(क) मूल पद:
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यों जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।
प्रीति-नदी मैं पाउँ न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी।
'सूरदास' अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यों पागी॥
(ख) संदर्भ एवं प्रसंग:
संदर्भ: प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक 'क्षितिज भाग-2' में संकलित 'सूरदास के पद' से उद्धृत है। इसके रचयिता भक्तिकाल के महाकवि सूरदास हैं। यह पद उनके प्रसिद्ध ग्रंथ 'सूरसागर' के 'भ्रमरगीत' प्रसंग से लिया गया है।
प्रसंग: श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल गोपियों के पास जब उद्धव योग और निर्गुण भक्ति का उपदेश लेकर आते हैं, तब गोपियां उन पर व्यंग्य करते हुए उनके दुर्भाग्य को भाग्यशाली कहती हैं।
(ग) विस्तृत भावार्थ:
गोपियां व्यंग्य करते हुए कहती हैं—"हे उद्धव! आप तो बड़े भाग्यशाली हैं (वास्तव में वे उन्हें परम अभागा कह रही हैं कि आप प्रेम से वंचित हैं)। आप श्रीकृष्ण के इतने निकट रहते हुए भी उनके प्रेम रूपी धागे (स्नेह-तगा) से पूरी तरह अलिप्त (अछूते) रहे और आपके मन में कभी किसी के प्रति अनुराग (प्रेम) उत्पन्न ही नहीं हुआ!
आपकी स्थिति तो ठीक कमल के पत्ते (पुरइनि पात) के समान है, जो रहता तो जल के भीतर है, परंतु जल की एक बूंद का दाग भी उस पर नहीं ठहरता! अथवा आपकी दशा तेल लगी मटकी (गागरि) जैसी है, जिसे जल में डुबोने पर भी जल की एक बूंद उस पर नहीं टिकती और वह सूखी की सूखी बाहर निकल आती है।
आपने श्रीकृष्ण रूपी प्रेम की पावन नदी में कभी अपना पैर तक नहीं डुबोया और न ही आपकी दृष्टि उनके रूप-सौंदर्य पर मुग्ध हुई। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियां विवशता से कहती हैं—परंतु हम तो भोली-भाली अबला गोपियां हैं, जो श्रीकृष्ण के प्रेम में उसी प्रकार लिपटकर अपनी सुध-बुध खो बैठी हैं जैसे गुड़ में चींटियां चिपट जाती हैं और अंत में वहीं अपने प्राण त्याग देती हैं!"
(घ) विशेष एवं काव्य-सौंदर्य (JAC परीक्षा अनिवार्य):
- भाव-सौंदर्य: गोपियों का उद्धव के प्रति तीखा वक्रोक्तिपूर्ण व्यंग्य और श्रीकृष्ण के प्रति एकनिष्ठ व अनन्य समर्पण का अत्यंत मार्मिक चित्रण।
- भाषा: सहज, स्वाभाविक, माधुर्य गुण संपन्न साहित्यिक ब्रजभाषा।
- रस: विप्रलंभ शृंगार रस (वियोग शृंगार) के साथ हास्य-व्यंग्य का पुट।
- अलंकार:
- 'बड़भागी' में वक्रोक्ति / व्यंग्य (प्रशंसा के बहाने निंदा)।
- 'पुरइनि पात...' तथा 'ज्यों जल माहँ...' में दृष्टांत एवं उदाहरण अलंकार।
- 'प्रीति-नदी' में रूपक अलंकार (प्रेम रूपी नदी)।
- 'गुर चाँटी ज्यों पागी' में उपमा अलंकार।
- शैली: पद शैली, संगीतात्मकता एवं गेयता (लयबद्ध पद)।