1.1 घर्षण द्वारा विद्युत उत्पत्ति एवं दो प्रकार के आवेश
जब किन्हीं दो उपयुक्त अचालक पदार्थों को आपस में रगड़ा जाता है, तो उनमें कागज के छोटे टुकड़ों, तिनकों या धूल-कणों जैसी हल्की वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करने का गुण आ जाता है। वस्तु की इस अवस्था को आवेशित अवस्था तथा घर्षण के कारण उत्पन्न इस विद्युत को स्थिर विद्युत (Static Electricity) कहते हैं, क्योंकि उत्पन्न आवेश वस्तु पर उसी स्थान पर स्थिर रहता है और प्रवाहित नहीं होता।
अमेरिकी वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रैंकलिन (1706–1790) ने प्रयोगों के आधार पर स्थिर विद्युत आवेशों को दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया:
- धनात्मक आवेश (+): काँच की छड़ को शुद्ध रेशम (Silk) से रगड़ने पर काँच की छड़ पर उत्पन्न होने वाला आवेश। (रेशम पर समान मात्रा में ऋणात्मक आवेश उत्पन्न होता है)।
- ऋणात्मक आवेश (-): एबोनाइट या अंबर की छड़ को ऊनी कपड़े या फलालेन (Flannel/Wool) से रगड़ने पर छड़ पर उत्पन्न होने वाला आवेश। (ऊनी कपड़े पर समान धनात्मक आवेश आ जाता है)।
स्थिर विद्युत का मूल नियम: सजातीय (समान) आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं, जबकि विजातीय (विपरीत) आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं।
1.2 आवेशन का इलेक्ट्रॉन सिद्धांत एवं आवेश संरक्षण नियम
आधुनिक परमाणु भौतिकी के अनुसार प्रत्येक परमाणु सामान्य अवस्था में विद्युत उदासीन होता है, क्योंकि उसके नाभिक में उपस्थित धनात्मक प्रोटॉनों की संख्या और बाहर विभिन्न कक्षाओं में परिक्रमा कर रहे ऋणात्मक इलेक्ट्रॉनों की संख्या बिल्कुल बराबर होती है:
$$\text{कुल प्रोटॉन संख्या } (+) = \text{कुल इलेक्ट्रॉन संख्या } (-)$$घर्षण द्वारा आवेशन का कारण: नाभिक के भीतर बंधे प्रोटॉन शक्तिशाली नाभिकीय बल के कारण कभी स्थानांतरित नहीं हो सकते। परंतु परमाणुओं की सबसे बाहरी कक्षा में स्थित ढीले संयोजी इलेक्ट्रॉन घर्षण से उत्पन्न ऊष्मा से एक वस्तु से दूसरी वस्तु में चले जाते हैं:
- जो वस्तु इलेक्ट्रॉन त्यागती है: उसमें इलेक्ट्रॉनों की कमी हो जाती है और वह धनात्मक रूप से आवेशित (+Q) हो जाती है।
- जो वस्तु इलेक्ट्रॉन ग्रहण करती है: उसमें इलेक्ट्रॉनों की अधिकता हो जाती है और वह समान मात्रा में ऋणात्मक रूप से आवेशित (-Q) हो जाती है।
आवेश संरक्षण का नियम (Conservation of Charge): आवेश न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है; किसी विलगित निकाय में कुल धनात्मक व ऋणात्मक आवेशों का बीजगणितीय योग सदैव स्थिर रहता है। आवेशन केवल इलेक्ट्रॉनों का पुनर्वितरण मात्र है।
आवेश का क्वांटमीकरण (Quantization of Charge): किसी भी आवेशित वस्तु पर कुल आवेश $Q$ सदैव मूल इलेक्ट्रॉन आवेश $e$ ($1.602 \times 10^{-19}\text{ C}$) का पूर्ण गुणज होता है:
$$Q = \pm n \cdot e \quad (n = 1, 2, 3, \dots)$$1.3 स्थिर वैद्युत प्रेरण (मुक्त एवं बद्ध आवेश)
स्थिर वैद्युत प्रेरण (Electrostatic Induction): किसी आवेशित वस्तु को किसी अनावेशित चालक के निकट (बिना स्पर्श किए) लाने पर, चालक के सिरों पर विपरीत प्रकृति के आवेशों के अस्थायी संचय की घटना को स्थिर वैद्युत प्रेरण कहते हैं।
प्रायोगिक प्रदर्शन:
- एक कुचालक स्टैंड पर रखे धातु के अनावेशित बेलनाकार चालक के निकट एक धनावेशित काँच की छड़ लाई गई।
- काँच की छड़ के आकर्षण से चालक के मुक्त इलेक्ट्रॉन निकटवर्ती सिरे ($A$) पर खिंच आते हैं, जिससे $A$ सिरे पर ऋणात्मक आवेश संचित हो जाता है। दूरवर्ती सिरे ($B$) पर इलेक्ट्रॉनों की कमी होने से समान परिमाण का धनात्मक आवेश उत्पन्न हो जाता है।
प्रेरित आवेशों का वर्गीकरण:
- बद्ध आवेश (Bound Charge): चालक के निकटवर्ती सिरे ($A$) पर उत्पन्न विपरीत प्रकृति का आवेश। यह प्रेरक छड़ के तीव्र आकर्षण में बंधा रहता है और चालक को भू-संपर्कित करने पर भी जमीन में नहीं जा सकता।
- मुक्त आवेश (Free Charge): चालक के दूरवर्ती सिरे ($B$) पर उत्पन्न समान प्रकृति का आवेश। यह प्रेरक छड़ द्वारा प्रतिकर्षित होने के कारण स्वतंत्र रहता है। चालक को उंगली से छूते ही पृथ्वी से इलेक्ट्रॉन आकर इस मुक्त धनावेश को उदासीन कर देते हैं।
स्वर्णिम नियम: आकर्षण से पहले सदैव प्रेरण होता है। जब आवेशित कंघी कागज के अनावेशित टुकड़ों को खींचती है, तो वह पहले कागज के निकटवर्ती पृष्ठ पर प्रेरण द्वारा विपरीत आवेश पैदा करती है, जिसके बाद ही आकर्षण संभव होता है।
1.4 स्वर्ण-पत्र विद्युतदर्शी (Gold-Leaf Electroscope)
स्वर्ण-पत्र विद्युतदर्शी एक अत्यंत संवेदनशील वैज्ञानिक उपकरण है, जिसकी सहायता से किसी वस्तु पर विद्युत आवेश की उपस्थिति, उसकी मात्रा एवं उसकी प्रकृति (धनात्मक या ऋणात्मक) की पहचान की जाती है।
उपकरण की मुख्य संरचना:
- पीतल की चकती (Brass Disc): उपकरण के ऊपरी सिरे पर स्थित धातु की चकती, जो आवेश ग्रहण करने या प्रेरण के लिए प्रयुक्त होती है।
- पीतल की छड़: कुचालक कॉर्क में से होकर काँच के जार के भीतर जाने वाली ऊर्ध्वाधर छड़।
- स्वर्ण-पत्र (Gold Leaves): छड़ के निचले सिरे पर लटकी सोने या एल्युमीनियम की दो अत्यंत महीन व लचीली पत्तियां।
- काँच का जार एवं टिन की पट्टियां: वायु के झोंकों से बचाने वाला पारदर्शी जार, जिसके भीतरी किनारों पर भू-संपर्कित टिन की पत्तियां लगी होती हैं जो उपकरण की संवेदनशीलता बढ़ाती हैं।
कार्यप्रणाली एवं आवेश परीक्षण:
- आवेश की उपस्थिति: अनावेशित विद्युतदर्शी की चकती से वस्तु को छूने या निकट लाने पर यदि दोनों पत्तियां फैल जाती हैं (प्रतिकर्षित होती हैं), तो वस्तु आवेशित है। यदि पत्तियां न फैलें, तो वस्तु अनावेशित है।
- आवेश की प्रकृति परीक्षण: पहले विद्युतदर्शी को किसी ज्ञात आवेश (जैसे धनात्मक) से आवेशित कर लिया जाता है, जिससे पत्तियां पहले से फैली रहती हैं। अब अज्ञात वस्तु को चकती के पास लाया जाता है:
- यदि पत्तियों का फैलाव और बढ़ जाता है, तो अज्ञात वस्तु पर विद्युतदर्शी के समान ही धनात्मक आवेश है।
- यदि पत्तियों का फैलाव घट जाता है, तो वस्तु पर विपरीत आवेश (ऋणात्मक) है या वह अनावेशित है।
परीक्षण का सार्वभौमिक सत्य: आकर्षण नहीं, बल्कि प्रतिकर्षण ही आवेशन का एकमात्र निश्चित प्रमाण है, क्योंकि प्रेरण के कारण एक अनावेशित वस्तु भी आवेशित वस्तु द्वारा आकर्षित हो सकती है।
1.5 स्थिर विद्युत में कूलॉम का नियम (Coulomb's Law)
1785 में फ्रांसीसी भौतिक विज्ञानी चार्ल्स-ऑगस्टिन डी कूलॉम ने दो स्थिर बिंदु आवेशों के बीच लगने वाले स्थिर वैद्युत बल के संबंध में एक मूलभूत गणितीय नियम प्रतिपादित किया:
कूलॉम का नियम: दो स्थिर बिंदु आवेशों के मध्य कार्यरत आकर्षण अथवा प्रतिकर्षण बल दोनों आवेशों के परिमाणों के गुणनफल के समानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
$$\mathbf{F = k \cdot \frac{|q_1 \cdot q_2|}{r^2}}$$जहाँ:
- $q_1, q_2$ दोनों बिंदु आवेशों के मान हैं (कूलॉम में)।
- $r$ आवेशों के बीच की दूरी है (मीटर में)।
- $k$ माध्यम का स्थिर वैद्युत नियतांक है (वायु अथवा निर्वात में $k \approx 9 \times 10^9\text{ N}\cdot\text{m}^2/\text{C}^2$)।