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CBSE • कक्षा XII • Physics • अध्याय 7
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

प्रत्यावर्ती धारा (AC)

आधुनिक विद्युत सभ्यता का सम्पूर्ण ढांचा—विशाल पावर स्टेशनों से लेकर हमारे घरों, पंखों, कंप्यूटरों और उद्योगों तक—प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current - AC) पर ही संचालित होता है। प्रत्यावर्ती धारा वह धारा है जिसका परिमाण और दिशा समय के साथ ज्यावक्रीय रूप से आवर्ती रूप में बदलते रहते हैं ($I = I_0 \sin\omega t$, भारत में मानक आवृत्ति $\nu = 50\text{ Hz}$)। पूर्ण चक्र में AC का औसत मान शून्य ($I_{\text{avg}} = 0$) होता है, अतः इसके तापन प्रभाव को मापने हेतु वर्ग माध्य मूल मान (RMS Value) $I_{\text{rms}} = \frac{I_0}{\sqrt{2}} \approx 0.707 I_0$ तथा $V_{\text{rms}} = \frac{V_0}{\sqrt{2}}$ की अवधारणा अनिवार्य है (घरेलू $220\text{ V AC}$ का शिखर मान $\approx 311\text{ V}$ होता है, जिससे यह $220\text{ V DC}$ की तुलना में अत्यधिक घातक झटका देती है)। शुद्ध प्रतिरोध ($R$) में विभव व धारा समान कला में होते हैं; शुद्ध प्रेरकत्व ($L$) में वोल्टता $90^\circ$ अग्रगामी होती है तथा प्रेरकीय प्रतिघात $X_L = \omega L = 2\pi\nu L$ होता है; शुद्ध धारिता ($C$) में धारा $90^\circ$ अग्रगामी होती है तथा धारितीय प्रतिघात $X_C = \frac{1}{\omega C}$ होता है। श्रेणी LCR परिपथ की कुल प्रतिबाधा $Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2}$ होती है। जब $X_L = X_C$ हो जाए, तो विद्युत अनुनाद (Resonance) उत्पन्न होता है, जहाँ प्रतिबाधा न्यूनतम ($Z=R$), धारा अधिकतम ($I_0 = V_0/R$), तथा अनुनादी आवृत्ति $\nu_r = \frac{1}{2\pi\sqrt{LC}}$ होती है—जो रेडियो व वायरलेस संचार का आधार है। परिपथ की औसत शक्ति $P = V_{\text{rms}} I_{\text{rms}} \cos\phi$ में $\phi=90^\circ$ होने पर शून्य ऊर्जा क्षय वाली वाटहीन धारा (Wattless Current) तथा चोक कुंडली (Choke Coil) का जन्म होता है। अंततः, अन्योन्य प्रेरण पर आधारित ट्रांसफॉर्मर (उच्चायी व अपचायी) दूरस्थ विद्युत पारेषण में ऊर्जा हानि को नगण्य कर देता है।

घरों में आने वाली 220V AC बिजली 220V DC की तुलना में कहीं अधिक जानलेवा और भयानक झटका क्यों देती है?

जब बिजली के खंभे पर लिखा होता है 'खतरा: 220 वोल्ट', तो क्या आपने कभी सोचा है कि यह 220 वोल्ट कौन सा मान है? यह वोल्टता का औसत मान नहीं, बल्कि वर्ग माध्य मूल मान ($V_{\text{rms}}$) है! चूंकि प्रत्यावर्ती धारा एक ज्या तरंग (Sine Wave) है, अतः $220\text{ V AC}$ की प्रत्येक धड़कन वास्तव में शून्य से बढ़कर प्लस $311\text{ वोल्ट}$ तक जाती है और फिर माइनस $311\text{ वोल्ट}$ तक गिरती है! यानी $220\text{ V AC}$ को छूने पर इंसान का शरीर एक चक्र में $622\text{ वोल्ट}$ के भयानक विभवांतर के झूलों पर झूलता है, जबकि $220\text{ V DC}$ लगातार केवल $220\text{ V}$ पर स्थिर रहती है। इतना ही नहीं, AC मानव शरीर की मांसपेशियों को 1 सेकंड में 100 बार सिकोड़कर चिपका लेती है! आइए समझें प्रत्यावर्ती धारा के इस गतिशील और रोमांचक विज्ञान को!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

CBSE और CBSE कक्षा 12वीं भौतिकी बोर्ड परीक्षा में 'प्रत्यावर्ती धारा' सर्वाधिक अंक-भार वाली पसंदीदा इकाइयों में शामिल है। प्रत्यावर्ती धारा के शिखर मान व RMS मान में संबंध ($I_{\text{rms}} = I_0 / \sqrt{2}$) का संपूर्ण गणितीय निगमन, शुद्ध L, शुद्ध C और शुद्ध R परिपथों में कलांतर एवं प्रतिघात ($X_L = \omega L, X_C = 1/\omega C$) के व्यंजक, श्रेणी LCR परिपथ की प्रतिबाधा ($Z$) और कला कोण ($\tan\phi$) का फेजर आरेख विधि से निगमन, श्रेणी LCR अनुनाद (शर्त, अनुनादी आवृत्ति $\nu_r = \frac{1}{2\pi\sqrt{LC}}$, विशेषता गुणांक $Q = \frac{1}{R}\sqrt{\frac{L}{C}}$), औसत शक्ति सूत्र ($P = V_{\text{rms}}I_{\text{rms}}\cos\phi$), वाटहीन धारा एवं चोक कुंडली का कार्य सिद्धांत, तथा ट्रांसफॉर्मर (उच्चायी व अपचायी) का सिद्धांत, परिणमन अनुपात ($K$), और 4 प्रमुख ऊर्जा हानियों पर प्रतिवर्ष 5 अंकों के दीर्घ-उत्तरीय और संख्यात्मक प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • विद्युतचुंबकीय प्रेरण, फैराडे के नियम एवं अन्योन्य प्रेरण ($M$) की समझ।
  • त्रिकोणमिति (ज्यावक्रीय फलन: $\sin\omega t, \cos\omega t, \sin^2\theta = \frac{1-\cos 2\theta}{2}$)।
  • समाकलन (Integration: $\int_0^T \sin^2(\omega t) dt = T/2$)।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • प्रत्यावर्ती धारा एवं वोल्टता के तात्क्षणिक, शिखर, औसत और वर्ग माध्य मूल (RMS) मानों का गणितीय निगमन करना।
  • शुद्ध R, शुद्ध L और शुद्ध C परिपथों के फेजर आरेख खींचना तथा प्रतिघातों ($X_L, X_C$) का विश्लेषण करना।
  • श्रेणी LCR परिपथ की प्रतिबाधा ($Z$) का फेजर विधि से निगमन करना और अनुनाद की स्थिति एवं तीक्ष्णता ($Q$) की व्याख्या करना।
  • AC परिपथ में औसत शक्ति ($P_{\text{avg}}$), शक्ति गुणांक ($\cos\phi$), वाटहीन धारा तथा चोक कुंडली के उपयोग को स्पष्ट करना।
  • ट्रांसफॉर्मर के सिद्धांत, संरचना, परिणमन अनुपात ($K$), ऊर्जा हानियों तथा दक्षता ($\eta$) का संपूर्ण सचित्र वर्णन करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. प्रत्यावर्ती धारा: शिखर मान, औसत...
2 2. शुद्ध R, शुद्ध L एवं शुद्ध C युक...
3 3. श्रेणी LCR परिपथ, प्रतिबाधा एवं...
4 4. AC परिपथ में शक्ति, शक्ति गुणांक...
5 5. ट्रांसफॉर्मर: सिद्धांत, संरचना,...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. प्रत्यावर्ती धारा: शिखर मान, औसत मान एवं वर्ग माध्य मूल (RMS) मान

1.1 प्रत्यावर्ती धारा एवं वोल्टता की परिभाषा

प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current - AC): वह धारा जिसका परिमाण समय के साथ निरंतर बदलता रहता है तथा जिसकी दिशा एक निश्चित समयांतराल के पश्चात आवर्ती रूप से उलटती रहती है:

$$\mathbf{I = I_0 \sin(\omega t)} \quad \text{तथा वोल्टता} \quad \mathbf{V = V_0 \sin(\omega t)}$$जहाँ $I_0$ व $V_0$ धारा व वोल्टता के शिखर मान (Peak Value / Amplitude) हैं, तथा $\omega = 2\pi \nu = \frac{2\pi}{T}$ कोणीय आवृत्ति है (भारत में $\nu = 50\text{ Hz} \implies \omega \approx 314\text{ rad/s}$)।

1.2 प्रत्यावर्ती धारा का औसत मान (Mean / Average Value)

  1. पूर्ण चक्र (Full Cycle) के लिए औसत मान:
    चूंकि प्रथम धनात्मक अर्ध-चक्र का औसत मान $+ \frac{2I_0}{\pi}$ तथा द्वितीय ऋणात्मक अर्ध-चक्र का औसत मान $- \frac{2I_0}{\pi}$ होता है, अतः एक पूर्ण चक्र में प्रत्यावर्ती धारा का औसत मान सदैव शून्य होता है:
    $$I_{\text{avg}} = \frac{1}{T} \int_0^T I_0 \sin(\omega t) dt = \mathbf{0}$$
    निष्कर्ष: सामान्य DC चल-कुंडली अमीटर या वोल्टमीटर AC परिपथ में शून्य पाठ्यांक दर्शाते हैं।
  2. अर्ध-चक्र (Half Cycle) के लिए औसत मान:
    $$I_{\text{mean}} = \frac{1}{T/2} \int_0^{T/2} I_0 \sin(\omega t) dt = \mathbf{\frac{2 I_0}{\pi} \approx 0.637 I_0}$$$$V_{\text{mean}} = \mathbf{\frac{2 V_0}{\pi} \approx 0.637 V_0}$$

1.3 वर्ग माध्य मूल मान (Root Mean Square - RMS Value / Virtual Value)

परिभाषा: प्रत्यावर्ती धारा का वर्ग माध्य मूल मान (या आभासी मान $I_{\text{rms}}$) उस स्थिर दिष्ट धारा (DC) के मान के बराबर होता है जो किसी दिए गए प्रतिरोध में निश्चित समय में उतनी ही ऊष्मा उत्पन्न करती है जितनी कि वही AC धारा उसी प्रतिरोध में उतने ही समय में उत्पन्न करती है。

गणितीय निगमन:
सूक्ष्म समय $dt$ में प्रतिरोध $R$ में उत्पन्न ऊष्मा: $dH = I^2 R\,dt = (I_0 \sin\omega t)^2 R\,dt$
एक पूर्ण चक्र ($T$) में कुल ऊष्मा: $H = I_0^2 R \int_0^T \sin^2(\omega t) dt = I_0^2 R \left( \frac{T}{2} \right)$
यदि RMS धारा $I_{\text{rms}}$ हो: $H = I_{\text{rms}}^2 R T$
तुलना करने पर: $I_{\text{rms}}^2 R T = I_0^2 R \frac{T}{2} \implies I_{\text{rms}}^2 = \frac{I_0^2}{2}$
$$\mathbf{I_{\text{rms}} = \frac{I_0}{\sqrt{2}} \approx 0.707 I_0} \quad \text{तथा} \quad \mathbf{V_{\text{rms}} = \frac{V_0}{\sqrt{2}} \approx 0.707 V_0}$$• AC अमीटर एवं वोल्टमीटर: धारा के तापन प्रभाव (तप्त-तार उपकरण - Hot Wire Instruments) पर आधारित होते हैं और सदैव RMS मान ही मापते हैं।
• घरेलू संभरण ($220\text{ V}$): यह $V_{\text{rms}} = 220\text{ V}$ है। इसका शिखर मान: $\mathbf{V_0 = 220 \times \sqrt{2} = 220 \times 1.414 \approx 311\text{ Volt}}$।

2. शुद्ध R, शुद्ध L एवं शुद्ध C युक्त प्रत्यावर्ती परिपथ

2.1 केवल शुद्ध प्रतिरोध ($R$) युक्त परिपथ

जब $V = V_0 \sin(\omega t)$ को शुद्ध प्रतिरोध $R$ से जोड़ा जाता है: $I = \frac{V}{R} = \frac{V_0}{R}\sin(\omega t) = I_0 \sin(\omega t)$।

  • कला संबंध: वोल्टता $V$ तथा धारा $I$ समान कला (In Phase, $\phi = 0$) में होते हैं।
  • फेजर आरेख: $V$ और $I$ के सदिश एक ही दिशा में होते हैं।

2.2 केवल शुद्ध प्रेरकत्व ($L$) युक्त परिपथ

जब परिपथ में शुद्ध प्रेरक $L$ लगा हो, तो स्वप्रेरित विरोधी EMF $\mathcal{E} = -L \frac{dI}{dt}$ उत्पन्न होता है: $V - L\frac{dI}{dt} = 0 \implies dI = \frac{V_0}{L}\sin(\omega t) dt$।

  • समाकलन करने पर: $I = -\frac{V_0}{\omega L} \cos(\omega t) = \mathbf{I_0 \sin\left(\omega t - \frac{\pi}{2}\right)}$
  • कला संबंध: वोल्टता $V$, धारा $I$ से कला में $\frac{\pi}{2}$ (या $90^\circ$) अग्रगामी (Leads) होती है (अर्थात धारा $90^\circ$ पश्चगामी होती है)।
  • प्रेरकीय प्रतिघात (Inductive Reactance - $X_L$): प्रेरक द्वारा धारा के मार्ग में प्रस्तुत किया गया अवरोध:
    $$\mathbf{X_L = \omega L = 2\pi \nu L} \quad (\text{SI मात्रक: } \text{ओम - } \Omega)$$• दिष्ट धारा (DC) के लिए: $\nu = 0 \implies \mathbf{X_L = 0}$ (प्रेरक DC के लिए शून्य प्रतिरोध प्रस्तुत करता है)।

2.3 केवल शुद्ध धारिता ($C$) युक्त परिपथ

जब शुद्ध संधारित्र $C$ पर वोल्टता $V = V_0 \sin(\omega t)$ लगाई जाती है: $q = C V = C V_0 \sin(\omega t)$।

  • धारा $I = \frac{dq}{dt} = C V_0 \omega \cos(\omega t) = \mathbf{I_0 \sin\left(\omega t + \frac{\pi}{2}\right)}$
  • कला संबंध: धारा $I$, वोल्टता $V$ से कला में $\frac{\pi}{2}$ (या $90^\circ$) अग्रगामी (Leads) होती है।
  • धारितीय प्रतिघात (Capacitive Reactance - $X_C$): संधारित्र द्वारा धारा के मार्ग में प्रस्तुत अवरोध:
    $$\mathbf{X_C = \frac{1}{\omega C} = \frac{1}{2\pi \nu C}} \quad (\text{SI मात्रक: } \text{ओम - } \Omega)$$• दिष्ट धारा (DC) के लिए: $\nu = 0 \implies \mathbf{X_C = \frac{1}{0} = \infty}$ (संधारित्र DC को पूर्णतः अवरुद्ध / Block कर देता है)।

3. श्रेणी LCR परिपथ, प्रतिबाधा एवं विद्युत अनुनाद

3.1 श्रेणी LCR परिपथ की प्रतिबाधा ($Z$) का फेजर निगमन

जब प्रतिरोध $R$, प्रेरकत्व $L$, तथा धारिता $C$ श्रेणीक्रम में प्रत्यावर्ती स्रोत $V = V_0 \sin(\omega t)$ से जुड़े हों:

  • $R$ के सिरों पर विभवांतर: $V_R = I R$ (धारा $I$ की कला में)
  • $L$ के सिरों पर विभवांतर: $V_L = I X_L$ (धारा $I$ से $90^\circ$ अग्रगामी)
  • $C$ के सिरों पर विभवांतर: $V_C = I X_C$ (धारा $I$ से $90^\circ$ पश्चगामी)
  • फेजर आरेख में $V_L$ तथा $V_C$ परस्पर विपरीत दिशा में हैं, अतः उनका परिणामी $(V_L - V_C)$ धारा से $90^\circ$ पर है।
  • पायथागोरस प्रमेय से परिणामी वोल्टता:$$V_0^2 = V_R^2 + (V_L - V_C)^2 = (I_0 R)^2 + (I_0 X_L - I_0 X_C)^2 = I_0^2 [R^2 + (X_L - X_C)^2]$$$$V_0 = I_0 \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2}$$
  • परिपथ का कुल प्रभावी अवरोध प्रतिबाधा (Impedance - $Z$) कहलाता है:$$\mathbf{Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2} = \sqrt{R^2 + \left( \omega L - \frac{1}{\omega C} \right)^2}} \quad (\text{मात्रक: } \Omega)$$
  • कलांतर (Phase Angle - $\phi$): वोल्टता तथा धारा के मध्य कला कोण:$$\mathbf{\tan\phi = \frac{V_L - V_C}{V_R} = \frac{X_L - X_C}{R} = \frac{\omega L - \frac{1}{\omega C}}{R}}$$• यदि $X_L > X_C$: परिपथ प्रेरकीय है (वोल्टता अग्रगामी)।
    • यदि $X_C > X_L$: परिपथ धारितीय है (धारा अग्रगामी)।

3.2 श्रेणी LCR अनुनाद (Resonance in Series LCR Circuit)

अनुनाद की स्थिति: जब स्रोत की आवृत्ति ऐसी हो जाए कि प्रेरकीय प्रतिघात धारितीय प्रतिघात के बराबर हो जाए:

$$\mathbf{X_L = X_C \implies \omega L = \frac{1}{\omega C} \implies \omega^2 = \frac{1}{LC}}$$
• अनुनादी कोणीय आवृत्ति: $\mathbf{\omega_r = \frac{1}{\sqrt{LC}}}$
• अनुनादी आवृत्ति (Resonant Frequency - $\nu_r$):
$$\mathbf{\nu_r = \frac{1}{2\pi \sqrt{LC}}}$$
अनुनाद की 4 प्रमुख विशेषताएं:
1. प्रतिबाधा न्यूनतम होती है: $Z_{\min} = \sqrt{R^2 + 0} = \mathbf{R}$ (परिपथ विशुद्ध प्रतिरोधी बन जाता है)।
2. धारा का आयाम अधिकतम होता है: $\mathbf{I_{0,\max} = \frac{V_0}{R}}$।
3. कलांतर शून्य होता है: $\tan\phi = 0 \implies \mathbf{\phi = 0}$ (वोल्टता व धारा समान कला में होते हैं)।
4. विशेषता गुणांक (Quality Factor - $Q$): अनुनाद वक्र की तीक्ष्णता का मापक:
$$\mathbf{Q = \frac{\omega_r L}{R} = \frac{1}{R}\sqrt{\frac{L}{C}}}$$
व्यावहारिक अनुप्रयोग: रेडियो एवं टेलीविजन के ट्यूनिंग परिपथ (Tuning Circuit) में वांछित स्टेशन की आवृत्ति को पकड़ने के लिए श्रेणी LCR अनुनाद का ही प्रयोग किया जाता है।

4. AC परिपथ में शक्ति, शक्ति गुणांक, वाटहीन धारा एवं चोक कुंडली

4.1 प्रत्यावर्ती परिपथ में औसत शक्ति एवं शक्ति गुणांक

यदि $V = V_0 \sin(\omega t)$ तथा $I = I_0 \sin(\omega t - \phi)$ हो, तो एक पूर्ण चक्र में औसत शक्ति व्यय:

$$P_{\text{avg}} = \frac{1}{T} \int_0^T V I\,dt = \frac{V_0 I_0}{2} \cos\phi = \left(\frac{V_0}{\sqrt{2}}\right) \left(\frac{I_0}{\sqrt{2}}\right) \cos\phi$$$$\mathbf{P_{\text{avg}} = V_{\text{rms}} I_{\text{rms}} \cos\phi}$$जहाँ $\mathbf{\cos\phi = \frac{R}{Z}}$ को परिपथ का शक्ति गुणांक (Power Factor) कहते हैं।
  • शुद्ध प्रतिरोध में: $\phi = 0 \implies \cos\phi = 1 \implies P = V_{\text{rms}} I_{\text{rms}}$ (अधिकतम शक्ति व्यय)।
  • शुद्ध प्रेरकत्व या धारिता में: $\phi = 90^\circ \implies \cos 90^\circ = 0 \implies \mathbf{P_{\text{avg}} = 0}$ (शून्य शक्ति व्यय)।

4.2 वाटहीन धारा (Wattless Current) एवं चोक कुंडली (Choke Coil)

वाटहीन धारा: यदि किसी परिपथ में प्रतिरोध शून्य हो ($R = 0$, जैसे शुद्ध प्रेरक या शुद्ध संधारित्र), तो कलांतर $\phi = 90^\circ$ होता है। अतः परिपथ में धारा प्रवाहित होने के बावजूद औसत शक्ति व्यय शून्य होता है ($P = V_{\text{rms}} I_{\text{rms}} \cos 90^\circ = 0$)। इस धारा को वाटहीन धारा कहते हैं。

चोक कुंडली (Choke Coil):
• संरचना: नर्म लोहे के पटलित क्रोड पर मोटे तांबे के तार के अनेक फेरों वाली उच्च स्वप्रेरकत्व ($L$) तथा नगण्य ओमीय प्रतिरोध ($R \approx 0$) की एक कुंडली।
• कार्य सिद्धांत: प्रत्यावर्ती परिपथ में धारा नियंत्रित करने हेतु यदि सामान्य प्रतिरोधक (Rheostat) का उपयोग करें, तो $I^2R$ के कारण बहुत अधिक ऊर्जा ऊष्मा के रूप में नष्ट होती है। परंतु चोक कुंडली में $R \approx 0$ होने से शक्ति गुणांक $\cos\phi = \frac{R}{Z} \approx 0$ होता है। अतः यह बिना किसी ऊर्जा हानि ($P \approx 0$) के प्रत्यावर्ती धारा को सुगमता से नियंत्रित कर लेती है (उदा: ट्यूबलाइट का चोक)।

5. ट्रांसफॉर्मर: सिद्धांत, संरचना, परिणमन अनुपात एवं ऊर्जा हानियां

5.1 ट्रांसफॉर्मर का सिद्धांत एवं प्रकार

परिभाषा: अन्योन्य प्रेरण (Mutual Induction) के सिद्धांत पर आधारित वह स्थिर वैद्युत युक्ति जो प्रत्यावर्ती वोल्टता को बिना आवृत्ति बदले उच्च वोल्टता से निम्न वोल्टता में अथवा निम्न वोल्टता से उच्च वोल्टता में परिवर्तित करती है। (चेतावनी: यह केवल AC पर कार्य करता है, DC पर कभी नहीं)।

  • 1. उच्चायी ट्रांसफॉर्मर (Step-up Transformer): निम्न प्रत्यावर्ती वोल्टता को उच्च प्रत्यावर्ती वोल्टता में बदलता है ($N_s > N_p$ तथा $V_s > V_p$ परंतु $I_s < I_p$)।
  • 2. अपचायी ट्रांसफॉर्मर (Step-down Transformer): उच्च प्रत्यावर्ती वोल्टता को निम्न प्रत्यावर्ती वोल्टता में बदलता है ($N_s < N_p$ तथा $V_s < V_p$ परंतु $I_s > I_p$)।

5.2 परिणमन अनुपात (Transformation Ratio - $K$) का निगमन

प्राथमिक कुंडली में फेरे $N_p$ तथा द्वितीयक में $N_s$ हैं। यदि कोई फ्लक्स क्षरण न हो, तो प्रति फेरा फ्लक्स परिवर्तन $\frac{d\Phi}{dt}$ समान होगा:

$$V_p = -N_p \frac{d\Phi}{dt} \quad \text{तथा} \quad V_s = -N_s \frac{d\Phi}{dt}$$भाग देने पर: $\frac{V_s}{V_p} = \frac{N_s}{N_p}$

एक आदर्श ट्रांसफॉर्मर में निवेशी शक्ति = निर्गत शक्ति ($V_p I_p = V_s I_s \implies \frac{V_s}{V_p} = \frac{I_p}{I_s}$)।

$$\mathbf{\frac{V_s}{V_p} = \frac{N_s}{N_p} = \frac{I_p}{I_s} = K}$$जहाँ $K$ परिणमन अनुपात है (उच्चायी हेतु $K > 1$, अपचायी हेतु $K < 1$)।

5.3 ट्रांसफॉर्मर में ऊर्जा हानियां एवं दक्षता

ऊर्जा हानि का प्रकारहानि का कारणनिवारण का उपाय
1. ताम्र हानि (Copper Loss)कुंडलियों के प्रतिरोध के कारण जूल तापन ($I^2R$) द्वारा ऊष्मा उत्पन्न होना।मोटे तांबे के तारों का उपयोग करके प्रतिरोध न्यूनतम करना।
2. लौह हानि / भंवर धाराएं (Iron Loss)लोहे के क्रोड में प्रेरित चक्करदार भंवर धाराओं द्वारा ऊर्जा क्षय।क्रोड को ठोस के स्थान पर पटलित (Laminated Core) बनाना।
3. शैथिल्य हानि (Hysteresis Loss)AC के प्रत्येक चक्र में क्रोड के बार-बार चुंबकित व विचुंबकित होने से ऊर्जा क्षय।संकीर्ण शैथिल्य लूप वाले नर्म लोहे (Soft Iron) का क्रोड उपयोग करना।
4. फ्लक्स क्षरण (Flux Leakage)प्राथमिक का संपूर्ण फ्लक्स द्वितीयक से न गुजर पाना।प्राथमिक और द्वितीयक कुंडलियों को एक-दूसरे के ऊपर लपेटना।

ट्रांसफॉर्मर की दक्षता (Efficiency - $\eta$): $\mathbf{\eta = \frac{\text{निर्गत शक्ति}}{\text{निवेशी शक्ति}} \times 100\% = \frac{V_s I_s}{V_p I_p} \times 100\%}$ (व्यावहारिक ट्रांसफॉर्मर में $\eta \approx 90-98\%$)。

प्रमुख भौतिक सूत्र, नियम एवं नियतांक

AC तात्क्षणिक समीकरण
$$I = I_0 \sin(\omega t); \quad V = V_0 \sin(\omega t) \quad (\omega = 2\pi\nu)$$
अर्ध-चक्र औसत मान
I_{mean} = {2I_0} ≈ 0.637 I_0; (पूर्ण चक्र I_{avg} = 0)
वर्ग माध्य मूल मान (RMS)
$$I_{\text{rms}} = \frac{I_0}{\sqrt{2}} \approx 0.707 I_0; \quad V_{\text{rms}} = \frac{V_0}{\sqrt{2}} \approx 0.707 V_0$$
प्रेरकीय प्रतिघात
X_L = L = 2 L (DC हेतु X_L = 0)
धारितीय प्रतिघात
X_C = {1}{ C} = {1}{2 C} (DC हेतु X_C = )
श्रेणी LCR प्रतिबाधा
$$Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2} = \sqrt{R^2 + (\omega L - 1/\omega C)^2}$$
LCR कलांतर
$$\tan\phi = \frac{X_L - X_C}{R}; \quad I_0 = \frac{V_0}{Z}$$
अनुनादी आवृत्ति
$$\nu_r = \frac{1}{2\pi \sqrt{LC}}; \quad \omega_r = \frac{1}{\sqrt{LC}} \quad (Z_{\min} = R, I_{\max})$$
Q-गुणांक (तीक्ष्णता)
$$Q = \frac{\omega_r L}{R} = \frac{1}{R}\sqrt{\frac{L}{C}}$$
औसत शक्ति व शक्ति गुणांक
$$P_{\text{avg}} = V_{\text{rms}} I_{\text{rms}} \cos\phi; \quad \cos\phi = \frac{R}{Z}$$
वाटहीन धारा शर्त
= 90^ ⇒ = 0 ⇒ P = 0 (चोक कुंडली: R≈ 0)
ट्रांसफॉर्मर अनुपात
$$\frac{V_s}{V_p} = \frac{N_s}{N_p} = \frac{I_p}{I_s} = K; \quad \eta = \frac{V_s I_s}{V_p I_p} \times 100\%$$

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
घरेलू संभरण का प्रत्यावर्ती विभवांतर $220\text{ V}, 50\text{ Hz}$ है। (a) इसका शिखर विभवांतर, तथा (b) धारा को शून्य से शिखर मान तक पहुँचने में कितना समय लगेगा?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
दिया है:
RMS वोल्टता $V_{\text{rms}} = 220\text{ V}$
आवृत्ति $\nu = 50\text{ Hz}$

(a) शिखर विभवांतर ($V_0$):
$$V_0 = V_{\text{rms}} \times \sqrt{2} = 220 \times 1.414 \approx \mathbf{311.1\text{ Volt}}$$

(b) शून्य से शिखर मान तक का समय ($t$):
आवर्तकाल $T = \frac{1}{\nu} = \frac{1}{50} = 0.02\text{ s}$
शून्य से शिखर मान तक पहुँचने में समय $= \frac{T}{4}$ लगता है:
$$t = \frac{T}{4} = \frac{0.02}{4} = \mathbf{0.005\text{ s} = 5\text{ ms}}$$
उदाहरण 2
एक प्रत्यावर्ती परिपथ में $R = 40\text{ }\Omega$, $L = 0.4\text{ H}$ तथा $C = 100\text{ }\mu\text{F}$ श्रेणीक्रम में $200\text{ V}, 50\text{ Hz}$ के स्रोत से जुड़े हैं। परिपथ की प्रतिबाधा ($Z$), प्रवाहित धारा ($I_{\text{rms}}$) तथा शक्ति गुणांक ($\cos\phi$) ज्ञात कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
दिया है:
$R = 40\text{ }\Omega$, $L = 0.4\text{ H}$, $C = 100\text{ }\mu\text{F} = 10^{-4}\text{ F}$
$V_{\text{rms}} = 200\text{ V}$, $\nu = 50\text{ Hz} \implies \omega = 2\pi \times 50 = 100\pi \approx 314.16\text{ rad/s}$

1. प्रतिघातों की गणना:
$$X_L = \omega L = (314.16) \times 0.4 \approx 125.66\text{ }\Omega$$
$$X_C = \frac{1}{\omega C} = \frac{1}{(314.16) \times 10^{-4}} = \frac{10000}{314.16} \approx 31.83\text{ }\Omega$$
$$X_L - X_C = 125.66 - 31.83 = 93.83\text{ }\Omega$$

2. प्रतिबाधा ($Z$):
$$Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2} = \sqrt{(40)^2 + (93.83)^2} = \sqrt{1600 + 8804} = \sqrt{10404} \approx \mathbf{102.0\text{ }\Omega}$$

3. धारा ($I_{\text{rms}}$) एवं शक्ति गुणांक ($\cos\phi$):
$$I_{\text{rms}} = \frac{V_{\text{rms}}}{Z} = \frac{200\text{ V}}{102\text{ }\Omega} \approx \mathbf{1.96\text{ Ampere}}$$
$$\cos\phi = \frac{R}{Z} = \frac{40}{102} \approx \mathbf{0.392}$$
उदाहरण 3
श्रेणी LCR परिपथ में अनुनाद की स्थिति की व्याख्या कीजिए तथा अनुनादी आवृत्ति का सूत्र निगमित कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
श्रेणी LCR अनुनाद:
श्रेणी LCR परिपथ में जब प्रत्यावर्ती स्रोत की आवृत्ति बदलते हुए एक ऐसी विशेष आवृत्ति पर पहुंच जाती है जहाँ प्रेरकीय प्रतिघात तथा धारितीय प्रतिघात परिमाण में बिल्कुल बराबर हो जाते हैं ($X_L = X_C$), तो परिपथ में विद्युत अनुनाद (Resonance) की स्थिति उत्पन्न होती है。

अनुनादी आवृत्ति का निगमन:
1. श्रेणी LCR परिपथ की प्रतिबाधा:
$$Z = \sqrt{R^2 + \left(\omega L - \frac{1}{\omega C}\right)^2}$$
2. अनुनाद की स्थिति में $X_L = X_C$ होने पर:
$$\omega_r L = \frac{1}{\omega_r C} \implies \omega_r^2 = \frac{1}{LC} \implies \mathbf{\omega_r = \frac{1}{\sqrt{LC}}}$$
3. चूंकि कोणीय आवृत्ति $\omega_r = 2\pi \nu_r$ होती है:
$$2\pi \nu_r = \frac{1}{\sqrt{LC}} \implies \mathbf{\nu_r = \frac{1}{2\pi \sqrt{LC}}}$$
यही अनुनादी आवृत्ति का अभीष्ट व्यंजक है。

अनुनाद के प्रभाव:
• प्रतिबाधा न्यूनतम हो जाती है ($Z = R$)。
• परिपथ में प्रवाहित धारा का मान अधिकतम ($I_{\max} = V_0/R$) हो जाता है。
• कलांतर शून्य हो जाता है ($\phi = 0$) तथा शक्ति गुणांक इकाई ($\cos\phi = 1$) हो जाता है।
उदाहरण 4
वाटहीन धारा (Wattless Current) से क्या तात्पर्य है? चोक कुंडली (Choke Coil) किस सिद्धांत पर कार्य करती है और यह धारा नियंत्रण में सामान्य प्रतिरोध से श्रेष्ठ क्यों है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
वाटहीन धारा:
यदि किसी प्रत्यावर्ती परिपथ में ओमीय प्रतिरोध शून्य हो ($R = 0$, जैसे केवल शुद्ध प्रेरकत्व अथवा शुद्ध संधारित्र), तो वोल्टता और धारा के मध्य कलांतर $\phi = 90^\circ$ होता है।
इस स्थिति में परिपथ में व्यय होने वाली औसत शक्ति:
$$P_{\text{avg}} = V_{\text{rms}} I_{\text{rms}} \cos 90^\circ = 0$$
अतः परिपथ में धारा प्रवाहित होने पर भी कोई वैद्युत शक्ति व्यय नहीं होती। इस निष्प्रभावी धारा को वाटहीन धारा कहते हैं。

चोक कुंडली का कार्य सिद्धांत एवं श्रेष्ठता:
1. संरचना: चोक कुंडली उच्च स्वप्रेरकत्व ($L$) तथा नगण्य प्रतिरोध ($R \approx 0$) वाली एक कुंडली होती है。
2. श्रेष्ठता: यदि प्रत्यावर्ती परिपथ में धारा को घटाने के लिए साधारण प्रतिरोध (धारानियंत्रक) का प्रयोग किया जाए, तो प्रतिरोध में जूल के नियम ($I^2Rt$) के अनुसार भारी मात्रा में वैद्युत ऊर्जा व्यर्थ ऊष्मा में नष्ट हो जाती है。
3. इसके विपरीत, चोक कुंडली में $R \approx 0$ होने के कारण इसका शक्ति गुणांक $\cos\phi = \frac{R}{Z} \approx 0$ होता है, जिससे यह बिना किसी ऊर्जा हानि (ऊष्मा क्षय) के प्रत्यावर्ती धारा को नियंत्रित कर लेती है。
उदाहरण 5
ट्रांसफॉर्मर का सिद्धांत क्या है? एक उच्चायी ट्रांसफॉर्मर (Step-up Transformer) में प्राथमिक एवं द्वितीयक कुंडलियों में फेरों की संख्या का अनुपात $1:20$ है। यदि प्राथमिक को $220\text{ V}$ से जोड़ा जाए तो द्वितीयक की वोल्टता क्या होगी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
ट्रांसफॉर्मर का सिद्धांत:
ट्रांसफॉर्मर अन्योन्य प्रेरण (Mutual Induction) के सिद्धांत पर कार्य करता है। जब प्राथमिक कुंडली में प्रवाहित प्रत्यावर्ती धारा के कारण लोहे के क्रोड में चुंबकीय फ्लक्स निरंतर बदलता है, तो वही परिवर्तित फ्लक्स द्वितीयक कुंडली से गुजरकर उसमें एक समान आवृत्ति का प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न कर देता है。

संख्यात्मक हल:
दिया है: प्राथमिक वोल्टता $V_p = 220\text{ V}$
फेरों का अनुपात: $\frac{N_p}{N_s} = \frac{1}{20} \implies \frac{N_s}{N_p} = 20$

सूत्र:
$$\frac{V_s}{V_p} = \frac{N_s}{N_p} \implies V_s = V_p \times \left( \frac{N_s}{N_p} \right)$$
गणना:
$$V_s = 220 \times 20 = \mathbf{4400\text{ Volt} = 4.4\text{ kV}}$$
उत्तर: द्वितीयक कुंडली की वोल्टता $\mathbf{4400\text{ V}}$ होगी।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

AC के पूर्ण चक्र में औसत मान को RMS मान समझ लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पूर्ण चक्र में AC का औसत मान शून्य ($I_{\text{avg}} = 0$) होता है; उपकरणों द्वारा मापा जाने वाला प्रभावी मान वर्ग माध्य मूल मान ($I_{\text{rms}} = I_0/\sqrt{2}$) होता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

संधारित्र को DC धारा प्रवाहित करने वाला मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

संधारित्र का धारितीय प्रतिघात DC हेतु अनंत होता है ($X_C = 1/(2\pi\nu C) = \infty$), अतः संधारित्र DC को पूरी तरह ब्लॉक कर देता है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

अनुनाद की स्थिति में प्रतिबाधा को अनंत मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

श्रेणी LCR अनुनाद में प्रतिबाधा न्यूनतम ($Z = R$) तथा धारा अधिकतम होती है; यह समांतर अनुनाद में प्रतिबाधा अधिकतम होती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

ट्रांसफॉर्मर को दिष्ट धारा (DC) पर कार्य करने योग्य समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ट्रांसफॉर्मर केवल प्रत्यावर्ती धारा (AC) पर कार्य करता है; DC लगाने पर फ्लक्स परिवर्तन शून्य ($d\Phi/dt = 0$) होगा और प्राथमिक कुंडली अत्यधिक धारा से जल सकती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

उच्चायी ट्रांसफॉर्मर में वोल्टता के साथ-साथ धारा भी बढ़ने का दावा करना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

ऊर्जा संरक्षण के नियमानुसार, यदि वोल्टता बढ़ती है ($V_s > V_p$), तो धारा उसी अनुपात में घटती है ($I_s < I_p$); शक्ति कभी नहीं बढ़ सकती।

प्रत्यावर्ती धारा: RMS मान, श्रेणी LCR अनुनाद, वाटहीन धारा व ट्रांसफॉर्मर

प्रत्यावर्ती धारा: RMS मान, श्रेणी LCR अनुनाद, वाटहीन धारा व ट्रांसफॉर्मर1. RMS मान व प्रतिघाततापन प्रभाव व कला• RMS मान: I_rms = I₀ / √2V_rms = V₀ / √2 ≈ 0.707 V₀220V AC का शिखर मान = 311V• शुद्ध L: X_L = ωL = 2πνLवोल्टता 90° अग्रगामी (DC: X_L=0)• शुद्ध C: X_C = 1 / (ωC)धारा 90° अग्रगामी (DC: X_C=∞)• औसत शक्ति P = V_rms I_rms cosφ• वाटहीन धारा जब φ = 90°2. श्रेणी LCR व अनुनादप्रतिबाधा एवं ट्यूनिंग• प्रतिबाधा Z = √[R² + (X_L - X_C)²]• कला कोण tanφ = (X_L - X_C) / R• अनुनाद शर्त: X_L = X_Cω_r = 1 / √(LC)अनुनादी आवृत्ति ν_r = 1 / [2π√(LC)]• अनुनाद पर विशेषताएं:1. Z_min = R (न्यूनतम प्रतिबाधा)2. I_max = V₀ / R (अधिकतम धारा)3. φ = 0 (समान कला, cosφ = 1)• Q-गुणांक Q = (1/R) √(L/C)3. ट्रांसफॉर्मर (Transformer)अन्योन्य प्रेरण सिद्धांत• परिणमन अनुपात (K):V_s / V_p = N_s / N_p = I_p / I_s = K• दो मुख्य प्रकार:उच्चायी (Step-up): K > 1, V_s > V_pअपचायी (Step-down): K < 1, V_s < V_p• 4 प्रमुख ऊर्जा हानियां:1. ताम्र हानि (मोटे तार से निवारण)2. भंवर धारा (पटलित क्रोड)3. शैथिल्य हानि (नर्म लोहा क्रोड)4. फ्लक्स क्षरण (कुंडलियों की ओवरलैपिंग)बोर्ड परीक्षा के प्रमुख संप्रत्यय (Golden Alternating Current Capsule)220V AC बनाम DC:AC का V₀ = 220√2 = 311V होता है; अतः AC का झटका DC से अधिक तीव्र व घातक होता है।अनुनाद अवस्था:X_L = X_C होने पर Z = R न्यूनतम और धारा I_max होती है (रेडियो ट्यूनिंग सिद्धांत)।चोक कुंडली श्रेष्ठता:R ≈ 0 होने से cosφ ≈ 0; बिना ऊर्जा हानि के AC धारा नियंत्रित करती है (वाटहीन धारा)।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
प्रत्यावर्ती धारा I = I₀ sin(ωt) (भारत में आवृत्ति ν = 50 Hz, कोणीय आवृत्ति ω = 314 rad/s) होती है।
मुख्य बिंदु 2
पूर्ण चक्र में AC का औसत मान शून्य (I_avg = 0) होता है; अर्ध-चक्र का औसत मान 2I₀/π ≈ 0.637 I₀ होता है।
मुख्य बिंदु 3
वर्ग माध्य मूल मान I_rms = I₀/√2 ≈ 0.707 I₀; घरेलू 220V AC का शिखर मान 311V होता है।
मुख्य बिंदु 4
शुद्ध प्रेरकत्व में वोल्टता 90° अग्रगामी होती है और प्रेरकीय प्रतिघात X_L = ωL = 2πνL होता है।
मुख्य बिंदु 5
शुद्ध धारिता में धारा 90° अग्रगामी होती है और धारितीय प्रतिघात X_C = 1/(ωC) = 1/(2πνC) होता है।
मुख्य बिंदु 6
श्रेणी LCR परिपथ की कुल प्रतिबाधा Z = √[R² + (X_L - X_C)²] तथा tanφ = (X_L - X_C)/R होती है।
मुख्य बिंदु 7
LCR अनुनाद पर X_L = X_C, Z_min = R, धारा अधिकतम तथा अनुनादी आवृत्ति ν_r = 1 / [2π√(LC)] होती है।
मुख्य बिंदु 8
औसत शक्ति P = V_rms I_rms cosφ (शक्ति गुणांक cosφ = R/Z); φ = 90° होने पर वाटहीन धारा बहती है।
मुख्य बिंदु 9
चोक कुंडली उच्च प्रेरकत्व व नगण्य प्रतिरोध की कुंडली है जो बिना शक्ति व्यय के AC नियंत्रित करती है।
मुख्य बिंदु 10
ट्रांसफॉर्मर अन्योन्य प्रेरण पर कार्य करता है; परिणमन अनुपात V_s/V_p = N_s/N_p = I_p/I_s = K होता है।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
प्रत्यावर्ती धारा के वर्ग माध्य मूल मान (RMS Value) तथा शिखर मान (Peak Value) में संबंध स्थापित करने वाला सूत्र लिखिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: I_rms = I₀ / √2 ≈ 0.707 I₀ तथा V_rms = V₀ / √2 ≈ 0.707 V₀।
2
प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में संधारित्र (Capacitor) दिष्ट धारा (DC) को क्यों रोक (Block) देता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि दिष्ट धारा (DC) की आवृत्ति शून्य होती है (ν = 0)। संधारित्र का धारितीय प्रतिघात X_C = 1 / (2π ν C) = 1 / 0 = ∞ (अनंत) हो जाता है, जिससे यह DC को अपने में से प्रवाहित नहीं होने देता।
3
श्रेणी LCR परिपथ में 'विद्युत अनुनाद' (Resonance) की स्थिति में प्रतिबाधा तथा शक्ति गुणांक का मान क्या होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अनुनाद की स्थिति में प्रतिबाधा न्यूनतम Z = R होती है (परिपथ विशुद्ध प्रतिरोधी बन जाता है) तथा शक्ति गुणांक cosφ = 1 (अधिकतम) होता है।
4
'वाटहीन धारा' (Wattless Current) किसे कहते हैं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: जब किसी प्रत्यावर्ती परिपथ में ओमीय प्रतिरोध नगण्य हो (जैसे केवल शुद्ध प्रेरक या शुद्ध संधारित्र), तो वोल्टता और धारा के बीच कलांतर 90° होता है। इस स्थिति में परिपथ में धारा प्रवाहित होने पर भी औसत शक्ति व्यय शून्य रहता है (P_avg = 0); इस धारा को वाटहीन धारा कहते हैं।
5
ट्रांसफॉर्मर केवल प्रत्यावर्ती धारा (AC) पर ही कार्य क्यों करता है, दिष्ट धारा (DC) पर क्यों नहीं?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: क्योंकि ट्रांसफॉर्मर अन्योन्य प्रेरण पर आधारित है जिसके लिए प्राथमिक कुंडली में धारा का निरंतर बदलना आवश्यक है ताकि चुंबकीय फ्लक्स परिवर्तित हो सके। दिष्ट धारा (DC) का मान नियत रहने से फ्लक्स परिवर्तन शून्य (dΦ/dt = 0) होता है, जिससे द्वितीयक में कोई विभवांतर प्रेरित नहीं होता।
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