(क) मूल कविता: 'उत्साह'
घेर घेर घोर गगन, परधिरो!
ललित ललित, काले घुँघराले,
बाल कल्पना के-से पाले,
विद्युत-छवि उर में, कवि, नवजीवन वाले!
वज्र छिपा, नूतन कविता
फिर भर दो—
बादल, गरजो!
विकल विकल, उन्मन थे उन्मन,
विश्व के निदाघ के सकल जन,
आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन!
तप्त धरा, जल से फिर
शीतल कर दो—
बादल, गरजो!
(ख) विस्तृत भावार्थ:
प्रथम बंध: कवि बादलों का आह्वान करते हुए ओजस्वी स्वर में कहते हैं—"हे बादलो! तुम केवल धीमे-धीमे बरसो मत, बल्कि गरजते हुए आकाश में छा जाओ! तुम इस विशाल और सघन आकाश (घोर गगन) को चारों ओर से घेरकर मूसलाधार बरसो!
तुम्हारा स्वरूप बहुत ही सुंदर (ललित) और घुंघराले काले केशों के समान आकर्षक है। तुम अबोध बालकों की असीम कल्पनाओं की तरह अनगढ़, कोमल और बदलते रहने वाले हो। हे बादलो! तुम्हारे हृदय (उर) में बिजली की अलौकिक चमक (विद्युत-छवि) छिपी हुई है। तुम संसार को नया जीवन और नई ऊर्जा देने वाले हो!
कवि बादलों को एक क्रांतिकारी कवि के रूप में संबोधित करते हुए कहते हैं कि तुम्हारे सीने में वज्र जैसी कठोर और विध्वंसकारी शक्ति छिपी है। तुम अपनी उस प्रलयंकारी शक्ति से समाज में एक नई चेतना और नूतन कविता का संचार कर दो! हे बादलो, तुम भीषण गर्जना करो!"
द्वितीय बंध: कवि कहते हैं कि जेठ की भीषण और झुलसा देने वाली गर्मी (निदाघ) से संसार के सभी मनुष्य अत्यंत व्याकुल (विकल) और अनमने (उदासीन/उन्मन) हो रहे थे।
तभी न जाने किस अज्ञात दिशा से इस असीम आकाश (अनंत) के बादल उमड़-घुमड़ कर आ पहुँचे हैं! हे बादलो! यह संपूर्ण पृथ्वी धूप और कष्टों से तपी हुई है (तप्त धरा)। तुम अपने शीतल और अमृतमय जल की वर्षा करके इस पीड़ित धरती और उसके समस्त प्राणियों को शीतलता और नवजीवन प्रदान करो! हे बादलो, तुम जोर से गरजो!"
(ग) विशेष:
- काव्य-गुण: संपूर्ण कविता में ओज गुण और वीर रस की तरंग विद्यमान है।
- अलंकार:
- 'घेर घेर घोर गगन' में अनुप्रास अलंकार ('घ' और 'ग' की आवृत्ति)।
- 'ललित ललित', 'विकल विकल' में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार।
- 'बाल कल्पना के-से पाले' में उपमा अलंकार।
- नाद-सौंदर्य: शब्दों के चयन से मेघों की गर्जना और बिजली की कड़क का सजीव ध्वनि-प्रभाव (Acoustic effect) उत्पन्न होता है।