(क) मूल चौपाई एवं दोहा:
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरिकरनी करि करिअ लराई॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
सुनि मुनिबचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
दोहा:
रे नृपबालक कालबस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम त्रिपुरारिधनु बिदित सकल संसार॥
(ख) संदर्भ, प्रसंग एवं विस्तृत भावार्थ:
संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश भक्तिकाल के अमर कवि गोस्वामी तुलसीदास रचित 'रामचरितमानस' के 'बालकांड' से उद्धृत है।
प्रसंग: शिवधनुष टूटने पर क्रोधित परशुराम जब सभा में गरजते हैं, तब श्रीराम अत्यंत विनम्रता से उत्तर देते हैं और लक्ष्मण व्यंग्यपूर्वक बात को आगे बढ़ाते हैं।
भावार्थ: श्रीराम दोनों हाथ जोड़कर अत्यंत शीतल वाणी में कहते हैं—"हे नाथ! भगवान शिव के इस धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास (सेवक) होगा। मेरे लिए क्या आज्ञा है, आप मुझसे क्यों नहीं कहते?" यह सुनकर क्रोधी मुनि परशुराम और अधिक कुपित होकर बोले—"सेवक तो वह होता है जो सेवा का कार्य करे; शत्रुता का कार्य (अरि-करनी) करके तो केवल लड़ाई ही लड़ी जाती है! हे राम, सुनो! जिसने भी इस शिवधनुष को तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा परम शत्रु है। वह इस राजाओं के समाज से तुरंत अलग होकर बाहर आ जाए, अन्यथा यहाँ उपस्थित सभी राजा व्यर्थ ही मारे जाएंगे!"
मुनि के ये अहंकार भरे वचन सुनकर लक्ष्मण जी मंद-मंद मुस्कुराने लगे और परशुराम जी का अपमान (उपहास) करते हुए बोले—"हे गोसाईं! बचपन में हमने खेल-खेल में ऐसी जाने कितनी छोटी-छोटी धनुहियाँ तोड़ डालीं, तब तो आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया! इसी धनुष पर आपकी इतनी विशेष ममता किस कारण से है?"
यह सुनकर भृगुकुल की पताका स्वरूप परशुराम जी क्रोध में तमतमाकर बोले—"अरे राजपुत्र! तू काल के वश में होकर बोल रहा है, इसीलिए तुझे अपनी वाणी पर कोई नियंत्रण नहीं है! सारा संसार जानता है कि यह भगवान त्रिपुरारी (शिव जी) का दिव्य धनुष है, तू इसकी तुलना साधारण धनुहियों से कर रहा है?"
(ग) विशेष:
- श्रीराम की विनम्रता और लक्ष्मण के व्यंग्य का सुंदर विरोधाभास।
- 'सेवकु सो जो करै सेवकाई' तथा 'सहसबाहु सम सो रिपु मोरा' में अनुप्रास एवं उपमा अलंकार।
- अवधी भाषा, चौपाई और दोहा छंद, रौद्र रस के साथ हास्य रस का पुट।