1.1 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं परिभाषा
परिभाषा: जब किसी उपयुक्त उच्च आवृत्ति (जैसे पराबैंगनी या दृश्य प्रकाश) का प्रकाश किसी धात्विक पृष्ठ पर आपतित होता है, तो धातु की सतह से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन होने लगता है। इस परिघटना को प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photoelectric Effect) तथा उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों को प्रकाश-इलेक्ट्रॉन (Photoelectrons) कहते हैं।
- हर्ट्ज का प्रेक्षण (1887): स्पार्क गैप पर पराबैंगनी प्रकाश डालने पर विद्युत विसर्जन अधिक सुगमता से होता है।
- हॉलवैक्स तथा लेनार्ड के प्रयोग (1888-1902): उन्होंने निर्वातित नलिका में दो इलेक्ट्रोडों (उत्सर्जक $C$ व संग्राहक $A$) पर प्रकाश डालकर प्रकाश-विद्युत धारा का विस्तृत अध्ययन किया।
1.2 प्रकाश-विद्युत प्रभाव के 4 प्रमुख प्रायोगिक निष्कर्ष
- 1. प्रकाश की तीव्रता का प्रभाव:
एक नियत आवृत्ति पर, प्रकाश-विद्युत धारा आपतित प्रकाश की तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होती है ($I \propto \text{Intensity}$)। तीव्रता बढ़ाने पर प्रति सेकंड उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ती है, परंतु उनकी अधिकतम गतिज ऊर्जा में कोई परिवर्तन नहीं होता। - 2. विभव का प्रभाव एवं निरोधी विभव (Stopping Potential - $V_0$):
• संग्राहक पट्टिका $A$ का धन विभव बढ़ाने पर धारा बढ़कर एक अधिकतम नियत मान पर पहुंच जाती है जिसे संतृप्त धारा (Saturation Current) कहते हैं।
• संग्राहक पट्टिका पर लगाया गया वह न्यूनतम ऋणात्मक विभव जिस पर प्रकाश-विद्युत धारा शून्य हो जाती है, निरोधी विभव (संस्तब्ध विभव - Cut-off Potential $V_0$) कहलाता है:
$$\mathbf{e V_0 = K_{\max} = \frac{1}{2} m v_{\max}^2}$$
महत्वपूर्ण: निरोधी विभव $V_0$ आपतित प्रकाश की तीव्रता पर बिल्कुल निर्भर नहीं करता, बल्कि केवल आवृत्ति पर निर्भर करता है। - 3. देहली आवृत्ति (Threshold Frequency - $\nu_0$):
प्रत्येक धातु के लिए आपतित प्रकाश की एक निश्चित न्यूनतम आवृत्ति होती है जिसके नीचे धातु से कोई इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं होता, चाहे प्रकाश की तीव्रता कितनी भी अधिक क्यों न हो। इसे देहली आवृत्ति ($\nu_0$) तथा संगत अधिकतम तरंगदैर्ध्य को देहली तरंगदैर्ध्य (Threshold Wavelength - $\lambda_0 = c/\nu_0$) कहते हैं। - 4. उत्सर्जन की तात्कालिकता (No Time Lag):
धातु की सतह पर प्रकाश के आपतित होने तथा इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जित होने के मध्य कोई समय-पश्चता नहीं होती। यह प्रक्रिया तात्क्षणिक होती है (समय अंतराल $\mathbf{< 10^{-9}\text{ सेकंड}}$)।
1.3 शास्त्रीय तरंग सिद्धांत की विफलता (Failure of Wave Theory)
1. तीव्रता व ऊर्जा का विरोधाभास: तरंग सिद्धांत के अनुसार तरंग की ऊर्जा तीव्रता पर निर्भर करती है। अतः अधिक तीव्रता के प्रकाश से उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा अधिक होनी चाहिए थी, जबकि प्रयोगों में गतिज ऊर्जा केवल आवृत्ति पर निर्भर पाई गई!
2. देहली आवृत्ति की व्याख्या में असमर्थ: तरंग सिद्धांत के अनुसार किसी भी आवृत्ति का प्रकाश, यदि पर्याप्त तीव्रता का हो, इलेक्ट्रॉनों को उत्सर्जित करने में समर्थ होना चाहिए था। अतः देहली आवृत्ति का अस्तित्व तरंग सिद्धांत से नहीं समझाया जा सका।
3. समय-पश्चता का विरोधाभास: तरंग सिद्धांत के अनुसार आपतित प्रकाश की ऊर्जा तरंगाग्र पर संपूर्ण धातु तल पर फैल जाती है। गणना के अनुसार एक इलेक्ट्रॉन को कार्यफलन जितनी ऊर्जा सोखने में कई घंटे लग जाने चाहिए थे, जबकि उत्सर्जन पलक झपकते ही ($10^{-9}\text{ s}$) हो जाता है!