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  • अध्याय 14: अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ
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CBSE • कक्षा XII • Physics • अध्याय 14
अनुमानित समय: 45 Mins
प्रगति: अध्ययनरत

अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ

20वीं सदी के उत्तरार्ध में ठोस अवस्था अर्धचालकों के आविष्कार ने भारी, नाजुक और अत्यधिक ऊर्जा खपाने वाले 'निर्वात वाल्वों' (Vacuum Tubes) का सदा के लिए अंत कर आधुनिक सिलिकॉन क्रांति का सूत्रपात किया। ठोसों का ऊर्जा बैंड सिद्धांत (Energy Band Theory) वर्जित ऊर्जा अंतराल ($E_g$) के आधार पर पदार्थों को चालकों ($E_g \approx 0$), विद्युतरोधियों ($E_g > 3\text{ eV}$) तथा अर्धचालकों ($E_g < 3\text{ eV}$; $\text{Si} = 1.1\text{ eV}, \text{Ge} = 0.72\text{ eV}$) में वर्गीकृत करता है। शुद्ध नैज अर्धचालक ($n_e = n_h = n_i$) में पंचसंयोजी अपद्रव्य (दाता - P, As) मिलाकर $n$-प्रकार ($n_e \gg n_h$) तथा त्रिसंयोजी अपद्रव्य (ग्राही - B, Al) मिलाकर $p$-प्रकार ($n_h \gg n_e$) अपद्रव्यी अर्धचालक निर्मित किए जाते हैं (द्रव्य अनुपाती क्रिया नियम $n_e \cdot n_h = n_i^2$)। जब इन दोनों को क्रिस्टलीय रूप से जोड़ा जाता है, तो विसरण और अपवाह धाराओं की गतिशील साम्यावस्था से ह्रासी परत (Depletion Layer) तथा प्राचीर विभव ($V_0 \approx 0.7\text{ V for Si}$) युक्त $p-n$ संधि डायोड का जन्म होता है। अग्र अभिनति (Forward Bias) में मिली-ऐम्पीयर धारा तथा पश्च अभिनति (Reverse Bias) में नगण्य माइक्रो-ऐम्पीयर धारा के अद्वितीय एकदिशीय चालकता गुण के कारण डायोड दिष्टकारी (Rectifier: अर्ध-तरंग $\eta = 40.6\%, f_{\text{out}} = f$ तथा पूर्ण-तरंग $\eta = 81.2\%, f_{\text{out}} = 2f$) के रूप में प्रत्यावर्ती धारा (AC) को दिष्ट धारा (DC) में परिवर्तित कर कंप्यूटर, स्मार्टफोन और समस्त आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की रीढ़ बनता है।

रेत (सिलिका) का एक नन्हा सा टुकड़ा कैसे बना आपके स्मार्टफोन और कंप्यूटर का जादुई दिमाग?

1940 के दशक में दुनिया का पहला कंप्यूटर 'ENIAC' लगभग 18,000 कांच की गर्म जलती वैक्यूम ट्यूबों से बना था। वह एक पूरे बड़े मकान जितना स्थान घेरता था, 150 किलोवाट बिजली फूंकता था और कमरे को भट्टी की तरह तपा देता था! परंतु आज आपकी कलाई पर बंधी स्मार्टवॉच उस 30 टन वजनी कंप्यूटर से लाखों गुना अधिक शक्तिशाली है! यह चमत्कारी क्रांति कैसे संभव हुई? समुद्र के किनारे बिखरी साधारण रेत (सिलिकॉन) में जब वैज्ञानिक स्तर पर मात्र 10 लाख में 1 परमाणु की अशुद्धि (Doping) मिलाई गई, तो जन्म हुआ एक ऐसे अद्भुत पदार्थ का जिसकी चालकता को हम इच्छा अनुसार उंगलियों के इशारे पर नियंत्रित कर सकते हैं! यही है 'अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी'—जिसने वैक्यूम ट्यूबों को इतिहास बनाकर दुनिया को आधुनिक डिजिटल युग में पहुंचा दिया! आइए समझें इस सिलिकॉन क्रांति का संपूर्ण भौतिकी सिद्धांत!

यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है

CBSE और CBSE कक्षा 12वीं भौतिकी बोर्ड परीक्षा में 'अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी' इकाई से 5 से 7 अंकों के अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे जाते हैं। ऊर्जा बैंड आरेख के आधार पर चालक, अचालक एवं अर्धचालक में तुलनात्मक अंतर, नैज एवं अपद्रव्यी ($n$-प्रकार व $p$-प्रकार) अर्धचालक में अंतर, दाता व ग्राही ऊर्जा स्तर, द्रव्य अनुपाती क्रिया नियम ($n_e n_h = n_i^2$), $p-n$ संधि निर्माण: ह्रासी परत एवं प्राचीर विभव ($V_0$) की उत्पत्ति, अग्र एवं पश्च अभिनति में $V-I$ अभिलाक्षणिक वक्र, तथा $p-n$ संधि डायोड का अर्ध-तरंग एवं पूर्ण-तरंग दिष्टकारी (Half-Wave & Full-Wave Rectifier) के रूप में परिपथ आरेख, कार्यप्रणाली व तरंगरूप बोर्ड परीक्षा के सर्वाधिक लोकप्रिय 5-अंकीय दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न हैं।

अध्ययन से पूर्व (आवश्यक ज्ञान)

  • परमाणु की इलेक्ट्रॉनिक संरचना एवं सहसंयोजी बंध (Covalent Bonds)।
  • विद्युत धारा, विभव, प्रतिरोध एवं ओम का नियम ($V = IR$)।
  • प्रत्यावर्ती धारा (AC) की आवृत्ति एवं तरंगरूप ($V = V_0 \sin\omega t$)।

इस अध्याय के लक्ष्य

  • ऊर्जा बैंड आरेख (संयोजकता बैंड, चालन बैंड, वर्जित अंतराल $E_g$) द्वारा पदार्थों का वर्गीकरण करना।
  • मादन (Doping) की प्रक्रिया समझना तथा $n$-प्रकार एवं $p$-प्रकार अर्धचालकों के गुणों की तुलना करना।
  • $p-n$ संधि निर्माण में विसरण, अपवाह, ह्रासी परत एवं प्राचीर विभव की भूमिका स्पष्ट करना।
  • अग्र एवं पश्च अभिनति में डायोड के $V-I$ अभिलक्षणों का विश्लेषण करना।
  • पूर्ण-तरंग एवं अर्ध-तरंग दिष्टकारी का परिपथ आरेख बनाकर कार्यप्रणाली तथा निर्गत तरंगरूप का सचित्र वर्णन करना।

अध्याय रूपरेखा एवं प्रगति

1 1. ऊर्जा बैंड सिद्धांत एवं पदार्थों...
2 2. नैज एवं अपद्रव्यी अर्धचालक (Intr...
3 3. p-n संधि डायोड: निर्माण एवं अभिन...
4 4. संधि डायोड दिष्टकारी के रूप में...

सम्पूर्ण सैद्धांतिक एवं वैचारिक अध्ययन

1. ऊर्जा बैंड सिद्धांत एवं पदार्थों का वर्गीकरण

1.1 ऊर्जा बैंड की उत्पत्ति

जब करोड़ों परमाणु मिलकर ठोस क्रिस्टल बनाते हैं, तो पाउली अपवर्जन नियम के अनुसार निकटवर्ती परमाणुओं के अतिव्यापन के कारण विविक्त ऊर्जा स्तर विपाटित होकर सतत ऊर्जा पट्टियों में बदल जाते हैं जिन्हें ऊर्जा बैंड (Energy Bands) कहते हैं:

  • संयोजकता बैंड (Valence Band - VB): संयोजी इलेक्ट्रॉनों से भरा निम्न ऊर्जा बैंड। यह पूर्णतः या आंशिक भरा होता है, कभी पूर्ण रिक्त नहीं होता।
  • चालन बैंड (Conduction Band - CB): संयोजकता बैंड के ऊपर स्थित उच्च ऊर्जा बैंड। इसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉन स्वतंत्र होते हैं और विद्युत चालन करते हैं।
  • वर्जित ऊर्जा अंतराल (Forbidden Energy Gap - $E_g$): CB और VB के मध्य का वह ऊर्जा अंतराल जिसमें कोई अनुमत ऊर्जा स्तर नहीं होता ($E_g = E_C - E_V$)।

1.2 ऊर्जा बैंड के आधार पर तुलना

लक्षणचालक (Conductors)अर्धचालक (Semiconductors)विद्युतरोधी (Insulators)
ऊर्जा अंतराल ($E_g$)$\mathbf{E_g \approx 0}$ (CB व VB अतिव्याप्त)संकीर्ण: $\mathbf{E_g < 3\text{ eV}}$
($\text{Si} = 1.1\text{ eV}, \text{Ge} = 0.72\text{ eV}$)
अत्यधिक चौड़ा: $\mathbf{E_g > 3\text{ eV}}$
(हीरा: $E_g \approx 5.4\text{ eV}$)
चालन बैंड (CB)इलेक्ट्रॉनों से प्रचुर भरा$0\text{ K}$ पर पूर्ण रिक्त, कक्ष ताप पर आंशिक भरापूर्णतः रिक्त (कोई मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं)
ताप का प्रभावताप बढ़ाने पर प्रतिरोध बढ़ता है ($\u0007lpha > 0$)ताप बढ़ाने पर प्रतिरोध घटता है (चालकता बढ़ती है, $\mathbf{\alpha < 0}$)ताप का कोई विशेष प्रभाव नहीं
प्रतिरोधकता ($\rho$)अत्यंत कम ($10^{-8} - 10^{-2}\text{ }\Omega\cdot\text{m}$)मध्यम ($10^{-5} - 10^6\text{ }\Omega\cdot\text{m}$)अत्यधिक उच्च ($10^{11} - 10^{19}\text{ }\Omega\cdot\text{m}$)

2. नैज एवं अपद्रव्यी अर्धचालक (Intrinsic & Extrinsic)

2.1 नैज (शुद्ध) अर्धचालक (Intrinsic Semiconductor)

चतुःसंयोजी शुद्ध सिलिकॉन (Si) या जर्मेनियम (Ge) जिसमें कोई अशुद्धि न हो, नैज अर्धचालक कहलाता है:

  • परम शून्य ताप ($T = 0\text{ K}$): सभी चारों संयोजी इलेक्ट्रॉन सहसंयोजी बंधों में दृढ़ता से बंधे होते हैं। CB पूर्ण रिक्त होता है, अतः अर्धचालक पूर्ण विद्युतरोधी (Perfect Insulator) की भांति व्यवहार करता है।
  • कक्ष ताप ($T > 0\text{ K}$): तापीय ऊर्जा के कारण कुछ सहसंयोजी बंध टूट जाते हैं। मुक्त इलेक्ट्रॉन CB में चले जाते हैं और VB में रिक्त स्थान छोड़ जाते हैं जिसे कोटर या होल (Hole - धनावेशित प्रभावी कण $+e$) कहते हैं।
  • नैज अर्धचालक में इलेक्ट्रॉन संख्या घनत्व ($n_e$) और होल संख्या घनत्व ($n_h$) सर्वदा समान होते हैं:
    $$\mathbf{n_e = n_h = n_i} \quad (n_i = \text{नैज वाहक सांद्रता})$$
    कुल धारा: $\mathbf{I = I_e + I_h}$।

2.2 मादन एवं अपद्रव्यी अर्धचालक (Extrinsic Semiconductors)

मादन (Doping): शुद्ध अर्धचालक की विद्युत चालकता को कई लाख गुना बढ़ाने के लिए उसमें नियंत्रित मात्रा में (लगभग $1\text{ ppm}$) उपयुक्त अशुद्धि मिलाने की क्रिया को मादन कहते हैं।

1. n-प्रकार अर्धचालक (n-type Semiconductor):
• जब शुद्ध Si में पंचसंयोजी अपद्रव्य (Pentavalent: P, As, Sb - दाता Donors) मिलाया जाता है।
• 4 इलेक्ट्रॉन बंध बनाते हैं तथा 5वां इलेक्ट्रॉन कमरे के ताप पर ही मुक्त हो जाता है।
• बहुसंख्यक आवेश वाहक (Majority Carriers): इलेक्ट्रॉन ($n_e \gg n_h$)।
• अल्पसंख्यक आवेश वाहक (Minority Carriers): होल ($n_h$)।
• दाता ऊर्जा स्तर ($E_d$): चालन बैंड के ठीक नीचे ($0.01-0.05\text{ eV}$) स्थित होता है。

2. p-प्रकार अर्धचालक (p-type Semiconductor):
• जब शुद्ध Si में त्रिसंयोजी अपद्रव्य (Trivalent: B, Al, In, Ga - ग्राही Acceptors) मिलाया जाता है।
• 3 इलेक्ट्रॉन बंध बनाते हैं और चौथे बंध में एक इलेक्ट्रॉन की कमी (होल) रह जाती है।
• बहुसंख्यक आवेश वाहक: कोटर/होल ($n_h \gg n_e$)।
• अल्पसंख्यक आवेश वाहक: इलेक्ट्रॉन ($n_e$)।
• ग्राही ऊर्जा स्तर ($E_a$): संयोजकता बैंड के ठीक ऊपर स्थित होता है।

द्रव्य अनुपाती क्रिया का नियम (Law of Mass Action): तापीय साम्यावस्था में:
$$\mathbf{n_e \cdot n_h = n_i^2}$$

विशेष चेतावनी: $n$-प्रकार तथा $p$-प्रकार दोनों ही अर्धचालक विद्युत रूप से पूर्णतः उदासीन (Electrically Neutral) होते हैं, क्योंकि जितने इलेक्ट्रॉन/होल उत्पन्न होते हैं, जालक में उतने ही विपरीत आवेशित दाता/ग्राही स्थिर आयन उपस्थित होते हैं!

3. p-n संधि डायोड: निर्माण एवं अभिनति (Biasing)

3.1 p-n संधि का निर्माण

जब एक ही एकल क्रिस्टल में एक भाग $p$-प्रकार तथा दूसरा भाग $n$-प्रकार का बनाया जाता है:

  • विसरण धारा (Diffusion Current): सांद्रता प्रवणता के कारण $p$-क्षेत्र से होल $n$-क्षेत्र की ओर तथा $n$-क्षेत्र से इलेक्ट्रॉन $p$-क्षेत्र की ओर विसरित होते हैं।
  • ह्रासी परत (Depletion Region): संधि के निकट इलेक्ट्रॉन व होल परस्पर मिलकर उदासीन हो जाते हैं। संधि के $n$-तरफ धनात्मक दाता आयनों ($N_d^+$) तथा $p$-तरफ ऋणात्मक ग्राही आयनों ($N_a^-$) की एक अचल (Immobile) परत बन जाती है जिसमें कोई गतिशील आवेश वाहक नहीं होता। इस परत को ह्रासी परत कहते हैं (मोटाई $\sim 10^{-6}\text{ m} = 1\text{ }\mu\text{m}$)।
  • प्राचीर विभव (Barrier Potential - $V_0$): अचल आयनों के कारण संधि पर $n$ से $p$ की दिशा में एक आंतरिक विद्युत क्षेत्र ($E_{\text{int}} \sim 10^6\text{ V/m}$) उत्पन्न हो जाता है जो आगे होने वाले विसरण को रोक देता है। इस विभवांतर को प्राचीर विभव कहते हैं ($\text{Si}$ हेतु $\approx 0.7\text{ V}$, $\text{Ge}$ हेतु $\approx 0.3\text{ V}$)।
  • साम्यावस्था में: विसरण धारा = अपवाह धारा (नेट धारा शून्य होती है)।

3.2 अग्र एवं पश्च अभिनति (Forward & Reverse Bias)

  1. अग्र अभिनति (Forward Bias):
    • डायोड के $p$-क्षेत्र को बैटरी के धन ध्रुव (+) से तथा $n$-क्षेत्र को ऋण ध्रुव (-) से जोड़ा जाता है।
    • बाह्य विद्युत क्षेत्र आंतरिक प्राचीर क्षेत्र के विपरीत होता है।
    • परिणाम: ह्रासी परत की चौड़ाई घटती है, प्रभावी विभव प्राचीर ($V_0 - V$) कम हो जाता है, और देहली विभव (Knee Voltage $\sim 0.7\text{ V}$) के पार होते ही तीव्र धारा मिली-ऐम्पीयर (mA) में प्रवाहित होती है।
  2. पश्च अभिनति (Reverse Bias):
    • डायोड के $p$-क्षेत्र को बैटरी के ऋण ध्रुव (-) से तथा $n$-क्षेत्र को धन ध्रुव (+) से जोड़ा जाता है।
    • बाह्य क्षेत्र आंतरिक प्राचीर क्षेत्र की ही दिशा में जुड़ जाता है।
    • परिणाम: ह्रासी परत की चौड़ाई बढ़ जाती है, प्रभावी रोधिका विभव ($V_0 + V$) बढ़ जाता है। बहुसंख्यक वाहक संधि पार नहीं कर पाते। केवल तापीय रूप से जनित अल्पसंख्यक वाहकों के कारण एक अतिसूक्ष्म नियत धारा माइक्रो-ऐम्पीयर ($\mu$A) में बहती है जिसे पश्च संतृप्त धारा (Reverse Saturation Current) कहते हैं।

4. संधि डायोड दिष्टकारी के रूप में (Diode as Rectifier)

4.1 दिष्टकरण (Rectification) का सिद्धांत

परिभाषा: प्रत्यावर्ती धारा (AC) को एकदिशीय दिष्ट धारा (DC) में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को दिष्टकरण तथा इस कार्य हेतु प्रयुक्त परिपथ को दिष्टकारी (Rectifier) कहते हैं।

मूल सिद्धांत: $p-n$ संधि डायोड अग्र अभिनति में अत्यंत कम प्रतिरोध ($R_f \approx 0$) प्रस्तुत कर धारा को गुजरने देता है, जबकि पश्च अभिनति में अत्यधिक उच्च प्रतिरोध ($R_r \to \infty$) प्रस्तुत कर धारा को रोक देता है। इस एकदिशीय गुण के कारण डायोड दिष्टकारी का कार्य करता है।

4.2 अर्ध-तरंग एवं पूर्ण-तरंग दिष्टकारी की तुलना

प्राचलअर्ध-तरंग दिष्टकारी (Half-Wave)पूर्ण-तरंग दिष्टकारी (Full-Wave)
डायोडों की संख्याकेवल $1$ डायोड ($D_1$)$2$ डायोड ($D_1$ व $D_2$) केंद्र-टैप ट्रांसफॉर्मर युक्त
कार्यप्रणालीनिवेशी AC के केवल धनात्मक अर्ध-चक्र में डायोड अग्र अभिनत होकर धारा प्रवाहित करता है; ऋणात्मक अर्ध-चक्र में बंद रहता है।धनात्मक अर्ध-चक्र में $D_1$ चालन करता है तथा ऋणात्मक अर्ध-चक्र में $D_2$ चालन करता है। लोड $R_L$ में दोनों चक्रों में धारा एक ही दिशा में बहती है।
निर्गत आवृत्ति ($f_{\text{out}}$)$\mathbf{f_{\text{out}} = f_{\text{in}}}$ (यदि निवेशी $50\text{ Hz}$ तो निर्गत $50\text{ Hz}$)$\mathbf{f_{\text{out}} = 2 f_{\text{in}}}$ (यदि निवेशी $50\text{ Hz}$ तो निर्गत $\mathbf{100\text{ Hz}}$)
अधिकतम दक्षता ($\eta_{\max}$)$\mathbf{40.6\%}$$\mathbf{81.2\%}$
रिपल गुणांक (Ripple Factor)$1.21$ (अधिक स्पंदन)$0.48$ (कम स्पंदन, अधिक स्थिर DC)
फिल्टर परिपथ (Filter Circuit): दिष्टकारी से प्राप्त स्पंदमान DC में AC घटक (तरंगिलता) को समाप्त कर एक स्थिर, चिकनी DC प्राप्त करने के लिए लोड $R_L$ के समांतर क्रम में एक उच्च धारिता का संधारित्र ($C$-फिल्टर) जोड़ा जाता है।

प्रमुख भौतिक सूत्र, नियम एवं नियतांक

वर्जित अंतराल Eg
Si: E_g = 1.1 eV; Ge: E_g = 0.72 eV; हीरा: E_g ≈ 5.4 eV
नैज वाहक सांद्रता
$$n_e = n_h = n_i \quad (I = I_e + I_h)$$
द्रव्य अनुपाती नियम
n_e · n_h = n_i^2 (तापीय साम्यावस्था में)
n-प्रकार संबंध
n_e ≈ N_d n_h (इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक)
p-प्रकार संबंध
n_h ≈ N_a n_e (होल बहुसंख्यक)
प्राचीर विभव V₀
$$\text{Si}: V_0 \approx 0.7\text{ V}; \quad \text{Ge}: V_0 \approx 0.3\text{ V}$$
अग्र बायस विभव
V_{eff} = V_0 - V (ह्रासी परत संकीर्ण होती है)
पश्च बायस विभव
V_{eff} = V_0 + V (ह्रासी परत चौड़ी होती है)
अर्ध-तरंग निर्गत आवृत्ति
$$f_{\text{out}} = f_{\text{in}} \quad (\eta_{\max} = 40.6\%)$$
पूर्ण-तरंग निर्गत आवृत्ति
$$f_{\text{out}} = 2 f_{\text{in}} \quad (\eta_{\max} = 81.2\%)$$
गतिक प्रतिरोध rd
r_d = { V}{ I} (अभिलाक्षणिक वक्र की ढाल का व्युत्क्रम)
विद्युत चालकता σ
= e(n_e _e + n_h _h) ( = गतिशीलता)

अवधारणात्मक हल उदाहरण एवं अनुप्रयोग (Solved Examples)

उदाहरण 1
ऊर्जा बैंड आरेख खींचकर चालक, अचालक (विद्युतरोधी) तथा अर्धचालक में अंतर स्पष्ट कीजिए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
ऊर्जा बैंड संरचना के आधार पर पदार्थों का वर्गीकरण:

1. चालक (Conductors - जैसे तांबा, ऐलुमिनियम):
• इनमें संयोजकता बैंड (VB) और चालन बैंड (CB) परस्पर अतिव्याप्त (Overlap) होते हैं अथवा चालन बैंड आंशिक भरा होता है।
• वर्जित ऊर्जा अंतराल शून्य होता है ($E_g \approx 0$)。
• सामान्य ताप पर भी चालन हेतु प्रचुर मात्रा में मुक्त इलेक्ट्रॉन उपलब्ध रहते हैं。

2. विद्युतरोधी (Insulators - जैसे कांच, हीरा):
• इनमें संयोजकता बैंड पूर्णतः भरा होता है तथा चालन बैंड पूर्णतः रिक्त होता है।
• इनके मध्य वर्जित ऊर्जा अंतराल अत्यधिक चौड़ा ($E_g > 3\text{ eV}$) होता है (जैसे हीरे हेतु $E_g \approx 5.4\text{ eV}$)।
• अत्यधिक विद्युत क्षेत्र लगाने पर भी इलेक्ट्रॉन VB से CB में नहीं जा पाते, अतः चालकता शून्य होती है。

3. अर्धचालक (Semiconductors - जैसे Si, Ge):
• इनमें संयोजकता बैंड पूर्ण भरा तथा चालन बैंड सामान्यतः रिक्त होता है, परंतु वर्जित अंतराल संकीर्ण ($E_g < 3\text{ eV}$) होता है (सिलिकॉन हेतु $E_g = 1.1\text{ eV}$ तथा जर्मेनियम हेतु $E_g = 0.72\text{ eV}$)।
• $0\text{ K}$ ताप पर ये पूर्ण कुचालक होते हैं, परंतु कमरे के ताप पर तापीय ऊर्जा पाकर कुछ इलेक्ट्रॉन CB में पहुंच जाते हैं जिससे मध्यम चालकता प्राप्त होती है।
उदाहरण 2
एक $p-n$ संधि डायोड के निर्माण में 'ह्रासी परत' (Depletion Layer) तथा 'प्राचीर विभव' (Barrier Potential) की उत्पत्ति कैसे होती है? समझाइए।
विस्तृत समाधान / उत्तर:
$p-n$ संधि में ह्रासी परत एवं प्राचीर विभव की उत्पत्ति:

1. विसरण प्रक्रिया (Diffusion): संधि बनने के तुरंत बाद, सांद्रता प्रवणता के कारण $p$-क्षेत्र से बहुसंख्यक कोटर (होल) $n$-क्षेत्र की ओर तथा $n$-क्षेत्र से बहुसंख्यक इलेक्ट्रॉन $p$-क्षेत्र की ओर विसरित होते हैं। इस प्रवाह से 'विसरण धारा' बहती है。

2. ह्रासी परत का निर्माण:
• संधि के समीप पहुँचकर इलेक्ट्रॉन और होल परस्पर मिलकर एक-दूसरे को उदासीन कर देते हैं।
• इसके परिणामस्वरूप, संधि के $n$-क्षेत्र की ओर स्थिर धनात्मक दाता आयनों ($N_d^+$) की तथा $p$-क्षेत्र की ओर स्थिर ऋणात्मक ग्राही आयनों ($N_a^-$) की एक अचल परत शेष रह जाती है।
• संधि के आसपास का यह संकीर्ण क्षेत्र (लगभग $1\text{ }\mu\text{m}$) गतिशील आवेश वाहकों (इलेक्ट्रॉन व होल) से पूर्णतः रिक्त हो जाता है, अतः इसे ह्रासी परत (Depletion Region) कहते हैं。

3. प्राचीर विभव की उत्पत्ति:
• इन अचल आयनों के कारण $n$-क्षेत्र से $p$-क्षेत्र की दिशा में एक आंतरिक विद्युत क्षेत्र ($E_{\text{int}} \sim 10^6\text{ V/m}$) स्थापित हो जाता है।
• यह क्षेत्र आगे होने वाले बहुसंख्यक वाहकों के विसरण का प्रबल विरोध करता है।
• ह्रासी परत के दोनों सिरों के मध्य उत्पन्न इस स्थिर विभवांतर को प्राचीर विभव (Barrier Potential - $V_0$) कहते हैं (Si के लिए $\approx 0.7\text{ V}$)।
उदाहरण 3
$p-n$ संधि डायोड का पूर्ण-तरंग दिष्टकारी (Full-Wave Rectifier) के रूप में परिपथ आरेख खींचिए तथा इसकी कार्यप्रणाली स्पष्ट कीजिए। यदि निवेशी AC आवृत्ति $50\text{ Hz}$ हो, तो निर्गत DC आवृत्ति क्या होगी?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
पूर्ण-तरंग दिष्टकारी की कार्यप्रणाली:

1. परिपथ व्यवस्था: एक केंद्र-टैप (Center-tapped) ट्रांसफॉर्मर की द्वितीयक कुंडली के सिरों $A$ और $B$ से दो $p-n$ संधि डायोड $D_1$ और $D_2$ के $p$-सिरों को जोड़ा जाता है। दोनों डायोडों के $n$-सिरों को आपस में जोड़कर लोड प्रतिरोध $R_L$ तथा ट्रांसफॉर्मर के केंद्रीय बिंदु $C$ के मध्य निर्गत वोल्टता ली जाती है。

2. धनात्मक अर्ध-चक्र में:
• सिरा $A$ धनात्मक तथा $B$ ऋणात्मक होता है।
• डायोड $D_1$ अग्र अभिनत (ON) होता है तथा $D_2$ पश्च अभिनत (OFF) होता है।
• अतः लोड $R_L$ में धारा $D_1$ के कारण $X$ से $Y$ की दिशा में प्रवाहित होती है。

3. ऋणात्मक अर्ध-चक्र में:
• सिरा $A$ ऋणात्मक तथा $B$ धनात्मक हो जाता है।
• अब डायोड $D_1$ पश्च अभिनत (OFF) तथा $D_2$ अग्र अभिनत (ON) हो जाता है।
• पुनः लोड $R_L$ में धारा $D_2$ के कारण उसी समान दिशा ($X$ से $Y$) में प्रवाहित होती है。

4. निष्कर्ष: लोड में दोनों अर्ध-चक्रों में धारा एक ही दिशा में बहती है, अतः पूर्ण-तरंग दिष्ट DC प्राप्त होती है。

निर्गत आवृत्ति की गणना:
पूर्ण-तरंग दिष्टकारी में एक पूर्ण चक्र में निर्गत स्पंद दो बार प्राप्त होते हैं:
$$f_{\text{out}} = 2 \times f_{\text{in}} = 2 \times 50\text{ Hz} = \mathbf{100\text{ Hz}}$$
उत्तर: निर्गत आवृत्ति $\mathbf{100\text{ Hz}}$ होगी।
उदाहरण 4
$n$-प्रकार तथा $p$-प्रकार के अर्धचालकों में मुख्य अंतर लिखिए। क्या $n$-प्रकार का अर्धचालक ऋणावेशित होता है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
$n$-प्रकार एवं $p$-प्रकार अर्धचालक में अंतर:

लक्षण$n$-प्रकार अर्धचालक$p$-प्रकार अर्धचालक
अपद्रव्य परमाणुपंचसंयोजी (दाता - जैसे P, As, Sb)त्रिसंयोजी (ग्राही - जैसे B, Al, In)
बहुसंख्यक वाहकमुक्त इलेक्ट्रॉन ($n_e \gg n_h$)कोटर / होल ($n_h \gg n_e$)
अल्पसंख्यक वाहकहोल ($n_h$)इलेक्ट्रॉन ($n_e$)
ऊर्जा स्तर स्थितिदाता स्तर ($E_d$) चालन बैंड के ठीक नीचेग्राही स्तर ($E_a$) संयोजकता बैंड के ठीक ऊपर

क्या $n$-प्रकार का अर्धचालक ऋणावेशित होता है?
उत्तर: नहीं! $n$-प्रकार का अर्धचालक विद्युत रूप से पूर्णतः उदासीन (Electrically Neutral) होता है।
कारण: यद्यपि इसमें बहुसंख्यक वाहक ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन होते हैं, परंतु प्रत्येक मुक्त इलेक्ट्रॉन के साथ जालक में एक स्थिर धनावेशित दाता आयन ($P^+$ या $As^+$) भी मौजूद होता है। चूंकि मादन से पूर्व सिलिकॉन और अपद्रव्य परमाणु दोनों उदासीन थे, अतः पूरा क्रिस्टल विद्युत उदासीन ही रहता है।
उदाहरण 5
शुद्ध सिलिकॉन में कमरे के ताप पर नैज वाहक सांद्रता $n_i = 1.5 \times 10^{16}\text{ m}^{-3}$ है। यदि इसे इंडियम द्वारा मादित करके होल सांद्रता $n_h = 4.5 \times 10^{22}\text{ m}^{-3}$ कर दी जाए, तो इलेक्ट्रॉन सांद्रता ($n_e$) ज्ञात कीजिए। यह किस प्रकार का अर्धचालक है?
विस्तृत समाधान / उत्तर:
दिया है:
नैज वाहक सांद्रता $n_i = 1.5 \times 10^{16}\text{ m}^{-3}$
होल सांद्रता $n_h = 4.5 \times 10^{22}\text{ m}^{-3}$

सूत्र (द्रव्य अनुपाती क्रिया का नियम):
$$n_e \cdot n_h = n_i^2 \implies n_e = \frac{n_i^2}{n_h}$$
गणना:
$$n_e = \frac{(1.5 \times 10^{16})^2}{4.5 \times 10^{22}} = \frac{2.25 \times 10^{32}}{4.5 \times 10^{22}}$$
$$n_e = 0.5 \times 10^{10} = \mathbf{5.0 \times 10^9\text{ m}^{-3}}$$

अर्धचालक का प्रकार:
चूंकि यहाँ होल सांद्रता ($n_h = 4.5 \times 10^{22}$) इलेक्ट्रॉन सांद्रता ($n_e = 5.0 \times 10^9$) की तुलना में खरबों गुना अधिक है ($n_h \gg n_e$), तथा मादन त्रिसंयोजी इंडियम द्वारा किया गया है, अतः यह एक $p$-प्रकार (p-type) अर्धचालक है।

सामान्य गलतियाँ एवं परीक्षक के जाल (Examiner Traps)

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

$n$-प्रकार अर्धचालक को ऋणावेशित और $p$-प्रकार को धनावेशित समझना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

दोनों ही प्रकार के अर्धचालक विद्युत रूप से पूर्णतः उदासीन (Neutral) होते हैं, क्योंकि मुक्त वाहकों के साथ विपरीत आवेशित स्थिर आयन भी उपस्थित होते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

पूर्ण-तरंग दिष्टकारी की निर्गत आवृत्ति को निवेशी आवृत्ति के समान मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पूर्ण-तरंग दिष्टकारी में निर्गत आवृत्ति निवेशी की दोगुनी होती है ($f_{\text{out}} = 2 f_{\text{in}} = 100\text{ Hz}$); केवल अर्ध-तरंग में यह $f$ रहती है।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

पश्च अभिनति में धारा पूरी तरह शून्य मान लेना।

सही वैज्ञानिक तथ्य

पश्च अभिनति में धारा शून्य नहीं होती, बल्कि अल्पसंख्यक वाहकों के कारण एक अतिसूक्ष्म नियत धारा ($\mu\text{A}$ में) बहती है जिसे पश्च संतृप्त धारा कहते हैं।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

ताप बढ़ाने पर अर्धचालक का प्रतिरोध बढ़ने का भ्रम।

सही वैज्ञानिक तथ्य

धातुओं के विपरीत, ताप बढ़ाने पर अर्धचालकों में सहसंयोजी बंध टूटने से मुक्त वाहक बढ़ते हैं, जिससे उनका प्रतिरोध घटता है (चालकता बढ़ती है, $\alpha < 0$)।

सामान्य भ्रम / गलत उत्तर

अग्र अभिनति में ह्रासी परत चौड़ी होने का भ्रम।

सही वैज्ञानिक तथ्य

अग्र अभिनति में ह्रासी परत संकीर्ण (Narrow) होती है और प्राचीर विभव घटता है; पश्च अभिनति में ह्रासी परत चौड़ी होती है।

अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: ऊर्जा बैंड, p-n संधि व दिष्टकारी

अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: ऊर्जा बैंड, p-n संधि व पूर्ण-तरंग दिष्टकारी1. ऊर्जा बैंड व मादनवर्जित अंतराल व प्रकार• Eg: Si=1.1 eV, Ge=0.72 eVचालक Eg≈0, कुचालक Eg>3 eV• n-प्रकार: पंचसंयोजी (P, As)दाता स्तर Ed; इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक• p-प्रकार: त्रिसंयोजी (B, Al)ग्राही स्तर Ea; होल बहुसंख्यक• द्रव्य अनुपाती नियम:n_e · n_h = n_i² (सर्वत्र सत्य)दोनों प्रकार विद्युत उदासीन हैं!2. p-n संधि डायोडह्रासी परत व विभव प्राचीर• ह्रासी परत (Depletion Region):अचल आयन परत, वाहक शून्य (~1 μm)• प्राचीर विभव: V₀ ≈ 0.7 V (Si)आंतरिक विद्युत क्षेत्र E ~ 10⁶ V/m• अग्र बायस (Forward Bias):p(+) n(-); ह्रासी परत घटी; धारा mA• पश्च बायस (Reverse Bias):p(-) n(+); ह्रासी परत बढ़ी; धारा μAएकदिशीय चालकता गुण!3. दिष्टकारी (Rectifier)AC को DC में बदलना• अर्ध-तरंग दिष्टकारी (1 Diode):f_out = f_in; दक्षता η_max = 40.6%• पूर्ण-तरंग दिष्टकारी (2 Diodes):f_out = 2 f_in (50Hz ⇒ 100Hz)दक्षता η_max = 81.2% (दोगुनी)• लोड में धारा सदैव एकदिशीय• संधारित्र फिल्टर (C-Filter):स्पंदमान DC को चिकनी DC में बदलनाआधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स का आधारबोर्ड परीक्षा के प्रमुख संप्रत्यय (Golden Semiconductor Capsule)मादन व उदासीनता:n-प्रकार (पंचसंयोजी दाता) व p-प्रकार (त्रिसंयोजी ग्राही) दोनों विद्युत उदासीन होते हैं; n_e n_h = n_i²।p-n संधि बायसन:अग्र बायस में ह्रासी परत संकीर्ण व धारा mA में; पश्च बायस में ह्रासी परत चौड़ी व धारा μA में।दिष्टकारी आवृत्ति:अर्ध-तरंग: f_out = f (40.6%); पूर्ण-तरंग: f_out = 2f (81.2%); संधारित्र रिपल घटाता है।

अध्याय का सार संक्षेप एवं 10 मुख्य निष्कर्ष

मुख्य बिंदु 1
ऊर्जा बैंड: चालक Eg≈0, अर्धचालक Eg<3 eV (Si=1.1 eV, Ge=0.72 eV), विद्युतरोधी Eg>3 eV (हीरा 5.4 eV)।
मुख्य बिंदु 2
नैज अर्धचालक 0 K पर पूर्ण कुचालक; कक्ष ताप पर n_e = n_h = n_i तथा कुल धारा I = I_e + I_h।
मुख्य बिंदु 3
n-प्रकार: पंचसंयोजी अपद्रव्य (P, As); दाता स्तर Ed चालन बैंड के नीचे; इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक वाहक।
मुख्य बिंदु 4
p-प्रकार: त्रिसंयोजी अपद्रव्य (B, Al); ग्राही स्तर Ea संयोजकता बैंड के ऊपर; होल बहुसंख्यक वाहक।
मुख्य बिंदु 5
द्रव्य अनुपाती क्रिया नियम: n_e · n_h = n_i²; n-प्रकार व p-प्रकार दोनों क्रिस्टल विद्युत उदासीन होते हैं।
मुख्य बिंदु 6
p-n संधि में विसरण व अपवाह साम्य से ह्रासी परत (~1 μm) एवं प्राचीर विभव V₀ (~0.7 V for Si) बनते हैं।
मुख्य बिंदु 7
अग्र अभिनति [p(+), n(-)]: ह्रासी परत संकीर्ण होती है, रोधिका घटती है, धारा mA में बहती है।
मुख्य बिंदु 8
पश्च अभिनति [p(-), n(+)]: ह्रासी परत चौड़ी होती है, रोधिका बढ़ती है, केवल अल्प वाहकों की μA धारा बहती है।
मुख्य बिंदु 9
दिष्टकरण: डायोड की एकदिशीय चालकता द्वारा प्रत्यावर्ती धारा (AC) को दिष्ट धारा (DC) में बदलना।
मुख्य बिंदु 10
अर्ध-तरंग दिष्टकारी: f_out = f_in (दक्षता 40.6%); पूर्ण-तरंग दिष्टकारी: f_out = 2f_in (दक्षता 81.2%)।

स्व-मूल्यांकन अभ्यास (Check Your Understanding)

मूल वैचारिक स्पष्टता की जांच के लिए नैदानिक प्रश्न। पहले स्वयं हल करें, फिर उत्तर देखें।

1
ऊर्जा अंतराल (Eg) के आधार पर चालक तथा अर्धचालक में मुख्य अंतर लिखिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: चालकों में संयोजकता बैंड तथा चालन बैंड परस्पर अतिव्याप्त होते हैं अतः वर्जित ऊर्जा अंतराल शून्य होता है (Eg ≈ 0)। जबकि अर्धचालकों में संयोजकता और चालन बैंड के मध्य एक संकीर्ण वर्जित ऊर्जा अंतराल होता है (Eg < 3 eV, जैसे Si हेतु 1.1 eV तथा Ge हेतु 0.72 eV)।
2
क्या n-प्रकार का अर्धचालक ऋणात्मक रूप से आवेशित होता है? कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: नहीं, n-प्रकार का अर्धचालक विद्युत रूप से पूर्णतः उदासीन (Neutral) होता है। यद्यपि इसमें बहुसंख्यक वाहक ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन होते हैं, परंतु प्रत्येक मुक्त इलेक्ट्रॉन के संगत जालक में एक स्थिर धनावेशित दाता आयन भी मौजूद रहता है।
3
अग्र अभिनति (Forward Bias) करने पर p-n संधि की 'ह्रासी परत की चौड़ाई' पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: अग्र अभिनति में बाह्य विद्युत क्षेत्र आंतरिक रोधिका क्षेत्र के विपरीत दिशा में कार्य करता है, जिससे ह्रासी परत की चौड़ाई घट जाती है (संकीर्ण हो जाती है) और प्राचीर विभव (V₀ - V) कम हो जाता है।
4
यदि किसी पूर्ण-तरंग दिष्टकारी (Full-Wave Rectifier) को 50 Hz आवृत्ति की AC आपूर्ति दी जाए, तो निर्गत DC की आवृत्ति क्या होगी?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: निर्गत DC की आवृत्ति निवेशी AC आवृत्ति की दोगुनी होगी: f_out = 2 × 50 Hz = 100 Hz।
5
दिष्टकारी के निर्गत में 'संधारित्र फिल्टर' (Capacitor Filter) लगाने का क्या उद्देश्य होता है?
उत्तर एवं व्याख्या देखें
उत्तर: दिष्टकारी से प्राप्त निर्गत DC स्पंदमान (Pulsating) होती है जिसमें AC तरंगें (रिपल) मौजूद होती हैं। संधारित्र फिल्टर इन AC घटकों को बाइपास करके लोड पर एक स्थिर एवं चिकनी (Smooth) दिष्ट धारा (DC) प्रदान करता है।
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