1.1 चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field - $\vec{B}$) एवं लॉरेंट्ज बल
गतिमान आवेश अथवा धारावाही चालक के चारों ओर का वह क्षेत्र जिसमें कोई अन्य गतिमान आवेश अथवा चुंबकीय सुई चुंबकीय बल का अनुभव करती है, चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है। इसका SI मात्रक टेस्ला (Tesla - T) अथवा $\text{Wb/m}^2$ है ($1\text{ Tesla} = 10^4\text{ Gauss}$)।
$$\mathbf{\vec{F}_m = q(\vec{v} \times \vec{B})} \implies F_m = q v B \sin\theta$$जहाँ $\theta$, $\vec{v}$ और $\vec{B}$ के बीच का कोण है। बल की दिशा दाएं हाथ के अंगूठे के नियम (Right Hand Rule) से निर्धारित होती है。
• विशेष स्थितियां:
1. यदि आवेश स्थिर हो ($v = 0$): $F_m = 0$ (स्थिर आवेश पर चुंबकीय बल कभी नहीं लगता)।
2. यदि आवेश क्षेत्र के समांतर गति करे ($\theta = 0^\circ$ या $180^\circ$): $F_m = 0$ (कोई विक्षेप नहीं)।
3. यदि आवेश क्षेत्र के लंबवत गति करे ($\theta = 90^\circ$): $\mathbf{F_{\max} = q v B}$ (अधिकतम बल)।
• शून्य कार्य प्रमेय: चूंकि $\vec{F}_m \perp \vec{v}$, अतः तात्क्षणिक शक्ति $P = \vec{F}_m \cdot \vec{v} = 0$। चुंबकीय बल द्वारा आवेशित कण पर किया गया कार्य सदैव शून्य होता है ($W = 0$); यह केवल कण की दिशा बदलता है, उसकी चाल और गतिज ऊर्जा अपरिवर्तित रहती है!
संपूर्ण लॉरेंट्ज बल (Total Lorentz Force): यदि कण विद्युत क्षेत्र $\vec{E}$ एवं चुंबकीय क्षेत्र $\vec{B}$ दोनों में गतिमान हो:
$$\mathbf{\vec{F} = q(\vec{E} + \vec{v} \times \vec{B})}$$
1.2 एकसमान चुंबकीय क्षेत्र में आवेशित कण की वृत्तीय एवं हेलिकल गति
- जब कण क्षेत्र के लंबवत प्रवेश करता है ($\theta = 90^\circ$):
चुंबकीय बल $\vec{F}_m$ सदैव वेग $\vec{v}$ के लंबवत केंद्र की ओर कार्य करता है, जो आवश्यक अभिकेंद्रीय बल प्रदान करता है:
$$\frac{m v^2}{r} = q v B \implies \mathbf{r = \frac{m v}{q B} = \frac{p}{q B} = \frac{\sqrt{2mK}}{qB}}$$
जहाँ $p = mv$ संवेग तथा $K = \frac{p^2}{2m}$ गतिज ऊर्जा है।
• आवर्तकाल (Time Period - $T$) एवं आवृत्ति (Frequency - $\nu$):
$$T = \frac{2\pi r}{v} = \frac{2\pi}{v} \left( \frac{mv}{qB} \right) = \mathbf{\frac{2\pi m}{q B}}$$$$\nu = \frac{1}{T} = \mathbf{\frac{q B}{2\pi m}}$$
क्रांतिक निष्कर्ष: वृत्ताकार पथ का आवर्तकाल और आवृत्ति कण के वेग ($v$) तथा त्रिज्या ($r$) पर बिल्कुल निर्भर नहीं करते! - जब कण किसी कोण $\theta$ ($0^\circ < \theta < 90^\circ$) पर प्रवेश करता है:
वेग के दो घटक होते हैं: $v_\parallel = v\cos\theta$ (क्षेत्र के अनुदिश, कोई बल नहीं) तथा $v_\perp = v\sin\theta$ (क्षेत्र के लंबवत, वृत्तीय गति कराता है)। इन दोनों के संयुक्त प्रभाव से कण का पथ एक कुंडलिनी (Helix) बन जाता है:
त्रिज्या $r = \frac{m v_\perp}{q B} = \frac{m v \sin\theta}{q B}$ तथा पिच (Pitch - एक आवर्तकाल में तय रेखीय दूरी) $p = v_\parallel \times T = \frac{2\pi m v \cos\theta}{q B}$।