(क) मूल काव्यांश:
मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।
इस गंभीर अनंत नीलिमा में असंख्य जीवन-इतिहास,
यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास,
तब भी कहते हो—कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती?
तुम सुनोगे, सुख पाओगे, देखोगे—यह गागर रीती!
(ख) संदर्भ, प्रसंग एवं विस्तृत भावार्थ:
संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश छायावाद के प्रवर्तक महाकवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कविता 'आत्मकथ्य' से उद्धृत है, जो हमारी पाठ्यपुस्तक 'क्षितिज भाग-2' में संकलित है।
प्रसंग: मित्रों द्वारा आत्मकथा लिखने का आग्रह किए जाने पर कवि जीवन की नश्वरता, अपनी असफलताओं और अंतर्मन की स्थिति का उद्घाटन करते हैं।
भावार्थ: कवि कहते हैं कि मेरा मन रूपी भँवरा (मधुप) गुनगुनाकर न जाने अपनी कौन-सी विरह-व्यथा की कहानी कह रहा है। जीवन रूपी वृक्ष से आज न जाने कितनी इच्छाएं और आशाएं सूखी पत्तियों की तरह मुरझा-मुरझाकर गिर रही हैं (अर्थात् जीवन निराशा और दुखों से भर गया है)।
इस विस्तृत और नीले आकाश (अनंत नीलिमा) के नीचे न जाने कितने महापुरुषों और सामान्य मनुष्यों ने अपने जीवन का इतिहास (आत्मकथाएं) लिखा है। परंतु ध्यान से देखने पर ऐसा लगता है मानो वे अपनी कमजोरियों और भूलों को दुनिया के सामने उजागर करके स्वयं अपना ही गंदा और उपहासास्पद मजाक (व्यंग्य-मलिन उपहास) उड़वाते रहते हैं!
कवि अपने मित्रों से प्रश्न करते हैं—"हे मित्रो! यह सब जानते हुए भी क्या तुम मुझसे यह चाहते हो कि मैं अपने जीवन की असफलताओं, कमजोरियों और धोखों की बीती हुई कहानी सबके सामने कह डालूँ? जब तुम मेरी इस कहानी को सुनोगे, तो क्या तुम्हें सुख मिलेगा? तुम देखोगे कि मेरा जीवन तो एक खाली घड़े (गागर रीती) के समान है जिसमें खुशियों का एक भी कतरा शेष नहीं है!"
(ग) विशेष एवं काव्य-सौंदर्य:
- 'मधुप' में रूपक अलंकार (मन रूपी भँवरा)।
- 'अनंत नीलिमा' जीवन के असीम विस्तार का सुंदर प्रतीक है।
- 'गागर रीती' जीवन के अभावों, उपलब्धिशून्यता और खालीपन का अत्यंत मार्मिक लाक्षणिक प्रयोग है।
- भाषा: संस्कृतनिष्ठ तत्सम प्रधान शुद्ध खड़ी बोली हिंदी।
- शैली: छायावादी आत्मपरक गीत शैली, प्रश्नवाचक शैली।