1.1 तरंगाग्र (Wavefront) की परिभाषा एवं प्रकार
परिभाषा: किसी माध्यम में प्रकाश स्रोत से निकलने वाले विक्षोभ के कारण समान कला (Same Phase) में कंपन करने वाले सभी कणों के बिंदुपथ (Locus) को तरंगाग्र कहते हैं। प्रकाश किरणें सदैव तरंगाग्र के लंबवत होती हैं।
- 1. गोलीय तरंगाग्र (Spherical Wavefront): किसी बिंदु प्रकाश स्रोत (Point Source) से परिमित दूरी पर उत्पन्न तरंगाग्र संकेंद्री गोले होते हैं।
- 2. बेलनाकार तरंगाग्र (Cylindrical Wavefront): किसी रेखीय प्रकाश स्रोत (जैसे संकीर्ण स्लिट अथवा ट्यूबलाइट) से परिमित दूरी पर उत्पन्न तरंगाग्र संकेंद्री बेलन होते हैं।
- 3. समतल तरंगाग्र (Plane Wavefront): जब कोई प्रकाश स्रोत (बिंदु या रेखीय) अत्यधिक अनंत दूरी पर स्थित हो (जैसे सूर्य या दूरस्थ तारा), तो तरंगाग्र का एक छोटा भाग समतल प्रतीत होता है।
1.2 हाइगेंस का द्वितीयक तरंगिकाओं का सिद्धांत (Huygens' Principle)
- किसी तरंगाग्र का प्रत्येक बिंदु एक नए विक्षोभ स्रोत की भांति कार्य करता है, जिससे नई गोलीय तरंगें निकलती हैं जिन्हें द्वितीयक तरंगिकाएं (Secondary Wavelets) कहते हैं। ये तरंगिकाएं माध्यम में प्रकाश के वेग ($v$) से आगे बढ़ती हैं।
- किसी दिए गए समय $t$ पर इन द्वितीयक तरंगिकाओं को आगे की ओर स्पर्श करने वाला पृष्ठ (अन्वालोप - Forward Envelope) उस क्षण नए तरंगाग्र की स्थिति को प्रदर्शित करता है।
1.3 हाइगेंस सिद्धांत द्वारा प्रकाश के अपवर्तन के नियम का निगमन (स्नेल नियम)
1. माना $XY$ एक समतल अंतरापृष्ठ है जो दो माध्यमों को अलग करता है। माध्यम-1 में प्रकाश की चाल $v_1$ तथा माध्यम-2 में चाल $v_2$ है ($n_1 < n_2$, माध्यम-2 सघन है)।
2. माना एक समतल तरंगाग्र $AB$ अंतरापृष्ठ पर आपतन कोण $i$ पर आपतित होता है।
3. सिरा $A$ पृष्ठ को छूता है, जबकि सिरे $B$ को बिंदु $C$ तक पहुँचने में $t$ समय लगता है: अतः $\mathbf{BC = v_1 t}$。
4. इस दौरान बिंदु $A$ से द्वितीयक तरंगिका माध्यम-2 में गति करती है और $t$ समय में $AD$ दूरी तय करती है: अतः $\mathbf{AD = v_2 t}$。
5. बिंदु $C$ से $AD$ पर स्पर्श रेखा खींचने पर समतल $CD$ अपवर्तित तरंगाग्र बनता है, जहाँ अपवर्तन कोण $r$ है。
• समकोण त्रिभुज $\Delta ABC$ में: $\sin i = \frac{BC}{AC} = \frac{v_1 t}{AC}$
• समकोण त्रिभुज $\Delta ADC$ में: $\sin r = \frac{AD}{AC} = \frac{v_2 t}{AC}$
भाग देने पर:
$$\mathbf{\frac{\sin i}{\sin r} = \frac{v_1 t / AC}{v_2 t / AC} = \frac{v_1}{v_2}}$$
चूंकि अपवर्तनांक $n_1 = c/v_1$ तथा $n_2 = c/v_2 \implies \frac{v_1}{v_2} = \frac{n_2}{n_1}$:
$$\mathbf{\frac{\sin i}{\sin r} = \frac{n_2}{n_1} = {_1n_2}}$$ (स्नेल का नियम इति सिद्धम्)
क्रांतिक निष्कर्ष: चूंकि सघन माध्यम में $n_2 > n_1$, अतः $\frac{\sin i}{\sin r} > 1 \implies \sin i > \sin r \implies i > r$ (किरण अभिलंब की ओर झुकती है) तथा $v_2 < v_1$ (सघन माध्यम में प्रकाश का वेग कम होता है)।