ईश्वर द्वारा बनाई गई आदर्श सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं को पुरुषों के अधीन होना चाहिए। उसके अनुसार रानी का शासक बनना ईश्वर के नियमों के विपरीत था।
2. दरबारी अमीरों का विरोध: तुर्क अमीर और सेनापति एक स्वतंत्र शासिका के अधीन काम करने को अपनी मानहानि समझते थे। रजिया द्वारा मर्दाना पोशाक (कुबा और कुलाह) पहनकर दरबार में बैठना और बिना पर्दे के युद्ध में जाना अमीरों को स्वीकार नहीं हुआ, जिसके परिणामस्वरूप मात्र 4 वर्षों (1236-1240) में षड्यंत्र रचकर उसे पदच्युत कर दिया गया।

उदाहरण 3
Q3 (प्रशासनिक संरचना): सुल्तानों द्वारा नियुक्त "मुक्ति" (Muqti) के क्या अधिकार व कर्तव्य थे? सुल्तानों ने मुुक्तियों पर कड़ा नियंत्रण रखने के लिए कौन-से उपाय किए?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. मुक्ति के कर्तव्य: अपने इक्ता (क्षेत्र) में कानून और व्यवस्था बनाए रखना, आवश्यकता पड़ने पर सुल्तान को सैन्य सहायता देना, और अपने इलाके के किसानों व व्यापारियों से तयशुदा राजस्व वसूल करना। इसी राजस्व से वे अपना और अपनी सेना का खर्च चलाते थे।
2. कड़े नियंत्रण के उपाय:
- मुक्ति का पद वंशानुगत नहीं था; उनके पुत्र अपने आप मुक्ति नहीं बन सकते थे।
- किसी भी मुक्ति को एक इक्ता में लंबे समय तक नहीं रहने दिया जाता था, बल्कि उनका बार-बार स्थानांतरण (Transfer) किया जाता था।
- राज्य द्वारा लेखाकार (Accountants) भेजे जाते थे जो जांच करते थे कि मुक्ति केवल निर्धारित दर पर कर वसूल रहा है और सैनिकों की तय संख्या का सही रखरखाव कर रहा है।

उदाहरण 4
Q4 (आर्थिक नीति समीक्षा): अलाउद्दीन खिलजी की "बाजार नियंत्रण नीति" (Market Control Policy) का मुख्य उद्देश्य क्या था और उसने इसे कैसे क्रियान्वित किया?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. मुख्य उद्देश्य: मंगोल आक्रमणों के लगातार खतरे के कारण अलाउद्दीन को दिल्ली में एक विशाल स्थायी सेना रखनी पड़ती थी। यदि वह सैनिकों को बहुत अधिक वेतन देता तो राजकोष खाली हो जाता। अतः उसने सैनिकों के जीवन-यापन का खर्च कम रखने के लिए दिल्ली में दैनिक आवश्यकताओं की सभी वस्तुओं के दाम तय कर दिए।
2. क्रियान्वयन के कदम:
- अनाज, शक्कर, कपड़े, घी, मवेशी और घोड़ों तक के निश्चित मूल्य तय कर दिए गए।
- बाजार की निगरानी के लिए शहना (Shahna/दरोगा) नामक सख्त अधिकारी और गुप्तचर (बरीद) नियुक्त किए गए।
- जमाखोरी करने या कम तोलने वाले दुकानदारों को कठोर शारीरिक दंड (जितना वजन कम तौला, उतना शरीर से मांस काट लेने का नियम) दिया जाता था।

उदाहरण 5
Q5 (योजनाओं की विफलता): मुहम्मद बिन तुगलक की "सांकेतिक मुद्रा" (Token Currency) परियोजना क्यों विफल हुई? इससे सल्तनत की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा?
विस्तृत समाधान / उत्तर:

उत्तर:
1. सांकेतिक मुद्रा का विचार: आधुनिक कागजी नोटों की तरह मुहम्मद बिन तुगलक ने 14वीं सदी में सोने और चांदी के सिक्कों के स्थान पर तांबे और पीतल की सस्ती धातुओं के सांकेतिक सिक्के चलाए, जिनका मूल्य चांदी के सिक्के (टके) के बराबर घोषित किया गया।
2. विफलता के कारण: उस समय टकसालों पर शाही नियंत्रण का कोई सुरक्षा मार्क या जटिल तकनीक नहीं थी। लोगों ने अपने घरों में ही तांबे-पीतल से जाली सिक्के ढालने शुरू कर दिए। लोग अपने सोने-चांदी के सिक्के बचाकर घर में रख लेते थे और राज्य का सारा लगान व व्यापार जाली सांकेतिक सिक्कों से चुकाने लगे।
3. परिणाम: विदेशी व्यापारियों ने सांकेतिक मुद्रा लेने से इनकार कर दिया। सुल्तान को यह योजना वापस लेनी पड़ी और राजकोष से जाली सिक्कों के बदले असली सोने-चांदी के सिक्के देने पड़े, जिससे शाही खजाना पूरी तरह खाली हो गया।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

इक्ता (Iqta) को किसी सामंत या जमींदार की स्थायी निजी पैतृक संपत्ति समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

इक्ता कोई निजी संपत्ति नहीं थी; यह राजस्व एकत्र करने और सैन्य सेवा के बदले दिया गया अस्थायी प्रशासनिक क्षेत्र था, जिसे सुल्तान कभी भी वापस ले सकता था या बदल सकता था।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

अलाउद्दीन खिलजी और मुहम्मद बिन तुगलक दोनों की मंगोल नीतियों को एक समान मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

अलाउद्दीन की नीति विशुद्ध रूप से रक्षात्मक (Defensive) थी जिसने गैरिसन और मूल्य नियंत्रण से सुरक्षा की; जबकि तुगलक की नीति आक्रामक (Offensive) थी जिसने खुरासान पर चढ़ाई की योजना बनाई।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

रजिया सुल्तान के पतन का कारण केवल उसकी सैन्य या प्रशासनिक कमजोरी मानना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

मिन्हाज-उस-सिराज के अनुसार रजिया अत्यंत योग्य प्रशासक थी, उसके पतन का मुख्य कारण तत्कालीन पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था और तुर्क अमीरों द्वारा एक स्वतंत्र महिला का आधिपत्य स्वीकार न करना था।

चित्रात्मक व्याख्या एवं मॉडल

दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक व विस्तार रूपरेखा (1206-1526 ई.)
तोमर व चौहान (देहलीवाल सिक्के) ➔ गुलाम वंश (रजिया व बंदगान) ➔ खिलजी विस्तार (सीरी व बाजार नियंत्रण) ➔ तुगलक प्रयोग (दौलताबाद व सांकेतिक मुद्रा) ➔ लोदी वंश (1526 पानीपत का युद्ध)

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
दिल्ली 12वीं सदी में तोमर राजपूतों और बाद में अजमेर के चौहानों के अधीन पहली बार एक साम्राज्य की राजधानी बनी।
मुख्य बिंदु 2
तवारीख के लेखक फारसी में सुल्तानों के लिए इतिहास लिखते थे, जो मुख्य रूप से शहरों में रहते थे और पुरस्कारों की आशा रखते थे।
मुख्य बिंदु 3
फख्र-ए-मुदब्बिर के "न्याय-चक्र" के अनुसार राजा का अस्तित्व प्रसन्न व समृद्ध किसानों पर और सेना का वेतन उनके राजस्व पर निर्भर था।
मुख्य बिंदु 4
1236 ई. में रजिया सुल्तान दिल्ली की गद्दी पर बैठी; वह अत्यंत योग्य थी किंतु रूढ़िवादी अमीरों के षड्यंत्र से 1240 ई. में हटा दी गई।
मुख्य बिंदु 5
सुल्तानों ने गैरिसन शहरों के विस्तार के लिए दोआब के जंगलों को कटवाया (आंतरिक सीमा) और दक्षिण भारत में सैन्य अभियान किए (बाह्य सीमा)।
मुख्य बिंदु 6
मस्जिद में मक्का की ओर की दिशा को "किबला" कहा जाता है, जो भारत में पश्चिम दिशा की ओर पड़ती है।
मुख्य बिंदु 7
सुलतान इल्तुतमिश ने अपने भरोसेमंद सैन्य दासों को ऊंचे पदों पर रखा जिन्हें फारसी में "बंदगान" कहा जाता था।
मुख्य बिंदु 8
प्रशासनिक क्षेत्रों को "इक्ता" और उनके सैन्य प्रमुख को "मुक्ति" या इक्तादार कहा जाता था, जिनका पद गैर-वंशानुगत होता था।
मुख्य बिंदु 9
अलाउद्दीन खिलजी ने मंगोल आक्रमणों से रक्षा हेतु "सीरी" गैरिसन शहर बनवाया और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर कठोर नियंत्रण लागू किया।
मुख्य बिंदु 10
मुहम्मद बिन तुगलक ने राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद स्थानांतरित किया और तांबे-पीतल की सांकेतिक मुद्रा चलाई जो असफल रही।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
दिल्ली में 12वीं सदी में ढाले जाने वाले प्रसिद्ध सिक्कों को क्या कहा जाता था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: दिल्ली में 12वीं सदी में तोमर और चौहान शासकों के समय ढाले जाने वाले सिक्कों को "देहलीवाल" (Dehliwal) कहा जाता था।
2
इतिहासकार मिन्हाज-उस-सिराज के अनुसार रजिया सुल्तान अपने भाइयों से किस प्रकार भिन्न थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मिन्हाज-उस-सिराज के अनुसार रजिया अपने सभी भाइयों से अधिक योग्य, बुद्धिमान और सक्षम शासक थी, यद्यपि तत्कालीन लिंगभेदी मान्यताओं के कारण वह उसे शासक रूप में स्वीकार नहीं कर पाया।
3
सल्तनत काल में "खराज" (Kharaj) क्या था और इसकी दर कितनी थी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: खराज किसानों की कृषि उपज पर लगाया जाने वाला प्रमुख भू-राजस्व कर था, जो सामान्यतः किसान की कुल उपज के 50 प्रतिशत के बराबर होता था।
4
अलाउद्दीन खिलजी ने मंगोल आक्रमणों के समय अपने सैनिकों के लिए कौन-सा नया गैरिसन शहर बसाया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अलाउद्दीन खिलजी ने मंगोल आक्रमणों का मुकाबला करने और सैनिकों के रहने के लिए दिल्ली में "सीरी" (Siri) नामक नया गैरिसन शहर बनवाया था।
5
मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली के स्थान पर किसे अपनी नई राजधानी बनाया था?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली के निवासियों को स्थानांतरित कर दक्षिण भारत में स्थित "दौलताबाद" (Daulatabad / देवगिरि) को अपनी नई राजधानी बनाया था।
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कक्षा 7 Social Science के सभी अध्याय

अध्याय 1: हज़ार वर्षों के दौरान हुए परिवर्तनों की पड़ताल (Tracing Changes Through a Thousand Years) अध्याय 2: नए राजा और साम्राज्य (New Kings and Kingdoms) अध्याय 3: दिल्ली के सुल्तान (The Delhi Sultans) अध्याय 4: मुगल साम्राज्य (The Mughal Empire) अध्याय 5: शासक और इमारतें (Rulers and Buildings) अध्याय 6: नगर, व्यापारी और शिल्पकार (Towns, Traders and Craftspersons) अध्याय 7: जनजातियां, खानाबदोश और एक जगह बसे हुए समुदाय (Tribes, Nomads and Settled Communities) अध्याय 8: ईश्वर से अनुराग (Devotional Paths to the Divine) अध्याय 9: क्षेत्रीय संस्कृतियों का निर्माण (The Making of Regional Cultures) अध्याय 10: अठारहवीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन (Eighteenth-Century Political Formations) अध्याय 11: पर्यावरण (Environment) अध्याय 12: हमारी पृथ्वी के अंदर (Inside Our Earth) अध्याय 13: हमारी बदलती पृथ्वी (Our Changing Earth) अध्याय 14: वायु (Air) अध्याय 15: जल (Water) अध्याय 16: मानव-पर्यावरण अंतःक्रिया: उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र (Human-Environment Interactions: The Tropical and the Subtropical Region) अध्याय 17: रेगिस्तान में जीवन (Life in the Deserts) अध्याय 18: समानता (On Equality) (On Equality) अध्याय 19: स्वास्थ्य में सरकार की भूमिका (Role of the Government in Health) अध्याय 20: राज्य शासन कैसे काम करता है (How the State Government Works) अध्याय 21: लड़के और लड़कियों के रूप में बड़ा होना (Growing Up as Boys and Girls) अध्याय 22: औरतों ने बदली दुनिया (Women Change the World) अध्याय 23: संचार माध्यमों को समझना (Understanding Media) अध्याय 24: हमारे आस-पास के बाज़ार (Markets Around Us) अध्याय 25: बाज़ार में एक कमीज़ (A Shirt in the Market) अध्याय 26: समानता के लिए संघर्ष (Struggles for Equality)

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