निबंध के प्रारंभ में ही अज्ञेय जी स्वयं से यह यक्ष-प्रश्न पूछते हैं—'मैं क्यों लिखता हूँ?' और फिर बड़े स्पष्ट शब्दों में स्वीकार करते हैं कि इस प्रश्न का उत्तर देना जितना सरल प्रतीत होता है, वास्तव में उतना ही कठिन है।
1.1 भीतरी विवशता (Internal Urge):
लेखक का मानना है कि लिखने का वास्तविक और प्राथमिक कारण 'भीतरी विवशता' है। जब किसी घटना या विचार से लेखक के मन में एक ऐसी व्याकुलता, बेचैनी और आंतरिक दबाव पैदा होता है, जिससे वह तब तक मुक्त नहीं हो सकता जब तक कि उसे कागज़ पर शब्दों के माध्यम से उकेर न दे। लिखकर ही लेखक उस आंतरिक दबाव से मुक्ति (Catharsis) पाता है और स्वयं को पहचानता है।
1.2 बाहरी दबाव (External Pressures):
भीतरी विवशता के अतिरिक्त कुछ बाह्य कारण भी लेखक को लिखने के लिए प्रेरित करते हैं, जैसे:
- संपादकों का आग्रह: पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों द्वारा किसी विशेषांक के लिए रचना की मांग।
- प्रकाशक का तकाज़ा: अनुबंध (Contract) के अनुसार नई पुस्तक समय पर देने की विवशता।
- आर्थिक आवश्यकता: जीवन-यापन के लिए रॉयल्टी अथवा पारिश्रमिक प्राप्त करने का उद्देश्य।
- यश और प्रतिष्ठा: समाज में सम्मान और साहित्यिक ख्याति अर्जित करने की स्वाभाविक मानवीय इच्छा।